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RSS के बढ़ते प्रभाव से घबराया विदेशी सिंडिकेट: सोरोस फंडिंग और भारत-विरोधी टूलकिट का पर्दाफाश

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में आज भारत विश्व की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनकर वैश्विक मंचों पर एक निर्णायक शक्ति के रूप में उभरा है। देश के बढ़ते कूटनीतिक प्रभाव और सांस्कृतिक पुनर्जागरण से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत-विरोधी शक्तियां पूरी तरह असहज हो चुकी हैं। जब भी भारत का शीर्ष राष्ट्रवादी नेतृत्व या राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) का कोई प्रतिनिधिमंडल विदेशी दौरों पर संवाद और सद्भाव के लिए निकलता है, विदेशी धन पर पलने वाला एक खास सिंडिकेट तुरंत सक्रिय हो जाता है। जॉर्ज सोरोस की फंडिंग, वामपंथी-कट्टरपंथी गठजोड़ और अमेरिकी लॉबिंग फर्मों का यह जाल किस तरह भारत की संप्रभु साख को चोट पहुंचाने का षड्यंत्र रच रहा है, यह विस्तृत रिपोर्ट उसी का संपूर्ण विश्लेषण है।

संघ के शताब्दी वर्ष में वैश्विक संवाद: 25 अगस्त से शुरू हुआ ऐतिहासिक त्रि-देशीय दौरा
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के शताब्दी वर्ष के अवसर पर सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत 25 अगस्त से अमेरिका, कनाडा और ब्रिटेन के ऐतिहासिक दौरे पर हैं। प्रवासी भारतीय संगठनों के निमंत्रण पर आयोजित इस यात्रा का सबसे मुख्य केंद्र 29 अगस्त को न्यूयॉर्क के प्रतिष्ठित मैडिसन स्क्वायर गार्डन में होने वाला ‘यूनिवर्सल वननेस सेलिब्रेशन’ कार्यक्रम है, जहां वे हजारों प्रवासी भारतीयों को ‘वसुधैव कुटुंबकम’ और भारतीय सांस्कृतिक चेतना पर संबोधित करेंगे। 100 वर्षों के सेवा और राष्ट्र निर्माण के संकल्प को वैश्विक मंच पर प्रस्तुत करने के इस अभूतपूर्व प्रयास से ही भारत-विरोधी लॉबिंग सिंडिकेट में भारी बौखलाहट देखने को मिल रही है। 

RSS के जमीनी विस्तार और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद से विदेशी नेटवर्क में बेचैनी
विदेशी फंडिंग पर पलने वाले लॉबिंग सिंडिकेट्स और वामपंथी नेटवर्क की राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) को लेकर सबसे बड़ी घबराहट इसके अराजनीतिक, अनुशासित और विशाल जमीनी ढांचे से है। भारत के कोने-कोने में सक्रिय लाखों स्वयंसेवक समाज के भीतर राष्ट्रीय स्वाभिमान, सामाजिक समरसता और सांस्कृतिक पुनर्जागरण का ऐसा सुरक्षा कवच तैयार करते हैं, जिसे बाहर से संचालित कोई भी टूलकिट या विदेशी नैरेटिव आसानी से भेद नहीं पाता। जब भी देश पर कोई प्राकृतिक आपदा, आंतरिक संकट या वैचारिक हमला होता है, संघ से जुड़े संगठन बिना किसी विदेशी सहायता के सबसे आगे खड़े मिलते हैं। विदेशी ताकतों को यह स्पष्ट दिखता है कि जब तक भारत में सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की यह मजबूत रीढ़ मौजूद है, तब तक देश को जाति, भाषा या क्षेत्र के नाम पर बांटकर अस्थिर करने का उनका षड्यंत्र कभी सफल नहीं हो सकता। यही कारण है कि संघ प्रमुख के विदेशी दौरों से लेकर जमीनी कार्यक्रमों तक को निशाना बनाकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भ्रम फैलाने की लगातार कोशिश की जाती है। 

