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पीएम मोदी के खिलाफ नैरेटिव बनाने वाली पत्रकार हेले अपने ही घर में घिरी, नार्वे के पूर्व मंत्री ने दिखाया आईना

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पीएम मोदी और भारत के खिलाफ नैरेटिव बनाने वाली नार्वे की पत्रकार हेले लिंग अपने ही घर में बुरी तरह घिर गई हैं। नार्वे के पूर्व मंत्री एरिक सोल्हेम ने एक ही ट्वीट में हेले को शानदार आईना दिखा दिया है। एरिक सोल्हेम ने इंडिया का पक्ष लेकर करारा जवाब दिया है। जिससे हेले की बोलती बंद हो गई है और उसके सारे नैगेटिव नेरेटिव के परखच्चे उड़ गए। हेले लिंग की पूरी पोल खोलते हुए एरिक सोल्हेम ने नॉर्वेजियन पत्रकार को बैबोन्स की किताब धर्म डेमोक्रेसी पढ़ने की सलाह दे डाली। उन्होंने अपने पोस्ट में लिखा- पत्रकार ने लोकतंत्र की एक ऐसी रैंकिंग का जिक्र किया, जिसमें भारत को दुनिया में 157वें स्थान पर रखा गया है, जो कई तानाशाही और बेहद संकटग्रस्त देशों से भी पीछे है। जब कोई रैंकिंग इतनी साफ तौर पर सामान्य बुद्धि के विपरीत हो, तो उन लोगों से ही तीखे सवाल क्यों न पूछे जाएं जिन्होंने यह रैंकिंग बनाई है, बजाय इसके कि नेताओं से इस बेतुकी बात पर टिप्पणी करने की मांग की जाए?

लिबरल गैंग का एजेंडा- भारत को किसी भी तरह बदनाम करो
दरअसल, भारत के खिलाफ झूठ, प्रोपेगेंडा और नैरेटिव गढ़ने की फैक्ट्री अब इतनी बेशर्म हो चुकी है कि उसे सच, तर्क और सामान्य बुद्धि तक से कोई मतलब नहीं रह गया। प्रधानमंत्री मोदी और भारत को बदनाम करने के लिए कुछ विदेशी पत्रकार और तथाकथित “लिबरल गैंग” वर्षों से एक तय एजेंडे पर काम कर रहे हैं। कभी प्रेस फ्रीडम इंडेक्स, कभी लोकतंत्र की रैंकिंग, कभी अल्पसंख्यकों के नाम पर डर फैलाने की कोशिश हर बार भारत को दुनिया के सामने एक असफल और दमनकारी राष्ट्र साबित करने की साजिश रची जाती है। लेकिन इस बार यह प्रोपेगेंडा उसी पश्चिमी दुनिया के भीतर बेनकाब हो गया, जहां से यह नैरेटिव पैदा किया जाता है। नॉर्वे की पत्रकार हेले लिंग ने भारत को लेकर वही घिसा-पिटा एजेंडा आगे बढ़ाने की कोशिश की, जिसमें भारत को लोकतंत्र के नाम पर कटघरे में खड़ा किया जाता है।

घटिया रेंकिंग से भारत की तुलना मानसिक दिवालियापन
इस नैगेटिव नेरेटिव का इस बार जवाब किसी भारतीय प्रवक्ता ने नहीं, बल्कि नॉर्वे के पूर्व मंत्री एरिक सोल्हेम ने दिया है। सोल्हेम ने जिस तीखे और तार्किक अंदाज में हेले लिंग की सोच को ध्वस्त किया। उसने पूरे नैरेटिव गैंग की हवा निकाल दी। उन्होंने साफ शब्दों में पूछा कि आखिर ऐसी रैंकिंग्स पर सवाल क्यों नहीं उठते, जो सामान्य बुद्धि का ही अपमान करती हैं? भारत जैसे जीवंत लोकतंत्र को दुनिया में 157वें स्थान पर रखना और उसे कई तानाशाही देशों से भी नीचे दिखाना आखिर किस मानसिक दिवालियापन का प्रमाण है? दरअसल समस्या यह है कि पश्चिम के कुछ मीडिया समूहों और तथाकथित मानवाधिकार ठेकेदारों को भारत का उभार पच नहीं रहा। उन्हें यह स्वीकार करने में तकलीफ होती है कि एक मजबूत, आत्मविश्वासी और निर्णायक नेतृत्व वाला भारत आज वैश्विक मंच पर पश्चिमी वर्चस्व को चुनौती दे रहा है। यही कारण है कि वे हर उस रिपोर्ट, हर उस इंडेक्स और हर उस “स्टडी” को हथियार बना देते हैं, जिससे भारत की छवि धूमिल की जा सके। लेकिन अब दुनिया बदल चुकी है। अब भारत चुपचाप अपमान सहने वाला देश नहीं रहा।

