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‘Smash the Patriarchy’ राहुल गांधी का खोखला विमर्श और नए भारत में ‘नारी शक्ति’ का उदय

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चुनावी सभाओं और मंचों से गढ़े जाने वाले राजनीतिक नारों और नीतिगत हकीकत के बीच का अंतर भारतीय राजनीति में अक्सर चर्चा का विषय बनता रहा है। कांग्रेस नेता राहुल गांधी द्वारा मंचों से “Smash the Patriarchy” (पितृसत्ता को ध्वस्त करो) का आह्वान इसी राजनीतिक विरोधाभास की सबसे ताजा बानगी है। लगातार कई चुनावी पराजयों के बावजूद पार्टी का सर्वोच्च नेतृत्व और चेहरा बार-बार सिर्फ राहुल गांधी को ही बनाया गया, जो सीधे तौर पर वंशवादी व्यवस्था का प्रमाण है। जब एक राजनीतिक दल अपने आंतरिक संगठन में वंशवाद और पारिवारिक प्राथमिकताओं को योग्यता से ऊपर रखता है, तो ऐसे प्रगतिशील नारे केवल सैद्धांतिक विमर्श बनकर रह जाते हैं। इसके विपरीत, वास्तविक महिला सशक्तिकरण प्रतीकात्मक भाषणों के बजाय नीतिगत सुधारों, संवैधानिक अधिकारों और आर्थिक सुरक्षा से तय होता है।

राहुल गांधी का ‘मनुस्मृति’ पर हमला और पितृसत्ता का नारा
पुणे में आयोजित ‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम के दौरान कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने युवाओं और छात्राओं को संबोधित करते हुए “Smash the Patriarchy” (पितृसत्ता को ध्वस्त करो) और “पिंजरा तोड़ो” का नारा दिया। अपने भाषण में उन्होंने मनुस्मृति के एक श्लोक का हवाला देते हुए आरोप लगाया कि भारतीय समाज में महिलाओं को बचपन में पिता, युवावस्था में पति और बुढ़ापे में बेटे के अधीन रखने की मानसिकता बनाई गई है। उन्होंने दावा किया कि देश की 70 करोड़ महिलाएं सबसे बड़ी ताकत हैं, लेकिन उन्हें एक नियंत्रित दायरे में बांधकर रखा जाता है।

वामपंथी विमर्श के जरिए समाज बांटने की कोशिश 
राहुल गांधी का यह बयान पहली नजर में प्रगतिशील लग सकता है, लेकिन गहराई से विश्लेषण करें तो यह शुद्ध रूप से चुनावी लाभ के लिए भारतीय संस्कृति और सनातन परंपरा को खलनायक साबित करने की सोची-समझी रणनीति है। जिस प्राचीन ग्रंथ की आड़ लेकर वे बहुसंख्यक समाज को कठघरे में खड़ा कर रहे हैं, उस पर तो दशकों पहले संविधान लागू होने के साथ ही देश आगे बढ़ चुका है। असल में राहुल गांधी पश्चिमी और वामपंथी सिद्धांतों के चश्मे से भारतीय समाज में ‘लिंग और पहचान का विभाजन’ पैदा कर युवाओं को भड़काने की कोशिश कर रहे हैं। खुद अपने दल के भीतर योग्यता को दरकिनार कर दशकों से परिवारवादी और वंशवादी पितृसत्ता को पालने वाले नेता जब मंचों से सामाजिक संरचना पर उपदेश देते हैं, तो उनका दोहरा चरित्र स्वतः उजागर हो जाता है। राहुल गांधी के इसी पाखंड और संकीर्ण राजनीतिक दांव पर भारतीय जनता पार्टी ने तीखा पलटवार किया है। 

