अंतरराष्ट्रीय कूटनीति की दुनिया में शब्दों का चयन, मंच की मर्यादा और संवाद की प्रकृति बहुत मायने रखती है। दो देशों के राष्ट्राध्यक्षों या प्रधानमंत्रियों की आधिकारिक बैठकों के दौरान होने वाली संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस कोई टीवी डिबेट नहीं होती, जहां अचानक सवालों की बौछार कर दी जाए। नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी को इतने सालों तक सांसद रहने और राजनीतिक जीवन जीने के बावजूद इतनी भी जानकारी नहीं है कि इन कार्यक्रमों का स्वरूप पहले से तय होता है। वक्तव्य निर्धारित होते हैं और कई बार प्रश्न पूछने की व्यवस्था भी सीमित या नियंत्रित रहती है। दुनियाभर के लगभग सभी बड़े लोकतांत्रिक देशों में यह सामान्य प्रक्रिया है। इसके बावजूद नॉर्वे की पत्रकार हेले लिंग के बहाने राहुल गांधी ऐसे नकारात्मक ट्वीट करते हैं तो साफ पता चलता है कि वे भी इस सुनियोजित नैरेटिव का हिस्सा हैं। क्योंकि जब बात भारत और विशेष रूप से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की आती है, तब कुछ अंतरराष्ट्रीय पत्रकार और भारत के भीतर बैठे राजनीतिक विरोधी हर सामान्य प्रक्रिया को “लोकतंत्र के संकट” का रंग देने लगते हैं। पत्रकार हेले लिंग का विवादित सवाल इसी रणनीति का ताजा उदाहरण है।
कूटनीतिक मंच को राजनीतिक रंग देने की कोशिश
दरअसल, नॉर्वे में आयोजित संयुक्त प्रेस कार्यक्रम के दौरान पत्रकार हेले लिंग ने प्रधानमंत्री मोदी से अचानक सवाल पूछा कि “आप दुनिया की सबसे स्वतंत्र प्रेस से सवाल क्यों नहीं लेते?” पहली नजर में यह सामान्य प्रश्न लग सकता है, लेकिन सवाल का तरीका, उसका समय, उसके पीछे की मंशा और उसके बाद हेले के ट्वीट सारे सुनियोजित नैरेटिव की ओर साफ-साफ इशारा कर देते हैं। क्योंकि यह कोई स्वतंत्र मीडिया संवाद कार्यक्रम नहीं था। यह दो देशों के बीच आधिकारिक कूटनीतिक कार्यक्रम था। ऐसे आयोजनों में आमतौर पर कई बार कोई प्रश्नोत्तर सत्र होता ही नहीं। अमेरिका, रूस, फ्रांस, चीन, जापान समेत दुनिया के अनेक देशों में ऐसे उदाहरण भरे पड़े हैं जहां राष्ट्राध्यक्ष बिना सवाल लिए मंच से चले गए। लेकिन उन मौकों पर “लोकतंत्र खतरे में है” जैसा वैश्विक शोर नहीं मचाया गया। स्पष्ट है कि यहां उद्देश्य जवाब पाना कम और एक राजनीतिक मसौदा तैयार करना ज्यादा था। हेले जिस नार्वे की प्रेस को दुनिया की सबसे स्वतंत्र प्रे बता रही हैं, वहीं के पीएम ने पत्रकारों के सवालों पर चुप्पी साथ ली थी।
The Norwegian Prime Minister also didn’t take any questions at the joint press briefing of the two leaders. But the lunatic Congress ecosystem led by Rahul Gandhi is crowing over a delinquent journalist’s incoherent rant. One wonders if, like the journalist in question, the…
— Amit Malviya (@amitmalviya) May 19, 2026
सवाल पूछने से ज्यादा ट्विटर पोस्ट का था हेले का मकसद
