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राहुल गांधी का पाखंड: मनुस्मृति की आड़ में प्रहार और ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ पर क्यों इनकार

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यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः।
यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्राफलाः क्रियाः॥
अर्थात: जहां स्त्रियों का आदर और सम्मान होता है, वहां देवता निवास करते हैं और सुख-समृद्धि रहती है। जहां उनका सम्मान नहीं होता, वहां किए गए सभी अच्छे कर्म और प्रयास निष्फल हो जाते हैं। महिलाओं के आदर की सर्वोच्चता का यह श्लोक उसी मनुस्मृति का है, जिसे राहुल गांधी ने पुणे में युवाओं और GenZ को दिग्भ्रमित करने के लिए शर्मनाक बताया है। सहज ही पूछा जा सकता है कि यदि राहुल वास्तव में महिलाओं की स्वतंत्र पहचान और सशक्तीकरण के लिए इतने ही चिंतित हैं, तो उन्होंने ‘नारी शक्ति वंदन संशोधन अधिनियम’ का विरोध क्यों किया? यह वही ऐतिहासिक विधेयक था, जिसने देशभर की महिलाओं को राजनीति में सीधे 33प्रतिशत भागीदारी सुनिश्चित की। महिलाओं के प्रति उनकी ओछी सोच इससे भी जाहिर होती है कि राहुल ने तो अपनी बहन प्रियंका तक को चुनावी राजनीति में खुद के दो दशक बाद उतारा। वह भी मजबूरी में, क्योंकि खुद उन्हें सफलता नहीं मिल पा रही और लगातार चुनाव हार रहे हैं। सवाल यह भी उठता है कि जिस तरह राहुल प्राचीन हिंदू संहिताओं, सनातन ग्रंथों को तोड़-मरोड़कर पेश करते हैं। या राजनीतिक फायदे के लिए सलेक्टिव सोच दिखाते हैं। क्या उनमें दूसरे धर्मों के ग्रंथों में महिलाओं की स्थिति और अधिकारों पर सार्वजनिक मंचों से बोलने का साहस है? जब राहुल केवल बहुसंख्यक समाज के ग्रंथों को चुन-चुनकर निशाना बनाते हैं, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि उनका इरादा महिला सशक्तिकरण नहीं, बल्कि सोची-समझी तुष्टिकरण की राजनीति साधना और सनातन आस्था को नीचा दिखाना है।नारीशक्ति से हर कालखंड में भारत की उन्नति और खुशहाली
राहुल गांधी अनर्गल आरोप लगा रहे हैं कि मनुस्मृति जैसे महान ग्रंथ से भारत में महिलाओं को दबाने का माइंसेट आता है। शायद उन्हें पता नहीं कि भारतभूमि सदियों ही से मातृशक्ति के सम्मान और गौरव की साक्षी रही है। मनुस्मृति में भी नारी को केवल एक व्यक्ति नहीं बल्कि शक्ति, विद्या और समृद्धि का साक्षात रूप माना गया है। सनातन संस्कृति में ‘नारी’ के आदर को सर्वोच्च स्थान देते हुए भगवान शिव के ‘अर्धनारीश्वर’ स्वरूप की कल्पना की गई, जो पुरुष और महिला की समानता और एक-दूसरे के प्रति सम्मान का सबसे बड़ा उदाहरण है। इतिहास और पुराणों में जब भी ज्ञान की आवश्यकता हुई तो मां सरस्वती, धन के लिए मां लक्ष्मी और संकटकाल में शक्ति के लिए मां दुर्गा का आह्वान किया गया, जो महिलाओं के प्रति अगाध श्रद्धा को दर्शाता है। व्यावहारिक जगत में भी अनुसूया, गार्गी और मैत्रेयी जैसी विदुषियों ने अपने ज्ञान से समाज का मार्गदर्शन किया, तो राजमाता जीजाबाई ने छत्रपति शिवाजी महाराज को संस्कार देकर राष्ट्रभक्ति की नींव रखी। आधुनिक युग में भी रानी लक्ष्मीबाई की वीरता, अहिल्याबाई होल्कर का कुशल प्रशासन और मां शारदा का वात्सल्य इसी पावन भूमि पर फला-फूला। ये ऐतिहासिक उदाहरण हमें स्मरण कराते हैं कि भारत की उन्नति और खुशहाली हर कालखंड में नारी के अधिकारों, उसकी गरिमा और उसके स्वाभिमान को अक्षुण्ण रखने से आई है।मनुस्मृति: महिलाओं के पक्ष में एक नहीं, अनेक उदाहरण
दरअसल, कांग्रेस और इंडी गठबंधन के नेताओं की यह सोची-समझी, लेकिन घटिया राजनीति है कि जब मुद्दाविहीन हो जाओ तो सनातन संस्कृति पर उंगली उठाओ। मनुस्मृति को गाली दे दो। जब स्वयं को आधुनिक व बुद्धिजीवी दिखाना हो तो रामचरितमानस और मनुस्मृति को शर्मनाक बता दो। राहुल जिस मनुस्मृति के श्लोक पर सवाल उठा रहे हैं, वही मनुस्मृति कहती है कि कन्या का अविवाहित रह जाना बेहतर है, लेकिन उसका विवाह किसी गुणहीन पुरुष से नहीं किया जाना चाहिए। नारी-सशक्तिकरण के लिए इससे बेहतर और क्या हो सकता है? मनुस्मृति कहती है – विन्देत सदृशं पतिम्। कन्या अपने योग्य पति का स्वयं वरण करे। यदि अभिभावक विवाह नहीं कराते और कन्या स्वयं पति चुन ले, तो न कन्या किसी पाप या अपराध की भागी होती है, और न वह पुरुष जिसे वह चुनती है। स्वेच्छा और कंसेंट को इससे बेहतर कोई कैसे परिभाषित कर सकता है? इतना ही नहीं, मनुस्मृति ही कहती है – पुत्रेण दुहिता समा। यानि पुत्री और पुत्र के समान है। स्त्री-पुरुष समानता के लिए मनुस्मृति से बेहतर ग्रंथ और कौनसा हो सकता है?

