प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ सोशल मीडिया पर एआई (AI) जनरेटेड, मॉर्फ्ड और बेहद आपत्तिजनक कंटेंट प्रसारित करने के मामले में बड़ी कानूनी कार्रवाई हुई है। हैदराबाद साइबर क्राइम पुलिस ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स की मूल कंपनी मेटा (Meta) इंडिया के प्रमुख अरुण श्रीनिवास और कई अन्य यूजर अकाउंट्स के खिलाफ एफआईआर दर्ज की है। यह कार्रवाई फेसबुक और इंस्टाग्राम जैसे प्लेटफॉर्म्स पर शेयर किए गए आपत्तिजनक वीडियो और पोस्ट्स के संदर्भ में की गई है।
यह पूरा मामला हाल ही में दिल्ली के जंतर-मंतर पर आयोजित प्रदर्शनों के दौरान सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर प्रधानमंत्री और संवैधानिक पदों के खिलाफ चलाए गए भ्रामक व अपमानजनक अभियानों से जुड़ा है। पुलिस में दर्ज कराई गई शिकायत के अनुसार, एआई से तैयार की गई फर्जी तस्वीरों और वीडियो के जरिए देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद की गरिमा को ठेस पहुंचाने और समाज में शांति भंग करने की कोशिश की गई।
साइबर क्राइम पुलिस ने इस मामले में भारतीय न्याय संहिता (BNS) और सूचना प्रौद्योगिकी (IT) अधिनियम की गंभीर धाराओं के तहत मामला दर्ज कर जांच शुरू कर दी है। पुलिस अब इस बात की पड़ताल कर रही है कि इन फर्जी वीडियो का मूल स्रोत क्या था और वे किस तरह से सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर तेजी से फैले।
इस कार्रवाई के बाद बिग टेक कंपनियों की जवाबदेही और एआई (AI) जनरेटेड भ्रामक सामग्रियों (Deepfakes) के नियमन को लेकर एक बार फिर राष्ट्रीय स्तर पर तीखी बहस छिड़ गई है।
हैदराबाद में दर्ज हुई FIR, बीजेपी कार्यकर्ताओं ने दर्ज कराई शिकायत
पुलिस के अनुसार, यह मामला हैदराबाद के साइबर क्राइम थाने में स्थानीय तेलंगाना बीजेपी सोशल मीडिया प्रतिनिधि और शिकायतकर्ताओं के आधार पर दर्ज किया गया है। शिकायतकर्ताओं का आरोप है कि इंस्टाग्राम और फेसबुक पर कई ऐसे मॉर्फ्ड वीडियो और पोस्ट्स आए, जिनमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अपमानजनक स्थिति में दिखाया गया था। इन पोस्ट्स पर की गई टिप्पणियों में भी अभद्र भाषा का इस्तेमाल किया गया था, जिसका उद्देश्य नफरत फैलाना और सामाजिक सौहार्द बिगाड़ना था।
AI जनरेटेड कंटेंट और मेटा के सुरक्षा तंत्र की हो रही जांच
पुलिस अधिकारी इस बात की विस्तृत जांच कर रहे हैं कि एआई के जरिए बनाए गए इन फर्जी वीडियो और मॉर्फ्ड तस्वीरों को किस स्रोत से अपलोड किया गया। इसके साथ ही मेटा (Meta) कंपनी के कंटेंट मॉडरेशन सिस्टम और सुरक्षा तंत्र पर भी सवाल उठाए गए हैं कि ऐसे संवेदनशील व भ्रामक कंटेंट को प्लेटफॉर्म पर वायरल होने से रोकने में कंपनी के सुरक्षा उपाय कितने कारगर रहे।
पाकिस्तान से भारत में प्रायोजित पॉलिटिकल कैंपेन
सोशल मीडिया पर मेटा (Meta) की विज्ञापन नीतियों और सुरक्षा तंत्र को लेकर एक बेहद गंभीर दावा सामने आया है। आरोप लगाया जा रहा है कि मेटा पाकिस्तान से भारत में चलाए जा रहे पेड पॉलिटिकल कैंपेन और प्रचार-प्रसार की अनुमति दे रहा है। दावा किया जा रहा है कि इस तरह के प्रायोजित विज्ञापनों के जरिए भारत में शासन परिवर्तन और राजनीतिक अस्थिरता पैदा करने की कोशिशें की जा रही हैं। पाकिस्तान से भारतीय यूजर्स को टारगेट कर चलाए जा रहे इन विज्ञापनों को लेकर राष्ट्रीय सुरक्षा और डिजिटल हस्तक्षेप पर चिंता जताई गई है।
This is extremely serious.