एक छोटे से जिस अखबार Dagsavisen के लिए पत्रकार हेले लिंग काम करती हैं, उसके फॉलोवर्स 50 हजार भी नहीं हैं। इसलिए साफ है कि ऐसे टुच्चे मीडिया संस्थान अंतरराष्ट्रीय मंचों पर विवादित सवाल पूछकर सुर्खियां बटोरने की कोशिश करते हैं। कुछ लोगों ने यह भी आरोप लगाया कि भारत से जुड़े मुद्दों पर पश्चिमी मीडिया का एक हिस्सा हमेशा नकारात्मक दृष्टिकोण अपनाता है। यह विवाद तब और गहरा हो गया जब प्रेस कार्यक्रम के बाद हेले लिंग ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर भारत की प्रेस स्वतंत्रता रैंकिंग का उल्लेख करते हुए टिप्पणी की। यदि उनका उद्देश्य सिर्फ पत्रकारिता था, तो सवाल पूछने के बाद मामला वहीं समाप्त हो जाना चाहिए था। लेकिन सोशल मीडिया पर राजनीतिक शैली में टिप्पणी करना यह संकेत देता है कि पूरा प्रकरण केवल पेशेवर पत्रकारिता तक सीमित नहीं था।
वामपंथी एवं एजेंडाबाज पत्रकार @HelleLyngSvends ने जैसे ही प्रधानमंत्री श्री @narendramodi जी के खिलाफ अपना प्रोपेगेंडा और एजेंडा चलाने की कोशिश की, कांग्रेस और पूरा इकोसिस्टम तुरंत सक्रिय हो गया।
जिस पत्रकार ने वर्षों तक अपने सोशल मीडिया अकाउंट पर कोई खास गतिविधि नहीं दिखाई, वही…
— Reetesh Maheshwari (@Reetesh777) May 19, 2026
मोदी विरोधी द वायर को फोलो करती है हेले
यहीं से यह मामला एक सुनियोजित नैरेटिव का हिस्सा दिखाई देने लगता है। पहले सार्वजनिक मंच पर सवाल उछालो। जहां पहले से ही पता है कि इसका जवाब देने प्रोटोकॉल में ही नहीं है। फिर सोशल मीडिया पर उसे वैचारिक रंग दो और उसके बाद भारत विरोधी समूहों तथा राजनीतिक दलों द्वारा उसे amplify कराया जाए। यही पैटर्न वर्षों से दिखाई देता रहा है। हालांकि नॉर्वेजियन पत्रकार हेले लिंग ने मंगलवार को नॉर्वे की यात्रा के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर की गई अपनी टिप्पणियों के बाद हुई आलोचना और ऑनलाइन हमलों का जवाब देते हुए कहना ही पड़ा कि वह “किसी भी तरह की विदेशी जासूस नहीं हैं”। यह भी तथ्य है कि हेले ट्वीटर पर जिनको फोलो करती है, उनमें एकमात्र भारतीय डिजिटल कंपनी द वायर भी है, जिसके मोदी विरोधी होने पर कोई शक नहीं है। The Wire ने नरेंद्र मोदी सरकार की कई नीतियों जैसे नागरिकता कानून, मीडिया स्वतंत्रता, पेगासस जासूसी विवाद, चुनावी बॉन्ड, नोटबंदी, संस्थागत स्वायत्तता आदि पर लगातार नेगेटिव रिपोर्टिंग की है।
The journalist Helle Lyng from Norway, who questioned India’s PM, follows Congress on Instagram.
She is also sharing Rahul Gandhi’s tweets on her Instagram story.
Why is a Norwegian journalist following Congress?
Why is she promoting Rahul Gandhi’s tweets?Especially when she… pic.twitter.com/q5U6N2BSiA
— Saffron Chargers (@SaffronChargers) May 19, 2026
राहुल गांधी की राजनीति और विदेशी मंचों का सहारा
सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि भारत के नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने भी इस मुद्दे को तुरंत राजनीतिक हथियार की तरह इस्तेमाल करना शुरू कर दिया। यह पहली बार नहीं है जब राहुल गांधी ने विदेशी मंचों, विदेशी रिपोर्टों या अंतरराष्ट्रीय टिप्पणियों का सहारा लेकर भारत की लोकतांत्रिक संस्थाओं, केंद्र सरकार और प्रधानमंत्री मोदी पर सवाल उठाने की कोशिश की हो। राहुल गांधी कभी विदेशी विश्वविद्यालयों में जाकर भारतीय लोकतंत्र पर टिप्पणी, कभी अंतरराष्ट्रीय मीडिया रिपोर्टों का हवाला, तो कभी विदेशी पत्रकारों के बयान, यह सब एक लगातार चलने वाली राजनीतिक रणनीति बन चुकी है।
We know which scared cat 🙀🙀has NEVER given a proper TV interview since Arnab Goswami took him to the cleaners 😂😂😂