विदेशी धरती पर समानांतर नैरेटिव गढ़ने की कांग्रेस की साजिश और विदेश मंत्रालय का कड़ा रुख
आरएसएस प्रमुख के ऐतिहासिक अमेरिका दौरे के प्रभाव को कम करने के लिए कांग्रेस और उसके नेताओं द्वारा विदेशी जमीन पर समानांतर विमर्श खड़ा करने के सुनियोजित प्रयास सामने आए हैं। तेलंगाना के मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी के उसी समय अमेरिका दौरे और न्यूयॉर्क में भारत-विरोधी बयानों के लिए चर्चित हलकों से संपर्क साधने की योजना को राजनीतिक विश्लेषकों ने संघ के वैश्विक संवाद को कमजोर करने का हथकंडा माना। हालांकि, भारतीय विदेश मंत्रालय (MEA) ने कूटनीतिक मर्यादा और प्रोटोकॉल का हवाला देते हुए इस दौरे को राजनीतिक मंजूरी न देकर इस पूरे षड्यंत्र को समय रहते निष्प्रभावी कर दिया। भाजपा का स्पष्ट आरोप रहा है कि कांग्रेस घरेलू राजनीति की हताशा में विदेशी मंचों पर भारत की साख को नुकसान पहुंचाने वाले तत्वों के साथ अघोषित तालमेल बनाती है।

स्थानीय अमेरिकी चेहरों और ‘डीप स्टेट’ तंत्र को आगे कर प्रायोजित विरोध का नया पैंतरा
मैडिसन स्क्वायर गार्डन जैसे प्रतिष्ठित मंचों पर संघ प्रमुख के संवाद कार्यक्रमों को रोकने के लिए विदेशी लॉबिंग तंत्र ने कुछ स्थानीय अमेरिकी राजनेताओं और चुनिंदा अंतरधार्मिक समूहों को ढाल बनाकर आगे किया है। भारतीय समाज में नफरत और विभाजन का झूठा आरोप लगाकर कुछ डेमोक्रेटिक नेताओं के जरिए बयानबाजी करवाना उसी सुनियोजित ‘डीप स्टेट’ टूलकिट का हिस्सा है। ऐतिहासिक तथ्य यह है कि संघ ने सदैव राष्ट्र निर्माण, सेवा और सामाजिक समरसता को प्राथमिकता दी है, जबकि भारत में सिखों के नरसंहार और आपातकाल जैसे काले अध्यायों का इतिहास कांग्रेस से जुड़ा रहा है। अमेरिकी जमीन पर चंद चेहरों द्वारा कराया जा रहा यह प्रायोजित विरोध 50 लाख से अधिक देशभक्त प्रवासी भारतीयों की आवाज और भारत के वैश्विक सम्मान को दबाने में पूरी तरह विफल रहा है।

अमेरिकी मेयर के तुष्टीकरण पर करारा प्रहार: सेवा कार्यों और हिंदू-अमेरिकियों के योगदान से दिया मुंहतोड़ जवाब
न्यूयॉर्क के मेयर जोहरान ममदानी द्वारा आरएसएस प्रमुख के कार्यक्रम का विरोध किए जाने पर एनडीए की सहयोगी शिवसेना की प्रवक्ता शाइना एनसी ने कड़ा पलटवार करते हुए इसे तुष्टीकरण और दोहरे मापदंड की ओछी राजनीति करार दिया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि संघ से प्रेरित संस्था ‘सेवा इंटरनेशनल’ अमेरिका में 200 से अधिक सेवा परियोजनाओं का संचालन करती है, जिसने हरिकेन जैसी भीषण प्राकृतिक आपदाओं से लेकर कोविड महामारी के दौरान अग्रिम मोर्चे पर रहकर अमेरिकी नागरिकों की निःस्वार्थ सेवा की है। यहां तक कि एफबीआई (FBI) जैसी शीर्ष अमेरिकी सुरक्षा एजेंसी ने भी उनके सेवा कार्यों की सराहना की है और कभी उन्हें चरमपंथी संगठन नहीं माना। शाइना एनसी ने दो टूक कहा कि मोहन भागवत उन लाखों हिंदू-अमेरिकियों के सांस्कृतिक संवाद का प्रतिनिधित्व करते हैं जो डॉक्टर, इंजीनियर और उद्यमी बनकर अमेरिकी अर्थव्यवस्था और समाज के निर्माण में रीढ़ की हड्डी की तरह योगदान दे रहे हैं; ऐसे में वोट-बैंक की राजनीति के लिए इस सेवा और समर्पण पर सवाल उठाने वालों को आईना देखना चाहिए। 

