कभी बिहार के ग्रामीण इलाकों के तालाबों और स्थानीय बाजारों तक सीमित रहने वाला मखाना अब दुनियाभर में हेल्दी स्नैक और प्रीमियम सुपरफूड के रूप में लोकप्रिय हो रहा है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के कुशल नेतृत्व में देश का यह पारंपरिक कृषि उत्पाद वैश्विक कृषि-खाद्य बाजार में अपनी मजबूत पहचान बना रहा है। स्वास्थ्य के प्रति बढ़ती जागरूकता, प्रीमियम स्नैक्स की मांग और वैश्विक बाजार में बढ़ती स्वीकार्यता ने इसे नई पहचान दी है। भारत दुनिया का सबसे बड़ा मखाना उत्पादक देश है और वैश्विक आपूर्ति में इसकी हिस्सेदारी करीब 80–85 प्रतिशत है। देश के कुल उत्पादन में बिहार की हिस्सेदारी लगभग तीन-चौथाई है।
क्या आप जानते हैं कि दुनिया का लगभग 90% मखाना बिहार से आता है?
तालाबों से लेकर वैश्विक बाजार तक, मखाना सिर्फ एक फसल नहीं बल्कि बिहार की मेहनत, परंपरा और समृद्धि की पहचान है।@IPRDBihar@Agribih@Agribih#horticulture #bihar #Superfood #Makhana pic.twitter.com/rxt30QrpeA
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बिहार बना मखाना उत्पादन का केंद्र
मखाना को वैज्ञानिक रूप से Euryale ferox कहा जाता है। यह एक जलीय फसल है, जिसकी खेती मुख्य रूप से उथले तालाबों और झीलों में की जाती है। इसका खाने योग्य हिस्सा बीज होता है, जिसे भूनने और प्रसंस्करण के बाद पॉप करके हल्के और कुरकुरे मखाने के रूप में खाया जाता है। भारत में इसका उत्पादन मुख्य रूप से बिहार, पश्चिम बंगाल और असम में होता है। बिहार के मिथिला क्षेत्र के दरभंगा, मधुबनी, पूर्णिया, सुपौल, सहरसा और मधेपुरा जिलों में इसकी खेती प्रमुखता से की जाती है। पारंपरिक खेती से निकलकर मखाना अब आधुनिक कृषि, प्रसंस्करण और ब्रांडिंग से भी जुड़ रहा है।
बिहार का गौरव, सेहत का खज़ाना—देखिए मखाना बनने की अद्भुत प्रक्रिया।#makhana #Bihar #horticulture pic.twitter.com/1BFsxQOQpj
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2024–25 में भारत का मखाना उत्पादन 63,910 मीट्रिक टन था, जबकि 2025–26 के द्वितीय अग्रिम अनुमानों के अनुसार यह बढ़कर 80,590 मीट्रिक टन हो गया। इसी अवधि में औसत उत्पादकता 2.03 से बढ़कर 2.34 मीट्रिक टन प्रति हेक्टेयर हुई। 2025–26 में बिहार का उत्पादन करीब 60,000 मीट्रिक टन रहा। परंपरागत तालाब आधारित खेती के साथ अब फील्ड-सिस्टम खेती और स्वर्ण वैदेही तथा सबौर मखाना-1 जैसी उन्नत किस्मों का इस्तेमाल भी बढ़ रहा है। इससे उत्पादकता बढ़ाने और खेती से जुड़े जोखिम कम करने में मदद मिली है।

‘मिथिला मखाना’ को GI टैग से मिली पहचान
‘मिथिला मखाना’ को GI टैग मिलने से बिहार के इस पारंपरिक उत्पाद की अलग पहचान मजबूत हुई है। GI दर्जा मिथिला क्षेत्र में उत्पादित मखाने की विशिष्ट गुणवत्ता, प्रतिष्ठा और पारंपरिक ज्ञान को मान्यता देता है। इससे मखाने को कानूनी संरक्षण के साथ घरेलू और अंतरराष्ट्रीय बाजारों में अलग ब्रांड पहचान बनाने का अवसर मिला है। प्रीमियम कीमत और निर्यात की संभावनाओं को देखते हुए यह किसानों के लिए भी महत्वपूर्ण है।

राष्ट्रीय मखाना बोर्ड से क्षेत्र को नई दिशा
मखाना क्षेत्र की बढ़ती संभावनाओं को देखते हुए केंद्रीय बजट 2025–26 में राष्ट्रीय मखाना बोर्ड की स्थापना की घोषणा की गई थी। इसका औपचारिक शुभारंभ 15 सितंबर 2025 को बिहार में हुआ। बोर्ड का उद्देश्य मखाना की पूरी मूल्य श्रृंखला को मजबूत करना है। इसमें अनुसंधान, उत्पादन, प्रसंस्करण, ब्रांडिंग, विपणन और निर्यात पर जोर दिया जा रहा है।