बाबासाहेब के विचारों की अनदेखी और सुविधा के नारीवाद पर सवाल
भारतीय जनता पार्टी ने कांग्रेस और राहुल गांधी के इस अभियान की असलियत उजागर करते हुए पूछा है कि क्या राहुल गांधी ने कभी भारत रत्न डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर को पढ़ा भी है? डॉ. आंबेडकर ने अपनी पुस्तक ‘Pakistan or the Partition of India’ (अध्याय X, “Social Stagnation”) में मुस्लिम महिलाओं की स्थिति और पर्दा प्रथा पर कड़े शब्दों में लिखा था कि पर्दा प्रथा केवल पोशाक का विषय नहीं, बल्कि महिलाओं को सामाजिक जीवन से अलग-थलग करने वाली एक व्यवस्था है। बाबासाहेब ने स्पष्ट लिखा था कि यह प्रथा मुस्लिम महिलाओं को मानसिक और नैतिक विकास से वंचित करती है और उन्हें असहाय बनाती है। उन्होंने यह भी रेखांकित किया था कि पर्दा प्रथा को केवल धार्मिक निर्देशों और सामाजिक आवश्यकताओं के बीच के संघर्ष का सामना करके ही समाप्त किया जा सकता है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या राहुल गांधी का ‘Smash the Patriarchy’ अभियान बाबासाहेब के इस दृष्टिकोण से मेल खाता है, या फिर यह केवल बहुसंख्यक समाज पर व्याख्यान देने और वोट-बैंक की खातिर अन्य कुप्रथाओं पर आंखें मूंद लेने वाला ‘सुविधा का नारीवाद’ है?

दोहरे मापदंड बनाम सनातन धर्म का आत्म-सुधार
इतना ही नहीं, राहुल गांधी का यह अभियान यह बुनियादी सवाल भी खड़ा करता है कि क्या उनका पितृसत्ता विरोधी रुख सभी धर्मों पर समान रूप से लागू होता है या सिर्फ हिंदू धर्म पर? हाल ही में इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि हिजाब इस्लाम का अनिवार्य धार्मिक अंग नहीं है और स्कूलों के यूनिफॉर्म नियमों को बरकरार रखा। इसके बावजूद कांग्रेस का दोहरा रुख सामने आता रहा है। यदि धार्मिक ग्रंथों में लैंगिक समानता की बात होती है, तो क्या राहुल गांधी अन्य धार्मिक ग्रंथों में महिलाओं की अधीनता से जुड़े अंशों पर कभी सार्वजनिक बहस का साहस दिखाएंगे? हिंदू धर्म की वास्तविक शक्ति आत्म-मंथन, संवाद और आंतरिक सुधार की रही है। यदि राहुल गांधी वास्तव में पितृसत्ता को समाप्त करना चाहते हैं, तो उन्हें बिना किसी तुष्टिकरण या वोट-बैंक की राजनीति के सभी पर समान मानक लागू करने चाहिए।

सनातन संस्कृति में नारी की स्वायत्तता बनाम वामपंथी-कांग्रेसी नैरेटिव का पाखंड

पश्चिमी विमर्श और भारत की ऐतिहासिक सच्चाई
कांग्रेस और वामपंथी विमर्शकारों द्वारा भारतीय परंपरा और सनातन।संस्कृति को सदैव एकतरफा रूप से ‘प्रतिगामी’ और ‘पितृसत्तात्मक’ सिद्ध करने का षड्यंत्र रचा जाता रहा है। राहुल गांधी का ‘Smash the Patriarchy’ जैसा खोखला नारा दरअसल पश्चिमी आयातित सिद्धांतों का वह चश्मा है, जो भारत के गौरवशाली इतिहास, वैदिक विदुषियों और वीरांगनाओं के वास्तविक योगदान को नकारता है। ऐतिहासिक और सांस्कृतिक यथार्थ यह सिद्ध करता है कि जिस सनातन कालखंड को रूढ़िवादिता का पर्याय बताकर बदनाम किया जाता है, उसी दौर में भारतीय नारी को सर्वोच्च बौद्धिक, निर्णयकारी, राजनीतिक और सामरिक स्वायत्तता प्राप्त थी।

