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कांग्रेस के 60 साल में 30, तो मोदी सरकार के 12 साल में 15 धरोहर स्थल यूनेस्को सूची में शामिल

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देश की सांस्कृतिक और ऐतिहासिक धरोहरों को वैश्विक मंच पर पहचान दिलाने की दिशा में पिछले 12 सालों में एक अभूतपूर्व क्रांति देखने को मिली है। जहां कांग्रेस के लगभग छह दशकों के शासनकाल में देश के महज 30 स्थल ही यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में जगह बना पाए थे, वहीं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में बीते 12 वर्षों के कार्यकाल में ही रिकॉर्ड 15 नए स्थलों को इसमें शामिल करा दिया गया है। यह आंकड़ा साफ दर्शाता है कि भारतीय संस्कृति, आस्था के केंद्रों और ऐतिहासिक गौरव को पुनर्स्थापित करने और उन्हें दुनिया के सामने गर्व से प्रस्तुत करने की मोदी सरकार की इच्छाशक्ति कितनी मजबूत और असरदार रही है।

इसी निरंतर प्रयासों और दूरदर्शी दृष्टिकोण का ताजा उदाहरण भगवान बुद्ध की पावन उपदेश स्थली ‘सारनाथ’ है, जिसे 26 जुलाई 2026 को यूनेस्को की इस प्रतिष्ठित सूची में शामिल किया गया है। सारनाथ के जुड़ने के साथ ही भारत के कुल विश्व धरोहर स्थलों की संख्या बढ़कर अब 45 हो गई है। मोदी सरकार के कार्यकाल में न केवल पूर्वोत्तर के ऐतिहासिक ‘मोइदाम्स’, मराठा सैन्य परिदृश्य और होयसल मंदिरों जैसी उपेक्षित धरोहरों को वैश्विक पहचान मिली, बल्कि भारत की सांस्कृतिक विरासत को वैश्विक स्तर पर संरक्षित करने और देश को विश्व गुरु के रूप में स्थापित करने की दिशा में नए आयाम भी स्थापित हुए हैं।

वर्ष 2014 के पहले तक यूनेस्को की सूची में भारत के 30 विरासत स्थल थे जबकि पीएम मोदी के देश की बागडोर संभालने के बाद 15 विरासत स्थलों को इस सूची में शामिल किया गया है। उन पर एक नजर-

31. ग्रेट हिमालयन राष्ट्रीय उद्यान

ग्रेट हिमालयन राष्ट्रीय उद्यान हिमाचल प्रदेश के कुल्लू जिले में स्थित भारत का एक प्रमुख राष्ट्रीय उद्यान और विश्व विरासत स्थल है इसे वर्ष 1999 में राष्ट्रीय उद्यान घोषित किया गया था। यह राष्ट्रीय उद्यान अपने जैव विविधता के लिए प्रसिद्ध है क्योंकि इस राष्ट्रीय उद्यान में 800 प्रकार के पौधे, लगभग 25 प्रकार के वन और 185 से अधिक पक्षियों की प्रजातियां पाई जाती है इस राष्ट्रीय उद्यान को वर्ष 2014 में यूनेस्को द्वारा विश्व धरोहर स्थल घोषित किया गया।

32. रानी की वाव

रानी की वाव गुजरात राज्य के पाटण में स्थित एक प्रसिद्ध बावड़ी अर्थात सीढ़ीदार कुऑं है। इस बावड़ी का निर्माण सन् 1063 में सोलंकी शासक भीमदेव प्रथम की पत्नी रानी उदयामती ने राजा भीमदेव प्रथम की याद करवाया था। यह वाव 20 मीटर चौड़ा 64 मीटर लंबा और 27 मीटर गहरा है। यह वाव सोलंकी शासनकालीन वास्तु कला का सुप्रसिद्ध उदाहरण है क्योंकि यह भारत का एक अनोखा वाव है। 22 जून 2014 को इस बावड़ी को यूनेस्को विश्व विरासत स्थल घोषित किया गया।

