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पीएम केयर्स फंड मामले में बुरे फंसे केजरीवाल के ‘कॉकरोच’, झूठ बोलकर करा बैठे फजीहत, सामान्य ज्ञान पर उठे सवाल

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एक प्रसिद्ध हिन्दी कहावत है- “जैसा गुरु वैसा चेला”। यह कहावत आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल और उनके चलों (कॉकरोचों) पर पूरी तरह से खरा उतरता है। जहां गुरु अरविंद केजरीवाल झूठ बोलने और माफी मांगने में सारा रिकॉर्ड तोड़ चुके है, वहीं केजरीवाल के चेले कॉकरोच जनता पार्टी के अभिजीत दीपके, सौरव दास और आशुतोष रंका भी उनके नक्शे कदम पर चल रहे हैं। वो पीएम केयर्स फंड को लेकर झूठ और प्रोपेगैंडा फैलाकर लोगों को गुमराह कर रहे हैं। लेकिन वो अब अपने ही बुने जाल में फंस गए हैं। पीएम केयर्स फंड को लेकर उन्होंने जो दलीलें दी हैं, वो काफी हास्यास्पद और आधारहीन है। बीजेपी ने आरोप लगाया कि अरविंद केजरीवाल अपने चेलों (कॉकरोचों) को बुनियादी तथ्य सिखाने में भी नाकाम रहे हैं।

पीएम केयर फंड को लेकर अभिजीत दीपके का झूठ
कॉकरोच जनता पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक अभिजीत दीपके ने अपने अभियान “स्कूल ठीक करो” के तहत एक वीडियो संदेश जारी कर पीएम केयर्स फंड के अप्रयुक्त पैसों पर सवाल उठाए थे। दीपके ने कहा कि हाल ही में सामने आई ऑडिट रिपोर्ट के मुताबिक पीएम केयर्स फंड में करीब 8,500 करोड़ की रकम पड़ी हुई है, जिसका कहीं इस्तेमाल नहीं हो रहा है। उन्होंने कहा कि ग्रामीण इलाकों के सरकारी स्कूलों में बच्चे पीने के पानी जैसी बुनियादी सुविधाओं के लिए तरस रहे हैं। दीपके ने कहा, “एक तरफ कहा जाता है कि स्कूलों के लिए बजट नहीं है और दूसरी तरफ 8,500 करोड़ की राशि खाली पड़ी है। इस पैसे का उपयोग नए स्कूल बनाने और बच्चों के लिए सुविधाएं सुधारने में क्यों नहीं किया जा रहा? अगर एक स्कूल बनाने के लिए 8 करोड़ रुपये लें तो अच्छी सुविधाओं के साथ एक हजार से ज्यादा नए हाइटेक मॉडल स्कूल बनाए जा सकते थे। लेकिन ये सब नहीं हो रहा है। ये पैसा जनता का पैसा है, पीएम का नहीं है।”

सौरव दास को भी पीएम केयर्स फंड का पैसा चाहिए
काॅकरोच जनता पार्टी’ (सीजेपी) के सह-संयोजक सौरव दास एक छात्र हैं, लेकिन घर का सलाना किराया सुनकर एक गरीब छात्र के पसीने छूट जाएं। पढ़ाई कर रहे एक छात्र द्वारा एक बेहद पॉश इलाके ग्रेटर कैलाश की एक भव्य कोठी में रहना और सालाना 12 लाख (एक लाख प्रतिमाह) का किराया चुकाना अपने आप में एक पहेली है। प्रति माह लाखों का किराया देने वाले सौरव दास पीएम केयर्स फंड पर सवाल उठा रहे हैं। उन्होंने सोशल मीडिया में पोस्ट किया, “PM-CARES फंड का उपयोग देश भर में स्कूलों के विकास के लिए तत्काल किया जाना चाहिए। 8400+ करोड़ रुपये बिना इस्तेमाल के क्यों पड़े हैं? उस पैसे का 93% फिक्स्ड डिपॉजिट में क्यों है? बैंकों से मिलने वाला वह उच्च ब्याज कौन खा रहा है? हमारा ‘स्कूल ठीक करो’ अभियान हमारे स्कूलों की बदहाली को उजागर कर रहा है! अब उस पैसे का इस्तेमाल कीजिए, प्रधानमंत्री जी!”