वैवाहिक चयन और व्यक्तिगत स्वायत्तता का सनातन स्वरूप (स्वयंवर से सावित्री तक)
पश्चिमी नारीवाद के आने से सदियों पहले सनातन परंपरा ने नारी को अपने जीवनसाथी के चयन का पूर्ण अधिकार प्रदान किया था। रामायण काल में माता सीता ने स्वयंवर के माध्यम से अपनी पसंद और योग्यता के आधार पर मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम को अपना वर चुना। स्वयंवर की यह परंपरा इस बात का प्रमाण है कि निर्णय का अधिकार सदैव स्त्री के हाथ में केंद्रित था। वहीं, जब समाज को तथाकथित रूप से नियमों में बंधा बताया जाता है, तब सावित्री ने अपने दृढ संकल्प के बल पर सत्यवान का वरण किया और अपने आत्मनिर्णय और विवेक के आधार पर जीवन का सबसे बड़ा फैसला स्वयं लिया।

ज्ञान, दर्शन और वेदों की रचना में मातृशक्ति का शीर्ष स्थान (22 ब्रह्मवादिनी विदुषियां)
भारतीय ज्ञान परंपरा में महिलाओं की भूमिका केवल अनुयायी की नहीं, बल्कि ज्ञान की रचयिता (ऋषिका) की रही है। वैदिक काल में 22 से अधिक विदुषी महिलाओं को ‘ब्रह्मवादिनी’ के रूप में मान्यता प्राप्त थी। अपाला, घोषा, लोपामुद्रा और विश्ववारा जैसी विदुषियों ने ऋग्वेद के दशम मंडल समेत कई महत्वपूर्ण वैदिक सूक्तों और मंत्रों की रचना की। वृहदारण्यक उपनिषद में महर्षि याज्ञवल्क्य जैसी महान विभूति को राजसभा में दार्शनिक प्रश्नों से निरुत्तर करने वाली विदुषी गार्गी का उदाहरण यह स्पष्ट करता है कि सनातन परंपरा में नारी की बौद्धिक क्षमता पर कोई प्रतिबंध नहीं था।

न्याय और सर्वोच्च बौद्धिक निर्णायक का आसन (देवी भारती का ऐतिहासिक प्रसंग)
सनातन परंपरा में केवल शास्त्रार्थ में भाग लेने की ही नहीं, बल्कि दार्शनिक विवादों में मुख्य न्यायाधीश बनने की शक्ति भी नारी के पास थी। जब अद्वैत वेदांत के प्रणेता आदि शंकराचार्य और प्रकांड विद्वान मंडन मिश्र के बीच ऐतिहासिक शास्त्रार्थ हुआ, तो उसके निर्णायक पद (मुख्य पीठ) पर मंडन मिश्र की पत्नी विदुषी ‘देवी भारती’ आसीन हुईं। देवी भारती ने अपने पति की इच्छा या व्यक्तिगत संबंधों से ऊपर उठकर निष्पक्ष न्याय किया और शंकराचार्य के पक्ष में निर्णय दिया। इसके पश्चात उन्होंने स्वयं आदि शंकराचार्य को शास्त्रार्थ की चुनौती दी, जहां स्वयं शंकराचार्य ने भी उनकी अद्वितीय विद्वता और तार्किक शक्ति का लोहा माना।

सामाजिक समरसता और सुशासन का शिखर (लोकमाता अहिल्याबाई होल्कर)
वामपंथी विमर्शकारों के संकीर्ण नैरेटिव को तोड़ता हुआ अहिल्याबाई होल्कर का जीवन भारतीय समाज की समरसता और नारी नेतृत्व का अनुपम उदाहरण है। एक साधारण गड़रिया परिवार की कन्या अहिल्याबाई का विवाह मालवा के राजपरिवार में हुआ, जो सनातन व्यवस्था में योग्यता और चरित्र के सर्वोच्च सम्मान का परिचायक था। पति और पुत्र के देहावसान के बाद लोकमाता देवी अहिल्याबाई ने स्वयं राजकाज संभाला, सेना का नेतृत्व किया, न्याय व्यवस्था को सुदृढ किया और सोमनाथ से लेकर काशी विश्वनाथ तक देश भर के प्रमुख तीर्थस्थलों का जीर्णोद्धार कराकर सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की नींव रखी।

