7 अक्टूबर 2026 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संवैधानिक पद पर रहते हुए जन सेवा के 25 वर्ष पूरे हो रहे हैं। अक्टूबर 2001 में गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में जब नरेंद्र मोदी ने कमान संभाली थी, तब सरकारी कामकाज का मतलब सुस्त चाल, फाइलों के ढेर और दफ्तरों के अंतहीन चक्कर माना जाता था। साल 2014 में जब केंद्र में पूर्ण बहुमत वाली सरकार बनी, तब देश घोटालों, खस्ताहाल बैंकों, सुस्त फैसलों और नीतिगत पंगुता के दलदल में फंसा हुआ था। वैश्विक वित्तीय एजेंसियां भारत को लड़खड़ाती हुई पांच अर्थव्यवस्थाओं (‘Fragile Five’) की श्रेणी में गिनती थीं। कारखाने लगाने हों या पक्की सड़कें बनानी हों, परियोजनाएं दशकों तक अलग-अलग मंत्रालयों की लालफीताशाही में उलझी रहती थीं।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में सरकार ने काम करने के इस पुराने ढर्रे को बुनियादी तौर पर बदल दिया। बिना वजह के 40 हजार से अधिक पुराने और पेचीदा कानूनी नियमों (Compliances) को खत्म कर सुशासन का नया खाका खींचा गया। प्रोजेक्ट्स में देरी की पुरानी बीमारी को खत्म करने के लिए ‘प्रगति’ (PRAGATI – Pro-Active Governance And Timely Implementation) प्लेटफॉर्म शुरू किया गया, जिसके जरिए प्रधानमंत्री खुद राज्यों के मुख्य सचिवों और केंद्रीय सचिवों के साथ बैठकर अटकी हुई महत्वपूर्ण परियोजनाओं की सीधी समीक्षा करते हैं। लोकलुभावन वादों और रेवड़ियों के बजाय देश के बजट का मुंह हमेशा के लिए स्थायी संपत्तियां—एक्सप्रेसवे, रेल पटरियां, पोर्ट्स और ऊर्जा संयंत्र—बनाने की तरफ मोड़ दिया गया। 2014 से 2026 का यह सफर बताता है कि जब मजबूत राजनीतिक इच्छाशक्ति होती है, तो फाइलों में दबा देश जमीन पर दौड़ने लगता है।
नीतिगत जड़ता (Policy Paralysis) का अंत: पर्यावरण मंजूरी का समय 600 दिन से घटकर हुआ 75 दिन
2014 से पहले: कोयला खदानों और स्पेक्ट्रम आवंटन में घोटालों व अदालती निरस्तीकरण के बाद सरकारी तंत्र में नीतिगत पंगुता छा गई थी और अधिकारी निर्णय लेने से कतराते थे। किसी भी नए उद्योग, राष्ट्रीय राजमार्ग या पुल के लिए पर्यावरण और वन विभाग की मंजूरी (Environmental Clearance) लेने में औसतन 600 दिन से अधिक का समय फाइलों की भूलभुलैया में बर्बाद हो जाता था।
2014 के बाद का बदलाव: केंद्र सरकार ने प्राकृतिक संसाधनों के मनमाने आवंटन को पूरी तरह बंद कर दिया। कोयले से लेकर 5G स्पेक्ट्रम तक सब कुछ 100% पारदर्शी ई-नीलामी (E-Auction) के जरिए ऑनलाइन नीलाम किया जाने लगा, जिससे सरकारी खजाने में रिकॉर्ड राजस्व आया। पर्यावरण व वन स्वीकृति के लिए ‘परिवेश’ (PARIVESH) सिंगल-विंडो पोर्टल शुरू किया गया, जिससे मंजूरी का समय 600 दिन से घटकर मात्र 70 से 75 दिन रह गया। ‘पीएम गतिशक्ति’ राष्ट्रीय मास्टर प्लान के जरिए विभिन्न मंत्रालयों के बुनियादी ढांचे के नक्शों को एक साथ जोड़ा गया, जिससे सड़कों के बनने के बाद बार-बार खुदाई और देरी की समस्या जड़ से समाप्त हो गई।
परिवेश पोर्टल, पर्यावरण से जुड़े सभी तरह के clearance के लिए single-window माध्यम बना है।
ये transparent भी है और इससे approval के लिए होने वाली भागदौड़ भी कम हो रही है।
8 साल पहले तक environment clearance में जहां 600 से ज्यादा दिन लग जाते थे, वहीं आज 75 दिन लगते हैं: PM
— PMO India (@PMOIndia) September 23, 2022
बैंकिंग तंत्र का पुनर्जन्म: फंसा कर्ज 11% से घटकर 2.15% पर, मुनाफा ₹1.98 लाख करोड़
2014 से पहले: रसूखदार उद्योगपतियों के रसूख और राजनीतिक दबाव पर बिना ठोस पड़ताल के हजारों करोड़ रुपये के अनियंत्रित कर्ज बांटे जाते थे। जब यह पैसा डूबने लगा, तो देश का बैंकिंग ढांचा चरमरा गया और बैंकों का फंसा कर्ज (Gross NPA) 10 से 11 प्रतिशत के खतरनाक स्तर तक पहुंच गया, जिससे बैंक नए निवेश को कर्ज देने में असमर्थ हो गए।
2014 के बाद का बदलाव: मोदी सरकार ने बैंकों में राजनीतिक हस्तक्षेप को पूरी तरह समाप्त कर पेशेवर स्वतंत्रता दी। बड़े बकाएदारों से वसूली और समयबद्ध समाधान के लिए 2016 में दिवाला कानून (Insolvency and Bankruptcy Code – IBC) लागू किया गया, जिससे डिफॉल्टर्स से संपत्तियां जब्त करने का कड़ा अधिकार मिला। 2015 की समीक्षा के जरिए छिपे हुए एनपीए की पारदर्शी पहचान की गई, ₹3.11 लाख करोड़ से अधिक की पूंजी डालकर बैंकों का पुनर्पूंजीकरण हुआ और 27 बैंकों का विलय कर 12 मजबूत बैंक बनाए गए। इसका ठोस परिणाम यह रहा कि बैंकों का ग्रॉस एनपीए दो दशक के ऐतिहासिक निचले स्तर 2.15 प्रतिशत पर आ गया। सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों (PSBs) ने वित्त वर्ष 2025-26 में ₹1.98 लाख करोड़ का शुद्ध मुनाफा कमाकर देश की आर्थिक रीढ़ को मजबूत किया।

डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर (DPI): ‘दलालों के कमीशन’ से ‘पाई-पाई का सीधा हिसाब’
2014 से पहले: सरकारी योजनाओं और आर्थिक लेन-देन में नकद व कागजी चेक का बोलबाला था। बैंकों के सीमित दायरे, कागजी चालान और बिचौलियों के दखल के बिना कोई काम नहीं होता था। आम नागरिक को सामान्य फंड ट्रांसफर या पेंशन के लिए लंबी कतारों में खड़ा होना पड़ता था, जिससे व्यवस्था में लीकेज और भ्रष्टाचार आम बात थी।
2014 के बाद का बदलाव: केंद्र सरकार ने किसी निजी एकाधिकार के बजाय साझी डिजिटल पूंजी के रूप में ‘इंडिया स्टैक’ और एकीकृत भुगतान इंटरफेस (UPI) का स्वदेशी व सुरक्षित ढांचा खड़ा किया। शून्य लागत पर रियल-टाइम भुगतान ने वित्तीय लेन-देन से बिचौलियों और कमीशन एजेंटों का दखल पूरी तरह समाप्त कर दिया। आज रेहड़ी-पटरी के छोटे दुकानदारों से लेकर विशाल उद्योगों तक का आर्थिक चक्र औपचारिक बैंकिंग से जुड़ चुका है। दुनिया भर में होने वाले कुल रियल-टाइम डिजिटल भुगतानों का लगभग आधा हिस्सा अकेले भारत में दर्ज हो रहा है, जो वैश्विक स्तर पर पारदर्शी सुशासन का सबसे बड़ा प्रमाण है।