PM Modiji gave > 50 interviews to channels across Bharat before 2024 polls whereas RaGa has still not recovered from Arnab Goswami’s out of syllabus questioning… pic.twitter.com/aiaiKOVdEg
— PallaviCT (@pallavict) May 19, 2026
भारत की वैश्विक छवि को कमजोर करते हैं राहुल गांधी
विपक्ष का काम सरकार से सवाल पूछना जरूर है, लेकिन जब देश के प्रधानमंत्री विदेश दौरे पर हों और उस समय विदेशी मीडिया द्वारा उठाए गए राजनीतिक नैरेटिव को भारत के भीतर का विपक्ष और राहुल गांधी आगे बढ़ाने लगें, तब सवाल स्वाभाविक रूप से उठते हैं। क्या यह सिर्फ सरकार का विरोध है या फिर भारत की वैश्विक छवि को कमजोर करने का कुत्सित प्रयास भी है? वास्तविकता यह है कि भारत में प्रधानमंत्री मोदी की आलोचना प्रतिदिन टीवी बहसों, अखबारों, यूट्यूब चैनलों और सोशल मीडिया पर खुले तौर पर होती है। विपक्ष सरकार पर लगातार हमले करता है। सुप्रीम कोर्ट स्वतंत्र है, चुनाव आयोग सक्रिय है और जनता हर चुनाव में अपना निर्णय खुलकर देती है। ऐसे देश को “लोकतंत्र संकट” के फ्रेम में फिट करने की कोशिश वस्तुतः वैचारिक पूर्वाग्रह को दर्शाती है।
हेले का सवाल नहीं एजेंडा, उसका पिछला ट्वीट दो साल पहले
नॉर्वे की पत्रकार हेले लिंग के भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से सवाल पूछने पर विवाद शुरू हो गया है। सोशल मीडिया पर आरोप लगाए जा रहे हैं कि वो पत्रकारिता नहीं बल्कि भारत के खिलाफ प्रोपेगेंडा फैला रही हैं। उनका सवाल एजेंडे से प्रेरित था। जबकि कुछ लोग इसे प्रेस की आजादी बता रहे हैं। लेकिन इस पूरे विवाद ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या पश्चिमी देशों के कुछ मीडिया संस्थान भारत की छवि को लेकर पहले से तय नैरेटिव के साथ काम करते हैं? ऐसा इसलिए क्योंकि पत्रकार हेल्ले लिंग ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर आखिरी पोस्ट 10 अप्रैल 2024 को किया था। इसके बाद उनका अगला पोस्ट प्रधानमंत्री मोदी को लेकर ही था।
Media Hit job on PM Modi (Investigation)
A 28-year-old little-known Norwegian journalist with hardly 500 followers, who hardly had any activity on X, posted a post targeting PM Modi at 12:02 GMT (17:32 IST)
She didn’t get any traction for next 17 mins
only 814 views1/11 pic.twitter.com/ZwGf1UuHmf
— STAR Boy TARUN (@Starboy2079) May 19, 2026
हेले की नीयत पर भी सवाल कि पत्रकारिता या प्रोपेगेंडा?
पत्रकार हेले लिंग भले ही कुछ भी सफाई दे लेकिन वो भारत को लेकर पूर्वाग्रह से ग्रसित महसूस हो रही हैं। ठीक वैसे ही जैसे भारत में भी कई पत्रकार पूर्वाग्रह से ग्रसित रहते हैं। क्योंकि हेले लिंग ने जहां प्रधानमंत्री मोदी से सवाल पूछा असल में वो एक पारंपरिक प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं था बल्कि वो एक ऐसा प्रेस कॉन्फ्रेंस था जहां दोनों देशों के नेता समझौतों के बारे में आधिकारिक बातें बताते हैं। किसी भी देश में ऐसे कार्यक्रम में अमूमन सवाल जवाब नहीं होते हैं। इसीलिए हेले लिंग की नीयत पर सवाल उठ रहे हैं कि आखिर उन्होंने सवाल पूछने के लिए एक ऐसे मंच को क्यों चुना जहां पारंपरिक तौर पर सवाल जवाब नहीं होते हैं।
Do you know what question @HelleLyngSvends asked to Trump during Norway PM’s visit?
