पंजाब की भगवंत मान की आप-दा सरकार जब भी मंचों से भाषण देती है, तो दिल्ली और पंजाब के ‘वर्ल्ड क्लास शिक्षा मॉडल’ का ढिंढोरा पीटा जाता है। दावा किया जाता है कि पंजाब के सरकारी स्कूलों के शिक्षकों को ट्रेनिंग के लिए विदेशों में भी भेजा जा रहा है। लेकिन हकीकत इससे बिल्कुल विपरीत है। इस खोखले प्रचार के पीछे छिपी कड़वी सच्चाई यह है कि राज्य के हजारों स्कूलों में बच्चों को पढ़ाने के लिए शिक्षक ही नहीं हैं। प्रिंसिपल और शिक्षकों के 31 हजार से अधिक पद खाली हैं और सरकार चैन की बंसी बजा रही है। हजारों उच्च व माध्यमिक विद्यालय बिना किसी नियमित प्रिंसिपल (प्रबंधक) के राम भरोसे चल रहे हैं। मान सरकार के चमक-दमक वाले, लेकिन खोखले दावों की जब परतें हटाई जाती हैं, तो जमीन पर एक बेहद डरावनी और लाचार तस्वीर सामने आती है। नीति आयोग की रिपोर्ट की पोल खोलती असली ग्राउंड रिपोर्ट बताती है कि राज्य के सुदूर गांवों के सरकारी स्कूल अपनी बदहाली पर आंसू बहा रहे हैं। बदतर हालात को इसी से समझा जा सकता है कि खुद मुख्यमंत्री भगवंत मान जिस संगरूर से दो बार सांसद रह चुके हैं, वहां के नौनिहाल स्कूल के अभाव में धर्मशाला के सहारे हैं। राज्य के जिलों से शिक्षा व्यवस्था की जो हकीकत सामने आई है, वह यह बताने के लिए काफी है कि पंजाब की भावी पीढ़ी आज भगवंत मान के सहारे नहीं, बल्कि ‘राम-भरोसे’ अपना भविष्य गढ़ने को मजबूर हैं।
मुख्यमंत्री भगवंत मान के गृह जिले संगरूर के बदतर हालात
पंजाब की राजनीति में हाल ही में ‘शिक्षा क्रांति’ शब्द सबसे ज्यादा गूंज रहा है। आम आदमी पार्टी (आप) की भगवंत मान सरकार लगातार यह दावा करती रही है कि उसने राज्य के सरकारी स्कूलों का कायाकल्प कर दिया है। पंजाब ने शिक्षा गुणवत्ता सूचकांक में पहला स्थान हासिल किया है। लेकिन ग्राउंड स्तप पर हकीकत कुछ और ही नजर आती है। मुख्यमंत्री भगवंत मान के गृह जिले संगरूर की स्थिति सबसे ज्यादा चौंकाने वाली है। मान खुद संगरूर से दो बार सांसद भी रह चुके हैं। इसलिए जिस जिले को आदर्श होना चाहिए था, वहां के सरकारी स्कूल बुनियादी ढांचे के अभाव से जूझ रहे हैं। संगरूर के कुछ इलाकों में सरकारी स्कूलों की अपनी कोई इमारत ही नहीं है। यहां बच्चे किसी सरकारी या निजी भवन में नहीं, बल्कि स्थानीय धर्मशालाओं में बैठकर पढ़ने को मजबूर हैं।
Punjab’s “model schools” — a model example of how NOT to run schools.
ARVIND KEJRIWAL IS A TOTAL FAILURE& ONLY PR!
Delhi rejected Kejriwal & AAP Da!