डॉ. भीमराव आंबेडकर ने भी माना था मनुस्मृति का लोहा
नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी जिन डॉ. आंबेडकर के संविधान की किताब को लेकर दिखावा करते रहते हैं, उन डॉ. आंबेडकर ने भी मनुस्मृति का लोहा माना था। उन्होंने हिंदू कोड बिल (Hindu Code Bill) के समय 24 फरवरी 1949 को संसद में चर्चा के दौरान मनुस्मृति का हवाला दिया था। उन्होंने तार्किक स्वर में कहा था कि कुल 137 स्मृतियों में याज्ञवल्क्य और मनु का स्तर सबसे ऊंचा है। उन्होंने रेखांकित किया कि स्वयं मनुस्मृति भी कुछ विशेष परिस्थितियों में (जैसे विधवा या पुत्र न होने पर) बेटियों को भाइयों के हिस्से का एक-चौथाई (1/4) उत्तराधिकार देने का समर्थन करती है। उनका उद्देश्य यह साबित करना था कि महिलाओं को संपत्ति का अधिकार देना कोई आधुनिक या विदेशी विचार नहीं है, बल्कि भारत की सनातन प्राचीन कानूनी परंपराओं में भी इसका आधार पहले से ही मौजूद रहा है।

पुणे के मंच से छात्रों की नहीं, ‘पाखंड’ के नए अध्याय की गूंज
राहुल गांधी ने 22 अगस्त को पुणे में ‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम के दौरान एक बार फिर अपने राजनीतिक एजेंडे को साधने के लिए सनातन संस्कृति और देश के गौरवशाली इतिहास को कठघरे में खड़ा करने का कुत्सित प्रयास किया। मनुस्मृति के एक श्लोक को संदर्भ से काटकर पेश करना और उसे ‘शर्मनाक’ करार देना, राहुल गांधी की हताशा को दर्शाता है। एक ऐसे मंच पर, जहां युवाओं को राष्ट्र निर्माण के लिए प्रेरित किया जाना चाहिए था, वहां एक ऐसे नेता का अपनी तुच्छ राजनीति के लिए प्राचीन ग्रंथों को बदनाम करना, न केवल निंदनीय है, बल्कि उनकी बौद्धिक और सांस्कृतिक समझ के स्तर को भी रेखांकित करता है।