33. नालंदा विश्वविद्यालय – बिहार

नालंदा विश्वविद्यालय भारत के बिहार राज्य के राजगीर में स्थित है। यह विश्वविद्यालय प्राचीन भारत में उच्च शिक्षा का सर्वाधिक विख्यात केंद्र था जिसका निर्माण महान गुप्त शासक कुमारगुप्त प्रथम ने करवाया था। यह एक बौद्ध विश्वविद्यालय था जिसमें बौद्ध धर्म के भग्नावशेष मिले हैं लेकिन इस विश्वविद्यालय में बौद्ध धर्म के साथ ही दूसरे अनेक धर्मों के छात्र भी पढ़ते थे। इस विश्वविद्यालय की खोज अलेक्जेंडर कनिंघम के द्वारा किया गया तथा इसे वर्ष 2016 में यूनेस्को की विश्व विरासत सूची में शामिल किया गया।

34. कंचनजंगा राष्ट्रीय उद्यान – सिक्किम

कंचनजंगा राष्ट्रीय उद्यान भारत के सिक्किम राज्य में स्थित एक प्रमुख राष्ट्रीय उद्यानों और वन्यजीव अभयारण्य है। इस राष्ट्रीय उद्यान की स्थापना वर्ष 1977 में की गई थी इस राष्ट्रीय उद्यान का संपूर्ण क्षेत्रफल 1784 वर्ग किलोमीटर है जो सिक्किम राज्य के कुल क्षेत्रफल का 25.14 है। इस राष्ट्रीय उद्यान में हिम तेंदुए, काले भालू, कस्तूरी मृग, जंगली गधा और लाल पांडा निवास करते हैं। वर्ष 2016 में इस राष्ट्रीय उद्यान को यूनेस्को की विश्व विरासत सूची में शामिल किया गया।

35. ली. कार्बुजिए के वास्तुशिल्प

चंडीगढ़ में स्थित ली कार्बुजिए के वास्तुशिल्प कार्य को आधुनिक आंदोलन के लिए उत्कृष्ट योगदान के हिस्से के रूप में वर्ष 2016 में UNESCO ने इसे विश्व धरोहर स्थल के रूप में मान्यता दी। सात अलग-अलग देशों के 17 स्थलों में ली कार्बुजिए के रचनात्मक एवं वास्तुशिल्प कार्य मौजूद हैं। यूनेस्को ने इन सभी स्थलों को विश्व धरोहर स्थलों के रूप में मान्यता दी है।

36. अहमदाबाद के ऐतिहासिक शहर

अहमदाबाद के ऐतिहासिक शहर जिसे पुराना अहमदाबाद भी कहा जाता है, यह शहर अहमदाबाद का ही एक हिस्सा है जो भारत के गुजरात राज्य में स्थित है। इस शहर की स्थापना की 11वीं सदी में राजा आशा भील के द्वारा आशावल नाम से की गई थी तब से यह गुजरात सल्तनत का महत्वपूर्ण राजनैतिक और वाणिज्य केंद्र बना रहा। वर्तमान समय में भी यह ऐतिहासिक शहर आधुनिक अहमदाबाद शहर का हृदय है। इसे वर्ष 2017 में यूनेस्को की विश्व विरासत सूची में शामिल किया गया।

37. मुंबई के विक्टोरियन और आर्ट डेको एनसेंबल

महाराष्ट्र राज्य के मुंबई शहर के फोर्ट इलाके में स्थित विक्टोरियन और आर्ट डेको एनसेंबल का निर्माण 19वीं सदी में विक्टोरियन नियो गोथिक शैली में किया गया था जो विक्टोरियन नियो गोथिक सार्वजनिक भवनों एवं आर्ट डेको भवनो का संग्रह है। इसे वर्ष 2018 में यूनेस्को के विश्व धरोहर स्थलों की सूची में शामिल किया गया।