Punjab will follow! pic.twitter.com/VmuPOVATTq
— Pradeep Bhandari(प्रदीप भंडारी)🇮🇳 (@pradip103) August 26, 2026
धर्मशाला को बनाया स्कूल, कार्यक्रम पर बच्चों की छुट्टी
किसी भी शहर-गांव में धर्मशालाएं, जो आमतौर पर सामाजिक आयोजनों, शादियों या धार्मिक कार्यक्रमों के लिए इस्तेमाल होती हैं, वहां ब्लैकबोर्ड टांगकर बच्चों को ककहरा सिखाया जा रहा है। यहां न तो बच्चों के बैठने के लिए उचित डेस्क हैं और न ही पढ़ने के लिए शांत माहौल। जब भी धर्मशाला में कोई सामाजिक आयोजन होता है, तो या तो बच्चों की छुट्टी कर दी जाती है या फिर उन्हें बेहद तंग कोनों में समेट दिया जाता है। देश को आधुनिक शिक्षा और ‘स्कूल ऑफ एमीनेंस’ का सपना दिखाने वाली सरकार के राज में मुख्यमंत्री के अपने क्षेत्र में ऐसी स्थिति होना सरकार के दावों पर एक बड़ा सवालिया निशान लगाता है।
एक कमरा, चार कक्षाएं: ध्यान भटकाती शिक्षा व्यवस्था
मीडिया की ग्राउंड रिपोर्ट में केवल धर्मशालाओं का ही सच सामने नहीं आया, बल्कि उन स्कूलों की जर्जर हालत भी उजागर हुई जहां इमारतें तो हैं, लेकिन कमरों की भारी कमी है। पंजाब के कई सरकारी स्कूलों में स्थिति यह है कि एक ही कमरे के भीतर चार अलग-अलग कक्षाओं के बच्चे एक साथ बैठते हैं। जरा कल्पना कीजिए, एक ही ब्लैकबोर्ड या एक ही कमरे के अलग-अलग कोनों में पहली, दूसरी, तीसरी और चौथी कक्षा के छात्र बैठे हैं। एक कोने में शिक्षक गणित पढ़ा रहे हैं, तो दूसरे कोने में इतिहास की बातें हो रही हैं। ऐसी स्थिति में बच्चे किस ब्लैकबोर्ड पर ध्यान केंद्रित करें और शिक्षक किस कक्षा को गंभीरता से पढ़ाएं? यह न केवल शिक्षकों के लिए एक मानसिक प्रताड़ना है, बल्कि बच्चों के भविष्य के साथ भी एक बड़ा खिलवाड़ है। शोर और अव्यवस्था के बीच होने वाली इस पढ़ाई से शिक्षा की गुणवत्ता का क्या स्तर होगा, इसका अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है।
ये पंजाब के CM भगवंत मान के ख़ुद के ज़िले संगरूर के स्कूलों का हाल है ‼️
हज़ारों करोड़ का प्रचार, जमकर भ्रष्टाचार, ख़ुद को बताते हैं कट्टर ईमानदार।
AAP funded CJP वाले यहाँ नहीं जाएँगे, ना ही एक भी ट्वीट करेंगे… pic.twitter.com/kIHKfIVrd0
— Swati Maliwal (@SwatiJaiHind) August 26, 2026
टूटी इमारतें और जर्जर दीवारें: हर पल हादसे का डर
पंजाब के ग्रामीण इलाकों में सरकारी स्कूलों की इमारतें इतनी जर्जर हो चुकी हैं कि वे कभी भी किसी बड़े हादसे को न्यौता दे सकती हैं। आजतक की खोजी रिपोर्ट बताती है कि छतों से गिरता प्लास्टर, दीवारों में आई दरारें और बरसात के दिनों में टपकता पानी यहां के छात्रों की नियति बन चुका है। कई स्कूलों में शौचालयों की हालत इतनी खराब है कि छात्राओं को भारी परेशानी का सामना करना पड़ता है। पीने के साफ पानी की व्यवस्था न होना और खेल के मैदानों का रखरखाव न होना भी आम बात है। एक तरफ सरकार बड़े-बड़े विज्ञापनों के जरिए यह दावा करती है कि पंजाब के स्कूल अब निजी स्कूलों को टक्कर दे रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ जमीन पर बच्चे टूटी छतों के नीचे बैठकर अपनी जान जोखिम में डालकर पढ़ रहे हैं।
KEJRIWALs FAKE PR DRIVEN PUNJAB EDUCATION MODEL EXPOSED :
• Water cooler tap DEAD.
• Doors and windows BROKEN.
• Benches? Only for a few.
• Rest of the children sitting on the FLOOR.
• Walls CRACKED.