जॉर्ज सोरोस और ओपन सोसाइटी का कथित वित्तीय जाल
अमेरिकी अरबपति जॉर्ज सोरोस और उनकी संस्था ओपन सोसाइटी फाउंडेशंस (OSF) पर लगातार भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था और राष्ट्रवादी नेतृत्व को अस्थिर करने के लिए विदेशी फंडिंग मुहैया कराने के आरोप लगते रहे हैं। भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने विभिन्न मंचों पर इस वित्तीय गठजोड़ को उजागर किया है, जिसमें यह रेखांकित किया गया है कि किस प्रकार मानवाधिकार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर संचालित एनजीओ को विदेशी धन से सींचा जाता है। इसका मुख्य उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत और राष्ट्रवादी संगठनों के विरुद्ध नकारात्मक विमर्श तैयार करना है। भाजपा का यह स्पष्ट तर्क रहा है कि भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था जनता के जनादेश से चलती है, किसी विदेशी अरबपति की वैचारिक सनक से नहीं।

‘हिंदुज फॉर ह्यूमन राइट्स’ और सुनीता विश्वनाथ की संदिग्ध भूमिका
हिंदुज फॉर ह्यूमन राइट्स (HfHR) की सह-संस्थापक सुनीता विश्वनाथ पर हिंदू पहचान का उपयोग कर भारत के सांस्कृतिक व सामाजिक ढांचे को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर बदनाम करने के आरोप हैं। यह संगठन पश्चिमी विश्वविद्यालयों और नीति-निर्माताओं के बीच ‘डिसमेंटलिंग ग्लोबल हिंदुत्व’ जैसे अभियानों को आगे बढ़ाने में सक्रिय रहा है। ओपन सोर्स इंटेलिजेंस और शोध रिपोर्टों से यह सामने आया है कि इस संगठन के संबंध सीधे तौर पर भारत विरोधी लॉबिंग समूहों से जुड़े हुए हैं। हिंदू नाम का मुखौटा लगाकर भारत की संप्रभुता पर चोट करना इस संगठन की सोची-समझी कार्यशैली रही है।

एक ही पते से संचालित मुखौटा संगठन: IAMC और जस्टिस फॉर ऑल
अमेरिका में पंजीकृत इंडियन अमेरिकन मुस्लिम काउंसिल (IAMC) और जस्टिस फॉर ऑल (Justice for All) जैसे संगठनों की कार्यप्रणाली की जांच में यह पाया गया है कि इनमें से कई संस्थाएं एक ही पते और साझा पदाधिकारियों द्वारा संचालित होती हैं। इन संगठनों का मुख्य काम भारत में कानून-व्यवस्था, नागरिकता संशोधन कानून (CAA) या राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के दौरों के समय सोशल मीडिया और अमेरिकी मीडिया में समन्वित अभियान चलाना है। शोधकर्ताओं के अनुसार, यह नेटवर्क विभिन्न नामों से मुखौटा संगठन बनाकर एक ही प्रोपेगैंडा को हवा देता है। यह वही नेटवर्क है जो भारत में दंगों और सामाजिक तनाव की घटनाओं का अंतरराष्ट्रीयकरण करने के लिए टूलकिट तैयार करता है।

 