38. गुलाबी शहर जयपुर

जयपुर भारत के राजस्थान राज्य का सबसे बड़ा शहर है। इस नगर की स्थापना महाराजा जयसिंह द्वितीय के द्वारा की गई थी। यह शहर अपनी समृद्ध भवन निर्माण-परंपरा, सरस, संस्कृति और ऐतिहासिक महत्व के लिए भारत के साथ-साथ संपूर्ण विश्व में प्रसिद्ध है। इस शहर में महलों और पुराने घरों में लगे गुलाबी धौलपुरी पत्थरों के कारण इस शहर को भारत का पिंक सिटी या गुलाबी शहर कहा जाता है। इस शहर को जुलाई 2019 में यूनेस्को द्वारा विश्व धरोहर स्थल घोषित किया गया।

39. रामप्पा मंदिर – तेलंगाना

रामप्पा मंदिर या रुद्रेश्वर मंदिर भारत दक्षिण भारत के तेलंगाना राज्य के मुलुंड जिले के पालमपेट गांव में स्थित एक प्रसिद्ध हिंदू मंदिर है। यह मंदिर भगवान शिव को समर्पित है। इस मंदिर में स्थित शिलालेख के अनुसार इस मंदिर का निर्माण सन् 1213 ईसवी में काकतीय साम्राज्य शासक गणपति देव के सेनापति रेचारला रुद्रदेव ने करवाया था। यूनेस्को ने वर्ष 2021 में इस मंदिर को अपनी विश्व धरोहर स्थलों की सूची में जोड़ा।

40. धोलावीरा, गुजरात 

धोलावीरा गुजरात राज्य के कच्छ जिले में स्थित सिंधु घाटी सभ्यता का एक प्रसिद्ध पुरास्थल एवं विश्व धरोहर स्थल है। यह स्थल अब तक ज्ञात सिंधु घाटी सभ्यता के सबसे बड़े स्थलों में से एक है। यहां सिंधु घाटी सभ्यता से संबंधित कई अवशेष और स्थल पाए गए हैं। धोलावीरा हड़प्पा संस्कृति का नगर है और दक्षिण एशिया में तीसरी से मध्य-दूसरी सहस्राब्दी ईसा पूर्व काल की चंद सबसे अच्छे से संरक्षित प्राचीन शहरी बस्तियों में से है। अब तक खोजे गए 1,000 से अधिक हड़प्पा स्थलों में छठा सबसे बड़ा और 1,500 से अधिक वर्षों तक मौजूद रहा धोलावीरा न सिर्फ मानव जाति की इस प्रारंभिक सभ्यता के उत्थान और पतन की पूरी यात्रा का गवाह है बल्कि शहरी नियोजन, निर्माण तकनीक, जल प्रबंधन, सामाजिक शासन और विकास, कला, निर्माण, व्यापार और आस्था प्रणाली के संदर्भ में भी अपनी बहुमुखी उपलब्धियों को प्रदर्शित करता है। अपनी अत्यंत समृद्ध कलाकृतियों के साथ, धोलावीरा की बड़ी अच्छी तरह से संरक्षित ये शहरी बस्ती, अपनी बेहद खास विशेषताओं वाले इस क्षेत्रीय केंद्र की एक जीवंत तस्वीर दर्शाती है जो समग्र रूप से हड़प्पा सभ्यता के मौजूदा ज्ञान में भी महत्वपूर्ण योगदान देती है।

41. शांतिनिकेतन, पश्चिम बंगाल  

पश्चिम बंगाल के बीरभूम जिले में स्थित शांतिनिकेतन को यूनेस्को की वर्ल्ड हेरिटेज लिस्ट में शामिल किया गया है। शांतिनिकेतन की शुरुआत रविंद्रनाथ टैगोर के पिता देवेंद्रनाथ टैगोर ने 1863 में एक आश्रम के तौर पर की थी। 1901 में रविंद्रनाथ टैगोर ने इसे प्राचीन भारत के गुरुकुल सिस्टम पर आधारित रेजिडेंशियल स्कूल और आर्ट सेंटर में बदला। टैगोर ने 1921 में यहां विश्व भारती की स्थापना की, जिसे 1951 में सेंट्रल यूनिवर्सिटी और राष्ट्रीय महत्व का संस्थान घोषित किया गया। रविंद्रनाथ टैगोर ने अपने जीवन का लंबा समय यहां बिताया था। आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया ने बताया कि शांतिनिकेतन वर्ल्ड हेरिटेज लिस्ट में शामिल होने वाली भारत की 41वीं धरोहर है। लंबे समय से इसे हेरिटेज लिस्ट में शामिल करने की मांग की जा रही थी।

