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पीएम-आशा: किसानों को एमएसपी का भरोसा, मोदी सरकार ने मजबूत किया मूल्य समर्थन का सुरक्षा कवच

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र सरकार ने कृषि क्षेत्र में किसानों की आय और उनके हितों को प्राथमिकता देते हुए ऐसी नीतियों पर जोर दिया है, जिनसे उन्हें अपनी उपज का उचित और लाभकारी मूल्य मिल सके। इसी दिशा में प्रधानमंत्री अन्नदाता आय संरक्षण अभियान (पीएम-आशा) किसानों को बाजार में कीमतों की अनिश्चितता से सुरक्षा देने वाली एक महत्वपूर्ण पहल बनकर सामने आया है।

सितंबर 2018 में शुरू की गई PM-AASHA का उद्देश्य न्यूनतम समर्थन मूल्य यानी एमएसपी को प्रभावी ढंग से लागू करना और किसानों को मजबूरी में कम दाम पर अपनी फसल बेचने से बचाना है। प्रधानमंत्री मोदी की किसान-केंद्रित नीति के तहत इस व्यवस्था को समय के साथ अधिक व्यापक बनाया गया है, ताकि मूल्य समर्थन के साथ-साथ बाजार, भंडारण और खरीद की व्यवस्थाएं भी मजबूत हों।

पीएम-आशा सिर्फ सरकारी खरीद की योजना नहीं है। यह एक व्यापक मूल्य-सुरक्षा तंत्र है, जिसमें फसल और बाजार की स्थिति के अनुसार मूल्य समर्थन, मूल्य स्थिरीकरण, मूल्य अंतर भुगतान और बाजार हस्तक्षेप जैसी व्यवस्थाएं शामिल हैं। इसका लाभ किसानों के साथ-साथ उपभोक्ताओं को भी मिलता है, क्योंकि इससे खाद्य वस्तुओं की कीमतों में अत्यधिक उतार-चढ़ाव को नियंत्रित करने में मदद मिलती है।

किसानों को सही कीमत दिलाने का एकीकृत तंत्र
मोदी सरकार ने यह सुनिश्चित करने पर जोर दिया है कि एमएसपी का लाभ छोटे और सीमांत किसानों समेत ज्यादा से ज्यादा किसानों तक पहुंचे। इसी सोच के तहत पीएम-आशा में खरीद की तैयारी संबंधित मार्केटिंग सीजन शुरू होने से पहले ही की जाती है।

केंद्र की नोडल एजेंसियां और राज्य सरकारें मिलकर खरीद के लिए जरूरी व्यवस्था तैयार करती हैं। दालों, तिलहन और खोपरा की खरीद में नेफेड और एनसीसीएफ जैसी संस्थाओं की महत्वपूर्ण भूमिका है। इससे फसल बाजार में पहुंचने के साथ ही किसानों के लिए सरकारी खरीद का रास्ता तैयार रहता है।

जब बाजार कीमत एमएसपी-MSP से नीचे चली जाती है, तब यह व्यवस्था किसानों को औने-पौने दाम पर फसल बेचने की मजबूरी से बचाने में मदद करती है। इस तरह पीएम-आशा किसानों की आय को सहारा देने के साथ कृषि बाजार में मूल्य स्थिरता को भी मजबूत करती है।

पीएम-आशा के चार प्रमुख आधार
पीएम-आशा के तहत चार प्रमुख व्यवस्थाएं हैं—मूल्य समर्थन योजना (पीएसएस PSS), मूल्य स्थिरीकरण कोष (पीएसएफ PSF), मूल्य अंतर भुगतान योजना (पीडीपीएस PDPS) और बाजार हस्तक्षेप योजना (एमआईएस MIS)। अलग-अलग फसलों और बाजार परिस्थितियों के अनुसार इनका इस्तेमाल किया जाता है।