सरकार ने मखाना विकास के लिए केंद्रीय क्षेत्र योजना को भी मंजूरी दी है। 2025–26 से 2030–31 तक इसके लिए कुल 476.03 करोड़ रुपये का परिव्यय निर्धारित किया गया है। योजना में गुणवत्तापूर्ण बीज, अनुसंधान एवं नवाचार, किसानों का कौशल विकास, कटाई और कटाई के बाद की तकनीक, मूल्य संवर्धन, ब्रांडिंग और निर्यात को बढ़ावा देने पर ध्यान है। 2025–26 के लिए 30 करोड़ रुपये और 2026–27 के लिए 90 करोड़ रुपये स्वीकृत किए गए हैं।

घरेलू बाजार में तेजी से बढ़ी मांग
मखाने की लोकप्रियता बढ़ने के पीछे स्वास्थ्य के प्रति बढ़ती जागरूकता बड़ी वजह है। 2021–22 से 2024–25 के बीच घरेलू मखाना बाजार में 17–18 प्रतिशत की वार्षिक वृद्धि दर्ज की गई। प्रीमियम उत्पादों की मांग, ब्रांडेड कंपनियों के विस्तार और हेल्दी स्नैक के रूप में बढ़ती स्वीकार्यता ने बाजार को गति दी।

मखाना बाजार के 2029–30 तक 11,000–12,000 करोड़ रुपये तक पहुंचने का अनुमान है। 2020–22 में इसकी औसत कीमत करीब 500 रुपये प्रति किलोग्राम थी, जो 2025 में बढ़कर लगभग 1,250 रुपये प्रति किलोग्राम हो गई। सीमित आपूर्ति, प्रीमियम ब्रांडिंग और स्वास्थ्य-केंद्रित स्नैक्स की मांग को इसके प्रमुख कारणों में माना गया है। भारत में पॉप्ड मखाने की अनुमानित मासिक घरेलू खपत 3,000–3,500 मीट्रिक टन है, जो त्योहारों के दौरान करीब 5,000 मीट्रिक टन तक पहुंच जाती है। ब्रांडेड FMCG और संगठित स्नैक कंपनियां हर महीने करीब 1,800–2,000 मीट्रिक टन की खपत करती हैं।

भारतीय मखाने की वैश्विक मांग
भारत का मखाना निर्यात भी तेजी से बढ़ा है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार निर्यात 2020 में 7,260 मीट्रिक टन से बढ़कर 2024 में 25,130 मीट्रिक टन हो गया। 2025–26 में भारत ने 7,264.89 मीट्रिक टन मखाना उत्पादों का निर्यात किया, जिसका मूल्य 19,296.08 लाख रुपये रहा। अमेरिका, कनाडा और यूएई भारत के सबसे बड़े बाजार हैं। दूसरी ओर जर्मनी, नेपाल और ऑस्ट्रेलिया जैसे छोटे बाजारों में प्रति किलोग्राम अधिक कीमत मिलती है। इससे निर्यात बाजारों में विविधता लाने और प्रीमियम बाजारों पर ध्यान देने की संभावनाएं सामने आती हैं।
बिहार का मखाना न केवल एक स्वादिष्ट व्यंजन है, बल्कि पोषक तत्वों का एक अनमोल खजाना भी है। आज यह सुपरफूड भारत के कोने-कोने से लेकर विश्व के हर हिस्से में अपनी पहचान बना रहा है। मखाने की बढ़ती मांग ने बिहार के किसानों को आर्थिक समृद्धि और वैश्विक मंच पर नई पहचान दी है। जो आने वाले… pic.twitter.com/M76MjQrcmW
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किसानों के लिए बढ़ रहे अवसर
मखाना विकास योजनाओं के तहत विभिन्न राज्यों में 1,010 हेक्टेयर अतिरिक्त क्षेत्र को मखाने की खेती के तहत लाया गया है। 73 हेक्टेयर क्षेत्र को बीज उत्पादन कार्यक्रम में शामिल किया गया है और उन्नत तकनीकों के प्रदर्शन के लिए 89 फ्रंट लाइन प्रदर्शन आयोजित किए गए हैं। किसानों के लिए प्रशिक्षण, सेमिनार और एक्सपोजर विजिट भी आयोजित किए जा रहे हैं। राज्य कृषि विश्वविद्यालयों, केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालयों और ICAR संस्थानों की मदद से किसानों को आधुनिक तकनीकों से जोड़ा जा रहा है। 2025–26 में योजना के तहत देशभर में कुल 8,159 किसान लाभान्वित हुए।