CJP का दावा – पीएम केयर्स फंड का इस्तेमाल सरकारी स्कूलों पर होना चाहिए
पीएम केयर्स फंड (PM CARES Fund) को लेकर मुख्य विवाद पारदर्शिता की कमी, आरटीआई (RTI) के दायरे से बाहर होने और भारी मात्रा में फंड जमा होने के बावजूद बेहद कम राशि खर्च किए जाने को लेकर है। कॉकरोच जनता पार्टी और विपक्षी दलों का आरोप है कि सरकारी संसाधनों और पीएसयू के पैसों का उपयोग होने के बावजूद इसे निजी ट्रस्ट बताना विरोधाभासी है। आलोचकों का कहना है कि इसके पदेन अध्यक्ष प्रधानमंत्री हैं और गृह, रक्षा तथा वित्त मंत्री इसके ट्रस्टी हैं। साथ ही, इसके प्रचार में सरकारी प्रतीकों और डोमेन का उपयोग किया गया है, जिससे इसके निजी होने के दावे पर सवाल उठते हैं। हालिया ऑडिट रिपोर्ट के अनुसार, फंड में हजारों करोड़ रुपये जमा हैं (जैसे 2024-25 तक लगभग ₹8,450 करोड़ से अधिक), जिसका अधिकांश हिस्सा फिक्स्ड डिपॉजिट (FD) में है, जबकि आपदा या सहायता कार्यों में बहुत कम हिस्सा खर्च हुआ है। इसलिए इस फंड का इस्तेमाल सरकारी स्कूलों को बेहतर बनाने में किया जाना चाहिए।

आइए जानते हैं, पीएम केयर्स फंड क्या है और कॉकरोच जनता पार्टी, लेफ्ट, लिबरल इकोसिस्टम और टुकड़े-टुकड़े गैंग के दावे में कितना दम है…

क्या 8,452 करोड़ रुपये “सरकार का पैसा” है?
पीएम केयर्स फंड में दर्ज लगभग 8,452 करोड़ रुपये की राशि को सीधे “भारत सरकार का पैसा” कहना गलत है। 8,452 करोड़ रुपये भारत सरकार के बजट की राशि नहीं, बल्कि PM CARES Trust में जमा कोष (Corpus) है। आधिकारिक जानकारी के अनुसार पीएम केयर्स एक सार्वजनिक धर्मार्थ न्यास (Public Charitable Trust) है, जिसे मुख्य रूप से स्वैच्छिक योगदान से धन प्राप्त होता है। इसे केंद्र सरकार के बजट से नियमित बजटीय सहायता नहीं मिलती। 2023 में प्रधानमंत्री कार्यालय ने दिल्ली हाई कोर्ट में इसी आधार पर कहा था कि पीएम केयर्स फंड आर्टिकल 12 के तहत “राज्य” तथा RTI Act के तहत “सार्वजनिक संपत्ति” नहीं है। 

कोविड-19 महामारी के दौरान मार्च 2020 में पीएम केयर्स फंड का गठन किया गया था। सरकार का तर्क है कि यह एक निजी चैरिटेबल ट्रस्ट है, इसलिए यह आरटीआई अधिनियम के दायरे में नहीं आता है। प्रधानमंत्री पीएम केयर्स फंड के अध्यक्ष हैं। तीन केंद्रीय मंत्री इसके ट्रस्टी हैं। पीएम केयर्स फंड संविधान से निर्मित संस्था नहीं है। संसद या किसी राज्य विधानसभा के कानून से स्थापित नहीं है।

क्या 8,452 करोड़ सरकारी स्कूलों को दे देना चाहिए ?
पीएम केयर्स फंड का प्राथमिक उद्देश्य आपातकाल, आपदा, सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट तथा प्रभावित लोगों को राहत देना है। इसके उद्देश्यों में स्वास्थ्य सुविधाओं और आवश्यक infrastructure का निर्माण/उन्नयन भी शामिल है। इसलिए इसे बिना ट्रस्ट के उद्देश्यों और ट्रस्टी के निर्णय के सीधे सरकारी स्कूलों के बजट में स्थानांतरित करना सामान्य सरकारी बजट आवंटन जैसा नहीं है। 2024-25 में लगभग 8,452 करोड़ रुपये का कोष रिपोर्ट हुआ है, लेकिन इसे यह समझना सही नहीं होगा कि पूरा 8,452 करोड़ रुपये का कोष तत्काल खर्च करने के लिए पड़ा हुआ कैश है। रिपोर्टेड आंकड़ों में लगभग 7,846.65 करोड़ रुपये fixed deposits में होने की बात भी सामने आई है। सरकार के पास सरकारी स्कूलों के लिए अलग बजटीय व्यवस्था है। उदाहरण के लिए, 2026-27 में Department of School Education & Literacy का बजट 83,562 करोड़ रुपये रखा गया है।