1. मूल्य समर्थन योजना से एमएसपी पर खरीद
मूल्य समर्थन योजना (पीएसएस) के तहत कटाई के समय बाजार कीमत एमएसपी से नीचे जाने पर दालों, तिलहन और खोपरा जैसी फसलों की एमएसपी पर खरीद की जाती है। राज्य सरकारों के अनुरोध पर नेफेड और एनसीसीएफ जैसी एजेंसियां इस प्रक्रिया को आगे बढ़ाती हैं। इसके लिए वैध भूमि दस्तावेज वाले किसान पात्र होते हैं। इसका उद्देश्य खरीद प्रक्रिया को अधिक व्यवस्थित और पारदर्शी बनाना तथा किसानों को सीधे लाभ पहुंचाना है।

वर्ष 2024–25 से पीएसएस के तहत दालों, तिलहन और खोपरा की खरीद की अनुमति शुरुआत में किसी राज्य या केंद्र शासित प्रदेश के कुल उत्पादन के 25 प्रतिशत तक दी गई है। जरूरत पड़ने पर अतिरिक्त खरीद को सचिवों की समिति द्वारा राष्ट्रीय उत्पादन के 25 प्रतिशत तक मंजूरी दी जा सकती है। दालों के घरेलू उत्पादन को बढ़ावा देने और आयात पर निर्भरता कम करने के लिए अरहर, उड़द और मसूर की खरीद राज्य के उत्पादन के 100 प्रतिशत तक करने की अनुमति दी गई है। यह कदम दलहन उत्पादन बढ़ाने और किसानों को बेहतर मूल्य का भरोसा देने की दिशा में महत्वपूर्ण है।

2. पीएसएफ से किसानों और उपभोक्ताओं दोनों को राहत
मूल्य स्थिरीकरण कोष (पीएसएफ) का उद्देश्य दालों, प्याज और आलू जैसी आवश्यक वस्तुओं की कीमतों में अत्यधिक उतार-चढ़ाव को नियंत्रित करना है। इसके तहत कटाई के मौसम में खरीद कर बफर स्टॉक बनाया जाता है। जब गैर-फसल मौसम में कीमतें तेजी से बढ़ती हैं, तब इस स्टॉक को बाजार में जारी किया जाता है। इससे उपभोक्ताओं को राहत मिलती है और किसानों के लिए भी बाजार में एक स्थिर मांग बनाए रखने में मदद मिलती है।

3. पीडीपीएस से सीधे खाते में मूल्य अंतर
मूल्य अंतर भुगतान योजना (पीडीपीएस) की खासियत यह है कि इसमें सरकार को किसान की पूरी उपज भौतिक रूप से खरीदने की जरूरत नहीं होती। अधिसूचित बाजार में एमएसपी और वास्तविक बाजार मूल्य के बीच के अंतर का भुगतान सीधे किसान के बैंक खाते में किया जाता है। यह भुगतान एमएसपी के अधिकतम 15 प्रतिशत तक हो सकता है। योजना मुख्य रूप से तिलहन के लिए उपयोग की जाती है। इससे बड़े पैमाने पर खरीद, भंडारण और परिवहन की जरूरत कम होती है और किसान को बाजार में अपनी उपज बेचने की स्वतंत्रता भी बनी रहती है।

4. एमआईएस से टमाटर-प्याज-आलू के किसानों को सुरक्षा
टमाटर, प्याज और आलू जैसे जल्दी खराब होने वाले उत्पादों पर एमएसपी लागू नहीं होता। ऐसे में बाजार हस्तक्षेप योजना (एमआईएस) किसानों को कीमतों में तेज गिरावट से बचाने का महत्वपूर्ण माध्यम बनती है। जब इन उत्पादों की कीमत पिछले सामान्य सत्र की तुलना में कम से कम 10 प्रतिशत गिर जाती है, तब एमआईएस के तहत हस्तक्षेप किया जा सकता है। केंद्र और राज्य सरकारें लागत साझा करते हुए नेफेड और एनसीसीएफ जैसी एजेंसियों के माध्यम से प्रक्रिया को आगे बढ़ाती हैं। बंपर पैदावार के समय जब बाजार में आपूर्ति मांग से काफी ज्यादा हो जाती है और कीमतें तेजी से गिरती हैं, तब यह व्यवस्था किसानों को बड़े नुकसान से बचाने में मदद करती है।

