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‘शिक्षा क्रांति’ के नाम पर छलावा: पंजाब में 1,100 से अधिक सरकारी स्कूलों में प्रिंसिपल नहीं!

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आम आदमी पार्टी (आप) के बहुचर्चित शिक्षा मॉडल की हकीकत एक बार फिर बेनकाब हो गई है। पंजाब में भगवंत मान सरकार द्वारा लगातार ‘शिक्षा क्रांति’ के बड़े-बड़े दावे किए जा रहे हैं, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि राज्य के 60 प्रतिशत सीनियर सेकेंडरी स्कूल बिना नियमित प्रिंसिपल के चल रहे हैं। शिक्षक संगठनों और विपक्षी दलों के खुलासे ने साफ कर दिया है कि दिल्ली से लेकर पंजाब तक शिक्षा व्यवस्था केवल महंगे विज्ञापनों और प्रचार तक सीमित है, जबकि हकीकत में स्कूल शिक्षकों की भारी कमी, प्रशासनिक अव्यवस्था और बदहाली से जूझ रहे हैं।

पंजाब में प्रशासनिक पंगुता: 1,113 सीनियर सेकेंडरी स्कूल बिना प्रिंसिपल
डेमोक्रेटिक टीचर्स फ्रंट (डीटीएफ) के अनुसार, पंजाब के कुल 1,927 सीनियर सेकेंडरी स्कूलों में से 1,113 स्कूलों में नियमित प्रिंसिपल ही नहीं हैं। मानसा और नवांशहर में 86 प्रतिशत, तरनतारन और बरनाला में 80 प्रतिशत तथा मोगा, कपूरथला और जालंधर में करीब 70 प्रतिशत पद रिक्त हैं। स्कूलों में मुखिया न होने के कारण अध्यापकों पर गैर-जरूरी प्रशासनिक बोझ डाला जा रहा है, जिससे शिक्षण कार्य पूरी तरह ठप हो गया है।

‘स्कूल ऑफ एमिनेंस’ के नाम पर छलावा: 19,000 आम स्कूलों की अनदेखी
पंजाब सरकार चुनिंदा ‘स्कूल ऑफ एमिनेंस’ का उद्घाटन कर वाहवाही लूटने की कोशिश कर रही है, जबकि राज्य के 19 हजार से अधिक सामान्य सरकारी स्कूल बुनियादी सुविधाओं के लिए तरस रहे हैं। बीजेपी नेताओं ने औचक निरीक्षण के बाद खुलासा किया कि सामान्य स्कूलों में 80 से 90 बच्चे एक ही कमरे या बरामदों में बैठकर पढ़ने को मजबूर हैं।

फिनलैंड और सिंगापुर टूर का तमाशा: प्रशासनिक प्रशिक्षण बनाम बुनियादी जरूरतें
सरकार ने शिक्षकों और प्रिंसिपलों को सिंगापुर और फिनलैंड भेजने के नाम पर करोड़ों रुपये का प्रचार किया, लेकिन जब स्कूलों में नियमित प्रिंसिपल और बुनियादी इंफ्रास्ट्रक्चर ही नहीं हैं, तो इस तरह के विदेशी दौरों की प्रासंगिकता पर गंभीर सवाल खड़े होते हैं। विशेषज्ञों का आरोप है कि बुनियादी कमियों को दूर करने के बजाय विदेशी दौरों को पीआर स्टंट की तरह भुनाया जा रहा है।

ड्रग्स और सुरक्षा का संकट: चारदीवारी और सुरक्षा गार्ड से वंचित स्कूल
पंजाब के कई सीमावर्ती और ग्रामीण इलाकों में सरकारी स्कूलों की चारदीवारी टूटी पड़ी है और सुरक्षा गार्ड तक तैनात नहीं हैं। राज्य में नशामुक्ति के दावों के बीच स्कूलों के आसपास सुरक्षा का यह अभाव छात्रों के लिए असुरक्षित माहौल पैदा कर रहा है, जिससे अभिभावकों में भारी चिंता है।