महिलाओं के सम्मान नहीं, सनातन के अपमान के लिए व्यग्र
यह कोई पहला मौका नहीं है जब राहुल गांधी ने अपनी राजनीति चमकाने के लिए हिंदू धर्म के प्रतीकों और ग्रंथों को निशाना बनाया है। राहुल गांधी अक्सर अपनी सुविधा के अनुसार सिर्फ उन अंशों को चुनते हैं जो उनके विभाजनकारी नैरेटिव में फिट बैठते हैं। उनका यह आचरण साफ दर्शाता है कि वे महिलाओं के सम्मान के प्रति नहीं, बल्कि सनातन संस्कृति को बदनाम करने के प्रति ‘व्यग्र’ हैं। राहुल गांधी का यह प्रयास कि वे मनुस्मृति जैसे ग्रंथों को शर्मनाक बताएं, केवल भारतीय संस्कृति और सनातन परंपराओं के प्रति उनके द्वेष को उजागर करता है। शायद उन्हें पता हो कि जिस प्राचीन भारत की वे आलोचना कर रहे हैं, उसी ने गार्गी और मैत्रेयी जैसी विदुषी महिलाओं को जन्म दिया? समस्या ग्रंथों में नहीं, बल्कि राहुल गांधी की उस मानसिकता में है जो हिंदू परंपराओं को बदनाम करके वोट बैंक की राजनीति करना चाहती है।

दोगलेपन की पराकाष्ठा: नारी शक्ति वंदन अधिनियम का विरोध क्यों?
यदि राहुल गांधी महिलाओं की स्वतंत्र पहचान और सशक्तिकरण के लिए वास्तव में चिंतित हैं, तो उन्होंने ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ का विरोध क्यों किया? यह एक ऐतिहासिक विधेयक था, जिसने महिलाओं को राजनीति में सीधे 33 प्रतिशत भागीदारी सुनिश्चित की। क्या यह महिलाओं को स्वतंत्र पहचान और देशसेवा का मार्ग प्रशस्त करने का सबसे बड़ा अवसर नहीं था? कांग्रेस, राहुल गांधी और उनके सहयोगी दलों ने इस विधेयक का न केवल विरोध किया, बल्कि इस पर सवाल भी उठाए। यह दोगलेपन की पराकाष्ठा है कि एक तरफ आप महिलाओं के ‘स्वतंत्र’ होने की बात करते हैं और दूसरी तरफ उन्हें सशक्त बनाने वाले कानून का विरोध करते हैं। दरअसल, जब उन्हें लगा कि महिलाएं अब उनके झांसे में नहीं आएंगी, तो उन्होंने ‘नारी शक्ति’ को एक ऐसे हथियार के रूप में इस्तेमाल करने का प्रयास किया, जिससे वे सरकार को घेर सकें। लेकिन देश की महिलाएं अब जागरूक हैं और वे जानती हैं कि ‘नारी शक्ति’ की असली हिमायती मोदी सरकार और उसकी नीतियां हैं।

प्रियंका गांधी की एंट्री: विफलताओं में बहना का सशक्तिकरण
इतना ही नहीं राहुल गांधी का दोहरा रवैया तो उनके अपने परिवार में भी साफ नजर आता है। उन्होंने अपनी बहन प्रियंका गांधी वाड्रा को चुनावी राजनीति में तब उतारा, जब कांग्रेस लगातार चुनाव हार रही थी और खुद राहुल की अपनी नेतृत्व क्षमता पर सवाल उठ रहे थे। दो दशक से अधिक समय तक जब कांग्रेस सत्ता में थी, तब महिलाओं को ‘स्वतंत्र पहचान’ क्यों नहीं दी गई? जब खुद का वजूद खतरे में दिखा, तब महिलाओं की याद आई। यह साफ़ करता है कि राहुल गांधी के लिए महिलाओं का सशक्तीकरण केवल एक राजनीतिक उपकरण है, न कि कोई वैचारिक प्रतिबद्धता है।