Why is Meta allowing political campaigning from Pakistan?
And that too, which is working for a regime change operation in India.
Meta is doing an extremely concerning act by allowing paid interface from Pakistan to India. pic.twitter.com/WJ91GeIMrb
— Office Of Vijay Patel (@VijayGajeraO) July 30, 2026
बीबीसी की रिपोर्ट में बच्चों के यौन शोषण से जुड़े कंटेंट के विज्ञापनों पर विवाद
मेटा के लिए एक और बड़ा विवाद बीबीसी (BBC) की हालिया जांच रिपोर्ट से सामने आया है। इस जांच में आरोप लगाया गया है कि इंस्टाग्राम पर भारत में बच्चों के यौन शोषण (CSAM) से जुड़े कंटेंट को प्रमोट करने वाले पेड विज्ञापनों से मेटा ने मुनाफा कमाया है। हालांकि मेटा ने जानबूझकर ऐसे विज्ञापनों की अनुमति देने से इनकार किया और शिकायत मिलने पर कंटेंट को हटा दिया, लेकिन इस खुलासे ने प्लेटफॉर्म की सुरक्षा प्रणाली और बच्चों की सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। भारत में इस मामले पर सख्त कानूनी जांच और जवाबदेही तय करने की मांग उठ रही है।
A BBC investigation has alleged that @Meta profited from paid advertisements promoting child se*ual ab*se material on Instagram in India, despite having policies that prohibit such content. The investigation says Meta’s review systems failed to detect the ads before publication.… https://t.co/bcHoLh3J9y pic.twitter.com/2dZ9dEQNMB
— CAUGHTIN4KHQ (@CaughtIn4KHQ) July 30, 2026
भारत सरकार की डिजिटल स्ट्राइक: मेटा में लागू होगा नया ओवरसाइट मैकेनिज्म
वैश्विक टेक कंपनियों की मनमानी पर अंकुश लगाते हुए भारत सरकार (IT मंत्रालय) के कड़े रुख के बाद मेटा ने बड़ा कदम उठाया है। मेटा ने राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, गृह मंत्री और भारतीय सशस्त्र बलों से जुड़े कंटेंट के लिए एक नया ‘ओवरसाइट मैकेनिज्म’ लागू करने की प्रतिबद्धता जताई है। अब मेटा का कोई भी व्यक्तिगत कर्मचारी संवैधानिक पदों से जुड़ी पोस्ट या वीडियो को मनमाने ढंग से नहीं हटा सकेगा; हर फैसले के लिए वरिष्ठ स्तर की समीक्षा अनिवार्य होगी। इसी सिलसिले में मेटा का शीर्ष नेतृत्व भारतीय अधिकारियों से मिलने नई दिल्ली पहुंच रहा है।
🚨🚨Another Surgical Strike: GoI Makes Meta Fall in Line-
Major digital strike by the GoI of India. This time, the target is #Meta. The era of global tech giants acting without accountability is coming to an end.