अतिथि और संविदा व्यवस्था का जाल: पक्के रोजगार के वादों की अनदेखी
दिल्ली के रास्ते पर चलते हुए पंजाब में भी स्थायी नियुक्तियों के बजाय संविदा, एडहॉक और गेस्ट शिक्षकों के भरोसे काम चलाया जा रहा है। चुनाव पूर्व सभी संविदा शिक्षकों को पक्का करने और समान काम के लिए समान वेतन देने के बड़े वादों के बावजूद आज भी शिक्षक अनिश्चित भविष्य और कम वेतन में काम करने को मजबूर हैं।

सड़कों पर लाठी खाते शिक्षक और गैर-शैक्षणिक कामों का बोझ
तथाकथित शिक्षा क्रांति का दावा करने वाली सरकार में ईटीटी और बीएड शिक्षक अपनी नियमित भर्तियों और लंबित पदोन्नतियों के लिए पानी की टंकियों पर चढ़ने और लाठीचार्ज झेलने को मजबूर हैं। वहीं, कार्यरत 90 प्रतिशत शिक्षकों को पढ़ाई कराने के बजाय जनगणना, ड्रग सर्वे और चुनावी ड्यूटियों जैसे गैर-शैक्षणिक कार्यों में झोंक दिया गया है।

छात्रों का मोहभंग: सरकारी स्कूलों में नामांकन में भारी गिरावट
प्रचार तंत्र के बावजूद पंजाब के सरकारी स्कूलों में विद्यार्थियों की संख्या में करीब 9 प्रतिशत की बड़ी गिरावट दर्ज की गई है। प्रशासनिक अव्यवस्था और पढ़ाई का माहौल न होने के कारण अभिभावक सरकारी स्कूलों से अपने बच्चों को निकालने पर मजबूर हैं, जिससे लाखों छात्रों का भविष्य दांव पर लग गया है।

साइंस-कॉमर्स स्ट्रीम नदारद: गरीब छात्रों के सपनों पर ताला
पंजाब और दिल्ली के अधिकांश ग्रामीण व कस्बाई सरकारी सीनियर सेकेंडरी स्कूलों में 11वीं और 12वीं में केवल आर्ट्स विषय पढ़ाए जा रहे हैं। विज्ञान (साइंस) और वाणिज्य (कॉमर्स) की प्रयोगशालाओं और अध्यापकों का अभाव होने से गरीब और मध्यम वर्ग के छात्र डॉक्टर, इंजीनियर या सीए बनने की दौड़ से स्कूल स्तर पर ही बाहर हो रहे हैं।

विज्ञापन बनाम बजट: प्रचार पर करोड़ों खर्च, शिक्षा बोर्ड का बकाया अटका
पंजाब बीजेपी ने सवाल उठाया है कि सरकार अपनी छवि चमकाने के लिए दूसरे राज्यों के विज्ञापनों में करोड़ों रुपये फूंक रही है, जबकि पंजाब स्कूल शिक्षा बोर्ड (पीएसईबी) का 570 करोड़ रुपये से अधिक का बकाया अटका पड़ा है। रिक्त पदों को भरने के बजाय सरकारी खजाने को राजनीतिक प्रचार में इस्तेमाल किया जा रहा है।

दिल्ली मॉडल की भी खुली पोल: क्लासरूम निर्माण में भारी अनियमितताएं
पंजाब से पहले दिल्ली के शिक्षा मॉडल की पोल भी खुल चुकी है, जहां संविदा और गेस्ट टीचर्स के भरोसे पूरा तंत्र छोड़ा गया। दिल्ली में अस्थायी क्लासरूम निर्माण की लागत में 53 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि और भारी वित्तीय गड़बड़ियों की जांच की मांग सतर्कता रिपोर्टों के आधार पर उठाई गई।

नतीजे चमकाने का खेल: 9वीं-11वीं में छंटनी की पुरानी नीति
दिल्ली में बोर्ड परीक्षाओं के नतीजे बेहतर दिखाने के लिए 9वीं और 11वीं कक्षा के कमजोर छात्रों को आगे न बढ़ने देने या स्कूल से निकालने की नीति का जो आरोप लगता रहा है, वही तरीका अब पंजाब में भी अपनाया जा रहा है। बच्चों की गुणवत्ता सुधारने के बजाय केवल आंकड़ों की बाजीगरी कर जनता को गुमराह किया जा रहा है।

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