• Rainwater enters the classrooms and kitchen.600 students in one… pic.twitter.com/VimSLzPq78
— Pradeep Bhandari(प्रदीप भंडारी)🇮🇳 (@pradip103) August 25, 2026
नीति आयोग की रैंकिंग और जमीनी सच का अंतर्विरोध
यह बेहद अजीबोगरीब विरोधाभास है कि कागजों पर पंजाब की शिक्षा व्यवस्था अव्वल नजर आती है। नीति आयोग के शिक्षा गुणवत्ता सूचकांक में पंजाब को शीर्ष स्थान मिलना, प्रशासनिक स्तर पर कागजी खानापूर्ति और आंकड़ों के बेहतर प्रबंधन को तो दर्शा सकता है, लेकिन यह उन बच्चों के आंसू नहीं छिपा सकता जो बिना छत और बिना बुनियादी सुविधाओं के पढ़ने को मजबूर हैं। आंकड़ों का यह विरोधाभासी मायाजाल और जमीन की यह बदहाली साफ करती है कि व्यवस्था में कहीं न कहीं बहुत बड़ा फासला है। राज्य के स्कूलों की असलियत इससे भी बयां हो जाती है कि सैकडों स्कूल को बिना मुखिया के ही चल रहे हैं। स्कूलों में शिक्षा देने के लिए शिक्षकों का खासा अभाव है। ऐसे में नीति आयोग की रैंकिंग पर स्कूलों का जमीनी सच सवालिया निशान लगाता है।
कैसा शिक्षा मॉडल: बिना मुखिया के स्कूल, बिना गुरु के ज्ञान
रिपोर्ट्स के अनुसार, राज्य के लगभग 30 से 40 फीसदी सरकारी सीनियर सेकेंडरी स्कूलों में स्थायी प्रिंसिपल ही नहीं हैं। राज्य में सरकारी स्कूलों में 31 हजार से ज्यादा पद खाली हैं। कई जिलों में तो एक ही प्रिंसिपल को तीन से चार अलग-अलग स्कूलों का अतिरिक्त प्रभार (एडिशनल चार्ज) सौंप दिया गया है। प्रिंसिपल की भूमिका केवल एक शिक्षक की नहीं होती, बल्कि वह पूरे स्कूल के अनुशासन, प्रशासनिक कार्यों, बजट प्रबंधन और शिक्षा की गुणवत्ता को नियंत्रित करने वाला ‘कप्तान’ होता है। पंजाब में स्थिति यह है कि राज्य के सीनियर सेकेंडरी और हाई स्कूलों में प्रिंसिपलों और हेडमास्टरों के हजारों पद लंबे समय से खाली पड़े हैं। नतीजा यह है कि वह अधिकारी केवल कागजी कार्रवाइयों, बैठकों और फाइलों को निपटाने में ही अपना पूरा समय बिता रहे हैं। जिस स्कूल के पास अपना खुद का मुखिया न हो, वहां शिक्षकों पर नियंत्रण कौन रखेगा? वहां बच्चों की समस्याओं को कौन सुनेगा? बिना कप्तान के चल रहे इन स्कूलों में शिक्षा व्यवस्था का बेपटरी होना लाजमी है।
सीमावर्ती जिलों में कहीं एक टीचर, तो कहीं ताले लटके
प्रिंसिपलों की कमी तो प्रशासनिक संकट है, लेकिन शिक्षकों (टीचर्स) की कमी सीधे तौर पर बच्चों के भविष्य पर कुल्हाड़ी चला रही है। पंजाब के प्राथमिक, माध्यमिक और उच्च विद्यालयों में शिक्षकों के हजारों पद रिक्त हैं। ग्रामीण और सीमावर्ती इलाकों (जैसे फाजिल्का, फिरोजपुर, गुरदासपुर) की हालत तो और भी बदतर है। कई प्राथमिक स्कूल ऐसे हैं, जो सिर्फ ‘सिंगल टीचर’ (एक अकेले शिक्षक) के भरोसे चल रहे हैं। वही अकेला शिक्षक पहली से पांचवीं कक्षा तक के सभी बच्चों को पढ़ाता है, मिड-डे मील की व्यवस्था देखता है, डाक संभालता है और सरकार की वीआईपी ड्यूटियों में भी जाता है। जब वह शिक्षक छुट्टी पर होता है, तो स्कूल में व्यावहारिक रूप से पढ़ाई पूरी तरह ठप हो जाती है। विज्ञान, गणित और अंग्रेजी जैसे मुख्य विषयों के शिक्षकों की भारी कमी है, जिसके कारण गरीब परिवारों के बच्चे निजी स्कूल के छात्रों की तुलना में बोर्ड परीक्षाओं में पिछड़ जाते हैं।
Make this video viral before They make it delete by AajTak.
Punjab’s school reality is right here.
The building is in Khasta condition, and the school is being run from a Dharamshala, a place where wedding guests and baraats stay.