Meta has now committed to the Ministry of Electronics and… pic.twitter.com/A07e46JhTU
— Rahul (@Rahulk123d) July 29, 2026
डीपफेक और एआई का बढ़ता दुरुपयोग: लोकतंत्र और सुरक्षा के लिए नया खतरा
हाल के महीनों में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और डीपफेक टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल राजनीतिक एजेंडा चलाने और भ्रामक जानकारी फैलाने के लिए तेजी से बढ़ा है। प्रधानमंत्री जैसे सर्वोच्च संवैधानिक पदों पर बैठे व्यक्तियों की मॉर्फ्ड तस्वीरें और एआई जनरेटेड फर्जी वीडियो न केवल जनभावनाओं को भड़काने की क्षमता रखते हैं, बल्कि देश की आंतरिक सुरक्षा और लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए भी गंभीर चुनौती पेश करते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि राजनीतिक विरोध के नाम पर इस प्रकार के फर्जी कंटेंट का निर्माण और प्रचार-प्रसार साइबर अपराध की श्रेणी में आता है।
बिग टेक कंपनियों की जवाबदेही: ‘सेफ हार्बर’ सुरक्षा पर उठे सवाल
इस एफआईआर के बाद फेसबुक और इंस्टाग्राम की मूल कंपनी मेटा (Meta) जैसी वैश्विक टेक कंपनियों की नीतिगत जवाबदेही पर एक बार फिर सवाल खड़े हो गए हैं। आईटी नियमों के तहत सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को मध्यस्थ (Intermediaries) का दर्जा प्राप्त है, लेकिन अगर वे अपने प्लेटफॉर्म पर बार-बार पोस्ट किए जा रहे देशविरोधी, भ्रामक या मानहानिकारक कंटेंट को हटाने में विफल रहते हैं, तो उनकी कानूनी सुरक्षा (Safe Harbour Protection) खत्म हो सकती है। इस कानूनी कार्रवाई से यह संदेश देने की कोशिश की गई है कि भारत के कानूनों का अनुपालन न करने पर टेक दिग्गजों के शीर्ष अधिकारियों को भी जवाबदेह ठहराया जाएगा।
अभिव्यक्ति की आजादी बनाम संवैधानिक पद का सम्मान: रेखा कहाँ खींची जाए?
यह मामला अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और उसके दायरे की सीमा के बीच की महीन रेखा को रेखांकित करता है। यद्यपि भारतीय संविधान नागरिकों को असहमति व्यक्त करने और सरकार की आलोचना करने का अधिकार देता है, लेकिन फर्जी साक्ष्यों, मॉर्फ्ड वीडियो और अभद्र भाषा के जरिए किसी भी व्यक्ति या प्रधानमंत्री पद की छवि धूमिल करने को स्वतंत्रता का अधिकार नहीं माना जा सकता। साइबर कानून विशेषज्ञों के अनुसार, वैध आलोचना और साइबर बदनामी (Cyber Defamation) में बड़ा अंतर है, जिसे ध्यान में रखना अनिवार्य है।
चुनावी माहौल में ‘सूचना युद्ध’ की आशंका
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बड़े आंदोलनों या राजनीतिक आयोजनों के दौरान सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को सूचना युद्ध के हथियार के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है। एआई जनरेटेड कंटेंट के जरिए आम जनता को भ्रमित करने और समाज में असंतोष पैदा करने के सुनियोजित प्रयास किए जा रहे हैं। जांच एजेंसियां अब इस पहलू की भी जांच कर रही हैं कि क्या इस प्रकार के मॉर्फ्ड वीडियो और आपत्तिजनक कंटेंट को किसी विशेष टूलकिट या संगठित नेटवर्क के जरिए प्रायोजित (Sponsor) किया जा रहा था।