कांग्रेस का ‘महिला विरोधी’ चरित्र: अभद्र टिप्पणियों पर चुप्पी
राहुल गांधी की पार्टी के नेताओं द्वारा महिलाओं पर की गई अभद्र टिप्पणियां जगजाहिर हैं। जब कांग्रेस के नेता महिलाओं के प्रति अमर्यादित भाषा का इस्तेमाल करते हैं, तब राहुल गांधी और उनकी बहन प्रियंका गांधी की की ‘स्वतंत्र पहचान’ की नैतिकता कहां चली जाती है? तब वे क्यों चुप्पी साध लेते हैं? कांग्रेस सरकारें हों या इंडी गठबंधन की सरकारें, इनमें महिलाओं पर जुल्म, शोषण और रेप पर इनके होंठ सिले ही रहते हैं। यह चुप्पी कायरता और मौन सहमति का प्रतीक है। यह दिखाता है कि कांग्रेस की संस्कृति में महिलाओं के प्रति सम्मान का अभाव है, और राहुल गांधी की बातें सिर्फ दिखावा मात्र ही हैं। राहुल का इस पर ‘मौन’ रहना यह साबित करता है कि वे भी इस तरह की मानसिकता का हिस्सा हैं। जब तक राहुल अपने नेताओं की इस अभद्र भाषा की निंदा नहीं करते, तब तक महिलाओं के प्रति उनके ‘सम्मान’ की बात एक छलावा मात्र है। 

बेटियों को लेकर कांग्रेसियों की ऐसी रही है निकृष्ट सोच

  • कांग्रेस की गहलोत सरकार में बेतहाशा रेप पर उनके मंत्री शांति धारीवाल ने शर्मनाक बयान दिया कि राजस्थान तो मर्दों का प्रदेश रहा है यार, अब उसका क्या करें।
  • पूर्व केंद्रीय कोयला मंत्री श्रीप्रकाश जायसवाल का महिलाओं के प्रति नजरिया देखिए- “जैसे-जैसे समय बीतता है, जीत का मजा फीका पड़ जाता है, ठीक वैसे ही जैसे पत्नी पुरानी होने पर अपनी चमक खो देती है।
  • पूर्व सीएम दिग्विजय सिंह और वरिष्ठ कांग्रेस नेता ने अपनी पार्टी की महिला नेता को 100 टके की टंच माल कहा।
  • कांग्रेस नेता सत्यदेव कटारे के मुताबिक जब तक महिला तिरछी नजर से नहीं देखेगी, तब तक पुरुष उसे नहीं छेड़ेगा।
  • कांग्रेस नेत बोटचा सत्यनारायण निर्भया कांड के बाद महिलाओं को रात में न घूमने की सलाह ही दे दी।
  • कांग्रेस के वरिष्ठ नेता रणदीप सुरजेवाला ने तो हेमा मालिनी पर घटिया बयान दे दिया। EC ने प्रचार पर 48 घंटे का प्रतिबंध लगाया।
  • राजीव गांधी सरकार ने शाहबानो केस में एक असहाय महिला के अधिकारों को कुचला।
  • कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने मिस वर्ल्ड मानुषी छिल्लर को ‘चिल्लर’ तक कह दिया।

राजस्थान में जब कांग्रेस की गहलोत सरकार थी, तब महिलाओं के शोषण और उनपर अत्याचार का यह हाल था… 

यह राजस्थान मर्दों का प्रदेश रहा है यार…उसका क्या करें ?
तब विधानसभा में पुलिस और जेल की अनुदान मांगों पर बहस का जवाब देने के दौरान संसदीय कार्यमंत्री शांति धारीवाल ने राजस्थान को रेप में नंबर वन बताने के साथ उसके कारणों पर बेहद आपत्तिजनक बयान भी दे दिया। शांति धारीवाल ने कहा कि ये सच है कि राजस्थान रेप के मामलों में नंबर वन है. कुछ देर चुप रहकर बोले कि अब ये रेप के मामले क्यों हैं? फिर हंसते हुए कहा- वैसे भी यह राजस्थान तो मर्दों का प्रदेश रहा है यार…उसका क्या करें ? धारीवाल ने जब रेप के मामले बढ़ने को मर्दों के प्रदेश से जोड़कर बयान दिया तो किसी को गलती का अहसास नहीं हुआ।