भारत का बचाव ही नहीं, पूरी मानसिकता पर प्रहार
एरिक सोल्हेम का बयान इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि उन्होंने सिर्फ भारत का बचाव नहीं किया, बल्कि उस पूरी मानसिकता पर प्रहार किया जो “रैंकिंग” और “इंडेक्स” के नाम पर राजनीतिक एजेंडा चलाती है। हेले लिंग को बैबोन्स की किताब *Democracy* पढ़ने की सलाह देकर सोल्हेम ने साफ कर दिया कि समस्या भारत में नहीं, बल्कि उन लोगों की समझ में है जो भारत को देखने के लिए पूर्वाग्रह का चश्मा पहन चुके हैं। यह वही गिरोह है जिसे भारत में चुनावों में करोड़ों लोगों की भागीदारी नहीं दिखती, डिजिटल लोकतंत्र नहीं दिखता, न्यायपालिका की स्वतंत्रता नहीं दिखती, लेकिन हर वक्त एक काल्पनिक संकट जरूर दिखता है।

हेले को साल्वाटोर की किताब धर्म डेमोक्रेसी पढ़ने की सलाह
दरअसल, भारत विरोधी यह गैंग अब अपने ही जाल में फंसने लगा है। दुनिया समझने लगी है कि भारत को बदनाम करने का यह खेल निष्पक्ष पत्रकारिता नहीं, बल्कि वैचारिक युद्ध है। और इस युद्ध में सबसे बड़ी हार उन लोगों की हो रही है, जो वर्षों तक खुद को “लोकतंत्र का ठेकेदार” समझते रहे। भारत आज मजबूती से खड़ा है, आत्मविश्वास से आगे बढ़ रहा है, और यही बात इन नैरेटिव कारोबारियों को सबसे ज्यादा चुभ रही है। नार्वे के पूर्व मंत्री एरिक सोल्हेम ने नॉर्वेजियन पत्रकार को बैबोन्स की किताब धर्म डेमोक्रेसी पढ़ने की सलाह दे डाली है। मैं साल्वाटोर बैबोन्स की किताब धर्म डेमोक्रेसी पढ़ने की सलाह देता हूं। यह किताब इन रैंकिंग्स की दोषपूर्ण कार्यप्रणाली का बड़े ही तर्कसंगत ढंग से खंडन करती है।अमेरिका में पत्रकार होना ज्यादा खतरनाक : एरिक सोल्हेम
एरिक सोल्हेम ने अपने पोस्ट में आगे लिखा कि एक रैंकिंग का हवाला दिया गया था, जिसमें दावा किया गया था कि भारत में पत्रकार होना बहुत खतरनाक है। असलियत यह है कि अमेरिका में पत्रकार होना ज्यादा खतरनाक है और दुनिया के ज्यादातर दूसरे देशों में तो यह कहीं ज्यादा खतरनाक है। नार्वे के पूर्व मंत्री ने अपने पोस्ट में आगे लिखा- भारत एकदम परफेक्ट नहीं है। जाहिर है, यहां घटनां होती रहती हैं। भारत की आबादी उत्तरी अमेरिका, दक्षिणी अमेरिका और यूरोप की कुल आबादी के बराबर है। लेकिन भारत, यूरोप या अमेरिका के मुकाबले कहीं ज्यादा शांतिपूर्ण है। यह बात वाकई काबिले-तारीफ है, खासकर भारत की जातीय, भाषाई और धार्मिक विविधता और विकास से जुड़ी कई चुनौतियों को देखते हुए यह और अहम हो जाती है।