डिजिटल प्लेटफॉर्म्स की जवाबदेही पर सख्त रुख
हाल के दिनों में एआई जनरेटेड फर्जी कंटेंट और डीपफेक के बढ़ते मामलों को देखते हुए जांच एजेंसियां और सरकार सख्त रुख अपना रही हैं। पुलिस ने स्पष्ट किया है कि मामले की जांच शुरुआती चरण में है और डिजिटल साक्ष्यों को जुटाने के बाद आगे की विधिक कार्रवाई की जाएगी।
आइए, अब देखते हैं कि मेटा और अन्य सोशल मीडिया के आका किस तरह भारत और राष्ट्रवादी व्यक्तियों, चैनलों के खिलाफ अपना एजेंडा सेट करती हैं:
1. विपक्ष और विदेशी ताकतों का राजनीतिक षड्यंत्र
वामपंथी इकोसिस्टम, कांग्रेस और विदेशी ताकतें भारत में एक लंबे और गहरे राजनीतिक खेल की तैयारी में जुटी हुई हैं। सांस्कृतिक और सभ्यतागत स्तर पर देश को कमजोर करने के प्रयासों के साथ-साथ, राजनीतिक व चुनावी हितों को ध्यान में रखते हुए भी सरकार को अब इन राष्ट्रविरोधी मंसूबों के खिलाफ सख्त और निर्णायक कदम उठाने की आवश्यकता है।

2. सीजेपी (CJP) को छूट और पीएम के वीडियो पर सेंसरशिप
सोशल मीडिया दिग्गजों की मनमानी पर सवाल उठाते हुए वरिष्ठ पत्रकारों ने रेखांकित किया है कि जहां सीजेपी (CJP) जैसी विवादित और प्रायोजित मुहीमों को प्लेटफॉर्म्स पर खुली छूट मिलती है, वहीं देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के रिकॉर्ड तोड़ संदेश को ब्लॉक कर दिया जाता है। भारतीय विज्ञापन राजस्व से अरबों कमाने वाले ये अमेरिकी प्लेटफॉर्म्स अब भारतीय लोकतंत्र को प्रभावित करने का काम कर रहे हैं, जिन पर मोदी सरकार को तुरंत सख्त ‘रेडलाइन्स’ तय करनी चाहिए।

3. फेसबुक का घोर पक्षपात और डिजिटल संप्रभुता पर प्रहार
फेसबुक द्वारा प्रधानमंत्री के पोस्ट को सेंसर करना भारत के लोकतंत्र और डिजिटल संप्रभुता में सीधा हस्तक्षेप है। यह कोई सामान्य ‘कंटेंट मॉडरेशन’ नहीं है, बल्कि एक विदेशी प्लेटफॉर्म द्वारा यह तय करने की तानाशाही कोशिश है कि भारतीय नागरिक क्या देख सकते हैं। फेसबुक को यह सार्वजनिक करना चाहिए कि उसने किस कानूनी अनुरोध या दबाव के तहत भारत के प्रधानमंत्री का संदेश रोका।
4. राइट-विंग अकाउंट्स का दमन और मेटा पर अस्थायी प्रतिबंध की मांग
मेटा (Meta) लगातार राष्ट्रवादी और राइट-विंग पेजों को निशाना बनाकर डिलीट या शैडोबैन करता रहा है। प्रधानमंत्री मोदी जी के पेपर लीक पर दिए गए सख्त रुख वाले वीडियो को भारत में ब्लॉक करके फेसबुक ने अपनी हदों को पार कर दिया है। जब तक सरकार ऐसे पक्षपाती विदेशी प्लेटफॉर्म्स को कम से कम 7-8 दिनों के लिए प्रतिबंधित नहीं करेगी, तब तक इन्हें सबक नहीं मिलेगा।
🚨 मेटा प्लेटफॉर्म पर सख्त एक्शन लेने का समय आ गया है
इस बार फेसबुक ने सारी हदें पार कर दी है!
