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हमारी गौरवशाली सेना की भी विरोधी पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री, जानिए कब-कब उठाए सवाल

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पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री के बयानों को लेकर समय-समय पर राष्ट्रीय राजनीति में तीखी बहस छिड़ती रही है। खासतौर पर जब मनगढ़ंत और झूठ आरोपों का संबंध हमारी गौरवशाली भारतीय सेना, राष्ट्रीय सुरक्षा तंत्र या संवेदनशील सुरक्षा मुद्दों से जुड़ता है, तब यह बहस और भी गंभीर हो जाती है। लोकतंत्र में सवाल उठाना और जवाबदेही मांगना स्वाभाविक है, लेकिन जब आरोपों की भाषा और संदर्भ देश की बहादुर सेना और उसकी विश्वसनीयता पर प्रभाव डालने लगें, तब यह विमर्श केवल राजनीतिक नहीं रह जाता। यह राष्ट्रीय मनोबल और संस्थागत भरोसे को डिगाने वाला बन जाता है। एक तरह से यह राष्ट्रद्रोह की सोच का शुरुआती चरण ही है। हाल के वर्षों में उनके कई बयान ऐसे रहे हैं, जिनमें उन्होंने सेना की कार्यशैली, केंद्र सरकार की सुरक्षा नीति और यहां तक कि राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार की भूमिका पर भी सवाल उठाए हैं।मनगढ़ंत आलोचना-आरोपों से राजनीतिक हित साधने की चेष्टा
हमारे लोकतंत्र की खूबसूरती यही है कि यहां सवाल पूछे जा सकते हैं। लेकिन सवाल पूछने और आरोप लगाने में फर्क होता है। जब कोई वरिष्ठ संवैधानिक पद पर बैठा व्यक्ति सेना जैसी संस्था पर टिप्पणी करता है, तो उसका प्रभाव सामान्य राजनीतिक बयान से कहीं अधिक व्यापक होता है। इससे न केवल देश के भीतर, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी संदेश जाता है। राजनीति में तीखे आरोप-प्रत्यारोप कोई नई बात नहीं हैं, लेकिन सेना और राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे मुद्दों पर एक न्यूनतम सहमति और संयम की अपेक्षा हमेशा रही है। जब यह सीमा टूटती है, तो राजनीतिक लाभ भले ही अल्पकालिक हो, लेकिन दीर्घकालिक नुकसान संस्थाओं के प्रति जनता के विश्वास को प्रभावित कर सकता है। ममता बनर्जी के बयान इसी संदर्भ में हैं, जिनमें आलोचना और आरोप के साथ-साथ राजनीतिक हित साधने की चेष्टा ज्यादा है।

आइए, अब जानते हैं कि बंगाल की मुख्यमंत्री ने सेना की विश्वसनीयता पर कब-कब सवालिया निशान लगाए….

सेना पर सवाल नंबर 5
20 जनवरी 2026
सेना की विश्वसनीयता पर सवाल: एक खतरनाक संकेत
जनवरी 2026 में ममता बनर्जी द्वारा भारतीय सेना के एक वरिष्ठ अधिकारी पर राजनीतिक प्रभाव में काम करने का आरोप लगाना एक गंभीर मामला बन गया। यह आरोप इतना संवेदनशील था कि सेना की पूर्वी कमान को राज्यपाल से हस्तक्षेप की मांग करनी पड़ी। सेना ने साफ तौर पर इन आरोपों को निराधार बताया। किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में सेना जैसी संस्था की निष्पक्षता और पेशेवर प्रतिबद्धता उसकी सबसे बड़ी ताकत होती है। ऐसे में बिना ठोस प्रमाण के इस तरह के आरोप न केवल संस्थागत गरिमा को ठेस पहुंचाते हैं, बल्कि जनता के बीच भ्रम भी पैदा करते हैं।

सेना पर सवाल नंबर 4
1 सितंबर 2025
सेना को कार्रवाई से पहले मुझसे सलाह लेनी चाहिए- मुख्यमंत्री
सितंबर 2025 में ममता बनर्जी का यह कहना कि सेना को किसी भी कार्रवाई से पहले राज्य सरकार या पुलिस से सलाह लेनी चाहिए, एक अलग तरह का विवाद खड़ा करता है। भारतीय संविधान में सेना की भूमिका और उसके संचालन का स्पष्ट ढांचा है, जिसमें केंद्र सरकार की प्रमुख भूमिका होती है। ऐसे में राज्य स्तर पर सैन्य निर्णयों को नियंत्रित करने की बात न केवल संवैधानिक व्यवस्था के विपरीत प्रतीत होती है, बल्कि इससे सुरक्षा तंत्र की कार्यक्षमता पर भी सवाल उठते हैं। उनका यह बचकाना बयान राजनीतिक असहमति से आगे जाकर संस्थागत सीमाओं को चुनौती देता नजर आता है।