42. होयसल मंदिर, कर्नाटक   

कर्नाटक में ‘होयसल के पवित्र मंदिर समूह’ बेलूर, हलेबिड और सोमनाथपुरा के होयसल मंदिरों को यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल किया गया है। वर्ल्ड हेरिटेज लिस्ट में शामिल होने वाली यह भारत की 42वीं धरोहर है। होयसल मंदिर 12वीं-13वीं शताब्दी में बनाए गए थे। कला एवं साहित्य के संरक्षक माने जाते होयसल राजवंश की यह राजधानी थी। तीन होयसला मंदिर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) के तहत संरक्षित स्मारक हैं। एएसआई इसका संरक्षण और रखरखाव करता है। यूनेस्को की आधिकारिक वेबसाइट में कहा गया है कि मंदिरों की विशेषता हाइपर-रियल मूर्तियां हैं। साथ ही इनके पत्थर पर नक्काशी की गई है जो संपूर्ण वास्तुशिल्प सतह को कवर करती है। होयसला के पवित्र स्मारक 2014 से यूनेस्को की संभावित सूची में थे। इसे जनवरी 2022 में 2022-23 के लिए भारत की ओर से विश्व धरोहर स्थल में शामिल करने के लिए नामांकित किया गया था।

43. मोइदम – अहोम राजवंश का टीला-समाधि तंत्र, असम

असम के चराईदेव में स्थित ‘मोइदम’ अहोम राजवंश का मध्यकालीन टीला-समाधि तंत्र है, जिसे अहोम राजवंश का पिरामिड भी कहा जाता है। 600 वर्षों तक शासन करने वाले अहोम राजाओं और उनके राजवंश के सदस्यों के अंत्येष्टि अवशेष इन मोंड्स (टीलों) में संरक्षित हैं। यह असम की समृद्ध संस्कृति, अनोखी वास्तुकला और अहोम साम्राज्य के स्वर्णिम इतिहास का प्रतीक है। पूर्वोत्तर भारत से सांस्कृतिक श्रेणी में यह पहला स्थल है जिसे यूनेस्को द्वारा मान्यता मिली है। इसे वर्ष 2024 में यूनेस्को की विश्व विरासत सूची में शामिल किया गया।

44. मराठा सैन्य परिदृश्य, महाराष्ट्र एवं तमिलनाडु

मराठा सैन्य परिदृश्य (Maratha Military Landscapes) 17वीं और 19वीं शताब्दी के बीच मराठा शासकों द्वारा विकसित की गई रणनीतिक और असाधारण सैन्य वास्तुकला को दर्शाता है। इसमें महाराष्ट्र और तमिलनाडु में फैले 12 प्रमुख किले शामिल हैं (जैसे शिवनेरी, रायगढ़, राजगढ़, प्रतापगढ़, सिंधुदुर्ग आदि), जिन्होंने छत्रपति शिवाजी महाराज और उनके उत्तराधिकारियों के शासन में मराठा साम्राज्य की सुरक्षा और विस्तार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। इसे वर्ष 2024 में यूनेस्को की विश्व धरोहर स्थल घोषित किया गया।