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी के पेपर लीक पर सख्त कार्रवाई वाले पोस्ट को भारत में ब्लॉक कर दिया गया।
क्या इस विदेशी प्लेटफॉर्म को अधिकार है कि वो भारत के प्रधानमंत्री के पोस्ट को… pic.twitter.com/BuQpdlUoqL
— Manoj Singh (@PracticalSpy) July 28, 2026
5. फेसबुक व व्हाट्सएप पर कड़े प्रतिबंध की सिफारिश
पीएम मोदी के वीडियो को सेंसर किए जाने की घटना के बाद भारतीय यूजर्स द्वारा फेसबुक और व्हाट्सएप को भारत में स्थायी रूप से ब्लॉक करने की मांग उठाई जा रही है। इनका मुकाबला करने के लिए स्वदेशी ऐप्स (जैसे अरट्टई / Arattai) को बढ़ावा देना चाहिए, ताकि विदेशी सोशल मीडिया का इस्तेमाल करके युवाओं और देश के माहौल को भड़काया न जा सके।
Meta has reportedly restricted/blocked visibility of PM .@narendramodi Ji’s 1st selfie video on Facebook in Bharat.
If True, I strongly suggest Modi Sarkar to block Facebook & WhatsApp in Bharat. Don’t touch Instagram. That may be used to instigate Gen-Z further. But Facebook &… pic.twitter.com/3kcKaF5570
— BhikuMhatre (@MumbaichaDon) July 28, 2026
6. अमेरिकी कॉर्पोरेट्स का कंट्रोल और स्वदेशी विकल्पों की जरूरत
अमेरिकी सोशल मीडिया कंपनियां दुनिया भर में नैरेटिव तय करके सरकारें बदलने का खेल खेलती रही हैं। पीएम मोदी की पोस्ट पर रोक लगाना इस बात का प्रमाण है कि उपभोक्ता जो देख रहे हैं, वह ये कॉर्पोरेशन तय करते हैं। चीन, रूस और जापान की तर्ज पर भारत को भी इन अमेरिकी प्लेटफॉर्म्स पर अपनी निर्भरता खत्म कर स्वदेशी डिजिटल ढांचा खड़ा करना होगा।
रेड अलर्ट: US कंपनी मेटा ने सबसे बड़े लोकतंत्र के पीएम @narendramodi की फेसबुक पोस्ट कुछ घंटों के लिए रोक दी. मोदी एक कॉरपोरेशन के शिकार बन गए.
अगर वो ये कर सकते हैं तो क्या उन्होंने एक खास इंस्टा पोस्ट को वायरल नहीं किया होगा? क्या आप यकीन से कह सकते हैं कि ये नहीं हुआ होगा?… pic.twitter.com/TDZa5O0c3z
— Dilip Mandal (@Profdilipmandal) July 28, 2026
7. मेटा की ‘तकनीकी गलती’ वाली सफाई पर उठते सवाल
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का Gen Z को संबोधित वीडियो हटाने के बाद विवाद बढ़ने पर मेटा ने इसे ‘लीगल रिक्वेस्ट’ के बजाय ‘तकनीकी गलती’ (Technical Error) करार देकर बहाल किया। हालाँकि, मेटा की इस सफाई से देश में संतोष नहीं है और पश्चिमी प्लेटफॉर्म्स के तरीकों पर भारी सवाल खड़े करते हुए भारतीय सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स की मांग तेज हो गई है।
Meta ने हटाया पीएम मोदी का वीडियो, बाद में इसे बताया ‘गलती’
मनीकंट्रोल के अनुसार मेटा ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के उस वीडियो को हटा दिया जिसमें उन्होंने Gen Z को संबोधित किया था। हालांकि बाद में इसे बहाल कर दिया गया।
कंपनी ने पहले तो कहा कि कानूनी अनुरोध के आधार पर वीडियो… pic.twitter.com/0fshJHV70o