राष्ट्र-निर्माण, स्वराज्य और राजसिंहासन पर समान अधिकार
प्राचीन और मध्यकालीन भारत में सत्ता का संचालन पुरुष-केंद्रित नहीं, बल्कि अर्धांगिनी के सह-अस्तित्व पर आधारित था। भारतीय परंपरा में राजा के साथ पटरानी का सिंहासन पर बैठना अनिवार्य था। चाहे राज्याभिषेक हो या धार्मिक-नीतिगत अनुष्ठान, स्त्री की उपस्थिति और सम्मति के बिना कोई भी राष्ट्रीय कार्य पूर्ण नहीं माना जाता था। वहीं, राजमाता जीजाबाई ने न केवल छत्रपति शिवाजी महाराज को संस्कारित किया, बल्कि उनके भीतर रणनीतिक दृष्टि, युद्ध कौशल और ‘हिंदवी स्वराज्य’ का संकल्प रोपा। वे स्वराज्य की प्रमुख मार्गदर्शक और नीति-निर्धारक थीं।

रणभूमि में शौर्य और सामरिक नेतृत्व (वीरांगना लक्ष्मीबाई)
जब देश की अस्मिता पर संकट आया, तो भारतीय नारी ने महल की सुख-सुविधाओं को छोड़कर रणचंडी का रूप धारण किया। रानी लक्ष्मीबाई ने बचपन में ही घुड़सवारी, तलवारबाजी और तोपखाने का संचालन सीखा और 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में अंग्रेजों की आधुनिक सेना को युद्ध के मैदान में धूल चटाई। यह उदाहरण साबित करता है कि भारतीय परंपरा में शस्त्र और शास्त्र, दोनों पर नारी का समान अधिकार रहा है।

संविधान सभा की 15 विदुषियां और कांग्रेस के कुशासन का ऐतिहासिक विरोधाभास
आजादी के समय भारतीय समाज की चेतना इतनी सशक्त थी कि बिना किसी आरक्षण के समाज के हर वर्ग की महिलाएं शीर्ष नीति-निर्माण तक पहुंचीं। भारत की संविधान सभा में हंसा मेहता, सरोजिनी नायडू, राजकुमारी अमृत कौर, मालती चौधरी, और वंचित-दलित समाज से आने वालीं दक्षायणी वेलायुधन जैसी 15 प्रखर महिलाएं बिना किसी वैधानिक आरक्षण के चुनकर आईं और संविधान निर्माण में ऐतिहासिक भूमिका निभाई। आजादी के बाद दशकों तक शासन करने वाली कांग्रेस ने तुष्टिकरण, परिवारवाद और उपदेशात्मक राजनीति के चलते महिलाओं को वास्तविक नीतिगत अधिकारों से वंचित कर दिया। परिणामस्वरूप, जिस देश में महिलाएं अपनी स्वाभाविक योग्यता से सर्वोच्च पदों पर पहुंचती थीं, वहां कांग्रेस के कुशासन के चलते महिलाओं की राजनीतिक हिस्सेदारी सिमटती गई, जिसे अंततः मोदी सरकार ने ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ के जरिए पुनः स्थापित किया।

परिवारवाद की चौखट, आंतरिक पितृसत्ता और तुष्टिकरण का ‘सुविधावादी नारीवाद’

प्रियंका गांधी वाड्रा का लंबा इंतजार और हाशिए पर योग्यता
यदि समानता और योग्यता का सिद्धांत कांग्रेस में सही मायने में लागू होता, तो संगठनात्मक फैसलों में यह स्पष्ट दिखता। एक ही परिवार के भीतर बेटे को तुरंत राष्ट्रीय भूमिका और नेतृत्व मिला, जबकि बेटी को मुख्यधारा की सक्रिय संगठनात्मक भूमिका के लिए वर्षों तक प्रतीक्षा सूची में रखा गया। योग्यता और सक्रियता के बावजूद परिवार के भीतर ही लैंगिक प्राथमिकता के कारण नेतृत्वकारी भूमिकाओं में वर्षों का विलंब देखा गया।