वैश्विक वित्तीय साख: ‘फ्रेजाइल फाइव’ से चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था, $700+ अरब डॉलर का विदेशी मुद्रा भंडार
2014 से पहले: प्रमुख वैश्विक वित्तीय एजेंसियां भारत को सबसे कमजोर और डांवाडोल पांच अर्थव्यवस्थाओं (‘Fragile Five’) में रखती थीं। दोहरे अंकों की अनियंत्रित महंगाई, मात्र 300 अरब डॉलर के आसपास सिमटा विदेशी मुद्रा भंडार और राजकोषीय असंतुलन देश की आर्थिक संप्रभुता के लिए गंभीर चिंता का विषय बने हुए थे।
2014 के बाद का बदलाव: वित्तीय अनुशासन, संरचनात्मक सुधारों और विनिर्माण नीतियों के दम पर भारत 11वें पायदान से ऐतिहासिक छलांग लगाते हुए ब्रिटेन और जापान को पीछे छोड़कर दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था (4th Largest Economy) बन गया है और अब तीसरे पायदान (जर्मनी) की ओर तेजी से अग्रसर है। वैश्विक निवेशकों के मजबूत भरोसे के चलते भारत का विदेशी मुद्रा भंडार (Forex Reserves) 700 अरब डॉलर के ऐतिहासिक स्तर को पार कर नए कीर्तिमान स्थापित कर चुका है। कोरोना महामारी और वैश्विक भू-राजनीतिक तनावों के बावजूद भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्था बना रहा, जिसकी स्थिरता की सराहना आज अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) और विश्व बैंक खुले मंचों से कर रहे हैं।
ऐतिहासिक उपलब्धि… वैश्विक स्तर पर भारत का लहराया परचम
यशस्वी प्रधानमंत्री श्री @narendramodi जी के नेतृत्व में भारत अब जापान को भी पीछे छोड़कर दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन गया है। वर्तमान में भारत 4,000 अरब डॉलर की अर्थव्यवस्था है। यह अभूतपूर्व उपलब्धि हम सभी… pic.twitter.com/Ncep0YY4LG
— Dr Mohan Yadav (@DrMohanYadav51) May 25, 2025
बजट का बदला चरित्र: Capex का बजट ₹1.87 लाख करोड़ से 6.5 गुना बढ़कर ₹12.2 लाख करोड़
2014 से पहले: केंद्रीय बजट का बड़ा हिस्सा चुनावी रेवड़ियों और तात्कालिक उपभोग के लोकलुभावन खर्चों में खप जाता था। वित्त वर्ष 2013-14 में देश में नई सड़कें, रेल नेटवर्क और बंदरगाह जैसी स्थायी राष्ट्रीय संपत्तियों के निर्माण के लिए कुल पूंजीगत व्यय (Capital Expenditure – Capex) मात्र ₹1.87 लाख करोड़ था, जिससे देश का बुनियादी ढांचा हमेशा पिछड़ा रहा।
2014 के बाद का बदलाव: सरकार ने बजट को चुनावी लाभ के साधन से बदलकर राष्ट्र-निर्माण का आधार बनाया। बुनियादी ढांचे के विकास के लिए सार्वजनिक पूंजीगत व्यय (Capex) को बढ़ाकर वित्त वर्ष 2026-27 में रिकॉर्ड ₹12.2 लाख करोड़ प्रस्तावित किया गया है, जो 2014 की तुलना में लगभग साढ़े छह गुना अधिक है। इस विजनरी बजट में देश भर में 7 नए हाई-स्पीड रेल कॉरिडोर, नया डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर, 20 नए राष्ट्रीय जलमार्ग (National Waterways) और स्वदेशी सी-प्लेन निर्माण के लिए ‘सी-प्लेन वीजीएफ योजना’ (VGF Scheme) की शुरुआत की गई है। साथ ही, निजी निवेशकों और डेवलपर्स का भरोसा बढ़ाने के लिए ‘इन्फ्रास्ट्रक्चर रिस्क गारंटी फंड’ का गठन किया गया है। करदाताओं के धन के इस भारी पूंजीगत निवेश ने न केवल विश्वस्तरीय बुनियादी ढांचे का निर्माण तेज किया है, बल्कि सीमेंट-स्टील उद्योगों को मजबूती देकर युवाओं के लिए रोजगार के नए अवसर सृजित किए हैं।

लॉजिस्टिक्स और कनेक्टिविटी: बंदरगाहों पर टर्न-अराउंड समय 94 घंटे से घटकर हुआ 48 घंटे, एयरपोर्ट्स 74 से बढ़कर 150 पार
2014 से पहले: भारतीय बंदरगाहों पर जहाजों से माल उतारने-चढ़ाने में लगने वाला समय (Turnaround Time) औसतन 93.6 घंटे (लगभग 4 दिन) था, जिससे निर्यातकों की लागत बढ़ जाती थी। आजादी के 67 वर्षों बाद भी देश में केवल 74 हवाई अड्डे चालू थे और राष्ट्रीय राजमार्ग निर्माण की गति मात्र 12 किलोमीटर प्रतिदिन पर अटकी थी।
2014 के बाद का बदलाव: ‘सागरमाला’ परियोजना और पोर्ट ऑटोमेशन के चलते बंदरगाहों पर जहाजों का टर्न-अराउंड समय घटकर औसतन 48 घंटे (और प्रमुख कंटेनर पोर्ट्स पर मात्र 26 घंटे) रह गया। ‘उड़ान’ (UDAN) योजना के तहत टियर-2 और टियर-3 शहरों को हवाई संपर्क से जोड़ा गया, जिससे देश में सक्रिय हवाई अड्डों की संख्या दोगुनी से अधिक होकर 150 के पार पहुंच गई। राष्ट्रीय राजमार्गों के निर्माण की रफ्तार बढ़कर 30 से 34 किलोमीटर प्रतिदिन से अधिक हो गई। डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर ने औद्योगिक माल की ढुलाई को समयबद्ध और सस्ता बनाकर घरेलू विनिर्माताओं की वैश्विक प्रतिस्पर्धा क्षमता को मजबूत किया।
रक्षा विनिर्माण में आत्मनिर्भरता: उत्पादन ₹1.27 लाख करोड़ पार, रक्षा निर्यात में 56 गुना छलांग
2014 से पहले: हमारे वीर जवानों के लिए बुलेटप्रूफ जैकेट, जूते, आधुनिक राइफलें और गोला-बारूद जैसे बुनियादी सैन्य साजो-सामान की फाइलें रक्षा मंत्रालय में दशकों तक अटकी रहती थीं। 200 साल पुराने सरकारी आयुध कारखाने (Ordnance Factory Board – OFB) पुराने ढर्रे और उत्पादकता की कमी से जूझ रहे थे, जिसके कारण भारत अपनी हर छोटी-बड़ी सामरिक जरूरत के लिए विदेशों से हथियार आयात करने पर निर्भर था।
2014 के बाद का बदलाव: मोदी सरकार ने 200 साल पुराने सुस्त आयुध कारखानों (OFB) की पुरानी व्यवस्था को समाप्त करते हुए उनका ऐतिहासिक निगमीकरण (Corporatisation) किया और उन्हें 7 पेशेवर व प्रतिस्पर्धी कंपनियों में बदल दिया। 5,000 से अधिक हथियारों और रक्षा उपकरणों की ‘सकारात्मक स्वदेशीकरण सूची’ (Positive Indigenisation Lists) बनाकर उनके विदेशों से आयात पर चरणबद्ध पाबंदी लगा दी गई। रक्षा क्षेत्र में ऑटोमैटिक रूट से 74% तक प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) की छूट दी गई और निजी उद्योगों व डिफेंस-स्टार्टअप्स को सेना के लिए अत्याधुनिक हथियार बनाने का खुला अवसर मिला। इसका परिणाम यह हुआ कि देश का कुल रक्षा उत्पादन ₹1.27 लाख करोड़ के रिकॉर्ड स्तर को पार कर गया। 2013-14 में मात्र ₹686 करोड़ का रक्षा निर्यात करने वाला भारत वित्त वर्ष 2025-26 में लगभग 56 गुना बढ़ोतरी के साथ रिकॉर्ड ₹38,424 करोड़ के सैन्य साजो-सामान 90 से अधिक मित्र देशों को निर्यात कर रहा है।
रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भर भारत की हुंकार! 🇮🇳
एक समय भारत रक्षा जरूरतों के लिए विदेशी हथियारों पर निर्भर था, लेकिन पिछले 12 वर्षों में तस्वीर बदल गई है।
2013-14 में ₹686 करोड़ का रक्षा निर्यात वित्त वर्ष 2025-26 में बढ़कर रिकॉर्ड ₹38,424 करोड़ पहुंच गया। ब्रह्मोस, आकाश और… pic.twitter.com/4MLaApK3ib
— BJP (@BJP4India) June 3, 2026
सीमावर्ती सुरक्षा नीति: ‘उपेक्षित बफर जोन’ की जगह ‘प्रथम गांव’ मॉडल से 6,600+ गांवों का कायाकल्प
2014 से पहले: दशकों तक देश की आधिकारिक सीमा नीति यह मानकर चलती थी कि “सीमा पर आधुनिक सड़कें और बस्तियां न बसाई जाएं ताकि दुश्मन सेना आसानी से आगे न बढ़ सके।” इस रक्षात्मक और नकारात्मक सोच के चलते वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) के सैकड़ों सीमावर्ती गांव बिजली, सड़क और संचार से वंचित होकर खाली हो गए और नागरिकों के भारी पलायन से सीमाएं असुरक्षित हो गईं।
2014 के बाद का बदलाव: केंद्र सरकार ने इस नीति को पूरी तरह पलटते हुए सीमांत गांवों को ‘अंतिम गांव’ नहीं, बल्कि देश का ‘पहला गांव’ घोषित किया। ‘वाइब्रेंट विलेजेज प्रोग्राम’ (Vibrant Villages Programme) के तहत सामरिक सीमावर्ती क्षेत्रों में बारहमासी पक्की सड़कें, 4G टेलीकॉम टावर, 24 घंटे सौर ऊर्जा और सीमा पर्यटन का सुदृढ़ इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार किया गया। स्थानीय आबादी का पलायन रुकने और नागरिक बस्तियां बसने से सीमाओं पर सेना की फॉरवर्ड कनेक्टिविटी मजबूत हुई और देश की अग्रिम सुरक्षा दीवार अभेद्य बन गई।
मूलभूत सुविधाएं: नल का जल 17% से बढ़कर 82% पार, 4 करोड़ से अधिक पक्के मकान
2014 से पहले: गरीबों के लिए कल्याणकारी योजनाएं चुनावी राजनीति और चुनिंदा वोट बैंकों तक सीमित रहती थीं। आजादी के 67 वर्षों बाद भी देश के केवल 3.2 करोड़ ग्रामीण परिवारों (मात्र 17%) के पास नल से जल का कनेक्शन था, स्वच्छता का दायरा 39% पर सिमटा था और करोड़ों निर्धन परिवार कच्चे छप्परों में रहने को विवश थे।
2014 के बाद का बदलाव: सरकार ने शत-प्रतिशत लाभार्थियों तक लाभ पहुंचाने का ‘सैचुरेशन मॉडल’ लागू किया। ‘जल जीवन मिशन’ के तहत युद्धस्तर पर पाइपलाइन नेटवर्क बिछाकर 15.89 करोड़ से अधिक ग्रामीण परिवारों (82% से अधिक कवरेज) के घरों तक नल से शुद्ध पेयजल पहुंचाया गया। ‘स्वच्छ भारत मिशन’ के तहत 11 करोड़ से अधिक शौचालयों का निर्माण कर देश को खुले में शौच मुक्त (ODF) बनाया गया और मातृशक्ति की गरिमा सुनिश्चित की गई। वहीं ‘पीएम आवास योजना’ के अंतर्गत 4 करोड़ से अधिक पक्के मकान गरीबों को सौंपे गए, जिनमें मालिकाना हक महिलाओं के नाम दर्ज कर उन्हें वास्तविक सामाजिक व आर्थिक संबल दिया गया।
7 दशक बीत गए, लेकिन हर घर तक नल से जल नहीं पहुंच पाया था। 🚰
फिर बदली रफ्तार, बदला संकल्प… और सिर्फ 12 वर्षों में 16 करोड़ घरों तक नल से जल पहुंचा। जब सेवा संकल्प बन जाए, तो बदलाव जन-जन तक पहुंचता है।
इस बदलाव की यात्रा से जुड़िए। 17 सितंबर से शुरू हो रहे #SevaSankalpAbhiyan… pic.twitter.com/aOgji29Ayo
— BJP Uttarakhand (@BJP4UK) September 14, 2026
ग्रामीण अर्थव्यवस्था में वित्तीय समावेशन: ‘साहूकारों के कर्ज-जाल’ से बिना गारंटी ₹20 लाख तक कर्ज और आर्थिक आत्मनिर्भरता
2014 से पहले: ग्रामीण महिलाओं को छोटे उद्यम शुरू करने के लिए औपचारिक बैंकिंग तंत्र से पूंजी मिलना लगभग असंभव था, क्योंकि बैंक जमानत या जमीन-जायदाद गिरवी रखने की मांग करते थे। मजबूरी में महिलाओं को स्थानीय साहूकारों से 36 से 60 प्रतिशत के भारी ब्याज पर कर्ज लेना पड़ता था, जिससे वे पीढ़ी-दर-पीढ़ी कर्ज के दलदल में फंसी रहती थीं।
2014 के बाद का बदलाव: सरकार ने वित्तीय नियमों में ऐतिहासिक सुधार करते हुए महिला स्वयं सहायता समूहों (SHGs) के लिए बिना किसी गारंटी (Collateral-free) मिलने वाले ऋण की सीमा को ₹10 लाख से बढ़ाकर ₹20 लाख कर दिया। ग्रामीण महिलाओं को पारंपरिक कुटीर उद्योगों से आगे ले जाकर फूड प्रोसेसिंग, आधुनिक पैकेजिंग, एग्री-बिजनेस और ड्रोन संचालन जैसी उच्च तकनीकी गतिविधियों से जोड़ा गया। इस व्यवस्थागत सुधार के चलते ग्रामीण महिलाएं साहूकारी शोषण से मुक्त हुईं और करोड़ों की संख्या में महिलाएं सालाना ₹1 लाख से अधिक की स्थायी आय अर्जित कर आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनीं।
स्वास्थ्य सुरक्षा: 55 करोड़ नागरिकों को ₹5 लाख तक मुफ्त इलाज और AIIMS की संख्या 6 से 22 पार
2014 से पहले: किसी भी गरीब या मध्यमवर्गीय परिवार में गंभीर बीमारी का अर्थ जीवनभर की जमा-पूंजी का खात्मा, जमीन-गहनों की बिक्री और कर्ज का बोझ होता था। निजी अस्पतालों की महंगी चिकित्सा आमजन की पहुंच से दूर थी और पूरे देश में केवल 6 एम्स (AIIMS) अस्पताल ही सक्रिय थे।
2014 के बाद का बदलाव: केंद्र सरकार ने दुनिया की सबसे बड़ी स्वास्थ्य आश्वासन योजना ‘आयुष्मान भारत – पीएम जय’ (PM-JAY) लागू कर 60 करोड़ से अधिक नागरिकों को प्रतिवर्ष ₹5 लाख तक का कैशलेस व निःशुल्क इलाज सुलभ कराया। इस सुरक्षा कवच का विस्तार करते हुए 70 वर्ष से अधिक आयु के देश के सभी वरिष्ठ नागरिकों को भी इसमें शामिल किया गया। देश में एम्स की संख्या 6 से बढ़ाकर 22 से अधिक कर दी गई और मेडिकल सीटें दोगुनी कर डॉक्टरों की कमी दूर की गई। 14,000 से अधिक ‘प्रधानमंत्री जन औषधि केंद्रों’ से 50 से 80 प्रतिशत सस्ती दवाएं मिलने से आम परिवारों के दवा खर्च में ₹30,000 करोड़ से अधिक की सीधी बचत हुई।
आयुष्मान भारत: सुरक्षा भी, सम्मान भी!🏥🌟
बीमारी कभी पूछकर नहीं आती, लेकिन अब इलाज के लिए चिंता करने की ज़रूरत नहीं।बदलते भारत में अब हर परिवार के पास है स्वास्थ्य का मजबूत सुरक्षा कवच।
आयुष्मान भारत योजना के तहत 60 करोड़ से अधिक लोगों को मिल रहा है ₹5 लाख तक का मुफ्त… pic.twitter.com/caw2TJzQcX