पश्चिम बंगाल की मिसाल, भारतीय लोकतंत्र पूरी तरह से स्वदेशी
भारत ही एकमात्र ऐसा प्रमुख पूर्व ब्रिटिश उपनिवेश है जो एक लोकतंत्र बना और आज भी बना हुआ है। कभी-कभी यह दावा किया जाता है कि अंग्रेजों ने भारत को लोकतंत्र सिखाया। अगर ऐसा होता, तो म्यांमार, पाकिस्तान या खाड़ी के राजतंत्र लोकतंत्र क्यों नहीं बन पाए? असलियत तो यह है कि भारतीय लोकतंत्र पूरी तरह से स्वदेशी है और असाधारण रूप से सफल भी है। नार्वे के पूर्व मंत्री ने हाल ही में 4 राज्यों और एक केंद्र शासित राज्य में हुए चुनाव का जिक्र करते हुए कहा- दो हफ्ते पहले भारत में चुनाव हुए. पश्चिम बंगाल जैसे चुनावी रणक्षेत्र वाले राज्य में मतदान 94% रहा। नॉर्वे में पिछले स्थानीय चुनावों में यह 62% था, और यूरोप के कई स्थानीय चुनावों में मतदान 50% से भी कम रहता है। क्या इतनी बड़ी संख्या में मतदान करना इस बात का संकेत हो सकता है कि भारतीय अपनी लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर भरोसा करते हैं? इन्हीं चुनावों में, BJP ने असम और पश्चिम बंगाल में बड़ी जीत हासिल की। वहीं, केरल और तमिलनाडु में उसे और भी बड़ी हार का सामना करना पड़ा। क्या यह विविधता इस बात का संकेत हो सकती है कि भारतीय लोकतंत्र वास्तव में जनता की इच्छा को ही दर्शाता है?

दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के बारे में जानकारी जरूरी
नार्वे के पूर्व पर्यावरण मंत्री एरिक सोल्हेम ने नॉर्वेजियन पत्रकार को टारगेट करते हुए और भारत के पक्ष में लंबा सोशल मीडिया पोस्ट डाला है। जिसमें उन्होंने न केवल हेले लिंग को आईना दिखाया है, बल्कि उन लोगों को भी आड़े हाथ लिया, जो भारत में पत्रकारी की स्वतंत्रता को लेकर सवाल उठा रहे हैं। एरिक सोल्हेम ने अपने एक्स पोस्ट पर लिखा- प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की नॉर्वे की अत्यंत सफल यात्रा के दौरान एक छोटी-सी घटना घटी। एक नॉर्वेजियाई पत्रकार ने मांग की कि प्रधानमंत्री प्रेस कॉन्फ्रेंस करना शुरू करें। उन्होंने दावा किया कि भारतीय लोकतंत्र की हालत खराब है। शायद अब रुकने का समय आ गया है? शायद अब दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के बारे में थोड़ी जिज्ञासा रखने का समय आ गया है?

पीएम मोदी के खिलाफ नैरेटिव गढ़ने का यह है पूरा मामला
ओस्लो के एक अखबार की पत्रकार हेले लिंग ने नॉर्वे दौरे के दौरान पीएम मोदी से एक सवाल पूछा था। संयुक्त बयान के दौरान हेले लिंग ने जोर से आवाज लगाकार पीएम मोदी से पूछा- आप दुनिया की सबसे स्वतंत्र प्रेस से सवाल क्यों नहीं लेते? प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की प्रेस ब्रीफिंग के दौरान जिस तरीके से उन्होंने दूर खड़े होकर सवाल उछाला, फिर खुद ही उसका वीडियो रिकॉर्ड कर सोशल मीडिया पर वायरल करने की कोशिश की, उसने उनकी मंशा पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। आलोचकों का कहना है कि यह पत्रकारिता कम और सुनियोजित राजनीतिक नैरेटिव गढ़ने की कोशिश ज्यादा लगती है। यही कारण है कि भारतीय अधिकारियों से तीखी बहस और सोशल मीडिया पर बढ़ते विवादों के बीच उनके फेसबुक और इंस्टाग्राम अकाउंट तक को सस्पेंड कर दिया गया है। इस पूरी घटना ने यह सवाल खड़ा किया है कि क्या हेले का उद्देश्य पत्रकारिता था या फिर भारत और प्रधानमंत्री को निशाना बनाकर वैश्विक स्तर पर सनसनी पैदा करना। अब हालत यह है कि जिस महिला पत्रकार को कुछ विपक्षी नेता “बहादुर आवाज” बताने में जुटे हैं, वही इंटरनेट पर अपनी कथित बदनीयती, संदिग्ध गतिविधियों और भारत विरोधी एजेंडे को लेकर कठघरे में खड़े नजर आ रहे हैं।