कोविड-19 महामारी के दौरान हुआ था पीएम केयर्स फंड का इस्तेमाल
कोविड-19 महामारी के दौरान आपातकालीन स्थिति से निपटने के लिए मार्च 2020 में पीएम केयर्स फंड (PM CARES Fund) बनाया गया था। इस फंड का मुख्य उपयोग वेंटिलेटर खरीदने, ऑक्सीजन प्लांट लगाने, चिकित्सा उपकरण जुटाने और महामारी से प्रभावित लोगों व बच्चों की मदद (जैसे पीएम केयर्स फॉर चिल्ड्रेन स्कीम) के लिए किया गया था। मार्च 2020 से मार्च 2021 के बीच लगभग 10,990 करोड़ रुपये जमा हुए थे। महामारी के पहले वित्तीय वर्ष (2020-21) के दौरान लगभग 3,976 करोड़ रुपये खर्च किए गए। शुरुआती खर्च के बाद करीब 7,044 करोड़ रुपये बिना खर्च के बचे थे, जो बाद में ब्याज और अन्य योगदानों के साथ बढ़कर 31 मार्च 2025 तक 8,452 करोड़ रुपये के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गए हैं।

कैसे होता है पीएम केयर्स फंड का ऑडिट?
पीएम केयर्स फंड के खर्च और प्रबंधन को लेकर समय-समय पर आंकड़े और ऑडिट रिपोर्ट्स जारी किए जाते हैं, जिन पर सार्वजनिक चर्चा भी होती रही है। PM CARES की आधिकारिक FAQ के अनुसार ट्रस्टी ने स्वतंत्र ऑडिटर नियुक्त किया है। आधिकारिक जानकारी के मुताबिक M/s KKC & Associates LLP, Chartered Accountants, Mumbai को तीन वर्ष के लिए auditor नियुक्त किया गया है। लेकिन सीएजी ऑडिट और स्वतंत्र ऑडिटर से ऑडिट कराने में अंतर होता है, क्योंकि पीएम केयर्स की ओर से उपलब्ध जानकारी के अनुसार इसका ऑडिट स्वतंत्र चार्टर्ड अकाउंटेंट द्वारा होता है। लेकिन यह CAG के नियमित audit के समान नहीं है।

क्या है पीएम केयर्स फंड का ताजा ऑडिट?
हाल ही में जारी वित्तीय वर्ष 2024-25 के ऑडिटेड स्टेटमेंट के अनुसार, पीएम केयर्स फंड का कुल कॉर्पस 17.8% बढ़कर 8,452.07 करोड़ हो गया है जो 2023-24 में 7,173.03 करोड़ था। रिपोर्ट के मुताबिक, इस फंड का एक बड़ा हिस्सा फिक्स्ड डिपॉजिट में जमा है, जिससे मिली ब्याज आय ने इसके कॉर्पस को बढ़ाने में योगदान दिया है। दीपके इसी राशि का उपयोग ग्रामीण क्षेत्रों की शिक्षा व्यवस्था के बुनियादी ढांचे को सुधारने के लिए करने की मांग कर रहे हैं।

पीएम केयर्स फंड को विदेशों से डोनेशन
वित्त वर्ष 2024-25 में पीएम केयर्स फंड को 92.8 लाख रुपये का विदेशी दान मिला है, जो पिछले वर्ष (1.13 करोड़ रुपये) की तुलना में करीब 18% कम है। इस फंड में अब तक कुल शेष राशि बढ़कर 31 मार्च 2025 तक 8,452 करोड़ रुपये हो गई है।

PMNRF पहले से था, फिर PM CARES क्यों बनाया गया?
भारत में पहले से प्रधानमंत्री राष्ट्रीय राहत कोष (PMNRF) मौजूद था। इसलिए आलोचक पूछते हैं कि नया आपातकालिक ट्रस्ट (पीएम केयर्स फंड) बनाने की आवश्यकता क्यों पड़ी। सरकार का मूल तर्क यह रहा कि पीएम केयर्स का उद्देश्य व्यापक emergency situations—विशेषकर COVID जैसी राष्ट्रीय आपदाओं—के लिए dedicated response mechanism बनाना था।