45. सारनाथ, उत्तर प्रदेश

उत्तर प्रदेश के वाराणसी के निकट स्थित सारनाथ भारत का एक अत्यंत पवित्र एवं ऐतिहासिक पुरातात्विक स्थल है। यह वही पावन स्थान है जहाँ ज्ञान प्राप्ति के पश्चात भगवान बुद्ध ने अपने पहले पांच शिष्यों को अपना पहला उपदेश दिया था, जिसे बौद्ध धर्म में ‘धर्मचक्रप्रवर्तन’ कहा जाता है। यहाँ प्रसिद्ध धमेख स्तूप, चौखंडी स्तूप और अशोक स्तंभ के अवशेष स्थित हैं। सम्राट अशोक द्वारा निर्मित इसी अशोक स्तंभ का ‘सिंह शीर्ष’ (Lion Capital) भारत का राष्ट्रीय प्रतीक (National Emblem) है। बौद्ध धर्म के प्रमुख तीर्थ स्थलों में से एक इस पवित्र स्थल को वर्ष 2026 में यूनेस्को की विश्व विरासत सूची में शामिल किया गया।

भारत के सभी 42 विश्व धरोहर स्थलों की सूचीः

क्र. विश्व धरोहर स्थल संबंधित राज्य/क्षेत्र घोषित वर्ष
1. आगरा का किला उत्तर प्रदेश 1983
2. ताजमहल उत्तर प्रदेश 1983
3. अजंता की गुफाएं महाराष्ट्र 1983
4. एलोरा की गुफाएं महाराष्ट्र 1983
5. कोणार्क सूर्य मंदिरम उड़ीसा 1984
6. महाबलीपुरम के स्मारक तमिलनाडु 1984
7. काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान असम 1985
8. मानस राष्ट्रीय उद्यान असम 1985
9. केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान राजस्थान 1985
10. हम्पी के स्मारक समूह कर्नाटक 1986
11. खजुराहो स्मारक स्थल मध्यप्रदेश 1986
12. फतेहपुर सीकरी उत्तर प्रदेश 1986
13. गोवा के गिरिजाघर एवं कॉन्वेंट गोवा 1986
14. एलीफेंटा की गुफाएं महाराष्ट्र 1987
15. सुंदरवन राष्ट्रीय उद्यान पश्चिम बंगाल 1987
16. पट्टादकल के स्मारक समूह कर्नाटक 1987
17. चोल मंदिर तमिलनाडु 1987, 2004
18. नंदा देवी और फूलों की घाटी राष्ट्रीय उद्यान उत्तराखंड 1988, 2005
19. सॉंची के बौद्ध स्तूप मध्यप्रदेश 1989
20. हुमायूं का मकबरा दिल्ली 1993
21. कुतुबमीनार एवं स्मारक दिल्ली 1993
22. भारतीय पर्वतीय रेलवे, दार्जिलिंग, विभिन्न भारतीय राज्य 1999, 2005, 2008
23. बोधगया का महाबोधि मंदिर बिहार 2002
24. भीमबेटका की गुफाएं मध्यप्रदेश 2003
25. छत्रपति शिवाजी टर्मिनस महाराष्ट्र 2004
26. चंपानेर – पावागढ़ पुरातत्व उद्यान गुजरात 2004
27. लाल किला दिल्ली 2007
28. जंतर – मंतर, जयपुर राजस्थान 2010
29. पश्चिमी घाट महाराष्ट्र, गोवा, तमिलनाडु, कर्नाटक और केरल 2012
30. राजस्थान के पहाड़ी दुर्ग राजस्थान 2013
31. ग्रेट हिमालयन राष्ट्रीय उद्यान हिमालय प्रदेश 2014
32. रानी की वाव गुजरात 2014
33. नालंदा विश्वविद्यालय बिहार 2016
34. कंचनजंगा राष्ट्रीय उद्यान सिक्किम 2016
35. ली. कार्बुजिए के वास्तुशिल्प चंडीगढ़ 2016
36. अहमदाबाद के एतेहासिक शहर गुजरात 2017
37. मुंबई के विक्टोरियन ओर आर्ट डेको एनसेंबल महाराष्ट्र 2018
38. गुलाबी शहर जयपुर राजस्थान 2019
39. रामप्पा मंदिर तेलंगाना 2021
40. धोलावीरा गुजरात 2021
41. शांतिनिकेतन, पश्चिम बंगाल 2023
42. होयसल मंदिर, कर्नाटक, 2023
43. मोइदम, असम, 2024
44. मराठा सैन्य परिदृश्य, महाराष्ट्र एवं तमिलनाडु, 2024
45. सारनाथ, उत्तर प्रदेश, 2026

