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आयकर की ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ से दिमागी नक्सलियों के नेटवर्क की परतें खुलीं, GenZ की वायरल रील ने भी खोली पोल

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आयकर विभाग ने एक बार फिर देशव्यापी ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ शुरू की है। इससे पहले आयकर विभाग ने नोटबंदी के समय काले धन को बाहर निकालने के लिए ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ शुरू की थी। इस बार निशाने पर वे कंपनियां हैं जो अपने आयकर रिकॉर्ड में या तो बहुत कम कारोबार दिखा रही हैं, अथवा कोई वास्तविक व्यावसायिक गतिविधि नहीं दिखातीं, लेकिन इसके बावजूद बहुत बड़ी रकम विदेश भेज रही हैं। विभाग को इन विदेशी प्रेषणों और घोषित कारोबार के बीच स्पष्ट असंगति मिली है। दरअसल, ये वो दिमागी नक्सली हैं, जो देश में रहकर भी देश के साथ गद्दारी करने में लगे हुए हैं। आयकर विभाग ने ऐसे ही दिमागी नक्सलियों के खिलाफ देशव्यापी वैरीफिकेशन एक्सरसाइज की ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ कर दी है। ताजा रिपोर्ट के अनुसार अलग डेटा-विश्लेषण में 6,422 नई पहचानी गई संस्थाओं से कुल 1.29 लाख करोड़ रुपए के विदेशी भुगतान का ट्रेल सामने आया है। प्राथमिक जांच में लगभग 394 संस्थाओं को सत्यापन के दायरे में लिया गया है। इनमें 117 संस्थाएं उन राज्यों में स्थित हैं जो भारत की अंतरराष्ट्रीय भूमि सीमाओं से लगे हैं। इसके अतिरिक्त लगभग 36 पेशेवरों, विशेष रूप से उन लोगों की भूमिका भी जांच के दायरे में है, जिन्होंने विदेशी भुगतान से जुड़े प्रमाणपत्र जारी किए।

दिमागी नक्सलियों से सावधान रहने की जरूरत- पीएम मोदी
‘दिमागी नक्सल’ कोई संगठन नहीं, बल्कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा 15 अगस्त 2026 के लाल किले के भाषण में इस्तेमाल किया गया राजनीतिक और वैचारिक शब्द है। पीएम मोदी ने हथियारबंद नक्सलवाद के कमजोर पड़ने के संदर्भ में कहा कि अब समाज में ऐसी नक्सली मानसिकता रखने वालों को पहचानने और अलग-थलग करने की जरूरत है, जो अराजकता या देश की एकता के विरुद्ध गतिविधियों को बढ़ावा देते हैं। उन्होंने आगाह किया कि भले ही हथियारबंद नक्सली चले गए हैं, लेकिन ‘दिमागी नक्सली’ (माओवादी और देश विरोधी सोच रखने वाले लोग) अभी भी मौजूद हैं और वे लगातार मौके की तलाश में रहते हैं। इसके बाद केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू ने दिमागी नक्सली की व्याख्या करते हुए कहा कि ये वो लोग हैं, जो माओवाद का समर्थन करते हैं और संविधान को नहीं मानते, अलगाववादियों के साथ खड़े होते हैं या अनुच्छेद 370 का समर्थन करते हैं, अथवा ‘चिकन नेक’ के जरिए पूर्वोत्तर को भारत से अलग करने की बात करते हैं।

आइए, अब सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहे एक ही गाने से समझते हैं कि दिमागी नक्सली कौन हैं और इनके खतरनाक मंसूबे क्या हैं…

विदेश जा रहे 1.29 लाख करोड़ रुपए और कागजों पर गायब कारोबार
इस बीच आयकर विभाग ने ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ से दिमागी नक्सलियों के संदिग्ध नेटवर्क की परतें खोली हैं। देश की अर्थव्यवस्था जब दुनिया की बड़ी और तेज गति से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में अपनी जगह मजबूत कर रही है, तब देश की कमाई को संदिग्ध रास्तों से बाहर ले जाने की दिमागी नक्सलियों की कोशिशें केवल कर चोरी का मामला नहीं रह जातीं। यह उस आर्थिक व्यवस्था पर सीधा प्रहार और देश से गद्दारी है, जिसमें करोड़ों ईमानदार करदाता अपनी जिम्मेदारी निभाते हैं। ऐसे समय में आयकर विभाग की देशव्यापी सत्यापन कार्रवाई इसलिए महत्वपूर्ण है कि इसमें सवाल केवल इस बात का नहीं है कि कितना पैसा विदेश गया, बल्कि यह भी है कि किसके पास से गया, किस कारोबार के नाम पर गया, किसे गया और उसके पीछे वास्तविक आर्थिक गतिविधि थी भी या नहीं। ताजा जांच में 1.29 लाख करोड़ के विदेशी भुगतान का बड़ा ट्रेल सामने आया है, जबकि 394 संस्थाएं कार्रवाई के दायरे में हैं।