अमेरिकी कांग्रेस और USCIRF में लॉबिंग का खेल
अमेरिकी व्यवस्था में लॉबिंग को कानूनी मान्यता प्राप्त है, और इसी व्यवस्था का दुरुपयोग भारत-विरोधी समूह करते हैं। शोध रिपोर्टों से उजागर हुआ है कि इंडियन अमेरिकन मुस्लिम काउंसिल (IAMC) और उसके सहयोगी संगठनों ने वाशिंगटन डीसी में पेशेवर लॉबिंग फर्मों (जैसे फिडेलिस गवर्नमेंट रिलेशंस) को लाखों डॉलर का भुगतान किया। इस भारी फंडिंग का एकमात्र उद्देश्य अमेरिकी सांसदों, सीनेटर्स और नीति-निर्माताओं के कार्यालयों में जाकर भारत, उसकी लोकतांत्रिक सरकार और राष्ट्रवादी संस्थाओं के खिलाफ पक्षपाती विमर्श तैयार करना रहा है। लाखों डॉलर का यह निवेश केवल भारत को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बदनाम करने के लिए किया जाता है।

USCIRF की बैठकों और रिपोर्टों को प्रभावित करने की रणनीति
अमेरिकी अंतरराष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता आयोग (USCIRF) एक सलाहकार निकाय है जिसकी रिपोर्टें अमेरिकी विदेश नीति को दिशा देने के लिए इस्तेमाल होती हैं। यह लॉबिंग नेटवर्क आयोग के सदस्यों और अधिकारियों के साथ नियमित ब्रीफिंग आयोजित करता है। इसमें भारत के आंतरिक मामलों—जैसे नागरिकता संशोधन कानून (CAA), अनुच्छेद 370 और धर्मांतरण विरोधी कानूनों—को संदर्भ से काटकर मानवाधिकार हनन के रूप में प्रस्तुत किया जाता है, ताकि आयोग पर भारत के विरुद्ध रुख अपनाने का दबाव बनाया जा सके।

भारत को ‘कंट्री ऑफ पर्टिकुलर कंसर्न’ (CPC) घोषित कराने की सुनियोजित कोशिश
इन संगठनों का मुख्य लक्ष्य अमेरिकी विदेश विभाग के माध्यम से भारत को ‘कंट्री ऑफ पर्टिकुलर कंसर्न’ (CPC) की श्रेणी में डलवाना है। यह वही दर्जा है जो उत्तर कोरिया, चीन, पाकिस्तान और ईरान जैसे देशों को दिया जाता है। यदि भारत को इस सूची में डाल दिया जाता, तो इससे भारत पर कूटनीतिक दबाव बढ़ता, व्यापारिक प्रतिबंधों का खतरा पैदा होता और भारत-अमेरिका रणनीतिक साझेदारी को सीधा नुकसान पहुंचता। हालांकि, अमेरिकी विदेश विभाग ने जमीनी हकीकत को देखते हुए आयोग की इन एकतरफा सिफारिशों को लगातार खारिज किया है। भारत की स्वतंत्र विदेश नीति और मजबूत आर्थिक स्थिति के आगे यह साजिश पूरी तरह बेअसर साबित हुई है।

वामपंथी और कट्टरपंथी नेटवर्क का अघोषित गठबंधन
इस लॉबिंग प्रक्रिया के पीछे केवल एक संगठन नहीं, बल्कि कई संस्थाओं का एक अघोषित सिंडिकेट काम करता है। इसमें सुनीता विश्वनाथ का संगठन हिंदुज फॉर ह्यूमन राइट्स, जस्टिस फॉर ऑल, और जमात से जुड़े कथित नेटवर्क शामिल हैं। ये समूह मानवाधिकार और धार्मिक स्वतंत्रता का चोगा ओढ़कर अमेरिकी कांग्रेस की सुनवाइयों (Congressional Hearings) में गवाहियां दिलवाते हैं और भारत की छवि खराब करने के लिए सोशल मीडिया पर समन्वित हैशटैग कैंपेन चलाते हैं।