— BJP (@BJP4India) June 14, 2026
शिक्षा-कौशल का कायाकल्प: 34 साल बाद आधुनिक शिक्षा नीति (NEP 2020), 7 नए IIT-IIM और ‘स्किल इंडिया’
2014 से पहले: भारत की शिक्षा व्यवस्था 1986 की 34 वर्ष पुरानी नीति के पुराने सांचे और रटंत प्रणाली में फंसी हुई थी। उद्योगों की आधुनिक मांग और युवाओं के कौशल में गहरा अंतर था, शोध व नवाचार के लिए संसाधनों का अभाव था और उच्च शिक्षा में मातृभाषा के प्रयोग के रास्ते बंद थे।
2014 के बाद का बदलाव: सरकार ने 34 वर्षों के गतिरोध को समाप्त कर ‘राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020’ (NEP 2020) लागू की, जिसमें 10+2 के स्थान पर 5+3+3+4 का आधुनिक ढांचा अपनाया गया। इंजीनियरिंग और मेडिकल जैसी तकनीकी शिक्षा को क्षेत्रीय व भारतीय भाषाओं में पढ़ाने का ऐतिहासिक निर्णय लिया गया। ‘पीएम कौशल विकास योजना’ के जरिए 1.5 करोड़ से अधिक युवाओं को आधुनिक औद्योगिक तकनीकों का प्रशिक्षण दिया गया। उच्च शिक्षा के विस्तार में 7 नए आईआईटी (IIT), 7 नए आईआईएम (IIM) और सैकड़ों केंद्रीय व राज्य विश्वविद्यालय स्थापित किए गए, जिससे देश का उच्च शिक्षा ग्रॉस एनरोलमेंट रेशियो (GER) बढ़कर 28.4% के पार पहुंच गया।
विरासत संरक्षण: 600 से अधिक प्राचीन मूर्तियों की स्वदेश वापसी और काशी-महाकाल से पर्यटन अर्थव्यवस्था में उछाल
2014 से पहले: देश के प्राचीन सांस्कृतिक, ऐतिहासिक और धार्मिक धरोहर केंद्रों को बुनियादी सुविधाओं से वंचित और बदहाल स्थिति में छोड़ दिया गया था। विरासत के संरक्षण को आधुनिक विकास से अलग मानकर उपेक्षित रखा गया। आजादी के बाद से 2014 तक के 67 वर्षों में विदेशों से तस्करी कर ले जाई गईं मात्र 13 प्राचीन मूर्तियां ही भारत वापस लाई जा सकी थीं।
2014 के बाद का बदलाव: ‘विकास भी, विरासत भी’ के मंत्र के साथ कूटनीतिक वार्ताओं और अंतरराष्ट्रीय समझौतों के दम पर अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, ब्रिटेन और यूरोपीय देशों से 600 से अधिक अमूल्य प्राचीन मूर्तियां और सांस्कृतिक धरोहरें सफलतापूर्वक स्वदेश वापस लाई गईं। काशी विश्वनाथ धाम, उज्जैन में श्री महाकाल लोक, केदारनाथ-बद्रीनाथ धाम पुनर्विकास, करतारपुर साहिब कॉरिडोर और अयोध्या में भव्य राम मंदिर निर्माण ने न केवल सांस्कृतिक स्वाभिमान को पुनर्स्थापित किया, बल्कि आध्यात्मिक पर्यटन (Spiritual Tourism) से स्थानीय अर्थव्यवस्था, होटल उद्योग, परिवहन और छोटे व्यापारियों की आजीविका को नई ऊंचाई दी।
#WATCH | भारत की खोई हुई सांस्कृतिक धरोहरों को वापस लाने के प्रयासों ने पिछले एक दशक में अभूतपूर्व गति पकड़ी है।
प्रधानमंत्री @narendramodi के नेतृत्व में अब तक 666 प्राचीन धरोहरें भारत को लौटाई जा चुकी हैं।
इनमें चोल और विजयनगर काल की दुर्लभ मूर्तियां, शिल्पकृतियां और पवित्र… pic.twitter.com/wOgoBqj70N
— डीडी न्यूज़ (@DDNewsHindi) May 16, 2026
आंतरिक सुरक्षा पर कड़ा प्रहार: सर्वाधिक नक्सल प्रभावित जिले 6 से घटकर सिर्फ 3, आतंक पर जीरो टॉलरेंस
2014 से पहले: देश के प्रमुख महानगर सिलसिलेवार आतंकी बम धमाकों से दहलते रहते थे। 2013 तक देश के 126 जिले नक्सली हिंसा (Red Corridor) के आतंक की गिरफ्त में थे। सीमा पार से होने वाले आतंकी हमलों के बाद भारत की नीति मात्र शोक जताने, कड़े बयानों और विदेशी मंचों पर डोजियर सौंपने की लाचारी तक सीमित थी।
2014 के बाद का बदलाव: आतंकवाद के विरुद्ध ‘जीरो टॉलरेंस’ नीति अपनाते हुए राष्ट्रीय सुरक्षा सिद्धांत को आक्रामक व निर्णायक बनाया गया। उरी और पुलवामा के बाद सर्जिकल स्ट्राइक और एयर स्ट्राइक कर भारत ने स्पष्ट किया कि वह देश की सुरक्षा के लिए सीमा पार जाकर भी प्रहार करने से नहीं हिचकेगा। जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 को समाप्त कर अलगाववाद, पत्थरबाजी और हड़तालों के तंत्र को ध्वस्त किया गया। गृह मंत्रालय के निरंतर अभियानों के चलते वामपंथी उग्रवाद प्रभावित जिले सिमटकर मात्र 11 रह गए हैं, जबकि ‘सर्वाधिक प्रभावित जिले’ भी 6 से घटकर केवल 3 (बीजापुर, सुकमा और नारायणपुर) तक सीमित हो चुके हैं। आज देश के महानगर आतंकी विस्फोटों के भय से पूरी तरह मुक्त हैं।
कृषि में बिचौलियों का अंत: ₹3.25 लाख करोड़ से अधिक सीधे खातों में, ₹1.5 लाख करोड़ से अधिक फसल बीमा क्लेम
2014 से पहले: किसानों को यूरिया की एक-एक बोरी के लिए थानों के बाहर कतारों में लाठियां खानी पड़ती थीं, क्योंकि सामान्य यूरिया रासायनिक कारखानों में ब्लैक कर दिया जाता था। प्राकृतिक आपदाओं से फसल बर्बाद होने पर पटवारियों के चक्कर काटने के बाद भी किसानों को समय पर मुआवजा नहीं मिलता था।
2014 के बाद का बदलाव: सरकार ने 100% नीम कोटेड यूरिया अनिवार्य कर रासायनिक उद्योगों में खाद की कालाबाजारी को पूरी तरह रोक दिया। ‘पीएम किसान सम्मान निधि’ (PM-KISAN) के माध्यम से बिना किसी दलाल या कमीशन के 11 करोड़ से अधिक अन्नदाताओं के बैंक खातों में प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (DBT) के जरिए ₹3.25 लाख करोड़ से अधिक की सम्मान राशि सीधे भेजी गई। ‘प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना’ (PMFBY) के तहत सैटेलाइट मैपिंग और ड्रोन तकनीक से पारदर्शी आकलन कर किसानों को ₹1.5 लाख करोड़ से अधिक के फसल बीमा दावों का त्वरित भुगतान किया गया।
लंबित परियोजनाओं का अंत: 40 साल से अटकी 90+ सिंचाई परियोजनाएं पूरी, 50 लाख हेक्टेयर भूमि तक पानी
2014 से पहले: योजनाओं के केवल शिलान्यास और घोषणाएं होती थीं, लेकिन बजट और निगरानी के अभाव में परियोजनाएं दशकों तक लटकी रहती थीं। 30 से 40 वर्षों से 99 प्रमुख राष्ट्रीय सिंचाई परियोजनाएं (जैसे सरयू नहर राष्ट्रीय परियोजना और बाणसागर परियोजना) अधूरी पड़ी थीं, जिससे उपजाऊ जमीनें प्यासी थीं और लागत सैकड़ों गुना बढ़ चुकी थी।