Helle asked- “In your goal of obtaining Greenland, NATO allies are not supporting. How will you proceed if you don’t get support”
She used word ‘Obtaining’ not even ‘Capturing’ for Greenland.… pic.twitter.com/kXP0OVOOHp
— Ankur Singh (@AnkurSingh) May 19, 2026
वैश्विक राजनीति के केंद्र में हैं लोकप्रिय प्रधानमंत्री मोदी
यह भी समझना होगा कि नरेंद्र मोदी आज केवल भारत के प्रधानमंत्री ही नहीं, बल्कि वैश्विक राजनीति के सबसे प्रभावशाली और लोकप्रिय नेताओं में गिने जाते हैं। भारत की बढ़ती अर्थव्यवस्था, वैश्विक मंचों पर उसकी मजबूत उपस्थिति, जी-20 की सफल मेजबानी, रूस-यूक्रेन जैसे मुद्दों पर संतुलित कूटनीति और विकसित भारत का विजन, इन सबने भारत की अंतरराष्ट्रीय साख को मजबूत किया है। ऐसे समय में भारत विरोधी नैरेटिव खड़ा करने की कोशिशें भी तेज हुई हैं। कभी मानवाधिकार के नाम पर, कभी प्रेस स्वतंत्रता के नाम पर, तो कभी लोकतंत्र के नाम पर। उद्देश्य एक ही दिखाई देता है कि भारत की उभरती हुई वैश्विक छवि को संदेह के घेरे में खड़ा करना। भारत को लेकर पश्चिमी मीडिया के एक हिस्से का रवैया लंबे समय से चयनात्मक रहा है। जिन देशों में प्रेस पर खुला नियंत्रण है, वहां अक्सर यही मीडिया बेहद नरम दिखाई देता है। लेकिन भारत जैसे जीवंत लोकतंत्र, जहां हजारों समाचारपत्र, सैकड़ों टीवी चैनल, अनगिनत डिजिटल प्लेटफॉर्म और सरकार की आलोचना करने वाले असंख्य पत्रकार सक्रिय हैं, वहां “प्रेस की आजादी खत्म” होने का नैरेटिव गढ़ा जाता है।
In 2013, Rahul Gandhi visited Norway and met to Norwegian Labor Party MP Sverre Myrli
The same party who has association with newspaper Dagsavisen
Whose journalist targeted PM ModiMyrli has been active in NATO Parliamentary Assembly that has Soros links
Now you can connect… pic.twitter.com/UDWLvFLWq7
— STAR Boy TARUN (@Starboy2079) May 19, 2026
पत्रकारिता और राजनीतिक एक्टिविज्म के बीच की महीन रेखा
यह सही है कि पत्रकारिता का उद्देश्य सवाल पूछना है, लेकिन पत्रकारिता और राजनीतिक एक्टिविज्म के बीच एक महीन रेखा भी होती है। जब कोई पत्रकार प्रश्न पूछने के तुरंत बाद सोशल मीडिया पर राजनीतिक टिप्पणी करने लगे और उसका उपयोग विपक्षी दल अपने एजेंडे के लिए करने लगें, तब निष्पक्षता पर सवाल उठना स्वाभाविक ही नहीं है। बल्कि इसमें राजनीतिक नैरेटिव तैयार करने के सुनियोजित साजिश भी नजर आती है। लोकतंत्र में सवाल पूछना आवश्यक है, लेकिन सवालों का इस्तेमाल राजनीतिक प्रोपेगेंडा के औजार की तरह करना लोकतांत्रिक संवाद को कमजोर करता है। दुर्भाग्य यह है कि आज दुनिया के कुछ हिस्सों में भारत को देखने के लिए उसी चश्मे का इस्तेमाल करते है, जिसे राहुल गांधी ने धारण किया हुआ है।
Norway में PM Modi के press interaction को लेकर Rahul Gandhi ने “fear” और “press freedom” पर सवाल उठाए।
लेकिन सवाल तो उनसे भी पूछे जाने चाहिए।Bangladeshi Hindus पर सवाल पूछने वाले journalist का interview delete करवाने के आरोप, press conferences में पत्रकारों पर भड़कना, Congress… pic.twitter.com/dMYRyIY0tH
— The Pamphlet (@Pamphlet_in) May 19, 2026
भारत को लेकर बदली हुई वैश्विक मानसिकता
दुनियाभर के सामने अब यह शीशे की तरह साफ हो गया है कि आज का भारत 15 साल पहले वाला भारत नहीं है। भारत अब दबाव में आने वाला राष्ट्र नहीं, बल्कि अपने हितों और अपनी आवाज को मजबूती से रखने वाला आत्मविश्वासी देश है। यही आत्मविश्वास कई वैश्विक शक्तियों और वैचारिक समूहों को असहज करता है। प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में भारत ने अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अपनी स्वतंत्र पहचान बनाई है। यही कारण है कि भारत विरोधी नैरेटिव बनाने की हर छोटी घटना को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया जाता है। हेले लिंग प्रकरण भी उसी कड़ी का हिस्सा प्रतीत होता है, जहां एक सामान्य कूटनीतिक प्रक्रिया को “लोकतंत्र बनाम तानाशाही” जैसी अतिरंजित बहस में बदलने की कोशिश की गई।
राहुल गांधी अब पत्रकारिता की आड़ में अपनी राजनीतिक रोटियां सेंक रहे हैं। लेकिन वास्तविकता में पत्रकारों के दमन का तो कांग्रेस का लंबा इतिहास रहा है….