तुष्टिकरण की राजनीति और रूढ़िवादिता को मौन समर्थन
एक तरफ आधुनिक मंचों पर प्रगतिशील शब्दावली का प्रयोग किया जाता है, तो दूसरी तरफ चुनावी मंचों पर कट्टरपंथी और रूढ़िवादी प्रतीकों को केवल वोट-बैंक की खातिर मौन स्वीकृति दी जाती है। यह दोहरा रवैया यह साबित करता है कि ऐसे विमर्श केवल चुनावी लाभ के लिए गढ़े जाते हैं।

शाह बानो से लेकर तीन तलाक तक (तुष्टिकरण बनाम सुधार)
कांग्रेस का इतिहास यह दर्शाता है कि जब-जब मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों और कट्टरपंथ के बीच चुनाव की बात आई, तब-तब पार्टी ने वोट-बैंक की खातिर सुधारों की बलि दी। 1985 के ऐतिहासिक शाह बानो मामले में सुप्रीम कोर्ट के प्रगतिशील फैसले को संसद में कानून बदलकर निष्प्रभावी कर दिया गया था। इसके विपरीत, मोदी सरकार ने राजनीतिक विरोध की परवाह किए बिना तीन तलाक (तलाक-ए-बिद्दत) को गैर-कानूनी घोषित कर मुस्लिम महिलाओं को ऐतिहासिक कानूनी सुरक्षा कवच दिया।

बिना ‘मेहरम’ हज यात्रा की आजादी 
दशकों तक मुस्लिम महिलाओं पर यह धार्मिक और सामाजिक बंदिश लागू रही कि वे किसी पुरुष अभिभावक (मेहरम) के बिना हज यात्रा पर नहीं जा सकती थीं। कांग्रेस सरकारों ने कभी इस बंदिश को हटाने की इच्छाशक्ति नहीं दिखाई। मोदी सरकार ने इस नियम को समाप्त कर मुस्लिम महिलाओं को पूर्ण स्वायत्तता दी, जिसके बाद हजारों महिलाएं बिना किसी पुरुष अभिभावक के स्वतंत्र रूप से हज यात्रा पर गईं।

समान नागरिक संहिता (UCC): हर धर्म की बेटी को कानूनी बराबरी का अधिकार
भाजपा शासित उत्तराखंड में समान नागरिक संहिता (UCC) लागू कर विवाह, तलाक, गुजारा भत्ता और पैतृक संपत्ति में सभी धर्मों की बेटियों को समान कानूनी अधिकार दिए गए। जिस पितृसत्ता को भाषणों में कोसने का दिखावा कांग्रेस करती है, उसी पितृसत्तात्मक कुप्रथाओं को खत्म करने वाले समान नागरिक संहिता का वह विरोध करती है, जो उसके दोहरे चरित्र को उजागर करता है।

अकादमिक उपदेश बनाम भारतीय नारी का आत्मविश्वास
आज देश के अलग-अलग हिस्सों में युवा और आत्मनिर्भर महिलाएं अपनी मेहनत से नए आयाम स्थापित कर रही हैं। उन्हें किसी राजनीतिक घराने से अधिकारों पर खोखले व्याख्यान की आवश्यकता नहीं है, बल्कि ऐसे माहौल और नीतियों की आवश्यकता है जो उनकी क्षमता को पहचानें और अवसर प्रदान करें।

विधायी व संसदीय प्रतिनिधित्व—सदन में आवाज और नीतिगत इच्छाशक्ति

16वीं लोकसभा में मुखरता का रिकॉर्ड (2014–2019)
2014 में केंद्र में मोदी सरकार बनने के बाद 16वीं लोकसभा के दौरान भाजपा की महिला सांसदों ने विधायी बहसों और जनहित के मुद्दों को उठाने में उल्लेखनीय सक्रियता दिखाई, जबकि मुख्य विपक्षी दल में यह भागीदारी काफी नीचे रही।