2014 के बाद का बदलाव: ‘प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना’ (PMKSY-AIBP) के तहत दशकों से अटकी 90 से अधिक वृहद व मध्यम सिंचाई परियोजनाओं को प्राथमिकता पर पूरा कराया गया, जिससे 50 लाख हेक्टेयर से अधिक असिंचित भूमि तक पक्का पानी पहुंचा। इसी तरह 21 वर्षों से लंबित असम के बोगीबील रेल-सड़क पुल और दशकों से रुके उधमपुर-श्रीनगर-बारामूला रेल लिंक (दुनिया के सबसे ऊंचे रेलवे आर्च ब्रिज ‘चेनाब ब्रिज’ सहित) को तेजी से पूरा कर राष्ट्र को समर्पित किया गया।
जल सुरक्षा और जल संरक्षण: टुकड़ों में बंटी व्यवस्था का अंत, 68,000+ अमृत सरोवर और भूजल पुनर्भरण
2014 से पहले: देश में जल प्रबंधन और नदियों का संरक्षण आधा दर्जन अलग-अलग मंत्रालयों में बिखरा हुआ था, जिससे कोई एकीकृत राष्ट्रीय जल नीति नहीं बन पाती थी। पारंपरिक तालाब, बावड़ियां और झीलें अतिक्रमण व गाद की भेंट चढ़ चुकी थीं और हर गर्मी में देश के हजारों गांव भीषण पेयजल संकट से जूझते थे।
2014 के बाद का बदलाव: सभी जल विभागों को एक सूत्र में पिरोकर एकीकृत ‘जल शक्ति मंत्रालय’ का गठन किया गया। आजादी के अमृत महोत्सव के अंतर्गत जनभागीदारी से ‘मिशन अमृत सरोवर’ शुरू किया गया, जिसके तहत देश भर में 68,000 से अधिक अमृत सरोवरों (तालाबों) का निर्माण व जीर्णोद्धार रिकॉर्ड समय में पूरा किया गया। इन जलाशयों ने न केवल ग्रामीण भूजल स्तर को रिचार्ज किया, बल्कि मत्स्य पालन, पशुपालन और स्थानीय सिंचाई को नया जीवन दिया। साथ ही ‘कैच द रेन’ अभियान ने वर्षा जल संचयन को जन-आंदोलन का रूप दिया।
सरकार ने जो 60 हजार से ज्यादा अमृत सरोवर बनाए हैं, वे भी देश की ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती देने में बहुत मददगार होने वाले हैं। pic.twitter.com/dWNpXHbdGk
— Narendra Modi (@narendramodi) February 22, 2024
खेल संस्कृति का कायाकल्प: खेल बजट में 3 गुना उछाल, TOPS और खेलो इंडिया से 100+ पदकों का नया युग
2014 से पहले: 2010 के कॉमनवेल्थ गेम्स जैसे घोटालों और कुप्रबंधन ने भारतीय खेल प्रशासन की साख को गहरी चोट पहुंचाई थी। एथलीटों को आधुनिक उपकरण, विश्वस्तरीय कोच, न्यूट्रिशन और यात्रा भत्तों के लिए खेल संघों के दफ्तरों के चक्कर काटने पड़ते थे और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश के पदक बेहद सीमित रहते थे।
2014 के बाद का बदलाव: खेल बजट को ₹1,200 करोड़ से तीन गुना बढ़ाकर ₹3,400+ करोड़ किया गया। ‘टारगेट ओलंपिक पोडियम स्कीम’ (TOPS) और ‘खेलो इंडिया’ (Khelo India) के माध्यम से प्रतिभाशाली एथलीटों के प्रशिक्षण, विदेशी दौरों और वैज्ञानिक देखरेख का पूरा खर्च सरकार ने वहन किया। इसका सीधा परिणाम यह रहा कि ओलंपिक और पैरालंपिक में ऐतिहासिक प्रदर्शन के साथ-साथ एशियाई खेलों में भारत ने पहली बार 100 से अधिक पदकों (107 पदक) का कीर्तिमान स्थापित किया। भारत ने खेल के इस मजबूत इंफ्रास्ट्रक्चर के दम पर 2036 ओलंपिक खेलों की मेजबानी की आधिकारिक दावेदारी भी पेश की है।
नौकरशाही में सुधार: ‘मिशन कर्मयोगी’ से क्षमता निर्माण, लेटरल एंट्री और 400+ अकार्यक्षम अफसरों पर कार्रवाई
2014 से पहले: देश का प्रशासनिक ढांचा पारंपरिक यूपीएससी कैडर के पुराने ढर्रे पर चलता था। आर्थिक, वाणिज्यिक और तकनीकी पेचीदगियों वाले मंत्रालयों में भी सामान्य प्रशासनिक अधिकारियों की तैनाती होती थी। पदोन्नति का आधार मेरिट के बजाय केवल वरिष्ठता था और अकार्यक्षम या लापरवाह अफसरों पर शायद ही कभी कोई कार्रवाई होती थी।
2014 के बाद का बदलाव: सिविल सेवा की कार्यसंस्कृति को आधुनिक बनाने के लिए ‘मिशन कर्मयोगी’ और ‘आईगॉट’ (iGOT Karmayogi) डिजिटल लर्निंग प्लेटफॉर्म शुरू किया गया, जिस पर लाखों कर्मचारी पेशेवर प्रशिक्षण ले रहे हैं। नीति-निर्माण में विशेषज्ञता लाने के लिए निजी क्षेत्र और अकादमिक जगत के शीर्ष पेशेवरों को संयुक्त सचिव और निदेशक स्तर पर ‘लेटरल एंट्री’ के जरिए शामिल किया गया। साथ ही फंडामेंटल रूल 56(j) के तहत अकर्मण्यता, भ्रष्टाचार और सुस्ती के आरोपी 400 से अधिक वरिष्ठ अधिकारियों को अनिवार्य सेवानिवृत्ति देकर प्रशासनिक जवाबदेही का कड़ा संदेश दिया गया।
आपदा प्रबंधन व वैश्विक राहत: राहत-केंद्रित मॉडल से ‘शून्य जनहानि’ और विदेशों से नागरिकों की सुरक्षित वापसी
2014 से पहले: आपदा प्रबंधन का नजरिया केवल ‘हादसा होने के बाद राहत सामग्री बांटने’ तक सीमित था। चक्रवात, बाढ़ या सूखे जैसी आपदाओं में समय पूर्व सटीक चेतावनी न मिलने से हजारों जानें चली जाती थीं। वहीं विदेशों में युद्ध या अशांति में फंसे भारतीय नागरिकों को अक्सर उनकी परिस्थितियों पर छोड़ दिया जाता था।
2014 के बाद का बदलाव: आधुनिक अर्ली वार्निंग वेदर सिस्टम, इसरो की सैटेलाइट ट्रैकिंग और एनडीआरएफ (NDRF) के आधुनिकीकरण के चलते बिपरजॉय और मोचा जैसे महा-चक्रवातों में भी ‘जीरो कैजुअल्टी’ (नगण्य जनहानि) का नया वैश्विक मानक स्थापित हुआ, जिसकी संयुक्त राष्ट्र ने भी सराहना की। वहीं अंतरराष्ट्रीय संकटों में ‘ऑपरेशन गंगा’ (यूक्रेन), ‘ऑपरेशन कावेरी’ (सूडान), ‘ऑपरेशन अजय’ (इजरायल) और तुर्किए भूकंप में ‘ऑपरेशन दोस्त’ के जरिए युद्धग्रस्त इलाकों से हजारों नागरिकों को सुरक्षित निकालकर भारत ने अपनी वैश्विक साख का लोहा मनवाया।

अंतरिक्ष क्षेत्र में खुलापन: सरकारी एकाधिकार से 200+ स्पेस-टेक स्टार्टअप्स और गगनयान की उड़ान
2014 से पहले: भारत का संपूर्ण अंतरिक्ष कार्यक्रम केवल इसरो (ISRO) के सरकारी दायरे तक सीमित था। अंतरिक्ष अनुसंधान में निजी उद्योगों, इंजीनियरिंग संस्थानों और युवा शोधकर्ताओं के लिए रास्ते बंद थे, जिससे होनहार प्रतिभाएं विदेशों का रुख करती थीं।
2014 के बाद का बदलाव: जून 2020 में अंतरिक्ष क्षेत्र को निजी क्षेत्र के लिए पूरी तरह खोलते हुए ‘इन-स्पेस’ (IN-SPACe) नियामक संस्था का गठन किया गया। कुछ ही वर्षों में देश में 200 से अधिक स्पेस-टेक स्टार्टअप्स खड़े हो गए, जिन्होंने निजी रॉकेट और सैटेलाइट लॉन्च करना शुरू कर दिया। इसरो ने चंद्रयान-3 की चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर ऐतिहासिक सॉफ्ट लैंडिंग और सूर्य मिशन ‘आदित्य एल-1’ से विश्व में भारत का डंका बजाया। भारत अब मानव अंतरिक्ष मिशन ‘गगनयान’ और अपने अंतरिक्ष स्टेशन के निर्माण की दिशा में अग्रसर है।
