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एथेनॉल पर केजरीवाल की कमजोर इकोनॉमिक्स, झूठ बेनकाब

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दिल्ली की सत्ता से जनता द्वारा बेदखल किए जाने के बाद भी आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल की भ्रामक राजनीति पर विराम नहीं लगा है। लगभग दस वर्षों तक दिल्ली को झांसे और भ्रम में रखने वाले केजरीवाल अब मीडिया की सुर्खियों में बने रहने के लिए राष्ट्रीय महत्व की कृषि व आर्थिक नीतियों पर झूठा विलाप कर रहे हैं। एथेनॉल मिश्रण नीति पर मनगढ़ंत दावे कर वे देश के किसानों और चीनी उद्योग की छवि धूमिल करने की साजिश में जुटे हैं, जबकि सच्चाई यह है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र सरकार ने एथेनॉल क्रांति से किसानों को सशक्त किया है, आयात बिल घटाया है और साथ ही त्योहारी सीजन में उपभोक्ताओं को महंगाई से बचाने के लिए समय पर कड़े व ऐतिहासिक फैसले लिए हैं।

शीरे के सदुपयोग से किसानों को समृद्धि, पहले नालों में बहता था वेस्ट
केजरीवाल का यह दावा पूरी तरह हास्यास्पद और अज्ञानता से भरा है कि एथेनॉल के कारण चीनी महंगी हो रही है। वास्तविकता यह है कि गन्ने की पेराई का प्राथमिक उद्देश्य हमेशा चीनी उत्पादन ही होता है; लगभग दस किलोग्राम गन्ने से एक किलोग्राम चीनी बनती है। इसके बाद बचने वाली खोई (बगास) ऊर्जा उत्पादन, कागज और पार्टिकल बोर्ड बनाने के काम आती है, जबकि मैली से जैविक खाद तैयार होती है। चीनी बनने के बाद जो शीरा (मोलासेस) बचता था, पूर्ववर्ती सरकारों की अनदेखी के चलते वह नालों और गड्ढों में बहा दिया जाता था क्योंकि स्पिरिट व शराब की खपत सीमित थी। मोदी सरकार ने पेट्रोल में एथेनॉल मिश्रण की नीति लागू कर इस अनुपयोगी शीरे को बहुमूल्य जैव ईंधन में बदल दिया। इससे चीनी मिलों की आर्थिक स्थिति मजबूत हुई और किसानों को गन्ने का सही मूल्य मिलना संभव हुआ। यदि यह आर्थिक चक्र न होता, तो उत्पादन लागत बढ़ने से चीनी के दाम कहीं अधिक बढ़ जाते।

त्योहारी सीजन में जमाखोरी पर कड़ा प्रहार: थोक खरीदारों पर 15 दिनों की स्टॉक लिमिट
आगामी गणेश चतुर्थी, दशहरा, दीपावली और छठ पूजा जैसे बड़े त्योहारों के दौरान घरेलू बाजार में चीनी की पर्याप्त उपलब्धता बनाए रखने के लिए केंद्रीय खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण मंत्री प्रह्लाद जोशी ने सख्त प्रशासनिक कदम उठाए हैं। जमाखोरी और कृत्रिम मूल्य वृद्धि पर लगाम लगाने के लिए सरकार ने आदेश जारी किया है कि प्रतिमाह 10 टन से अधिक चीनी का इस्तेमाल करने वाले थोक खरीदार 15 दिनों से अधिक का स्टॉक नहीं रख सकेंगे। सरकार की इस त्वरित सख्ती ने उन मुनाफाखोरों की कमर तोड़ दी है जो त्योहारी मांग का फायदा उठाकर कीमतें बढ़ाने की फिराक में थे।

घरेलू आपूर्ति को प्राथमिकता: 10 लाख टन कच्ची चीनी के शुल्क-मुक्त आयात का साहसिक कदम
विपरीत मौसम और कम ओपनिंग स्टॉक की स्थिति को भांपते हुए केंद्र सरकार ने प्रो-एक्टिव रुख अपनाकर 10 लाख मीट्रिक टन कच्ची चीनी के ड्यूटी-फ्री (टैरिफ-मुक्त) आयात को मंजूरी दी है। विदेश व्यापार महानिदेशालय (DGFT) द्वारा जारी यह अधिसूचना दर्शाती है कि आम जनता को राहत पहुंचाना मोदी सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता है। भारत की विशाल रिफाइनिंग क्षमता के दम पर ब्राजील जैसे प्रमुख उत्पादक देशों से कच्ची चीनी मंगाकर उसे तेजी से प्रोसेस किया जाएगा, जिससे खुदरा कीमतों पर किसी भी प्रकार का अनुचित दबाव न पड़े।