भारत सरकार का कड़ा रुख और पूर्वाग्रहों का पर्दाफाश
भारतीय विदेश मंत्रालय (MEA) ने USCIRF की इन रिपोर्टों को बार-बार ‘पक्षपाती’, ‘राजनीतिक रूप से प्रेरित’ और ‘तथ्यहीन’ बताकर सिरे से खारिज किया है। भारत का स्पष्ट मत रहा है कि देश का संविधान 140 करोड़ नागरिकों को पूर्ण धार्मिक स्वतंत्रता और समान अधिकार प्रदान करता है। विदेशी लॉबिंग फर्मों और उनके पोषित संगठनों द्वारा रचे गए इस नैरेटिव का उद्देश्य भारत की वैश्विक साख को कमजोर करना है, जिसे भारत की सशक्त कूटनीति ने वैश्विक मंचों पर बेनकाब किया है। मोदी सरकार ने कड़ा संदेश दिया है कि नया भारत अपने आंतरिक मामलों में किसी भी विदेशी संस्था का अनुचित हस्तक्षेप बर्दाश्त नहीं करेगा।

वैश्विक मंचों पर भारत की बढ़ती स्वीकार्यता और कूटनीतिक सफलता
पिछले एक दशक में योग, प्राचीन सांस्कृतिक दर्शन, मजबूत आर्थिक विकास और प्रवासी भारतीयों के प्रभाव के चलते भारत की सॉफ्ट पावर पूरी दुनिया में तेजी से स्थापित हुई है। जी20 की अध्यक्षता से लेकर प्रमुख भू-राजनीतिक मंचों पर भारत की स्वतंत्र विदेश नीति को पश्चिमी देशों में भी व्यापक सराहना मिली है। भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों और लोकतांत्रिक व्यवस्था की इस वैश्विक स्वीकार्यता ने उन ताकतों को असहज कर दिया है जो भारत को केवल एक विकासशील और आंतरिक रूप से विभाजित देश के रूप में देखना चाहती थीं।

द्विपक्षीय संबंधों के निर्णायक मोड़ों पर सुनियोजित विरोध अभियान
रणनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि जब भी भारत के अमेरिका, यूरोप या अन्य प्रमुख शक्तियों के साथ द्विपक्षीय संबंध प्रगाढ़ होते हैं या कोई बड़ा व्यापारिक व रक्षा समझौता आकार ले रहा होता है, तब पश्चिमी देशों में बैठे भारत-विरोधी समूह अचानक सक्रिय हो जाते हैं। शीर्ष भारतीय नेतृत्व या सांस्कृतिक संस्थाओं के प्रमुखों की यात्राओं के समय प्रायोजित प्रदर्शनों का मुख्य उद्देश्य पश्चिमी नीति-निर्माताओं और मीडिया का ध्यान भटकाकर द्विपक्षीय वार्ताओं पर नकारात्मक दबाव बनाना होता है।

सांस्कृतिक पहचान और ‘वसुधैव कुटुंबकम’ के विचार को कमजोर करने का प्रयास
भारतीय दर्शन का मूल मंत्र ‘वसुधैव कुटुंबकम’ और ‘सर्वे भवंतु सुखिनः’ पूरी दुनिया में शांति और सह-अस्तित्व का संदेश देता है, जिसे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उससे जुड़े सांस्कृतिक मंच वैश्विक स्तर पर बढ़ावा देते हैं। इसके विपरीत, कुछ वैचारिक समूह हिंदू संस्कृति और भारतीय समाज को पश्चिमी देशों में ‘असहिष्णु’ और ‘भेदभावपूर्ण’ साबित करने के लिए लगातार भ्रामक अभियान चलाते हैं, ताकि भारत की मूल सांस्कृतिक पहचान और उसके नैतिक प्रभाव को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आघात पहुँचाया जा सके।