नवीकरणीय ऊर्जा में छलांग: सौर व पवन क्षमता 35 GW से 200 GW पार, ‘पीएम सूर्य घर’ से मुफ्त बिजली
2014 से पहले: देश की ऊर्जा जरूरतें लगभग पूरी तरह कोयले और आयातित कच्चे तेल पर निर्भर थीं। देश में सौर और पवन जैसी स्वच्छ ऊर्जा की कुल स्थापित क्षमता मात्र 35 गीगावाट (GW) के आसपास थी और छतों पर सोलर सिस्टम लगाना आम परिवारों के लिए महंगा और कागजी उलझनों से भरा था।
2014 के बाद का बदलाव: भारत ने ‘अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन’ (ISA) का नेतृत्व किया और देश की गैर-जीवाश्म व नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता को लगभग 6 गुना बढ़ाकर 200 गीगावाट (GW) के पार पहुंचाया। पेरिस जलवायु समझौते के तहत तय लक्ष्यों को समय से कई वर्ष पूर्व ही हासिल कर लिया गया। आम परिवारों को सीधे लाभ पहुंचाने के लिए ₹75,000 करोड़ के बजट से ‘पीएम सूर्य घर मुफ्त बिजली योजना’ शुरू की गई, जिसके तहत 1 करोड़ परिवारों की छतों पर सोलर पैनल लगाए जा रहे हैं। इससे नागरिकों को 300 यूनिट तक मुफ्त बिजली मिलने के साथ ग्रिड को अतिरिक्त बिजली बेचकर कमाई का अवसर मिल रहा है।
“बारह वर्ष पहले, भारत की सौर ऊर्जा क्षमता केवल 2 गीगावाट थी। आज यह बढ़कर 160 गीगावाट हो गई है। पीएम सूर्य घर: मुफ़्त बिजली योजना के तहत 50 लाख से अधिक परिवारों ने रूफटॉप सोलर स्थापित किया है, जिससे महत्वपूर्ण बचत संभव हुई है और स्वच्छ ऊर्जा को बढ़ावा मिला है।”
माननीय… pic.twitter.com/xsOqj8nQZU
— PM Surya Ghar: Muft Bijli Yojana (@PMSuryaGhar) September 19, 2026
औपनिवेशिक कानूनों का अंत: 160 साल पुराने कानूनों की जगह भारतीय न्याय संहिता (BNS) से त्वरित न्याय
2014 से पहले: देश की आपराधिक न्याय प्रणाली अंग्रेजों के जमाने के 1860 के दंडात्मक कानूनों (IPC, CrPC और साक्ष्य अधिनियम) पर संचालित थी, जिनका मूल उद्देश्य नागरिकों को न्याय देना नहीं बल्कि उन्हें नियंत्रित व दंडित करना था। अदालतों में मुकदमों की अनगिनत तारीखों में पीड़ितों की पीढ़ियां बीत जाती थीं।
2014 के बाद का बदलाव: औपनिवेशिक गुलामी के प्रतीकों को हटाते हुए 1 जुलाई 2024 से तीन नए कानून—भारतीय न्याय संहिता (BNS), भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) और भारतीय साक्ष्य अधिनियम (BSA)—लागू किए गए। इन कानूनों में ‘दंड’ के स्थान पर ‘न्याय’ को प्राथमिकता दी गई। मुकदमों के फैसले के लिए स्पष्ट समय-सीमा तय की गई, महिलाओं व बच्चों के खिलाफ अपराधों पर कठोर दंड का प्रावधान हुआ, इलेक्ट्रॉनिक समन व फॉरेंसिक जांच अनिवार्य की गई और देश के किसी भी थाने से ‘जीरो एफआईआर’ दर्ज कराने की सुविधा देकर नागरिक अधिकारों को सशक्त किया गया।
आकांक्षी जिले (Aspirational Districts): पिछड़ेपन के ठप्पे से निकलकर 112 जिलों में विकास की दौड़
2014 से पहले: देश के 112 सबसे पिछड़े जिलों को ‘बीमारू’ मानकर उपेक्षित छोड़ दिया जाता था। प्रशासनिक व्यवस्था में इन जिलों में पोस्टिंग को अधिकारियों के लिए सजा माना जाता था, जिससे विकास का पैसा फाइलों में ही दबकर रह जाता था और जमीनी हालात जस के तस बने रहते थे।
2014 के बाद का बदलाव: नीति आयोग के नेतृत्व में जनवरी 2018 में ‘आकांक्षी जिला कार्यक्रम’ (Aspirational Districts Programme) शुरू किया गया। इन जिलों में युवा अधिकारियों को जिम्मेदारी दी गई और स्वास्थ्य, पोषण, शिक्षा, कृषि व वित्तीय समावेशन जैसे 49 पैमानों पर जिलों के बीच स्वस्थ प्रतिस्पर्धा शुरू की गई। इसका परिणाम यह रहा कि कई पिछड़े जिलों ने विकास के प्रमुख मानकों में अपने राज्यों के औसत को भी पीछे छोड़ दिया। इसी मॉडल की सफलता के आधार पर अब 500 पिछड़े प्रखंडों के लिए ‘आकांक्षी ब्लॉक कार्यक्रम’ संचालित हो रहा है।
श्रम कानून सुधार: 29 पेचीदा कानूनों की जगह केवल 4 सुगम श्रम संहिताएं (Labour Codes)
2014 से पहले: आजादी के समय से चले आ रहे 29 अलग-अलग और उलझाऊ श्रम कानूनों के चलते उद्योगों पर इंस्पेक्टर राज का शिकंजा रहता था, वहीं दूसरी ओर असंगठित क्षेत्र के करोड़ों कामगारों को न तो न्यूनतम वेतन मिलता था और न ही कोई सामाजिक सुरक्षा उपलब्ध थी।
2014 के बाद का बदलाव: संसद ने 29 जटिल कानूनों को एकीकृत कर केवल 4 सरल श्रम संहिताएं (Labour Codes – वेतन, सामाजिक सुरक्षा, औद्योगिक संबंध और सुरक्षा संहिता) बनाईं। इससे उद्योगों के लिए कागजी अनुपालन का बोझ घटा और व्यापार सुगमता (Ease of Doing Business) बढ़ी। पहली बार कानून में डिलीवरी बॉय, कैब ड्राइवर जैसे ऑनलाइन प्लेटफॉर्म कामगारों (Gig Workers) को मान्यता देकर उनके लिए सामाजिक सुरक्षा का मार्ग प्रशस्त किया गया और सभी कामगारों के लिए बैंक खातों में न्यूनतम वेतन की कानूनी गारंटी तय की गई।
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विनिर्माण (Manufacturing): ₹1.97 लाख करोड़ की ‘पीएलआई’ योजना, मोबाइल उत्पादन में दुनिया में नंबर 2
2014 से पहले: भारत मोबाइल फोन, दवाओं के कच्चे माल (Active Pharmaceutical Ingredients – API) और इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों के लिए पूरी तरह विदेशी आयात पर निर्भर था। पूर्ववर्ती नीतियां केवल कागजी सब्सिडी बांटती थीं, जिससे घरेलू विनिर्माण कारखाने नहीं लग पाते थे।
2014 के बाद का बदलाव: सरकार ने 14 प्रमुख क्षेत्रों के लिए ₹1.97 लाख करोड़ की उत्पादन आधारित प्रोत्साहन योजना (Production Linked Incentive – PLI) शुरू की। इसमें व्यवस्था की गई कि जो कंपनी भारत में वास्तविक उत्पादन और बिक्री करेगी, उसे ही सरकारी प्रोत्साहन मिलेगा। इसके चलते भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा मोबाइल विनिर्माता देश बना। आज देश में सेमीकंडक्टर, मेडिकल डिवाइस, ऑटोमोबाइल और सोलर मॉड्यूल के बड़े संयंत्र लग रहे हैं, जिससे भारत वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला (Global Supply Chain) का मजबूत आधार बन चुका है।