घरेलू मांग को लेकर मोदी सरकार का नीतिगत संतुलन
विपक्ष चाहे जितना भी दुष्प्रचार करे, मोदी सरकार के लिए देश के उपभोक्ताओं के हित सर्वोपरि हैं। जब भी बाजार में आपूर्ति प्रभावित होने की आशंका बनी, केंद्र सरकार ने तत्काल कदम उठाए। सरकार ने पहले ही निर्देश जारी कर गन्ने के ताजे रस या सिरप से सीधे एथेनॉल बनाने पर रोक लगा दी थी, ताकि पहली प्राथमिकता चीनी उत्पादन को मिले। सरकार की नीति बिल्कुल साफ है कि एथेनॉल उत्पादन मुख्य रूप से चीनी निर्माण के बाद बचे सह-उत्पादों (शीरे) से ही संतुलित रूप में किया जाए।

विदेशी मुद्रा की बचत और देश की ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करता विजन
एथेनॉल ब्लेंडिंग कार्यक्रम केवल एक कृषि नीति नहीं, बल्कि देश की अर्थव्यवस्था को आत्मनिर्भर बनाने का सशक्त माध्यम है। कच्चे तेल के आयात पर भारत की निर्भरता कम करके मोदी सरकार ने अब तक हजारों करोड़ रुपये की बहुमूल्य विदेशी मुद्रा बचाई है। विपक्ष का यह प्रलाप दर्शाता है कि वे देश को विदेशी ऊर्जा आयात पर ही निर्भर रखना चाहते हैं, जबकि केंद्र सरकार का लक्ष्य देश के संसाधनों का लाभ सीधे भारतीय किसानों और घरेलू अर्थव्यवस्था तक पहुंचाना है।

अर्थव्यवस्था पर केजरीवाल का भ्रामक गणित बेनकाब
केजरीवाल का यह दावा भी उनके आर्थिक अज्ञान और कुतर्क का स्पष्ट प्रमाण है, जिसमें वे कह रहे हैं कि तेल आयात से बची विदेशी मुद्रा चीनी आयात में खर्च हो रही है। जमीनी आंकड़े बताते हैं कि एथेनॉल ब्लेंडिंग से कच्चे तेल के आयात बिल में अब तक एक लाख करोड़ रुपये से अधिक की ऐतिहासिक विदेशी मुद्रा की बचत हुई है। इसके मुकाबले, त्योहारी मांग को पूरा करने के लिए 10 लाख टन कच्ची चीनी के सीमित आयात पर खर्च होने वाली राशि इस विशाल बचत का एक छोटा-सा हिस्सा मात्र है। तेल आयात में हुई भारी बचत स्थाई और दीर्घकालिक है, जबकि कच्ची चीनी का आयात एक अस्थायी व सामयिक कदम है। तथ्यों की इस बुनियादी समझ के बिना केजरीवाल केवल जनता में भ्रम फैला रहे हैं, जबकि मोदी सरकार की नीति ने देश की तिजोरी को मजबूत करते हुए महंगाई पर भी कड़ा नियंत्रण रखा है।

किसानों को रिकॉर्ड गन्ना मूल्य भुगतान और बकाए का ऐतिहासिक समाधान
पूर्ववर्ती सरकारों के दौर में गन्ना किसानों को अपने बकाए के भुगतान के लिए वर्षों तक मिलों के चक्कर काटने पड़ते थे। एथेनॉल उत्पादन से चीनी मिलों की वित्तीय तरलता (कैश फ्लो) में ऐतिहासिक सुधार हुआ है, जिसके परिणामस्वरूप आज देश में 99 प्रतिशत से अधिक गन्ना बकाए का भुगतान रिकॉर्ड समय पर संभव हो पाया है। किसानों की इस आर्थिक मजबूती को पचा पाना नकारात्मक राजनीति करने वाले दलों के बस की बात नहीं है।