भारत को हर मंच पर कठघरे में खड़ा करना एक फैशन
दरअसल, अंतरराष्ट्रीय कूटनीति की दुनिया में प्रेस कॉन्फ्रेंस कोई सड़क छाप बहस या टीवी स्टूडियो की चीख-पुकार नहीं होती। वहां हर शब्द, हर संकेत और हर सवाल की अपनी मर्यादा और तय प्रक्रिया होती है। लेकिन हाल ही में नॉर्वे की पत्रकार हेले लिंग को लेकर जो विवाद खड़ा हुआ, उसने यह बहस छेड़ दी है कि क्या कुछ विदेशी पत्रकार वास्तव में पत्रकारिता कर रहे हैं या फिर सुनियोजित राजनीतिक नैरेटिव का हिस्सा बन चुके हैं? भारत और प्रधानमंत्री मोदी को लेकर जिस प्रकार सोशल मीडिया पर अचानक एक मामूली विदेशी पत्रकार को “लोकतंत्र की योद्धा” बनाकर पेश किया गया, उसने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। सवाल केवल एक पत्रकार के व्यवहार का नहीं है, बल्कि उस मानसिकता का है, जिसमें भारत को हर मंच पर कठघरे में खड़ा करना एक फैशन और राजनीतिक हथियार बन चुका है।

दूर से पूछा गया सवाल या जानबूझकर रचा गया दृश्य
पूरा विवाद उस प्रेस ब्रीफिंग से शुरू हुआ, जहां हेले लिंग ने प्रधानमंत्री मोदी से सवाल पूछने की कोशिश की। जिस समय सवाल पूछा गया, उस समय प्रेस कॉन्फ्रेंस लगभग समाप्त हो चुकी थी और प्रधानमंत्री वहां से आगे बढ़ रहे थे। सवाल इतनी दूरी से पूछा गया कि यह संभव ही नहीं था कि वह स्पष्ट रूप से सुनाई दे। इसके बावजूद हेले लिंग ने अपने मोबाइल पर खुद ही उसे रिकॉर्ड किया और बाद में सोशल मीडिया पर पोस्ट कर दिया। इससे यह और साफ हो गया कि हेले का उद्देश्य जवाब पाना नहीं था, बल्कि एक “विवादित नैरेटिव” तैयार करना था, ताकि बाद में उसे राजनीतिक हथियार बनाया जा सके।

दो साल की खामोशी और अचानक “पीएम मोदी पोस्ट”
इस पूरे विवाद में सबसे ज्यादा चर्चा हेले लिंग के सोशल मीडिया व्यवहार को लेकर हुई। जिस एक्स अकाउंट पर 10 अप्रैल 2024 के बाद से कोई सक्रियता नहीं थी, वहां अचानक प्रधानमंत्री मोदी को लेकर पोस्ट सामने आती है। पहले पोस्ट में केवल “भारत के प्रधानमंत्री” लिखा जाता है, लेकिन जब उस पर अपेक्षित प्रतिक्रिया नहीं मिलती, तो पोस्ट को संपादित कर “भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी” लिखा जाता है। इसके बाद पोस्ट तेजी से वायरल होने लगती है। आलोचक इसे संयोग नहीं, बल्कि एक सुनियोजित डिजिटल रणनीति मान रहे हैं। क्योंकि जैसे ही मोदी का नाम जुड़ा, भारत का विपक्ष, एक्टिविस्ट समूह और कुछ अंतरराष्ट्रीय हैंडल उस पोस्ट को तेजी से फैलाने लगे।

800 से 32 हजार फॉलोअर्स: अचानक बढ़ी लोकप्रियता पर सवाल
इस विवाद ने हेले लिंग को रातोंरात सोशल मीडिया पर चर्चित चेहरा बना दिया। जिनके फॉलोअर्स पहले कुछ सौ बताए जा रहे थे, वे अचानक हजारों में पहुंच गए। आलोचकों का कहना है कि यह पूरी घटना “वायरल पॉलिटिक्स” का उदाहरण बन गई, जहां एक मामूली घटना को भारत विरोधी विमर्श में बदलकर डिजिटल प्रसिद्धि हासिल की गई। दिलचस्प बात यह भी बताई जा रही है कि जिस अखबार Dagsavisen के लिए वह काम करती हैं, उसके अपने सोशल मीडिया फॉलोअर्स 50 हजार से भी कम हैं। लेकिन पत्रकार अचानक वैश्विक चर्चा में आ जाती हैं। इससे यह सवाल खड़ा हुआ कि क्या यह सामान्य पत्रकारिता थी या फिर “ब्रांड बिल्डिंग” की रणनीति है?