  • भाजपा (289 में से 32 महिला सांसद, 11.1%): वॉयस रेशियो 1.25 (ओवर-वॉयस) दर्ज हुआ।
  • कांग्रेस (50 में से 4 महिला सांसद, 8.0%): वॉयस रेशियो मात्र 0.78 (अंडर-वॉयस) रहा।

17वीं लोकसभा में महिला सांसदों की सक्रियता (2019–2024)
17वीं लोकसभा में दोनों दलों में महिला सांसदों का प्रतिशत लगभग एक समान (13% से 13.6%) था, लेकिन सदन में आवाज उठाने और नीतिगत चर्चाओं में भाग लेने के अवसरों में भारी अंतर देखने को मिला।

  • भाजपा (308 में से 42 महिला सांसद, 13.6%): वॉयस रेशियो 1.16 (ओवर-वॉयस) रहा।
  • कांग्रेस (54 में से 7 महिला सांसद, 13.0%): वॉयस रेशियो घटकर मात्र 0.57 (अंडर-वॉयस) रह गया।

संसदीय बहसों में समग्र ‘वॉयस रेशियो’ (15वीं–17वीं लोकसभा)
15वीं से 17वीं लोकसभा के संयुक्त आंकड़ों (2009–2024) में दोनों दलों के बीच का अंतर स्पष्ट दिखाई देता है:

  • भाजपा (717 में से 88 महिला सांसद, 12.3%): वॉयस रेशियो 1.16 रहा (सीट हिस्सेदारी से 16% अधिक मुखरता)।
  • कांग्रेस (314 में से 36 महिला सांसद, 11.5%): वॉयस रेशियो मात्र 0.62 रहा (सीट हिस्सेदारी से 38% कम भागीदारी)।

शीर्ष सुरक्षा और वित्तीय मंत्रालयों में ऐतिहासिक नेतृत्व
दशकों तक देश के सबसे शक्तिशाली माने जाने वाले कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्योरिटी (CCS) मंत्रालयों में महिलाओं की पूर्णकालिक भागीदारी नगण्य रही। मोदी सरकार ने इस परिपाटी को तोड़ते हुए श्रीमती निर्मला सीतारमण को देश की पहली पूर्णकालिक महिला रक्षा मंत्री और पहली पूर्णकालिक महिला वित्त मंत्री के रूप में जिम्मेदारी सौंपकर देश की अर्थव्यवस्था और सामरिक नीतियों का सशक्त नेतृत्व प्रदान किया।

सर्वोच्च संवैधानिक पद पर आदिवासी महिला का नेतृत्व
प्रतीकात्मकता से आगे बढ़कर देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद (राष्ट्रपति) पर श्रीमती द्रौपदी मुर्मु का निर्वाचन भारतीय लोकतंत्र के इतिहास का अभूतपूर्व अध्याय बना। इसने दर्शाया कि शीर्ष पद अब अंतिम पायदान पर खड़ी महिलाओं की पहुंच में है।

नए संसद भवन का पहला कानून: ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ की ऐतिहासिक विजय
संसद और विधानसभाओं में महिलाओं को 33% आरक्षण देने वाला विधेयक दशकों तक लटका रहा। 2010 में राज्यसभा से पारित होने के बावजूद यूपीए शासनकाल में इसे लोकसभा में पारित कराने की राजनीतिक इच्छाशक्ति नहीं दिखाई गई। मोदी सरकार ने नए संसद भवन के पहले ही विशेष सत्र में ऐतिहासिक 106वें संविधान संशोधन के जरिए ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ को पहले कानून के रूप में पारित कर इतिहास रच दिया।

मोदी सरकार का ‘महिला-नेतृत्व विकास’ (Women-Led Development)—योजनाओं का विस्तार

‘नमो ड्रोन दीदी’ और कृषि में आधुनिक तकनीकी क्रांति
ग्रामीण महिलाओं को केवल पारंपरिक कार्यों तक सीमित न रखकर उन्हें आधुनिक कृषि तकनीक का वाहक बनाया गया है। ‘नमो ड्रोन दीदी’ योजना के तहत 15,000 महिला स्वयं सहायता समूहों को ड्रोन संचालन, फसल निगरानी और उर्वरक छिड़काव का आधुनिक प्रशिक्षण देकर कृषि क्षेत्र का नेतृत्व महिलाओं के हाथों में सौंपा गया है।