विदेशी मीडिया और अकादमिक जगत में नकारात्मक नैरेटिव की फैक्टरी
भारत की लोकतांत्रिक और आर्थिक प्रगति को सीधे तौर पर चुनौती न दे पाने के कारण पश्चिमी विश्वविद्यालयों के कुछ विभागों और चुनिंदा मीडिया संस्थानों के जरिए ‘लोकतंत्र का क्षरण’ और ‘मानवाधिकार संकट’ जैसे विषयों पर एकतरफा रिपोर्ट्स प्रकाशित कराई जाती हैं। यह नैरेटिव अंतरराष्ट्रीय रेटिंग एजेंसियों, विदेशी निवेशकों और वैश्विक थिंक-टैंक्स को प्रभावित करने की एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है, जिससे भारत की संप्रभु साख को वैश्विक मंचों पर कटघरे में खड़ा किया जा सके। राष्ट्रवादी विचारकों ने इस बौद्धिक आतंकवाद का तथ्यों के आधार पर कड़ा प्रतिवाद किया है।

भारतीय डायस्पोरा के प्रभाव को विभाजित करने की साजिश
अमेरिका और यूरोप में रह रहे लाखों भारतीय अपनी कड़ी मेहनत और पेशेवर उपलब्धियों के बल पर वहां की राजनीति और अर्थव्यवस्था में एक मजबूत स्तंभ बन चुके हैं। यह विशाल प्रवासी समुदाय भारत के सांस्कृतिक और कूटनीतिक हितों का सबसे बड़ा रक्षक है। अंतरराष्ट्रीय लॉबिंग समूह इस प्रवासी शक्ति को जातियों और धार्मिक पहचानों में बांटकर उनके साझा मंच को कमजोर करने का प्रयास करते हैं, ताकि वैश्विक स्तर पर भारत के पक्ष में उठने वाली सबसे प्रभावी आवाज को दबाया जा सके।

अमेरिका में 50 लाख से अधिक भारतीय डायस्पोरा की अटूट सांस्कृतिक निष्ठा
अमेरिका में रहने वाले 50 लाख से अधिक प्रवासी भारतीय (Indian Diaspora) अपनी कड़ी मेहनत, उच्च शिक्षा और कानून का पालन करने वाले समाज के रूप में जाने जाते हैं। यह समुदाय भारत की सांस्कृतिक जड़ों, लोकतांत्रिक व्यवस्था और सनातन परंपराओं से गहराई से जुड़ा हुआ है। जब भी भारत का कोई प्रमुख सांस्कृतिक, सामाजिक या राष्ट्रीय नेतृत्व अमेरिका पहुंचता है, तो विशाल भारतीय समुदाय संवाद और सांस्कृतिक आदान-प्रदान के कार्यक्रमों में भारी संख्या में भाग लेकर अपना स्वाभाविक समर्थन व्यक्त करता है। प्रवासी भारतीयों का यह अटूट विश्वास ही भारत-विरोधी ताकतों की सबसे बड़ी पराजय है।

हजारों की सहभागिता बनाम मुट्ठी भर प्रदर्शनकारियों का सीमित दायरा
प्रवासी भारतीयों के विशाल कार्यक्रमों में जहां हजारों लोग भारत की प्रगति और सामाजिक समरसता के संवाद का हिस्सा बनते हैं, वहीं उनके विरोध में दिखने वाले प्रदर्शनों में मात्र कुछ दर्जन लोग ही शामिल होते हैं। जमीन पर कोई व्यापक जनाधार न होने के बावजूद, सोशल मीडिया और चुनिंदा प्रचार तंत्र के माध्यम से इन छोटे विरोध प्रदर्शनों को बहुत बड़ा बनाकर पेश करने का प्रयास किया जाता है, जो वास्तविकता से पूरी तरह परे है।

मुख्यधारा के प्रवासी संगठनों का रचनात्मक और सेवा-केंद्रित दृष्टिकोण
अमेरिका में सक्रिय प्रमुख भारतीय-अमेरिकी संगठन जैसे हिंदू स्वयंसेवक संघ (HSS), हिंदू अमेरिकन फाउंडेशन (HAF) और सेवा इंटरनेशनल स्थानीय स्तर पर रक्तदान, आपदा राहत और भारतीय संस्कृति के प्रसार जैसे जनकल्याणकारी कार्यों में जुटे हैं। इन संगठनों का उद्देश्य भारतीय मूल्यों के जरिए अमेरिकी समाज में सकारात्मक योगदान देना और भारत-अमेरिका संबंधों को मजबूती प्रदान करना है, जो दोनों देशों के बीच आपसी विश्वास को बढ़ाता है।