बढ़ता बजट, बढ़ता किसान भरोसा
पीएम-आशा के लिए बढ़ता वित्तीय आवंटन भी मोदी सरकार के किसान-केंद्रित दृष्टिकोण को दर्शाता है। वर्ष 2024–25 में योजना के तहत वास्तविक व्यय 5,437.99 करोड़ रुपये रहा। बजट 2025–26 में यह बढ़कर 6,941.36 करोड़ रुपये हो गया। वर्ष 2026–27 के लिए पीएम-आशा को 7,200 करोड़ रुपये का बजट आवंटित किया गया है। बजट में यह बढ़ोतरी मूल्य समर्थन और किसानों की आय सुरक्षा के तंत्र को मजबूत करने की सरकार की प्राथमिकता को रेखांकित करती है।

उत्पादन लागत से ऊपर एमएसपी का भरोसा
प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में कृषि नीति का एक महत्वपूर्ण पक्ष किसानों को उनकी उत्पादन लागत से ऊपर लाभकारी मूल्य दिलाने पर जोर है। वर्ष 2026–27 के आंकड़े बताते हैं कि कई प्रमुख फसलों के एमएसपी और उत्पादन लागत के बीच अच्छा अंतर है।

*सामान्य धान की उत्पादन लागत 1,627 रुपये प्रति क्विंटल है, जबकि एमएसपी 2,441 रुपये प्रति क्विंटल है। यानी लागत के ऊपर 814 रुपये प्रति क्विंटल का अंतर है।

*सोयाबीन (पीला) की उत्पादन लागत 3,805 रुपये और एमएसपी 5,708 रुपये प्रति क्विंटल है। इस तरह लागत के मुकाबले 1,903 रुपये प्रति क्विंटल का अंतर है।

*गेहूं की उत्पादन लागत 1,239 रुपये और एमएसपी 2,585 रुपये प्रति क्विंटल है। इससे 1,346 रुपये प्रति क्विंटल का अंतर बनता है।

*जूट में उत्पादन लागत 3,662 रुपये और एमएसपी 5,925 रुपये प्रति क्विंटल है। यानी लागत के ऊपर 2,293 रुपये प्रति क्विंटल का अंतर है, जो दिए गए उदाहरणों में सबसे अधिक है।

इस तरह एमएसपी किसानों को उत्पादन लागत से ऊपर लाभकारी मूल्य का आधार देता है, जबकि पीएम-आशा बाजार में कीमतों में गिरावट आने की स्थिति में इस मूल्य आश्वासन को और मजबूत करती है।

खेत से बाजार तक मजबूत हो रहा पूरा ढांचा
किसान को बेहतर मूल्य तभी मिल सकता है, जब उसके पास फसल के भंडारण, परिवहन और बेहतर बाजार तक पहुंच की सुविधा भी हो। मोदी सरकार ने इसी व्यापक सोच के तहत कृषि अवसंरचना कोष (एआईएफ), ई-नाम और एफपीओ जैसी पहलों को बढ़ावा दिया है। एआईएफ के तहत 2,14,437 परियोजनाओं के लिए 96,426 करोड़ रुपये के ऋण स्वीकृत किए गए हैं। इससे 1,66,179 करोड़ रुपये से अधिक का निवेश जुटाया गया है। यह कृषि उपज के भंडारण, प्रसंस्करण और बाजार तक पहुंच से जुड़े बुनियादी ढांचे को मजबूत करने में मदद कर रहा है।