— RT Hindi (@RT_hindi_) July 28, 2026
8. विवाद के बाद मेटा का रुख और माफीनामा
नीट (NEET) पेपर लीक पर देश के युवाओं और छात्रों को आश्वस्त करते प्रधानमंत्री मोदी के सेल्फी वीडियो के फेसबुक से गायब होते ही देशभर में हंगामा मच गया। इस गंभीर विवाद और जनता के आक्रोश के बाद अंततः मेटा ने आधिकारिक बयान जारी कर अपनी चूक स्वीकार की और पीएम मोदी का वीडियो दोबारा बहाल करते हुए माफी मांगी।

सोशल मीडिया CEO का कार्यकाल और वामपंथी एजेंडा
वर्ष 2014 के बाद से ही सोशल मीडिया के दिग्गज प्लेटफॉर्म्स (ट्विटर, मेटा, इंस्टाग्राम) और भारत सरकार के बीच लगातार तनातनी देखने को मिली है। वामपंथी और लिबरल इकोसिस्टम ने इन प्लेटफॉर्म्स का इस्तेमाल करके राष्ट्रवादी आवाजों को दबाने और अपनी सहूलियत का नैरेटिव गढ़ने का प्रयास किया, जिसके जवाब में समय-समय पर भारत सरकार ने राष्ट्रीय सुरक्षा और कानून-व्यवस्था के तहत कड़े कदम उठाए। विभिन्न सीईओ के कार्यकाल के दौरान इस पूरे घटनाक्रम और सरकार द्वारा दिए गए निर्देशों का तिथिवार विवरण इस प्रकार है:
डिक कॉस्टोलो कार्यकाल (2014 – जून 2015) (ट्विटर)
वामपंथी/लिबरल आरोप: इस दौर में प्लेटफॉर्म पर एल्गोरिदम की भूमिका सीमित थी और पोस्ट समयक्रम में दिखते थे। 2014 चुनाव के बाद दक्षिणपंथी खातों की बढ़ती सक्रियता देखकर लिबरल मीडिया ने “राइट-विंग प्रोपेगैंडा” बढ़ने की चिंता जताई थी।
अगस्त 2014: असम हिंसा और पूर्वोत्तर के लोगों के खिलाफ फैलाई जा रही अफवाहों व भड़काऊ पोस्ट्स को हटाने के लिए भारत सरकार ने निर्देश दिए, जिसके तहत दर्जनों फर्जी और भड़काऊ हैंडल ब्लॉक किए गए।
जैक डोर्सी कार्यकाल (अक्टूबर 2015 – नवंबर 2021) (ट्विटर)
वामपंथी/लिबरल आरोप: डोर्सी के कार्यकाल में ट्विटर पर वामपंथी पूर्वाग्रह के सबसे कड़े आरोप लगे। 2018 में भारत दौरे पर डोर्सी की “Smash Brahminical Patriarchy” पोस्टर के साथ फोटो पर भारी विवाद हुआ। इसके अलावा, दक्षिणपंथी ट्रेंड्स को ‘शैडोबैन’ करने और डोनाल्ड ट्रंप का अकाउंट बैन करने को लेकर भी आलोचना हुई।
फरवरी 2021: किसान आंदोलन के दौरान केंद्र सरकार ने हिंसा भड़काने और भ्रामक हैशटैग चलाने वाले 250 से अधिक ट्विटर हैंडल को IT एक्ट की धारा 69A के तहत हटाने का आदेश दिया। ट्विटर ने पहले इन्हें ब्लॉक किया, फिर अनब्लॉक कर दिया, जिससे सरकार और प्लेटफॉर्म में तनातनी बढ़ी।
मई 2021: भाजपा नेताओं के कथित ‘कांग्रेस टूलकिट’ वाले ट्वीट्स को ट्विटर ने “Manipulated Media” का टैग दिया, जिसके बाद दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने ट्विटर इंडिया के दफ्तरों पर प्रक्रियात्मक जांच के तहत दौरा किया।
फरवरी 2021: भारत सरकार ने नए मध्यस्थ दिशानिर्देश (IT Rules 2021) लागू किए, जिसका अनुपालन न करने पर ट्विटर की लीगल इम्युनिटी खत्म होने की चेतावनी दी गई।
पराग अग्रवाल कार्यकाल (नवंबर 2021 – अक्टूबर 2022) (ट्विटर)