दरअसल, भारत में प्रधानमंत्री राष्ट्रीय राहत कोष (PMNRF) जनवरी 1948 से मौजूद है। इसे तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की अपील पर पाकिस्तान से विस्थापित लोगों की सहायता के लिए बनाया गया था। इसका इस्तेमाल बाढ़, भूकंप, बड़ी दुर्घटना और गंभीर बीमारी जैसी परिस्थितियों में जरूरतमंद लोगों को आर्थिक सहायता देने के लिए किया जाता रहा है।

PM CARES को 2020 में कोविड जैसी बड़ी आपात स्थिति के लिए अलग से बनाया गया। इसका उद्देश्य सिर्फ लोगों को राहत देना नहीं, बल्कि बड़ी emergency में लोगों की मदद के साथ-साथ स्वास्थ्य व्यवस्था को मजबूत करने के लिए है। कोविड के दौरान बड़े पैमाने पर स्वास्थ्य व्यवस्था खड़ी करने में भी पैसा लगाना था—जैसे वेंटिलेटर, ऑक्सीजन प्लांट, वैक्सीन और स्वास्थ्य संबंधी आधारभूत ढांचा। PM CARES का दायरा सार्वजनिक स्वास्थ्य आपातकाल, अनुसंधान, और आपातकालीन क्षमताओं के निर्माण तक विस्तृत है।

PMNRF का प्रबंधन पारंपरिक रूप से प्रधानमंत्री के विवेक पर होता है, जबकि PM CARES एक सार्वजनिक चैरिटेबल ट्रस्ट है, जिसमें देश के रक्षा मंत्री, गृह मंत्री और वित्त मंत्री इसके पदेन सदस्य/ट्रस्टी के रूप में शामिल होते हैं।

यूपीए सरकार में PMNRF से राजीव गांधी फाउंडेशन को दिया गया था फंड
यूपीए (UPA) सरकार के शासनकाल के दौरान प्रधानमंत्री राष्ट्रीय राहत कोष (PMNRF) से राजीव गांधी फाउंडेशन (RGF) को फंड दिए जाने का मामला सामने आया था। वर्ष 2020 में राजनीतिक बयानों और आरोपों के दौरान यह मुद्दा प्रमुखता से उठाया गया था। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी पीएमएनआरएफ के बोर्ड में भी थीं और आरजीएफ की अध्यक्ष भी थीं। इस फंड की रकम को एक परिवार के फाउंडेशन में डायवर्ट करना ना सिर्फ फ्रॉड था, बल्कि देश की जनता से धोखा भी था।

मोदी सरकार में स्कूलों के कायाकल्प पर बढ़ा खर्च
2014-15 से 2020-21 के बीच Department of School Education & Literacy का वास्तविक खर्च लगभग 5.42 लाख करोड़ रुपये रहा। संसद में दिए गए आंकड़ों के अनुसार इन सात वर्षों में वास्तविक व्यय क्रमशः 68,926 करोड़ रुपये, 67,352 करोड़ रुपये, 71,931 करोड़ रुपये, 80,246 करोड़ रुपये, 79,983 करोड़ रुपये, 89,513 करोड़ रुपये और 84,030 करोड़ रुपये रहा। इसमें केवल भवन निर्माण ही नहीं, बल्कि सरकारी स्कूलों की शिक्षा व्यवस्था से जुड़े विभिन्न कार्यक्रम, शिक्षक प्रशिक्षण, छात्र सहायता, मिड-डे मील, स्कूल infrastructure और अन्य मद शामिल हैं।

पीएम मोदी ने लॉन्च किया था ‘स्वच्छ भारत, स्वच्छ विद्यालय’ अभियान

सरकारी योजनाओं के अंतर्गत केवल नए स्कूल बनाने पर ही खर्च नहीं किया जाता, बल्कि स्कूलों की आधारभूत ढांचा के विकास पर खर्च किया जा रहा है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने देश के सभी स्कूलों में लड़के और लड़कियों के लिए अलग शौचालय सुनिश्चित करने के वास्ते 15 अगस्त 2014 को अपने स्वतंत्रता दिवस भाषण में घोषणा की थी, जिसे बाद में ‘स्वच्छ भारत, स्वच्छ विद्यालय’ अभियान के रूप में लॉन्च किया गया।

🏫 स्कूलों का बुनियादी ढाँचा

  • नए स्कूल भवन
  • अतिरिक्त कक्षाएँ
  • विज्ञान प्रयोगशालाएँ
  • शौचालय
  • स्वच्छ पेयजल
  • बिजली की सुविधा
  • दिव्यांग बच्चों के लिए रैंप एवं सुगम सुविधाएँ