इसी तरह ई-नाम ने देश की कृषि मंडियों को डिजिटल बाजार से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। 23 राज्यों और 4 केंद्र शासित प्रदेशों की 1,656 मंडियां इससे जुड़ी हैं और इसके माध्यम से 4,94,847 करोड़ रुपये का व्यापार हुआ है। ई-नाम पर 4,776 एफपीओ पंजीकृत हैं, जबकि 7,334 एफपीओ को डिजिटल कॉमर्स के लिए ओपन नेटवर्क यानी ओएनडीसी से जोड़ा गया है। इससे किसानों के सामूहिक बाजार तक पहुंच बनाने की क्षमता बढ़ी है।

इसके अलावा 25,081 कृषि विपणन अवसंरचना परियोजनाओं और 992.6 लाख मीट्रिक टन भंडारण क्षमता वाले 50,249 गोदामों को मंजूरी दी गई है। बेहतर भंडारण किसानों को फसल तुरंत कम कीमत पर बेचने की मजबूरी से बचाने में मदद करता है।

डिजिटल तकनीक से खरीद में पारदर्शिता
पीएम-आशा में किए गए डिजिटल सुधारों ने खरीद व्यवस्था को और मजबूत किया है। किसानों का बायोमेट्रिक और आधार-आधारित प्रमाणीकरण, पूर्व-पंजीकृत किसानों से सीधे खरीद और डिजिटल प्लेटफॉर्म के इस्तेमाल से प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी बनाने पर जोर दिया गया है। ई-समृद्धि और ई-संयुक्ति जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म ने खरीद और किसानों से जुड़ी जानकारी के प्रबंधन को बेहतर बनाया है। इससे खरीद प्रक्रिया की निगरानी और किसानों तक लाभ पहुंचाने की क्षमता बढ़ी है। टमाटर, प्याज और आलू जैसी फसलों के लिए परिवहन सहायता तथा बाजार हस्तक्षेप योजना के तहत मूल्य अंतर भुगतान जैसी व्यवस्थाएं भी जोड़ी गई हैं। इन सुधारों से जरूरत के समय सरकारी हस्तक्षेप को अधिक प्रभावी बनाने में मदद मिलती है।

किसान कल्याण से मजबूत कृषि अर्थव्यवस्था तक
पीएम-आशा मोदी सरकार की उस व्यापक किसान-केंद्रित नीति का हिस्सा है, जिसमें खेती को सिर्फ उत्पादन तक सीमित न रखकर किसान की पूरी आय और बाजार व्यवस्था को मजबूत करने पर जोर दिया गया है। एमएसपी से लेकर सरकारी खरीद, मूल्य अंतर भुगतान, बफर स्टॉक, बाजार हस्तक्षेप, भंडारण, डिजिटल मंडियों और एफपीओ तक—इन पहलों का उद्देश्य किसान को खेत से बाजार तक बेहतर अवसर उपलब्ध कराना है।

दालों, तिलहन और खोपरा की समय पर खरीद किसानों को बाजार का भरोसा देती है। वहीं मूल्य स्थिरीकरण और बाजार हस्तक्षेप जैसी व्यवस्थाएं कीमतों में अचानक गिरावट या बढ़ोतरी के असर को कम करती हैं। यही वजह है कि पीएम-आशा को सिर्फ एक खरीद योजना के तौर पर नहीं, बल्कि किसानों के लिए मूल्य सुरक्षा के व्यापक कवच के रूप में देखा जा सकता है। बढ़ता बजट, खरीद के विस्तार, डिजिटल सुधार और कृषि अवसंरचना में निवेश इस व्यवस्था को लगातार मजबूत कर रहे हैं।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में किसानों की आय, उनकी उपज के उचित मूल्य और कृषि बाजार की मजबूती पर दिया जा रहा जोर खेती को अधिक टिकाऊ और लाभकारी बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। पीएम-आशा इसी प्रयास को जमीन पर मजबूत आधार देते हुए किसानों के मन में यह भरोसा बढ़ाती है कि उनकी मेहनत की फसल को बाजार में बेहतर मूल्य दिलाने के लिए सरकार उनके साथ खड़ी है।

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