‘लखपति दीदी’ योजना और स्वयं सहायता समूह (SHGs)
ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई गति देने के लिए 10 करोड़ से अधिक महिलाओं को 90 लाख से अधिक SHGs से जोड़ा गया। करोड़ों ग्रामीण महिलाएं ₹1 लाख से अधिक की वार्षिक आय अर्जित कर ‘लखपति दीदी’ बन चुकी हैं, और सरकार ने इस अभियान को व्यापक स्तर पर आगे बढ़ाने का संकल्प लिया है।

संपत्ति पर मालिकाना हक (प्रधानमंत्री आवास योजना)
प्रधानमंत्री आवास योजना (ग्रामीण) के तहत 3.12 करोड़ से अधिक पक्के मकानों का निर्माण पूरा हुआ है, जिसमें से लगभग 75% मकानों की रजिस्ट्री महिलाओं के नाम या संयुक्त नाम पर की गई है, जिसने सदियों पुरानी सामाजिक व्यवस्था को बदलते हुए महिलाओं को घरों का वास्तविक स्वामी बनाया है।

मुद्रा योजना और जन धन से वित्तीय स्वतंत्रता
बिना किसी गारंटी (Collateral-Free) के छोटे उद्यमों के लिए ऋण देकर महिलाओं को उद्यमी बनाया गया। प्रधानमंत्री मुद्रा योजना (PMMY) के तहत दिए गए कुल ऋणों में लगभग 68% से अधिक लाभार्थी महिलाएं हैं। वहीं, 50 करोड़ से अधिक खुले जन धन खातों में 55% से अधिक खाते महिलाओं के हैं।

बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ और सुकन्या समृद्धि योजना
घटते लिंगानुपात की चुनौती से निपटने के लिए शुरू किए गए ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ अभियान ने बालिकाओं के प्रति सामाजिक दृष्टिकोण में बड़ा बदलाव लाया। वहीं, ‘सुकन्या समृद्धि योजना’ के तहत करोड़ों बैंक खातों में बालिकाओं के भविष्य, उच्च शिक्षा और आत्मनिर्भरता के लिए सुरक्षित वित्तीय आधार तैयार किया गया।

मातृत्व पोषण सहायता (प्रधानमंत्री मातृ वंदना योजना – PMMVY)
गर्भवती और स्तनपान कराने वाली माताओं के स्वास्थ्य और पोषण की रक्षा के लिए ‘प्रधानमंत्री मातृ वंदना योजना’ के तहत सीधे बैंक खातों में (DBT) वित्तीय सहायता प्रदान की गई, जिससे पहले बच्चे और विशेष रूप से दूसरी संतान बालिका होने पर पोषण और मजदूरी के नुकसान की सीधी भरपाई सुनिश्चित हुई।

गरिमा, स्वास्थ्य और मातृत्व सुरक्षा
कामकाजी महिलाओं के लिए सवेतन मातृत्व अवकाश 12 सप्ताह से बढ़ाकर 26 सप्ताह (6 महीने) किया गया। उज्ज्वला योजना के तहत 10 करोड़ से अधिक मुफ्त एलपीजी कनेक्शन देकर माताओं-बहनों को धुएं से मुक्ति दिलाई गई। स्वच्छ भारत मिशन के तहत 11 करोड़ से अधिक इज्जत घरों (शौचालयों) का निर्माण कर महिलाओं की गरिमा और सुरक्षा सुनिश्चित की गई। वहीं, जल जीवन मिशन के तहत करोड़ों ग्रामीण घरों तक नल से जल पहुंचाकर महिलाओं को दूर-दराज से पानी लाने की दैनिक परेशानी से मुक्ति दिलाई गई।