जलवायु परिवर्तन और बुआई रकबे में कमी को छुपाने की राजनीति
केजरीवाल प्राकृतिक और मौसमी कारणों को सरकार की नीतिगत विफलता बताने का कुत्सित प्रयास कर रहे हैं। प्रमुख उत्पादक राज्यों जैसे महाराष्ट्र और कर्नाटक में सूखे और कम वर्षा के कारण फसल प्रभावित हुई है। उदाहरण के लिए, अकेले उत्तराखंड में पेराई सत्र 2026-27 के दौरान गन्ने का कुल रकबा पिछले सत्र के 88,603 हेक्टेयर से घटकर 84,189 हेक्टेयर रह गया—यानी रकबे में करीब 4,413 हेक्टेयर (लगभग 5 प्रतिशत) की गिरावट आई, जिसका बड़ा असर हरिद्वार जिले में देखा गया। मौसम की मार और रकबे की प्राकृतिक कमी को नजरअंदाज कर एथेनॉल नीति पर सवाल उठाना केवल राजनीतिक अपरिपक्वता है।

तकनीकी तथ्य: रिकवरी दर में बदलाव के पीछे वैज्ञानिक कारक
सुगौली चीनी मिल जैसे मामलों में पेराई के दौरान चीनी की रिकवरी दर में आए उतार-चढ़ाव को विपक्ष गलत तरीके से पेश कर रहा है। वर्ष 2022-23 में 8.55 किलो और 2023-24 में 8.96 किलो रहने के बाद इसमें आई कमी के पीछे गन्ने की किस्मों में मिठास (सुक्रोज) की मात्रा, मौसम की मार और पेराई चक्र जैसे कई तकनीकी कारक जिम्मेदार हैं। वैज्ञानिक और कृषि तथ्यों को समझे बिना सतही बयानबाजी करना आम आदमी पार्टी की पुरानी कार्यशैली रही है।

पर्यावरण संरक्षण और ‘नेट जीरो’ की दिशा में भारत की वैश्विक छलांग
पेट्रोल में 20 प्रतिशत एथेनॉल मिश्रण (E20) का लक्ष्य पर्यावरण को कार्बन उत्सर्जन से मुक्त करने का महाअभियान है। इस नीति से लाखों टन कार्बन डाइऑक्साइड का उत्सर्जन कम हुआ है, जिससे वायु गुणवत्ता में सुधार हुआ है। जो दल वर्षों तक प्रदूषण पर केवल बहानेबाजी करते रहे, वे आज पर्यावरण और जनस्वास्थ्य को सुरक्षित करने वाली राष्ट्रीय जैव-ईंधन नीति का विरोध कर रहे हैं।

अनाज और कृषि अवशेषों से 2G एथेनॉल: बहुआयामी रणनीति
यह सोचना भी गलत है कि एथेनॉल केवल गन्ने पर टिका है। केंद्र सरकार ने मक्का, क्षतिग्रस्त खाद्यान्न और पराली (कृषि अवशेष) से भी सेकेंड जेनरेशन (2G) एथेनॉल बनाने के संयंत्र स्थापित किए हैं। इससे धान-गेहूं के अलावा अन्य फसलों के किसानों को नया बाजार मिला है और पराली के धुएं से होने वाले प्रदूषण का स्थाई वैज्ञानिक समाधान भी निकल रहा है।

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उपभोक्ता मूल्य स्थिरता: वैश्विक संकट के बीच भारत में कुशल प्रबंधन
अंतरराष्ट्रीय बाजार में चीनी की कीमतें रिकॉर्ड स्तर पर रहने और वैश्विक चुनौतियों के बावजूद भारत सरकार ने बफर स्टॉक प्रबंधन, समयबद्ध आयात और स्टॉक लिमिट के सटीक समन्वय से घरेलू कीमतों को नियंत्रित रखा है। आम परिवारों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ न पड़े, यह मोदी सरकार के कुशल आर्थिक और प्रशासनिक प्रबंधन का ही प्रमाण है।

सनसनीखेज दावों और मनगढ़ंत आरोपों का आदी रहा है केजरीवाल का राजनीतिक सफर
राजनीति में बदलाव का वादा लेकर आए अरविंद केजरीवाल का पूरा राजनीतिक करियर केवल सनसनीखेज दावों, निराधार आरोपों और मीडिया स्टंट पर आधारित रहा है। प्रशासनिक नीतियों से लेकर महामारी प्रबंधन तक, केजरीवाल का हर बड़ा दावा तथ्यों की कसौटी पर टिक नहीं सका। दिल्ली की जनता ने उनके इस फरेब को पहचानकर उन्हें सत्ता से बाहर कर दिया है, और अब देश भी उनके इस नए दुष्प्रचार को पूरी तरह खारिज कर चुका है।

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