सेना पर सवाल नंबर 3
6 जनवरी 2020
हमले को “फासीवादी सर्जिकल स्ट्राइक” बताया
आतंकी हमलों के खिलाफ सेना की सर्जिकल स्ट्राइक की तारीफ न करने वाली पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ने सर्जिकल स्ट्राइक को फासीवादी जरूर करार दिया। ममता का जनवरी 2020 में जेएनयू हिंसा के संदर्भ में “फासीवादी सर्जिकल स्ट्राइक” जैसे शब्दों का प्रयोग भी विवादों में रहा। “सर्जिकल स्ट्राइक” शब्द भारतीय सेना की एक विशेष सैन्य उपलब्धि से जुड़ा है, जिसे देश में गर्व के रूप में देखा जाता है। ऐसे में सीएम ने इसे जेएनयू की ओछी राजनीति में इस्तेमाल किया। इस शब्द का राजनीतिक संदर्भ में नकारात्मक अर्थों में इस्तेमाल करना वाकई लोगों को आपत्तिजनक लगा। इससे यह सवाल भी उठा कि क्या राजनीतिक विमर्श में सैन्य उपलब्धियों की भाषा का इस तरह उपयोग उचित है?

सेना पर सवाल नंबर 2
25 फरवरी 2019
सीएम तो जवानों के शवों पर राजनीति करने से बाज नहीं आई
2019 के पुलवामा अटैक के बाद देश शोक और आक्रोश के माहौल में था। एक और पुलवामा आतंकी हमले में हमारे इतने सारे जवान शहीद हो गए, वहीं दूसरी ओर तृणमूल कांग्रेस की सुप्रीमो जवानों के शवों पर राजनीति करने में लग गई। पश्चिम बंगाल की सीएम ने कहा कि केंद्र सरकार के पास खुफिया सूचना थी कि पुलवामा हमले जैसे आतंकी हमले हो सकते हैं लेकिन उसने कोई कदम नहीं उठाया। बीजेपी ने पलटवार करते हुए कहा कि वह अपने बयानों से “राजनीतिक बढ़त” लेना चाहती हैं। जिस समय पूरा देश एकजुटता दिखा रहा हो, उस समय ऐसे बयानों का राजनीतिक निहितार्थ साफ नजर आता है। इस तरह की टिप्पणियां संवेदनशील समय में राष्ट्रीय एकता के बजाय राजनीतिक ध्रुवीकरण को बढ़ावा देती हैं।सेना पर सवाल नंबर 1
19 फरवरी 2019
नेशनल सिक्योरिटी एडवाईजर डोवाल क्या कर रहे थे?
जम्मू-कश्मीर के पुलवामा में सीआरपीएफ के काफिले पर हुए आतंकी हमले में 40 जवान शहीद हो गए। पश्चिम बंगाल की सीएम ममता ने केंद्र सरकार और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोवाल पर सवाल उठा दिए। उसने पूछा कि सुरक्षा एजेंसियां, रक्षा मंत्रालय और नेशनल सिक्योरिटी एडवाईजर क्या कर रहे थे? तृणमूल अध्यक्ष ने राजनीतिक रोटियां सेंकते हुए इसे खुफिया विभाग की विफलता बता डाला। ममता ने केंद्र को तीन दिन का राष्ट्रीय शोक घोषित करने की सलाह जरूर दे डाली। उन्होंने कई मौकों पर केंद्र सरकार पर सेना के दुरुपयोग का आरोप भी लगाया है। चाहे वह कोलकाता में मंच हटाने का मामला हो या अन्य प्रशासनिक मुद्दे हों, इन बयानों ने केंद्र-राज्य संबंधों में तनाव को उजागर किया। हालांकि, इन आरोपों पर सेना और केंद्र की ओर से अक्सर स्पष्ट किया गया कि वे केवल निर्धारित प्रोटोकॉल के तहत कार्य कर रहे थे। ऐसे में यह बहस भी उठती है कि क्या प्रशासनिक विवादों में सेना को शामिल करना पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री की घटिया राजनीतिक रणनीति का हिस्सा बन गया है।

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