फ्रेट, सॉफ्टवेयर आयात और कंसल्टेंसी के नाम पर हो रहा खेल
आयकर विभाग के प्रारंभिक मैदानी सत्यापन में कई ऐसी दिमागी नक्सली संस्थाओं की पहचान हुई, जिनका घोषित कारोबार बेहद छोटा था या जिन्होंने आयकर रिटर्न तक दाखिल नहीं किया था। इसके बावजूद उनके माध्यम से विदेशों में बड़ी रकम भेजी गई। सबसे बड़ा सवाल यहीं पैदा होता है कि यदि किसी कंपनी का घोषित कारोबार मामूली है, तो उसके विदेशी भुगतान इतने बड़े कैसे हो गए? विभाग के अनुसार कई मामलों में घोषित टर्नओवर और विदेश भेजी गई रकम के बीच कोई स्पष्ट संबंध नहीं दिखा। विदेशी भुगतान अपने आप में गैरकानूनी नहीं है। भारतीय कंपनियां वैध रूप से माल आयात करती हैं, सॉफ्टवेयर खरीदती हैं, कंसल्टेंसी सेवाएं लेती हैं और विदेशों में अन्य कारोबारी भुगतान करती हैं। समस्या तब शुरू होती है जब लेन-देन का घोषित उद्देश्य, कंपनी की वास्तविक गतिविधि और भुगतान की रकम आपस में मेल न खाएं। आयकर विभाग ने ऐसे मामलों में फ्रेट भुगतान, सॉफ्टवेयर आयात और कंसल्टेंसी जैसी बताई गई वजहों और वास्तविक रकम के बीच असंगति पाई है।

वास्तविक पते पर कारोबारी गतिविधियों का कोई अता-पता ही नहीं
इनकम टैक्स विभाग की जांच का एक और गंभीर पहलू सामने आया है। जब जांच की गई तो पता चला कि वास्तविकता में कुछ संस्थाएं उन पतों पर संचालित ही नहीं हैं, जो उनके सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज है। यानी कागजों पर कंपनी मौजूद, बैंकिंग चैनल मौजूद, विदेशी भुगतान मौजूद है, लेकिन जिस पते पर उसका कारोबार होना चाहिए, वहां वास्तविक कारोबारी गतिविधि का कोई अता-पता ही नहीं है। यदि आगे की जांच इन आशंकाओं को प्रमाणित करती है, तो यह केवल टैक्स चोरी का मामला नहीं, बल्कि फर्जी कारोबारी संरचनाओं के इस्तेमाल से धन स्थानांतरण की संभावित बड़ी कहानी बन सकता है। प्रारम्भिक जांच में 394 संस्थाओं का आंकड़ा इस कार्रवाई की शुरुआत का महत्वपूर्ण संकेत है। ताजा रिपोर्ट के अनुसार आयकर जांच में 6,422 नई पहचानी गई संस्थाओं द्वारा 1.29 लाख करोड़ विदेश भेजे जाने का ट्रेल सामने आया है। इनमें से 394 फर्मों के खिलाफ कार्रवाई की जा चुकी है और व्यापक नेटवर्क में कंपनियों तथा व्यक्तियों की भूमिका भी जांची जा रही है। इसका अर्थ है कि सत्यापन की परतें खुलने के साथ दायरा बढ़ सकता है।

चीन समेत पांच प्रमुख देशों में गई 1.29 लाख करोड़ की रकम
विदेशों में भेजी गई इतनी धनराशि की जांच में कई गंभीर तथ्य भी सामने आए हैं। Economic Times के अनुसार कुल 1.29 लाख करोड़ रुपए में से 72.3 प्रतिशत धनराशि पांच प्रमुख देशों चीन, सिंगापुर, यूएई, हांगकांग और मॉरीशस भेजी गई है। अकेले सिंगापुर को 41,885 करोड़, UAE को 18,331 करोड़ और हांगकांग को 18,064 करोड़ भेजे जाने की जानकारी सामने आई है। जांच का एक महत्वपूर्ण पहलू इसका भौगोलिक दायरा है। करीब 117 संस्थाएं उन राज्यों में स्थित हैं, जिनकी अंतरराष्ट्रीय सीमा है। इसका अर्थ यह नहीं है कि सीमावर्ती राज्य की हर संस्था संदिग्ध है; बल्कि आयकर विभाग ने वहां स्थित उन संस्थाओं को भी सत्यापन में शामिल किया है, जिनसे बड़े विदेशी भुगतान जुड़े पाए गए। संवेदनशील सीमावर्ती क्षेत्रों में वित्तीय नेटवर्क की वास्तविकता की जांच इसलिए भी महत्वपूर्ण हो जाती है, क्योंकि आर्थिक गतिविधियों के साथ-साथ धन के अवैध प्रवाह की संभावित कड़ियों को अलग-अलग एजेंसियां गंभीरता से देखती हैं।