भारत पर विश्वास पर विदेश मंत्रालय की तीखी प्रतिक्रिया
इस पूरे विवाद सनसनीखेज हिस्सा तीखी नोकझोंक भी रही, जिसमें भारत के विदेश मंत्रालय के अधिकारियों और इस महिला विदेशी पत्रकार के बीच तल्ख संवाद हुआ। पत्रकार हेले ने जिस शैली में “भारत पर क्यों विश्वास करें?” जैसा सवाल उठाया गया, उससे कई लोगों को यह साफ-साफ लगा कि वह भारत को किसी छोटे या संदिग्ध देश की तरह पेश करने की कोशिश कर रही है। इसके जवाब में भारतीय विदेश मंत्रालय के अधिकारियों ने भी तीखा प्रतिप्रश्न किया कि आखिर भारत किसी विदेशी पत्रकार पर क्यों विश्वास करे? यह केवल एक संवाद नहीं था, बल्कि उस मानसिकता की टकराहट थी, जिसमें पश्चिमी मीडिया अक्सर खुद को नैतिक निर्णायक की भूमिका में रखता है।

Dagsavisen, लेबर पार्टी और सोरोस के बीच कनेक्शन
इस मामले का सबसे संवेदनशील हिस्सा हेले लिंग का अखबार है। दरअसल, हेले जिस Dagsavisen अखबार से जुड़ी हैं, उसके ऐतिहासिक संबंध नॉर्वे की लेबर पार्टी से रहा है। वह अखबार नार्वे की नार्वेजियन लेबर पार्टी का मुखपत्र हुआ करता था। ये वही पार्टी है, जो दुनिया के 117 राजनीतिक दलों के प्रोग्रेसिव अलाइंस का हिस्सा है। इतना ही नहीं इसमें राहुल गांधी के चहेते जार्ज सोरोस भी शामिल हैं। इसमें राहुल गांधी की कांग्रेस पार्टी भी शामिल है। इस पार्टी के सांसद से राहुल गांधी भी मिल चुके हैं। यही वजह है कि सोशल मीडिया पर लोग इसे वैश्विक “प्रोग्रेसिव नेटवर्क” से जोड़ रहे हैं। भारत में इस बहस को और हवा तब मिली जब कुछ लोगों ने कांग्रेस पार्टी, अंतरराष्ट्रीय प्रोग्रेसिव समूहों और पश्चिमी एक्टिविस्ट नेटवर्क के बीच वैचारिक समानताओं की चर्चा शुरू की।

चीन, इलन मस्क और वैचारिक झुकाव से खुली पोल
सोशल मीडिया पर हेले लिंग के पुराने पोस्ट भी खंगाले गए। कुछ यूजर्स ने आरोप लगाया कि उन्होंने चीन को “सुपर पावर” बताने वाले पोस्ट किए और इलन मस्क की तीखी आलोचना की। इन पोस्टों के आधार पर उनके वैचारिक झुकाव को लेकर बहस छिड़ गई। हालांकि किसी पत्रकार का राजनीतिक या वैचारिक दृष्टिकोण होना असामान्य नहीं है, लेकिन जब वही पत्रकार किसी दूसरे देश के प्रधानमंत्री को लेकर विवाद खड़ा करे, तो उसके पुराने विचार भी जांच के दायरे में आ जाते हैं। यही वजह है कि भारत में कई लोगों ने उनकी निष्पक्षता पर सवाल उठाए हैं। नार्वे की पत्रकार हेले लिंग की आलोचना करने वाले यह भी पूछ रहे हैं कि यदि वह प्रेस स्वतंत्रता, मीडिया सेंसरशिप और मानवाधिकारों को लेकर इतनी मुखर हैं, तो फिर उन्होंने पिछले चार सालों में चीन, पश्चिम एशिया या यूरोप में पत्रकारों पर हुए हमलों पर उतनी सक्रियता क्यों नहीं दिखाई? उन्होंने क्यों कभी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता या फिर वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम इंडेक्स पहले कभी लेख क्यों नहीं लिखे। इसे “सेलेक्टिव एक्टिविज्म” बताने वालों का सीधा तर्क है कि भारत को लेकर पश्चिमी मीडिया का एक वर्ग हमेशा अधिक आक्रामक रहता है, जबकि दूसरे देशों के मामलों में वही आक्रामकता दिखाई नहीं देती।