इन उपलब्धियों के अलावा वर्ष 2022 में भारत के तीन नए सांस्कृतिक स्थलों को यूनेस्को के विश्व धरोहर स्थलों की संभावित सूची में शामिल किया गया। इनमें मोढेरा सूर्य मंदिर, वडनगर और उनाकोटी की मूर्तियां शामिल हैं। इन पर एक नजर-

1. विश्व प्रसिद्ध है गुजरात के मोढेरा का सूर्य मंदिर

यह सूर्य मंदिर प्रधानमंत्री मोदी के गृह राज्य गुजरात में स्थित है, यह बहुत प्राचीन मंदिर हैं, इसका एतिहासिक महत्व भी है। मोढेरा में स्थित सूर्य मंदिर का निर्माण 1026 ई. में सूर्यवंशी सोलंकी राजा भीमदेव प्रथम द्वारा करवाया गया था। यह मंदिर ग्याहरवीं शताब्दी का है। इस मंदिर का निर्माण इस तरह से किया गया है कि सूर्योदय से लेकर सूर्यास्त के समय तक इस पर सूर्य की किरणें पड़ती हैं। यह एक पहाड़ी पर स्थित है। इस मंदिर के गर्भगृह की दीवारों पर बहुत सुंदर नक्काशी की गई है। इसकी दीवारों पर नक्काशी से पौराणिक कथाओं का चित्रण किया गया है। यह मंदिर तीन हिस्सों में विभाजित है। इस मंदिर में सूर्य कुंड, सभा मंडप और गूढ़ मंडप बना है, कुंड में जाने के लिए सीढ़ियों का निर्माण किया गया है। यह मंदिर विश्वप्रसिद्ध है, इस मंदिर में वास्तुकला का अद्भुत नमूना देखने को मिलता है। इसकी सबसे बड़ी खासियत है कि इसको बनाने में चूने का प्रयोग नहीं किया गया है। राजा भीमदेव के द्वारा इस मंदिर का निर्माण करवाया गया था जिसमें सभामंडप और गर्भगृह आता है। सभा मंडप के आगे की ओर को एक कुंड बना हुआ है जिस सूर्यकुंड या रामकुंड कहा जाता है। यह एक प्रसिद्ध पर्यटक स्थल भी है। इसकी देख-रेख अब पुरातत्व विभाग के द्वारा की जाती है।

2. करीब 2500 साल पुराना है गुजरात का ऐतिहासिक वडनगर शहर

वडनगर गुजरात का प्राचीन शहर है। इसका इतिहास करीब 2500 साल पुराना है। पुरातत्ववेत्ताओं के मुताबिक, यहां हजारों साल पहले खेती होती थी। खुदाई के दौरान यहां से हजारों साल पहले के मिट्टी के बर्तन, गहने और तरह-तरह के औजार-हथियार भी मिल चुके हैं। कई पुरातत्ववेत्ताओं का मानना है कि यह हड़प्पा सभ्यता के पुरातत्व स्थलों में से एक है। हड़प्पा सभ्यता भारत की सबसे प्राचीनतम सभ्यता मानी जाती है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के गृहनगर वडनगर में खुदाई में यहां से बौद्ध स्तूप मिले थे। खनन के दौरान अब यहां से करीब 2 हजार साल पुराने दो बौद्ध कक्ष और चार दीवारें मिली हैं। ये दीवारें करीब 2 मीटर ऊंची और 1 मीटर चौड़ी हैं। आसपास के हालात देखकर पुरातत्व विभाग के अधिकारियों ने यहां बौद्ध विहार होना का अनुमान लगाया है। महेसाणा जिले के वडनगर में चल रही खुदाई के दौरान हाल ही में तीसरी व चौथी सदी के बौद्ध स्तूप के अवशेष और सातवीं-आठवीं सदी का एक मानव कंकाल भी मिला था। यह मानव कंकाल सातवीं-आठवीं सदी का बताया गया है। खुदाई के दौरान तीसरी व चौथी सदी के समय का सांकेतिक बौद्ध स्तूप भी मिला था।