असल कहानी कंपनियों की नहीं, दिमागी नक्सलियों की है
इस पूरे मामले का सबसे अहम पक्ष 36 ऐसे पेशेवर हैं, जिन्हें साफ तौर पर दिमागी नक्सली कहा जा सकता है। आयकर विभाग ने उन दिमागी नक्सलियों की भूमिका भी सत्यापन के दायरे में रखी है, जिन्होंने विदेशी भुगतान से संबंधित प्रमाणपत्र जारी किए हैं। इसके साथ ही चार्टर्ड अकाउंटेंट्स को Form 15CB/Form 146 जारी करते समय सावधानी बरतने की चेतावनी दी है। दरअसल, Form 15CB कोई सामान्य कागज नहीं है। इसका उद्देश्य विदेशी भुगतान की कर-देयता और संबंधित कर अनुपालन का निर्धारण करना है। आयकर विभाग के अनुसार प्रमाणपत्र जारी करने वाले अकाउंटेंट को संबंधित खातों और दस्तावेजों के आधार पर भुगतान की कर-स्थिति की जांच करनी होती है। अब यदि एक ही छोटे समूह के द्वारा बड़ी संख्या में ऐसे प्रमाणपत्र जारी किए जाने और विदेश भेजी गई रकम में संदिग्ध पैटर्न दिखाई देता है, तो स्वाभाविक रूप से सवाल उठ रहे हैं कि क्या हर प्रमाणपत्र वास्तविक लेन-देन की पर्याप्त जांच के बाद जारी हुआ था?

 

फर्जी चैरिटेबल ट्रस्ट: सवाल पैसा भेजने का नहीं, हिसाब देने का है
किसी भारतीय कंपनी का विदेश में पैसा भेजना अपने आप में अपराध नहीं है। असली सवाल है कि क्या वह पैसा वास्तविक कारोबार के बदले गया? क्या उसके पीछे वास्तविक सेवा या वस्तु थी? क्या टैक्स कानूनों का पालन हुआ? क्या दस्तावेज सही थे? क्या जिस कंपनी ने पैसा भेजा, उसका कारोबार वास्तव में उतना था? और क्या प्रमाणपत्र जारी करने वाले पेशेवरों ने पर्याप्त जांच की? इन सवालों के जवाब ही इस पूरे ऑपरेशन की असली तस्वीर सामने लाएंगे। इस जांच का एक दूसरा सिरा कथित फर्जी चैरिटेबल ट्रस्टों के खिलाफ हुई कार्रवाई से जुड़ता है। आयकर विभाग के अनुसार एक तलाशी अभियान में ऐसे कथित फर्जी ट्रस्टों का नेटवर्क सामने आया, जिन पर फर्जी दान और योगदान के बदले accommodation entries देने के आरोप हैं। इसी व्यापक डेटा और ग्राउंड इंटेलिजेंस ने विदेशी भुगतानों की संदिग्ध श्रृंखला की ओर ध्यान खींचा है।

अब ‘मास्टरमाइंड’ दिमागी नक्सलियों तक पहुंचना होगा
गौरतलब है कि 2016 में नोटबंदी के बाद काले धन के खिलाफ आयकर कार्रवाइयों को तत्कालीन आर्थिक मामलों के सचिव शक्तिकांत दास ने “surgical strike” कहे जाने की बात कही थी। तत्कालीन रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर ने नोटबंदी को काले धन, आतंक और ड्रग मनी के खिलाफ सर्जिकल स्ट्राइक बताया था। Economic Times के मुताबिक 394 संस्थाओं की पहचान अंत नहीं, शुरुआत है। आयकर विभाग ने खुद कहा है कि ऐसे मामलों में ऑपरेशन का वास्तविक तौर-तरीका आगे की जांच से स्पष्ट होगा। इसलिए अब सबसे महत्वपूर्ण चरण यह जानना है कि कागजी कंपनियों के पीछे वास्तविक लाभार्थी कौन हैं? पैसा किस स्रोत से आया? किस उद्देश्य से गया ? किन विदेशी संस्थाओं तक पहुंचा और इस पूरी श्रृंखला में किसकी क्या भूमिका थी? ऐसी जांच का उद्देश्य और इसका एक बड़ा लाभ यह भी है कि इससे ईमानदारी से कारोबार करने वाली कंपनियों का भरोसा मजबूत होता है। यदि कोई कंपनी नियमों के अनुसार आयात करती है, विदेशी सेवाओं का भुगतान करती है और उसके पास हर लेन-देन का स्पष्ट दस्तावेज है, तो मजबूत सत्यापन व्यवस्था उसके लिए परेशानी नहीं, बल्कि सुरक्षा कवच बन सकती है।

 

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