And this school is in Sangrur, Bhagwant Mann’s… pic.twitter.com/tAvZGeWvsL
— Lala (@FabulasGuy) August 26, 2026
कागजी पदोन्नति और अदालती मुकदमों में उलझी भर्तियां
सवाल यह उठता है कि अगर 1100 से अधिक Principle पद खाली हैं, तो सरकार इन्हें भर क्यों नहीं रही? इसके पीछे शिक्षा विभाग की सुस्ती, त्रुटिपूर्ण तबादला नीतियां और पदोन्नति (प्रमोशन) के नियमों में विसंगतियां हैं। सालों से काम कर रहे लेक्चरर और हेडमास्टरों को प्रिंसिपल के पद पर पदोन्नत नहीं किया जा रहा है, क्योंकि विभाग की वरिष्ठता सूचियों (सीनियरिटी लिस्ट) को लेकर लगातार कानूनी विवाद चलते रहते हैं। नई भर्तियों की प्रक्रियाएं या तो समय पर शुरू नहीं होतीं और अगर होती भी हैं, तो पेपर लीक या नियमों की कमियों के कारण अदालतों के चक्कर में फंसकर रह जाती हैं। सरकार विदेशों में शिक्षकों को भेजने का इवेंट तो आयोजित कर लेती है, लेकिन अपने ही राज्य के बेरोजगार टेट (TET) पास युवाओं को रोजगार देने और उन्हें स्कूलों में नियुक्त करने में नाकाम साबित हुई है।
🚨PUNJAB EDUCATION SCAM EXPOSED
🧹AAP & Kejriwal keep screaming “Sikhiya Kranti” and “Punjab No.1 in education”.
🇮🇳Here’s the reality they don’t want you to see:
✅Over 57% of principal posts vacant
1,113 out of 1,927 government senior secondary schools are running WITHOUT a… pic.twitter.com/RV1XdXi2OJ— Sandeep Phogat (@MrSandeepPhogat) August 20, 2026
अस्थायी और मानदेय शिक्षकों के भरोसे झूठी ‘क्रांति’
नियमित शिक्षकों की कमी को पूरा करने के लिए सरकारें वर्षों से एडहॉक, कॉन्ट्रैक्ट (ठेके पर), कंप्यूटर टीचर्स और कम मानदेय वाले वॉलिंटियर्स के भरोसे काम चला रही हैं। इन शिक्षकों का एक बड़ा हिस्सा अपने नियमितीकरण (रेगुलराइजेशन) और समान वेतन की मांग को लेकर साल के बारह महीने सड़कों पर प्रदर्शन करता नजर आता है। जब राष्ट्र का निर्माता कहे जाने वाला शिक्षक खुद अपने भविष्य को लेकर असुरक्षित महसूस करेगा और सड़कों पर लाठियां खाएगा, तो वह क्लासरूम में बच्चों को शांति और एकाग्रता से कैसे पढ़ा पाएगा? नीति आयोग की रैंकिंग चाहे जो कहे, लेकिन जब तक राज्य के स्कूलों को उनके हिस्से के शिक्षक और प्रिंसिपल नहीं मिल जाते, तब तक पंजाब की ‘शिक्षा क्रांति’ महज एक चुनावी नारा ही है। पंजाब के बच्चों को विज्ञापनों वाले ‘स्कूल ऑफ एमीनेंस’ से ज्यादा अपने गांव के स्कूल में एक अदद प्रिंसिपल और विषय के शिक्षक की जरूरत है।
पंजाब का युवा नशे और पलायन की मार झेल रहा
पंजाब कभी अपनी खुशहाली और तरक्की के लिए जाना जाता था। आज यदि वहां का युवा नशे और पलायन की मार झेल रहा है, तो उसके पीछे कहीं न कहीं एक कमजोर प्राथमिक शिक्षा व्यवस्था भी जिम्मेदार है। जब बच्चों को प्राथमिक स्तर पर ही सही माहौल, उचित बुनियादी ढांचा और एकाग्रता के साथ पढ़ने का स्थान नहीं मिलेगा, तो वे वैश्विक प्रतिस्पर्धा में कैसे टिक पाएंगे? भगवंत मान सरकार को यदि सचमुच पंजाब में ‘शिक्षा क्रांति’ लानी है, तो उन्हें विज्ञापनों और राजनीतिक बयानों से बाहर निकलकर जिलों और सुदूर गांवों का दौरा करना होगा। जब तक हर बच्चे को एक सुरक्षित कमरा, बैठने के लिए डेस्क और पढ़ने के लिए एक शांत माहौल नहीं मिल जाता, तब तक किसी भी रैंकिंग या सूचकांक का कोई मोल नहीं है। पंजाब के बच्चों का भविष्य धर्मशालाओं के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता।
AAP के राज में नशे की गिरफ्त में पंजाब का भविष्य! pic.twitter.com/OaulqJ0wVf
— BJP Delhi (@BJP4Delhi) August 19, 2026