मोदी विरोधी ‘द वायर’ को फोलो करती है हेले लिंग
यहीं से यह मामला एक सुनियोजित नैरेटिव का हिस्सा दिखाई देने लगता है। पहले सार्वजनिक मंच पर सवाल उछालो। जहां पहले से ही पता है कि इसका जवाब देने प्रोटोकॉल में ही नहीं है। फिर सोशल मीडिया पर उसे वैचारिक रंग दो और उसके बाद भारत विरोधी समूहों तथा राजनीतिक दलों द्वारा उसे amplify कराया जाए। यही पैटर्न वर्षों से दिखाई देता रहा है। हालांकि नॉर्वेजियन पत्रकार हेले लिंग ने मंगलवार को नॉर्वे की यात्रा के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर की गई अपनी टिप्पणियों के बाद हुई आलोचना और ऑनलाइन हमलों का जवाब देते हुए कहना ही पड़ा कि वह “किसी भी तरह की विदेशी जासूस नहीं हैं”। यह भी तथ्य है कि हेले ट्वीटर पर जिनको फोलो करती है, उनमें एकमात्र भारतीय डिजिटल कंपनी द वायर भी है, जिसके मोदी विरोधी होने पर कोई शक नहीं है। The Wire ने नरेंद्र मोदी सरकार की कई नीतियों जैसे नागरिकता कानून, मीडिया स्वतंत्रता, पेगासस जासूसी विवाद, चुनावी बॉन्ड, नोटबंदी, संस्थागत स्वायत्तता आदि पर लगातार नेगेटिव रिपोर्टिंग की है।

विपक्ष की भूमिका और “विदेशी प्रमाणपत्र” की राजनीति
इस पूरे विवाद का एक बड़ा पहलू भारतीय विपक्ष की प्रतिक्रिया भी रही। कांग्रेस समेत कई विपक्षी नेताओं और समर्थकों ने हेले लिंग की प्रशंसा की और उन्हें “निडर पत्रकार” बताया। आलोचक यहीं सबसे बड़ा सवाल उठाते हैं कि क्या भारत के विपक्ष को हर विदेशी आलोचना में अपना राजनीतिक अवसर नजर आता है? यह पहली बार नहीं है जब किसी विदेशी संस्था, रिपोर्ट या पत्रकार के बयान को भारत सरकार के खिलाफ राहुल गांधी और विपक्षी नेताओं ने राजनीतिक हथियार की तरह इस्तेमाल किया हो। इससे यह धारणा भी मजबूत होती है कि देश के भीतर राजनीतिक लड़ाई अब अंतरराष्ट्रीय मंचों तक फैलाने की साजिश रची जा रही है।

जासूसी के आरोप और भारत की छवि बनाम पश्चिमी नैरेटिव
सोशल मीडिया पर कुछ लोगों ने हेले लिंग पर विदेशी एजेंसियों या चीन से संबंधों तक के आरोप लगाए। हालांकि हेले लिंग ने इन आरोपों का खंडन किया है। लेकिन इसके समर्थन में कोई ठोस सार्वजनिक प्रमाण भी सामने नहीं आया है। लेकिन यह जरूर है कि विवाद जितना बढ़ा, उतनी ही तेजी से साजिश, विदेशी फंडिंग और वैचारिक नेटवर्क की चर्चाएं भी सोशल मीडिया पर फैलती गईं। असल सवाल केवल हेले लिंग का नहीं हैं। वास्तविकता यह है कि क्या भारत की बढ़ती वैश्विक ताकत के साथ उसके खिलाफ अंतरराष्ट्रीय नैरेटिव की लड़ाई भी तेज हो रही है? आज भारत दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्था, तकनीकी शक्ति और भू-राजनीतिक केंद्र के रूप में उभर रहा है। ऐसे में पश्चिमी मीडिया का एक वर्ग भारत को लगातार “लोकतंत्र संकट”, “मानवाधिकार खतरा” और “मीडिया दमन” जैसे फ्रेम में पेश करता है। भारत के समर्थक इसे पूर्वाग्रह मानते हैं।

 

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