राजनीतिक और वैचारिक पूर्वाग्रह से ग्रस्त संगठनों का विभाजनकारी एजेंडा
मुख्यधारा के प्रवासी समुदाय के सकारात्मक कार्यों के विपरीत, कुछ चुनिंदा संगठन मानवाधिकार और न्याय के नाम पर केवल भारत-विरोधी राजनीतिक एजेंडा चलाने में सक्रिय रहते हैं। ये संगठन अमेरिकी विश्वविद्यालयों और नगर परिषदों में ऐसे प्रस्ताव पारित कराने का प्रयास करते हैं, जिससे प्रवासी भारतीय समाज में आपसी दूरियां बढ़ें और भारत की छवि को नुकसान पहुंचे। अधिकांश प्रवासी भारतीय इस तरह के विभाजनकारी प्रयासों से खुद को पूरी तरह अलग रखते हैं।

भारत की प्रगति के साथ एकजुट प्रवासी शक्ति और विफल होती साजिशें
भारतीय अर्थव्यवस्था के तेजी से बढ़ने और वैश्विक पटल पर भारत का मान स्थापित होने के कारण प्रवासी समुदाय में राष्ट्र के प्रति गौरव की भावना अभूतपूर्व स्तर पर है। यही कारण है कि विभाजन पैदा करने वाले संगठनों के तमाम भ्रामक अभियानों के बावजूद, सामान्य प्रवासी भारतीय अपने देश, संस्कृति और राष्ट्रवादी नेतृत्व के साथ मजबूती से खड़े हैं, जिससे भारत-विरोधी विमर्श बार-बार अपनी प्रासंगिकता खो देता है।

पड़ोसी देशों में अल्पसंख्यकों के नरसंहार पर रहस्यमयी चुप्पी
स्वयं को मानवाधिकारों का वैश्विक पैरोकार बताने वाले संगठन जैसे हिंदुज फॉर ह्यूमन राइट्स (HfHR) और इंडियन अमेरिकन मुस्लिम काउंसिल (IAMC) का रिकॉर्ड पड़ोसी देशों में अल्पसंख्यकों की स्थिति पर बेहद पक्षपाती रहा है। पाकिस्तान में हिंदू, सिख और ईसाई लड़कियों के जबरन धर्मांतरण और अपहरण के सैकड़ों मामलों या बांग्लादेश में दुर्गा पूजा पंडालों, हिंदू मंदिरों और अल्पसंख्यक आबादी पर होने वाले सुनियोजित हमलों पर ये संगठन पूरी तरह चुप्पी साधे रहते हैं। इनके बयानों और सोशल मीडिया पोस्ट्स का विश्लेषण यह स्पष्ट करता है कि इन भयानक मानवाधिकार हनन की घटनाओं पर कभी कोई अंतरराष्ट्रीय अभियान या लॉबिंग नहीं की जाती। यह खामोशी साबित करती है कि इनका उद्देश्य मानवाधिकार नहीं, बल्कि हिंदू-विरोध है।

भारत के आंतरिक मामलों पर चौबीसों घंटे सक्रियता का दोहरा चरित्र
जहां एक तरफ पड़ोसी इस्लामिक देशों में अल्पसंख्यकों के वास्तविक अस्तित्व के संकट पर ये संगठन तटस्थ बने रहते हैं, वहीं भारत के आंतरिक और कानूनी मामलों पर इनकी सक्रियता तुरंत बढ़ जाती है। नागरिकता संशोधन कानून (CAA), जो वास्तव में पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान के प्रताड़ित अल्पसंख्यकों को शरण और नागरिकता देने का एक मानवीय कानून है, उसे इन संगठनों ने अंतरराष्ट्रीय मंचों पर ‘भेदभावपूर्ण’ बताकर दुष्प्रचार किया। यह दोहरा मापदंड साफ दर्शाता है कि इनका सरोकार मानवाधिकारों की रक्षा से नहीं, बल्कि भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था पर सवाल खड़े करने से है।