स्टार्टअप और उद्यमिता में महिला नेतृत्व
भारत के 1,02,054 से अधिक डीपीआईआईटी-मान्यता प्राप्त स्टार्टअप्स में कम से कम एक महिला डायरेक्टर या पार्टनर कार्यरत हैं। इसके साथ ही ‘स्टैंड अप इंडिया’ जैसी योजनाओं ने अनुसूचित जाति, जनजाति और महिला उद्यमियों को सीधे वित्तीय ताकत दी है।

पद्म सम्मानों का लोकतंत्रीकरण (पीपुल्स पद्म)
संभ्रांत वर्ग की परिधि से बाहर निकालकर जमीनी स्तर पर पर्यावरण संरक्षण, जैविक खेती, लोककला और स्वास्थ्य सेवा में जुटी ग्रामीण व आदिवासी महिलाओं (जैसे तुलसी गौड़ा, तीजन बाई और राहीबाई पोपेरे) को सर्वोच्च नागरिक सम्मान प्रदान कर देश की मुख्यधारा में सम्मान दिया गया।

विज्ञान, खेल और सामरिक सुरक्षा के अग्रिम मोर्चे पर ‘नारी शक्ति’

सैनिक स्कूलों के दरवाजे खुले और स्थायी कमीशन का अधिकार
देश के सभी सैनिक स्कूलों के दरवाजे पहली बार बेटियों के लिए खोले गए। इसके साथ ही राष्ट्रीय रक्षा अकादमी (NDA) के दरवाजे महिला कैडेट्स के लिए खोले गए और सेना, नौसेना व वायुसेना की सभी अग्रिम शाखाओं में महिलाओं को स्थायी कमीशन (Permanent Commission) दिया गया।

सियाचिन से लेकर सीमाओं तक दुर्गम मोर्चों पर तैनाती
दुनिया के सबसे ऊंचे और दुर्गम युद्धक्षेत्र ‘सियाचिन ग्लेशियर’ में पहली बार महिला सैन्य अधिकारियों (कैप्टन शिवा चौहान) की तैनाती की गई। इसके अलावा सीमा सड़क संगठन (BRO) की कठिन और अग्रिम निर्माण परियोजनाओं की कमान भी महिला अधिकारियों को सौंपकर नए भारत का सामर्थ्य स्थापित किया गया।

रणक्षेत्र और आकाश में देश की संप्रभुता की रक्षा
भारतीय वायुसेना की महिला फाइटर पायलट आज अत्याधुनिक Su-30MKI और राफेल जैसे लड़ाकू विमान उड़ा रही हैं। नौसेना के युद्धपोतों से लेकर कठिन सीमा चौकियों तक महिला अधिकारी अग्रिम मोर्चे पर देश की संप्रभुता की रक्षा कर रही हैं।

अंतरिक्ष से खेल के मैदान तक (वैश्विक मंचों पर परचम)
चंद्रयान-3 और गगनयान जैसे जटिल स्पेस मिशनों में इसरो की महिला वैज्ञानिकों (‘रॉकेट विमेन’) ने तकनीकी और रणनीतिक नेतृत्व किया। वहीं ‘खेलो इंडिया’ और TOPS योजना के तहत मिली आधुनिक सुविधाओं के दम पर महिला एथलीटों ने ओलंपिक, पैरालंपिक और राष्ट्रमंडल खेलों में ऐतिहासिक पदक जीतकर तिरंगे का मान बढ़ाया।

खोखले विमर्श पर भारी पड़ता जमीनी सशक्तिकरण
भारत की नारी शक्ति आज अकादमिक परिभाषाओं और खोखले राजनीतिक नारों से आगे निकलकर देश के नीति-निर्माण, अर्थव्यवस्था और रक्षा के अग्रिम मोर्चे पर अपनी योग्यता साबित कर रही है। जब नीतियां ईमानदार हों और अवसर वास्तविक, तो समाज स्वतः रूढ़ियों को तोड़कर विकसित भारत के संकल्प को सिद्धि तक पहुंचाता है।

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