भारत की इलेक्ट्रॉनिक्स और मोबाइल निर्माण क्षेत्र ने पिछले एक दशक में अभूतपूर्व विकास दर्ज किया है। वर्ष 2014-15 में इलेक्ट्रॉनिक्स उत्पादन मात्र 1.9 लाख करोड़ रुपये था, जो अब वर्ष 2024-25 में लगभग छह गुना बढ़कर 11.3 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया है। इस दौरान मोबाइल फोन निर्यात… pic.twitter.com/6b1EPhBIHd
— Dainik Jagran (@JagranNews) October 11, 2025
ऊर्जा सुरक्षा: लोड शेडिंग और ब्लैकआउट से मुक्ति, ‘एक राष्ट्र, एक ग्रिड’ से बिजली की किल्लत शून्य
2014 से पहले: राज्यों की बिजली वितरण कंपनियां (DISCOMs) भारी घाटे में डूबी थीं और थर्मल पावर प्लांट्स के पास कोयले का न्यूनतम स्टॉक भी नहीं रहता था। जुलाई 2012 में देश ने दुनिया का सबसे बड़ा ब्लैकआउट झेला था, जब उत्तर भारत के 60 करोड़ लोग कई घंटों तक बिना बिजली के अंधेरे में रहे थे।
2014 के बाद का बदलाव: बिजली वितरण कंपनियों के वित्तीय सुधार के लिए ‘उदय’ (UDAY) योजना चलाई गई और ट्रांसमिशन नेटवर्क का विस्तार कर ‘एक राष्ट्र, एक ग्रिड, एक फ्रीक्वेंसी’ का राष्ट्रीय ग्रिड तैयार किया गया। अब कन्याकुमारी से कश्मीर तक पूरा देश एक ग्रिड से जुड़ा है, जिससे बिजली की पीक डेफिसिट (किल्लत) लगभग शून्य हो चुकी है। गांवों में बिजली कटौती की पुरानी समस्या समाप्त हुई और भारत अपनी घरेलू जरूरतें पूरी करने के साथ पड़ोसी देशों को भी बिजली निर्यात कर रहा है।
परिसंपत्ति मुद्रीकरण (Asset Monetisation): टैक्स बढ़ाए बिना ₹6 लाख करोड़ पूंजी जुटाने का रोडमैप
2014 से पहले: सरकारी विभागों की हजारों संपत्तियां—खाली जमीनें, बंद पड़े गोदाम, गैस पाइपलाइनें और हाईवे—दशकों तक बिना किसी उपयोग के बेकार पड़ी रहती थीं। नए इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए सरकारों को या तो जनता पर टैक्स बढ़ाना पड़ता था या विदेशी कर्ज लेना पड़ता था।
2014 के बाद का बदलाव: नेशनल मोनेटाइजेशन पाइपलाइन (NMP) के तहत सरकारी संपत्तियों का मालिकाना हक बेचे बिना, केवल निश्चित अवधि के लिए उनके संचालन का जिम्मा निजी कंपनियों को लीज पर दिया गया। टोल-ऑपरेट-ट्रांसफर (TOT) और इंफ्रास्ट्रक्चर इन्वेस्टमेंट ट्रस्ट्स (InvITs) के माध्यम से बिना जनता पर टैक्स का बोझ डाले हजारों करोड़ रुपये की गैर-ऋण पूंजी जुटाई गई। इस पूंजी का पुनः निवेश नए एक्सप्रेसवे, डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर और रेलवे के आधुनिकीकरण में किया जा रहा है।
अप्रत्यक्ष करों की क्रांति (GST): 17 टैक्सों के जंजाल का अंत, मासिक संग्रह ₹90 हजार करोड़ से बढ़कर ₹2 लाख करोड़ तक
2014 से पहले: एक राज्य से दूसरे राज्य में माल ले जाने के लिए ट्रकों को सीमाओं पर बने चुंगी नाकों पर दिनों तक कतारों में खड़ा रहना पड़ता था। वैट, एक्साइज, सर्विस टैक्स और चुंगी जैसे 17 अलग-अलग टैक्स और दर्जनों सेस के कागजात जुटाने में ही व्यापारियों का समय बर्बाद होता था।
2014 के बाद का बदलाव: 1 जुलाई 2017 को वस्तु एवं सेवा कर (Goods and Services Tax – GST) लागू कर पूरे देश में ‘एक राष्ट्र, एक कर’ की पारदर्शी व्यवस्था बनाई गई। राज्य सीमाओं से चुंगी नाके हटने से माल की आवाजाही तेज हुई। डिजिटल इनपुट टैक्स क्रेडिट से कर चोरी पर लगाम लगी। शुरुआती दौर में ₹80-90 हजार करोड़ रहने वाला मासिक जीएसटी संग्रह आज लगातार बढ़कर ₹1.8 से ₹2 लाख करोड़ प्रति माह के पार पहुंच चुका है, जिसने केंद्र और राज्यों दोनों के वित्तीय सामर्थ्य को मजबूत किया है।
अगस्त में ₹2 लाख करोड़ के पार पहुंचा जीएसटी कलेक्शन।
अगस्त 2026 में सकल जीएसटी संग्रह सालाना आधार पर 14.8 प्रतिशत बढ़कर लगभग दो लाख करोड़ रुपये (1,99,853 करोड़ रुपये) रहा।
इस दौरान घरेलू लेनदेन से होने वाला जीएसटी राजस्व 9.3 प्रतिशत बढ़कर 1.37 लाख करोड़ रुपये से अधिक रहा,…
— Panchjanya (@epanchjanya) September 1, 2026
स्टार्टअप क्रांति: 400 कंपनियों से 1.45 लाख स्टार्टअप्स, 110 से अधिक यूनिकॉर्न्स के साथ दुनिया में तीसरा स्थान
2014 से पहले: भारत में नया उद्यम शुरू करने का अर्थ था दर्जनों विभागों की मंजूरियों के चक्कर काटना और बैंक लोन के लिए भटकना। देश में गिने-चुने 400-500 स्टार्टअप्स थे और युवाओं की प्राथमिकता केवल पारंपरिक नौकरियों तक सीमित थी।
2014 के बाद का बदलाव: 2016 में शुरू हुए ‘स्टार्टअप इंडिया’ मिशन, शुरुआती 3 साल की टैक्स छूट, एंजेल टैक्स की समाप्ति और आसान नियमों ने युवाओं के हौसले को नई उड़ान दी। आज देश में 1.45 लाख से अधिक मान्यता प्राप्त स्टार्टअप्स और 110 से अधिक यूनिकॉर्न्स (1 अरब डॉलर से अधिक मूल्यांकन वाली कंपनियां) सक्रिय हैं। भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा स्टार्टअप इकोसिस्टम बन चुका है, जहां टियर-2 और टियर-3 शहरों के युवा तकनीक और नवाचार के दम पर लाखों रोजगार पैदा कर रहे हैं।
रणनीतिक विदेश व्यापार: निर्यात $450 अरब से बढ़कर ₹70 लाख करोड़ ($800+ Billion) के पार
2014 से पहले: भारत की विदेश व्यापार नीतियां अक्सर रक्षात्मक रुख अपनाती थीं। पुराने व्यापार समझौतों से सस्ता विदेशी माल बिना रोक-टोक भारत आने से घरेलू उद्योगों को नुकसान पहुंचता था और देश का कुल सालाना निर्यात लगभग 450 अरब डॉलर पर अटका हुआ था।
2014 के बाद का बदलाव: ‘राष्ट्र प्रथम’ (India First) की विदेश व्यापार नीति अपनाते हुए यूएई, ऑस्ट्रेलिया और यूरोपीय देशों के साथ संतुलित व्यापार समझौते किए गए, जिनसे भारतीय उत्पादों को वैश्विक बाजारों में आसान पहुंच मिली। वैश्विक प्रतिबंधों के दबाव के बावजूद भारत ने अपने राष्ट्रीय हितों को सर्वोपरि रखकर ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित की। ‘मेक इन इंडिया’ के बल पर भारत का कुल वस्तु व सेवा निर्यात ₹70 लाख करोड़ (800 अरब डॉलर से अधिक) के सर्वकालिक उच्च स्तर को पार कर चुका है।
वैश्विक बाजार में भारत के निर्यात को नई रफ्तार!