बयानों और अभियानों का विश्लेषण: एकतरफा राजनीतिक एजेंडा
इन संस्थाओं द्वारा अमेरिकी कांग्रेस, संयुक्त राष्ट्र मंचों और पश्चिमी थिंक-टैंकों में प्रस्तुत की जाने वाली रिपोर्टों का डेटा यह साबित करता है कि इनकी 90 प्रतिशत से अधिक सामग्री केवल भारत, केंद्र सरकार और राष्ट्रवादी संस्थाओं जैसे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) को लक्षित करने के लिए तैयार की जाती है। वैश्विक मानवाधिकार मंचों का उपयोग तटस्थ निगरानी के बजाय एक विशेष राजनीतिक दल और विचारधारा के विरोध के लिए एक उपकरण के रूप में किया जाता है, जिससे इनकी साख पूरी तरह संदिग्ध हो जाती है।

धर्मनिरपेक्षता और मानवाधिकार के मुखौटे की हकीकत
ये संगठन पश्चिमी मीडिया और संस्थानों के सामने खुद को ‘धर्मनिरपेक्ष’ और ‘न्याय के समर्थक’ के रूप में पेश करते हैं, लेकिन इनका मंच साझा करने का तरीका और फंडिंग के स्रोत इनके असली एजेंडे को उजागर करते हैं। मानवाधिकार की आड़ में कट्टरपंथी व अलगाववादी तत्वों के साथ गठजोड़ करना और केवल एक समुदाय विशेष के मुद्दों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करना यह साबित करता है कि यह पूरा अभियान वैचारिक दुर्भावना और प्रायोजित नैरेटिव का हिस्सा है।

तथ्यों और वास्तविकता के सामने बेनकाब होता सिलेक्टिव प्रोपेगैंडा
भारत में सभी 140 करोड़ नागरिकों को संविधान द्वारा समान अधिकार, न्यायिक संरक्षण और लोकतांत्रिक आजादी हासिल है। इसके विपरीत, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत को कटघरे में खड़ा करने की कोशिश करने वाले ये सिंडिकेट्स जब वास्तविक संकटग्रस्त क्षेत्रों पर आंखें मूंद लेते हैं, तो वैश्विक जनमानस में इनका ‘सिलेक्टिव आउटरेज’ स्वतः उजागर हो जाता है। राष्ट्रवादी मंचों और निष्पक्ष शोधकर्ताओं ने इनके इस दोहरे मापदंड को लगातार साक्ष्यों के साथ सार्वजनिक किया है।

सशक्त नेतृत्व और अटूट प्रवासी शक्ति के आगे पस्त होता भारत-विरोधी सिंडिकेट
तमाम विदेशी फंडिंग, अंतरराष्ट्रीय लॉबिंग और सुनियोजित नैरेटिव के बावजूद जमीनी सच्चाई यह है कि आज का भारत अपनी सांस्कृतिक जड़ों, मजबूत लोकतांत्रिक संस्थाओं और 140 करोड़ नागरिकों के विश्वास के साथ निरंतर आगे बढ़ रहा है। जॉर्ज सोरोस से लेकर वाशिंगटन की लॉबिंग फर्मों तक का यह सिंडिकेट केवल इसलिए परेशान है क्योंकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत अब पश्चिमी दबावों के आगे झुकने वाला देश नहीं रहा। 50 लाख से अधिक प्रवासी भारतीयों का अटूट समर्थन और भारत की बढ़ती आर्थिक व सामरिक शक्ति इन सभी भारत-विरोधी षड्यंत्रों को पूरी तरह निष्प्रभावी साबित कर रही है।

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