पोषण ने बनाया ‘सुपरफूड’
मखाने की बढ़ती लोकप्रियता की एक बड़ी वजह इसकी पोषण संबंधी खूबियां हैं। इसमें कार्बोहाइड्रेट, उच्च गुणवत्ता वाला प्रोटीन, आहार फाइबर और मैग्नीशियम, पोटैशियम, फॉस्फोरस तथा आयरन जैसे आवश्यक पोषक तत्व पाए जाते हैं। इसमें सोडियम की मात्रा कम होती है और यह कोलेस्ट्रॉल-मुक्त है। मखाने में वसा की मात्रा भी काफी कम है—प्रति 100 ग्राम करीब 0.33 ग्राम। इसमें आवश्यक अमीनो एसिड पाए जाते हैं और इसकी लगभग 95 प्रतिशत प्रोटीन पाचन क्षमता बताई गई है। कम ग्लाइसेमिक लोड और पोषण प्रोफाइल के कारण मखाना स्वास्थ्य-केंद्रित खाद्य बाजार में तेजी से लोकप्रिय हुआ है। यही वजह है कि इसे अब भारत से बाहर भी प्रीमियम और पौध-आधारित सुपरफूड के तौर पर देखा जा रहा है।

बीज से स्नैक तक लंबी प्रक्रिया
मखाने की मूल्य श्रृंखला खेत से शुरू होकर बाजार तक पहुंचती है। तालाब की तैयारी, बीजों का छिड़काव, फसल प्रबंधन और पानी से बीजों की मैनुअल कटाई इसके शुरुआती चरण हैं। इसके बाद बीजों की सफाई, सुखाने और उच्च तापमान पर भूनने की प्रक्रिया होती है। भुने हुए बीजों को पॉप किया जाता है, जिसके बाद पॉलिशिंग, छंटाई और ग्रेडिंग होती है। बड़े और बेहतर गुणवत्ता वाले मखाने को अधिक कीमत मिलती है। अब मखाने का कारोबार पारंपरिक पॉप्ड उत्पाद तक सीमित नहीं है। फ्लेवर्ड मखाना, रेडी-टू-ईट स्नैक्स, मखाना आटा और अन्य मूल्यवर्धित उत्पादों की मांग बढ़ रही है। इससे ग्रामीण क्षेत्रों में प्रसंस्करण, रोजगार और छोटे उद्यमों की संभावनाएं बढ़ी हैं।

अनुसंधान और तकनीक से बदल रहा क्षेत्र
राष्ट्रीय मखाना अनुसंधान केंद्र यानी NRCM मखाना क्षेत्र के आधुनिकीकरण में अहम भूमिका निभा रहा है। केंद्र ने अधिक उपज देने वाली किस्मों, जल-कुशल कृषि प्रणालियों और मखाना-सह-मछली पालन को बढ़ावा दिया है। NRCM ने किसानों और विभिन्न संस्थानों को 15,824.1 किलोग्राम अधिक उपज देने वाले मखाना बीज वितरित किए हैं। 2012 से 2023 के बीच 3,000 से अधिक किसानों को उन्नत खेती, प्रसंस्करण और विपणन का प्रशिक्षण दिया गया। केंद्र ने मखाना बीज वॉशर, बीज ग्रेडर, रोस्टिंग मशीन, पॉपिंग मशीन और पॉप्ड मखाना ग्रेडर जैसी मशीनें भी विकसित की हैं। इन तकनीकों के व्यावसायिक उपयोग से उत्पादन और प्रसंस्करण को अधिक आधुनिक बनाने की संभावनाएं बढ़ी हैं।
India’s Makhana: Growing Demand, Global Reach
💠 Makhana, or fox nut, has emerged as a fast-growing agri-food product in India. This is due to its nutritional value, rising health awareness, and increasing global demand
💠 India is the world’s largest producer of #Makhana.… pic.twitter.com/NuEZKMoCOQ
— PIB India (@PIB_India) August 21, 2026
पारंपरिक फसल से वैश्विक ब्रांड तक
मखाना अब सिर्फ बिहार की पारंपरिक फसल नहीं रह गया है। यह किसानों की आय, ग्रामीण रोजगार, खाद्य प्रसंस्करण और कृषि निर्यात की संभावनाओं से जुड़ा तेजी से बढ़ता क्षेत्र बन चुका है। राष्ट्रीय मखाना बोर्ड, केंद्रीय क्षेत्र योजना और अनुसंधान संस्थानों की पहल से उत्पादन से लेकर प्रसंस्करण और ब्रांडिंग तक पूरी मूल्य श्रृंखला को मजबूत करने की कोशिश हो रही है। वहीं घरेलू और वैश्विक बाजार में हेल्दी और प्रीमियम स्नैक्स की बढ़ती मांग मखाने के लिए नए अवसर पैदा कर रही है। मखाना आने वाले वर्षों में किसानों की आय बढ़ाने, ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार पैदा करने और भारत के कृषि-खाद्य निर्यात को नई मजबूती देने वाला महत्वपूर्ण उत्पाद बन सकता है। पारंपरिक तालाबों से निकलकर ग्लोबल सुपरफूड बनने की मखाने की यह यात्रा भारत के बदलते कृषि-खाद्य क्षेत्र की नई तस्वीर पेश करती है।