रेप को मर्दानगी से जोड़ने के बयान का यू-ट्यूब पर सीधा प्रसारण
यह कहकर धारीवाल फिर हंसे तो कई मंत्री और कांग्रेस विधायक भी हंसने लगे। किसी ने धारीवाल को टोका तक नहीं। इस मौके पर सरकार के मंत्री और सत्ताधारी पार्टी के विधायक हंसते रहे। सरकार में तीन-तीन महिला मंत्री भी हैं, उनमें से भी किसी ने नहीं टोका। संसदीय कार्यमंत्री धारीवाल ने बताया कि रेप के मामले में रेप और रेप विद मर्डर के आंकड़े अलग-अलग हैं। रेप विथ मर्डर में राजस्थान 11 वें नंबर पर है। धारीवाल जिस वक्त रेप को मर्दानगी से जोड़ने का बयान दे रहे थे, उस वक्त विधानसभा की कार्यवाही का यू-ट्यूब पर सीधा प्रसारण चल रहा था। बड़ी संख्या में आम लोगों ने भी उनके बयान को सुना।

विपक्ष के विधायक सदन से बायकॉट करके चले गए थे
संसदीय कार्य मंत्री शांति धारीवाल ने जिस वक्त यह बयान दिया, उस वक्त सदन में विपक्ष के बीजेपी विधायक मौजूद नहीं थे। धारीवाल के जवाब शुरू होते ही उनकी टिप्पणियों से नाराज होकर बीजेपी विधायक सदन से बहिष्कार कर गए थे। ऐसे में विपक्ष की गैर मौजूदगी में दिए गए बयान पर किसी ने आपत्ति नहीं की। आपत्ति करना तो दूर सत्ता पक्ष के विधायक संसदीय कार्यमंत्री के गैर-जिम्मेदाराना बयान पर ठहाके ही लगाते रहे।

अपने मंत्री की निर्लज्ज स्वीकारोक्ति पर प्रियंका क्या कहेंगी
तत्कालीन संसदीय कार्यमंत्री धारीवाल के बयान पर बीजेपी नेता सतीश पूनिया ने कहा कि सदन में प्रदेश में बलात्कार में एक नंबर पर होने की निर्लज्ज स्वीकारोक्ति और मर्दों की आड़ में नारी के प्रति स्तरहीन बयान प्रदेश की महिलाओं का अपमान है। पूनिया ने कहा कि धारीवाल ने इस बयान से पुरुषों की गरिमा को भी गिराया है। उन्हें सदन और महिलाओं से माफी मांगनी चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि अपने मंत्री के इस तरह के बयान पर अब प्रियंका जी क्या कहेंगी।

शांति धारीवाल ने सदन को कलंकित किया, माफी मांगें
भाजपा के वरिष्ठ नेता राजेंद्र राठौड़ ने कहा कि मंत्री ने सदन को कलंकित करने का काम किया है। भाजपा इसकी निंदा करती है, उन्हें सदन में माफी मांगनी होगी। बलात्कार के मामलों को लेकर राजस्थान को मर्दो का प्रदेश कहना और हंसना, साथ ही कांग्रेस के अन्य विधायकों का भी हंसना, बड़ा ही शर्मनाक है। कांग्रेसियों की इस हंसी ने सदन की गरिमा को गिराया है। राठौड़ ने धारीवाल की बात का जवाब देते हुए कहा कि उत्तर प्रदेश में भाजपा अपनी कानून व्यवस्था के बल पर ही सत्ता में लौटी है। लेकिन राजस्थान में बिगड़ी कानून व्यवस्था चर्चा में हैं। यहां रोज 18 मामले बलात्कार के दर्ज हो रहे हैं। सरकार इस दिशा में कुछ नहीं कर रही है।

अबलाओं की अस्मत पर यूपी में हंगामा, राजस्थान में चुप्पी
कांग्रेस सांसद सोनिया गांधी को महिला होने के बावजूद लगता है महिलाओं की पीड़ा के कोई सरोकार नहीं है। न ही उनकी बेटी प्रियंका गांधी को राजस्थान की महिलाओं पर हो रहे अत्याचार नजर आते थे। यह और बात है कि यदि यही अत्याचार उत्तर प्रदेश या अन्य किसी बीजेपी शासित राज्य में घटित हो जाएं तो वह सियासत करने का कोई मौका नहीं गंवाती हैे। महिलाओं की अस्मत लुटने के मामले में राजस्थान देशभर में शर्मसार हुआ, तब राहुल-प्रियंका ने इस दिशा में कुछ भी नहीं किया। क्योंकि यहां पर उनकी पार्टी की सरकार थी। तब शिक्षा के मंदिरों में शिक्षकों के द्वारा छात्राओं के साथ यौैन अपराध सुर्खियों में रहा था।

 

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