वामपंथी/लिबरल आरोप: पराग अग्रवाल और विजया गाड्डे (पॉलिसी हेड) के नेतृत्व में मॉडरेशन टीम पर दक्षिणपंथी आवाजों को चुनिंदा रूप से सेंसर करने और डोमिनेंट लिबरल विचारों को प्राथमिकता देने के आरोप बने रहे।
जुलाई 2022: ट्विटर ने भारत सरकार के कई अकाउंट-ब्लॉकिंग ऑर्डर्स के खिलाफ कर्नाटक उच्च न्यायालय में याचिका दायर की और इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हनन बताया।
अगस्त-सितंबर 2022: सरकार के कड़े कानूनी रुख के बाद ट्विटर ने भारत में राष्ट्रीय सुरक्षा और कानून व्यवस्था से जुड़े कई खातों को ‘जिओ-ब्लॉक’ (Geo-block) किया।
एलन मस्क कार्यकाल (अक्टूबर 2022 – वर्तमान) (ट्विटर / X)
वामपंथी/लिबरल आरोप: एलन मस्क ने कमान संभालते ही ‘Twitter Files’ लीक कीं, जिससे यह साबित हुआ कि पिछला प्रबंधन राजनीतिक पूर्वाग्रहों के आधार पर कंटेंट सेंसर करता था। मस्क ने खुद को “Free Speech Absolutist” घोषित किया।
जनवरी 2023: पीएम मोदी और 2002 गुजरात दंगों पर बनी बीबीसी की विवादित डॉक्यूमेंट्री “India: The Modi Question” के लिंक और ट्वीट्स को सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के आदेश पर प्लेटफॉर्म से ब्लॉक किया गया।
जून 2023: पूर्व CEO जैक डोर्सी ने आरोप लगाया कि भारत सरकार ने किसान आंदोलन के समय ट्विटर बंद करने की धमकी दी थी, जिसे सरकार ने सिरे से खारिज करते हुए केवल कानून पालन का निर्देश बताया।
फरवरी 2024: किसान आंदोलन 2.0 के दौरान गृह मंत्रालय के निर्देशों पर सुरक्षा कारणों से सैकड़ों अकाउंट्स और लिंक्स पर भारत में रोक लगाई गई।
मार्क जुकरबर्ग (मेटा) व एडम मोसेरी (इंस्टाग्राम) कार्यकाल (2014 – वर्तमान) (मेटा एवं इंस्टाग्राम)
वामपंथी/लिबरल आरोप: फेसबुक व इंस्टाग्राम के ‘फैक्ट-चेकिंग’ तंत्र पर दक्षिणपंथी और राष्ट्रवादी पोस्ट्स को सेंसर/डाउनग्रैड करने के आरोप लगे। दूसरी ओर, 2020 की WSJ रिपोर्ट में यह आरोप भी लगा कि फेसबुक की भारत नीति टीम ने सत्तारूढ़ दल के नेताओं की नफरती बयानबाजी पर ढिलाई बरती, जिससे दोनों पक्षों में विवाद रहा।
2016: ट्राई (TRAI) और भारत सरकार ने फेसबुक की ‘Free Basics’ योजना को नेट न्यूट्रैलिटी के नियमों का उल्लंघन मानते हुए भारत में प्रतिबंधित कर दिया।
अप्रैल-मई 2021: कोविड की दूसरी लहर के दौरान ऑक्सीजन संकट और सरकार की आलोचना वाले कुछ हैशटैग्स (जैसे #ResignModi) अस्थायी रूप से ब्लॉक हुए, जिसे बाद में फेसबुक ने “तकनीकी खराबी” बताया।
2021-2023: सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के आदेशों के तहत साइबर सुरक्षा, अलगाववादी (खालिस्तानी) और राष्ट्रविरोधी गतिविधियों से जुड़े सैकड़ों फेसबुक/इंस्टाग्राम पेजों को समय-समय पर बैन किया गया।
फरवरी 2026: भारत सरकार के अद्यतन IT नियमों के तहत सभी सोशल मीडिया कंपनियों को भ्रामक और गैर-कानूनी सामग्री 3 घंटे के भीतर हटाने के सख्त निर्देश दिए गए।