🧼 स्वच्छ भारत, स्वच्छ विद्यालय

  • स्कूलों में स्वच्छ एवं अलग शौचालय
  • छात्राओं के लिए विशेष स्वच्छता सुविधाएँ
  • सुरक्षित पेयजल
  • हाथ धोने की व्यवस्था
  • स्वच्छ एवं स्वस्थ विद्यालय परिसर
  • बच्चों में स्वच्छता की आदतों को बढ़ावा

‘स्वच्छ भारत, स्वच्छ विद्यालय’ अभियान के माध्यम से स्कूलों में स्वच्छता, शौचालय और पेयजल जैसी बुनियादी सुविधाओं को बेहतर बनाने पर विशेष जोर दिया गया।

💻 डिजिटल शिक्षा

  • सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी प्रयोगशालाएँ
  • स्मार्ट कक्षाएँ
  • इंटरनेट सुविधा
  • डिजिटल शिक्षण सामग्री
  • दीक्षा मंच के माध्यम से डिजिटल शिक्षा

👨‍🏫 शिक्षक एवं शिक्षण गुणवत्ता

  • शिक्षकों का प्रशिक्षण
  • विद्यालय नेतृत्व का विकास
  • जिला शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थानों को मजबूत करना
  • शिक्षण की गुणवत्ता और सीखने के परिणामों में सुधार

👧 बालिकाएँ एवं वंचित वर्ग

  • कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालय
  • समावेशी शिक्षा
  • विशेष आवश्यकता वाले बच्चों के लिए सुविधाएँ
  • परिवहन एवं एस्कॉर्ट सुविधा
  • विशेष प्रशिक्षण

🍱 बच्चों का पोषण

  • पीएम पोषण योजना
  • विद्यालयों में पौष्टिक भोजन
  • बच्चों के पोषण एवं विद्यालय में उपस्थिति को बढ़ावा

बीजेपी शासित राज्यों में भी स्कूलों पर बढ़ा खर्च, पकड़ा गया अभिजीत का झूठ
कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के संस्थापक अभिजीत दीपके ने राजस्थान में जर्जर स्कूलों के पुनर्निर्माण (300 स्कूलों की मरम्मत/भवन) को अपनी पार्टी के अभियान का असर बताया था। सीजेपी के सह-संयोजक आशुतोष रांका और उनकी टीम के दौरों को श्रेय दिया था। लेकिन मीडिया रिपोर्ट्स और सरकारी रिकॉर्ड के अनुसार यह दावा गलत साबित हुआ क्योंकि यह पुराना और केंद्र/राज्य सरकार का स्वीकृत फैसला था। रिपोर्ट्स के मुताबिक, केंद्र सरकार ने मार्च में ही राजस्थान के स्कूल इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए 300 करोड़ रुपये मंजूर किए थे, और राज्य सरकार ने 10 जुलाई को ही जर्जर विद्यालयों पर प्रेस रिलीज जारी कर दी थी—जबकि CJP की ‘स्कूल ठीक करो’ मुहिम की शुरुआत 15 अगस्त को हुई थी।

FCRA BILL और IT जांच से लेफ्ट, लिबरल इकोसिस्टम में हड़कंप
आम आदमी पार्टी और कॉकरोच जनता पार्टी के समर्थकों के साथ ही लेफ्ट, लिबरल इकोसिस्टम और टुकड़े-टुकड़े गैंग भी पीएम केयर्स फंड के खिलाफ मैदान में कूद पड़ा है। आंकड़ों को तोड़-मरोड़कर नए-नए नैरेटिव तैयार किए जा रहे हैं। आधारहीन तथ्यों के आधार पर सीधे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को निशाना बनाने की कोशिश हो रही है। यह सब प्रोपेगैंड कॉकरोच जनता पार्टी और उन तमाम स्वयं सेवी संस्थाओं को बचाने और लोगों का ध्यान अपनी तरफ से हटाने के लिए हो रहा है, जो विदेशों से फंड लेते हैं। मोदी सरकार ने विदेशी फंड को पारदर्शी बनाने के लिए एफसीआरए बिल लाया है। इनकम टैक्स डिपार्टमेंट ने विदेश से संदिग्ध लेन-देन की जांच के लिए एक वेरिफिकेशन शुरू किया है। जिसके तहत 394 संस्थाएं और 36 प्रोफेशनल्स रडार पर हैं। इससे संदिग्ध विदेशी फंड लेने वालों के बीच खलबली मची हुई है।

 

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