3. त्रिपुरा के रघुनंदन हिल्स में उनाकोटी की मूर्तियां काफी मशहूर

पूर्वोत्तर के त्रिपुरा राज्य में उनाकोटी की मूर्तियां काफी मशहूर हैं। यह मूर्तियां त्रिपुरा के रघुनंदन हिल्स के एक पहाड़ के चट्टानों को काटकर बनाई गईं हैं। सबसे खास बात यह है कि यहां एक, दो या दस मूर्तियां नहीं हैं बल्कि इनकी संख्या 99 लाख 99 हजार 999 मूर्तियां हैं। बंगाली भाषा में उनाकोटी का मतलब ही होता है एक करोड़ से एक कम। रिसर्चर्स की मानें तो इन मूर्तियों को करीब 8वीं या 9वीं शताब्दी में बनाया गया होगा लेकिन इसे किसने बनाया इस बात की कोई ठोस जानकारी नहीं हैं। हालांकि कुछ मूर्तियां इसमें से खराब भी हो गई हैं। उनाकोटी में ज्यादातर मूर्तियां हिंदू देवी-देवताओं की हैं। इनमें भगवान गणेश, भगवान शिव और दूसरे देवताओं की मूर्तियां मौजूद हैं। फिलहाल इस जगह के संरक्षण की जिम्मेदारी आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया के पास है। इसके बाद से यहां कि हालत में कुछ सुधार देखने को मिला है। यहां मौजूद कई मूर्तियां इतनी विशाल हैं कि इनके ऊपर से झरने बहते हैं। यहां देश के कई हिस्से से लोग घूमने के लिए भी आते हैं। गौरतलब है कि कुछ खास मूर्तियों के पास आमजनों को जाने की अनुमति नहीं है। यहां नंदी बैल भी है। यह नंदी बैल भगवान शिव के नजदीक है। इन नंदी बैलों की संख्या तीन है। अप्रैल के महीने में इस जगह पर एक बहुत बड़ा मेला भी लगता है जिसे अशोकाष्टमी का मेला कहा जाता है। उनाकोटी में बनी भगवान शिव की मूर्ति को उनाकोटिश्वरा काल भैरवा नाम से पुकारा जाता है जो करीब 30 फीट के आस-पास ऊंची है। भारत सरकार अब इस जगह को वर्ल्ड हेरिटेज साइट का टैग दिलाने की तैयारी कर रही है क्योंकि सरकार का कहना है कि यह एक अनोखी सांस्कृतिक धरोहर है।

2025- यूनेस्को ने दिवाली को घोषित किया अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर
भारत के लिए यह एक ऐतिहासिक और बेहद खुशी का पल है। दुनिया भर में प्रकाश और उल्लास फैलाने वाले त्योहार दिवाली को यूनेस्को ने 10 दिसंबर 2025 को अपनी प्रतिष्ठित अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर (Intangible Cultural Heritage) की लिस्ट में शामिल कर लिया है। यह न सिर्फ दीपावली के लिए, बल्कि भारत की समग्र सांस्कृतिक पहचान के लिए एक बहुत बड़ी उपलब्धि है। दिवाली को विश्व धरोहर सूची में शामिल किए जाने से भारत की पारंपरिक कला, रीतियों, सामूहिक उत्सव और सामाजिक जुड़ाव को और मजबूती मिलेगी। दीयों की रोशनी, रंगोली, पूजा-अर्चना, परिवारों का मिलन—इन सबमें समाई भारतीयता को अब दुनिया भर में एक खास पहचान मिल गई है। देश में भी इसे लेकर जबरदस्त उत्साह है। लोग इसे भारत की सांस्कृतिक कूटनीति की एक बड़ी सफलता मान रहे हैं। विदेशों में बसे भारतीयों के लिए भी यह गर्व का बड़ा मौका बन गया है, क्योंकि उनका प्रिय त्योहार अब आधिकारिक रूप से वैश्विक धरोहर बन चुका है।

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