अगस्त 2026 में भारत का कुल निर्यात 82.68 अरब डॉलर रहा, जो अगस्त 2025 के मुकाबले 25.41% अधिक है।
NDA सरकार के नेतृत्व में निर्यात की बढ़ती रफ्तार वैश्विक व्यापार में भारत की मजबूत होती भागीदारी और पहचान को दर्शाती है।… pic.twitter.com/hKF2H7VP98
— BJP Bihar (@BJP4Bihar) September 21, 2026
सरकारी खरीद में पारदर्शिता (GeM Portal): दलालों का खेल खत्म, संचयी कारोबार ₹20 लाख करोड़ पार
2014 से पहले: सरकारी विभागों में स्टेशनरी से लेकर बड़े उपकरणों की खरीद में चुनिंदा बिचौलियों और ठेकेदारों का एकाधिकार था। टेंडर की शर्तें ऐसी बनाई जाती थीं कि सामान्य व्यापारी हिस्सा न ले सके, जिससे भारी कमीशनखोरी और घटिया सामान की सप्लाई का दौर चलता था।
2014 के बाद का बदलाव: गवर्नमेंट ई-मार्केटप्लेस (GeM Portal) लागू कर सरकारी खरीद को पूरी तरह ऑनलाइन और पारदर्शी बनाया गया। अब देश के किसी भी सुदूर कस्बे का छोटा दुकानदार, महिला उद्यमी या कुटीर उद्योग सीधे सेना और मंत्रालयों को अपने उत्पाद बेच सकते हैं। GeM पोर्टल पर संचयी कारोबार (GMV) ₹20 लाख करोड़ के विशाल आंकड़े को पार कर चुका है, जिससे बिचौलियों का खेल समाप्त हुआ और करदाताओं के हजारों करोड़ रुपये की बचत हुई।
प्रत्यक्ष कर में फेसलेस क्रांति: इनकम टैक्स रिटर्न भरने वालों की संख्या 3.8 करोड़ से बढ़कर 8.6 करोड़ पार
2014 से पहले: आयकर विभाग का नाम आते ही आम करदाता और व्यापारी उत्पीड़न व नोटिसों के भय से घबरा जाते थे। स्क्रूटनी के नाम पर करदाताओं को दफ्तरों के चक्कर लगाने पड़ते थे और देश में रिटर्न भरने वालों की संख्या मात्र 3.8 करोड़ के आसपास सिमटी हुई थी।
2014 के बाद का बदलाव: आयकर व्यवस्था में फेसलेस असेसमेंट (चेहरा-रहित जांच) और करदाता घोषणापत्र (Taxpayers’ Charter) लागू कर अफसरों की मनमानी समाप्त की गई। अब करदाता और अधिकारी का कोई सीधा संपर्क नहीं होता; फाइलें कंप्यूटर द्वारा स्वतः आवंटित होती हैं। विवादों के समाधान के लिए ‘विवाद से विश्वास’ जैसी योजनाएं आईं। व्यवस्था के पारदर्शी होने से टैक्स बेस बढ़ा और इनकम टैक्स रिटर्न भरने वालों की संख्या दोगुनी से अधिक होकर 8.6 करोड़ के पार पहुंच गई।
पूर्वोत्तर का कायाकल्प: उपेक्षा और बंद के दौर से निकलकर ‘अष्टलक्ष्मी’ का स्वर्णिम विकास
2014 से पहले: पूर्वोत्तर के आठों राज्य दशकों तक दिल्ली के नीतिगत गलियारों से उपेक्षित पड़े रहते थे। आए दिन होने वाली आर्थिक नाकेबंदी (बंद), उग्रवाद, जर्जर सड़कें और रेल नेटवर्क का अभाव वहां के नागरिकों की नियति बन चुका था।
2014 के बाद का बदलाव: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पूर्वोत्तर को देश की ‘अष्टलक्ष्मी’ मानकर विकास की मुख्यधारा से जोड़ा। विभिन्न उग्रवादी संगठनों के साथ ऐतिहासिक शांति समझौते कर 10 हजार से अधिक युवाओं का पुनर्वास कराया गया। पूर्वोत्तर के सभी राज्यों की राजधानियों को ब्रॉडगेज रेल नेटवर्क और चौड़े राष्ट्रीय राजमार्गों से जोड़ा गया। बोगीबील पुल, भूपेन हजारिका सेतु और 13,000 फीट की ऊंचाई पर बनी सेला टनल जैसी सामरिक परियोजनाओं ने पूर्वोत्तर को हर मौसम में देश के बाकी हिस्सों से निर्बाध जोड़ दिया।
पूर्वोत्तर में लिखी जा रही है, विकास की नई कहानी!
अष्टलक्ष्मी यानी पूर्वोत्तर के आठों राज्यों में बदलाव की जो बयार मोदी सरकार के नेतृत्व में बीते कुछ सालों में बही है, उसने पूर्वोत्तर राज्यों के सांस्कृतिक, सामाजिक और आर्थिक ताने-बाने को उभरने का काम किया है। pic.twitter.com/LYAfLWvMCz
— BJP (@BJP4India) July 31, 2025
लालफीताशाही का अंत: 40,000 नियम खत्म, 1,500 पुराने कानून निरस्त और ‘जन विश्वास’ से जेल का डर समाप्त
2014 से पहले: आम नागरिक और उद्यमी सरकारी नियमों और कागजी औपचारिकताओं के जाल में जकड़े रहते थे। फॉर्म में किसी मामूली तकनीकी चूक पर भी जेल भेजने वाले कठोर कानूनी प्रावधान लागू थे और आजादी के बाद से 1,500 से अधिक अप्रासंगिक कानून व्यवस्था को पंगु बना रहे थे।
2014 के बाद का बदलाव: सरकार ने केंद्र और राज्यों के 40,000 से अधिक गैर-जरूरी अनुपालनों (Compliances) को समाप्त किया। संसद से ‘जन विश्वास कानून’ पारित कर व्यापार में होने वाली छोटी तकनीकी चूकों को अपराध की श्रेणी से बाहर किया गया ताकि व्यापारियों के मन से जेल का डर खत्म हो सके। औपनिवेशिक काल के 1,500 से ज्यादा निरर्थक कानूनों को निरस्त कर दिया गया और सरकारी दफ्तरों में हलफनामों की जगह नागरिक के स्व-सत्यापन (Self-Attestation) को मान्य कर नागरिक गरिमा को पुनर्स्थापित किया गया।

संकल्प से सिद्धि: विकसित भारत की सुदृढ़ और अटूट नींव
अक्टूबर 2001 में गुजरात से शुरू हुई जन सेवा की यह यात्रा और 2014 के बाद पूरे देश में आया प्रशासनिक कायाकल्प इस बात का प्रमाण है कि जब स्पष्ट विजन और साहसिक नेतृत्व होता है, तो देश का भाग्य कैसे बदलता है। 2014 से पहले जिस देश को घोटालों, कमजोर बैंकों, लटकी परियोजनाओं और नीतिगत लाचारी के लिए जाना जाता था, वही भारत आज समयबद्ध फैसलों, मजबूत वित्तीय संस्थाओं, आधुनिक इंफ्रास्ट्रक्चर और दुनिया की 5वीं सबसे बड़ी आर्थिक शक्ति के रूप में गर्व से खड़ा है। फाइलों के जंजाल से मुक्ति, सैटेलाइट निगरानी, रिकॉर्ड हाईवे निर्माण और पारदर्शी डिजिटल सुशासन का यह सफर केवल आंकड़ों की बात नहीं है, बल्कि देश के 140 करोड़ नागरिकों के जीवन में आई वास्तविक सहजता (Ease of Living) की गाथा है। सुशासन और दूरदर्शी नीतियों ने जो सुदृढ़ आधार तैयार किया है, वही वर्ष 2047 तक भारत को एक पूर्ण ‘विकसित राष्ट्र’ बनाने के संकल्प को सिद्ध करेगा।