सवाल पूछने पर पत्रकार को राहुल गांधी ने कहा ‘दलाल’
कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी राजनीतिक सफलता हासिल करने के लिए झूठ और फरेब के हथकंडे अपना रहे हैं। इस क्रम में वे कभी अपनी अधूरी जानकारी पर एक्सपोज हो रहे हैं तो कभी फर्जी खबरें फैलाकर देश को गुमराह कर रहे हैं। जब पत्रकार उनसे सवाल पूछते हैं, तो वे उनपर भड़क जाते हैं। ऐसा एक बार नहीं, बल्कि दो दिन में दो बार हुआ। मंगलवार (21 दिसंबर, 2021) को दिल्ली के विजय चौक पर जब पत्रकारों ने मॉब लिंचिंग को लेकर किए गए ट्वीट के बारे में राहुल गांधी से सवाल पूछा, तो उन्होंने एक बार फिर अपना आपा खो दिया। उन्होंने पत्रकार को सरकार का एजेंट बताते हुए कहा, “सरकार की दलाली मत कीजिए।”
#WATCH | Congress leader Rahul Gandhi responds when asked about his today’s tweet on ‘lynching’. pic.twitter.com/UUxi3bpSOa
— ANI (@ANI) December 21, 2021
दरअसल, मंगलवार को राहुल गांधी ने ट्वीट करते हुए लिखा कि 2014 से पहले ‘लिंचिंग’ शब्द सुनने में भी नहीं आता था। इसी ट्वीट पर पत्रकार ने सवाल किया कि केंद्र सरकार लिंचिंग मामले में 1984 की बात कह रही है। राहुल गांधी से जैसे ही ये सवाल दागा गया वो बिफर गए और खीझते हुए कहते हैं कि सरकार की दलाली मत करो। इतना कहते हुए वो कांग्रेस और अन्य नेताओं के साथ वहां से निकल जाते हैं। कांग्रेस नेता ने जब पत्रकार को दलाल कहा तो वहां मौजूद संजय राउत समेत तमाम विपक्षी दलों के नेता हसते नजर आए।

इसके एक दिन पहले सोमवार (20 दिसंबर, 2021) को राहुल गांधी ऐसे ही आपा खो बैठे थे। संसद में विपक्ष के हंगामे पर किए गए एक सवाल पर कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी लाल हो गए। मीडियाकर्मी ने कहा कि सरकार का कहना है कि हाउस ऑर्डर में नहीं आता है तो इस वजह से चर्चा नहीं हो रही है। सरकार हर चीज पर चर्चा करने के लिए तैयार है। मीडियाकर्मी के इतना कहते ही राहुल तमतमा उठे। प्रतिक्रिया देने के बजाय वह मीडियाकर्मी से बहस में उलझ गए। राहुल मीडियाकर्मी से ही सवाल कर बैठे कि क्या आप सरकार के लिए काम करते हैं?
#WATCH | Congress leader Rahul Gandhi responds when asked about the Opposition’s uproar in the Parliament. pic.twitter.com/bpnRpDcmLY
— ANI (@ANI) December 20, 2021
इंदिरा गांधी ने रामनाथ गोयनका को किया था परेशान
समय इंदिरा गांधी का रहा हो या राजिव गांधी का, सत्ता के ठसक में कांग्रेस ने हमेशा ही पत्रकारों का दमन किया है। गांधी परिवार को कभी मीडिया की स्वतंत्रता नहीं सुहाई। पत्रकारों के अधिकारों को कम करने की सबसे पहली पहल देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने ही की थी। बाद में आपातकाल के दौरान इंदिरा गांधी ने तो पूरे प्रेस पर ही बंदिश लगा दी थी। इतना ही नहीं पत्रकारिता की दुनिया के प्रमुख हस्ती रहे रामनाथ गोयनका को झुकाने के लिए उन्होंने उनके अखबार को दिए जाने वाले विज्ञापन बंद करवा दिए। इतना ही नहीं, इंदिरा गांधी ने अपने प्रशासनिक हनक के माध्यम से अखबार छपने के समय बिजली कटवा देती थी, ताकि समय पर लोगों को अखबार नहीं मिले।
यूथ कांग्रेस का पुराना इतिहास रहा है गुंडागर्दी का
किसी पत्रकार पर जानलेवा हमला करना यूथ कांग्रेस की पहली घटना नहीं है। अपने आकाओं की आलोचना करने वालों के साथ गुंडागर्दी करना उसे विरासत में मिली हुई है। सन 1988 की बात है जब पटना रेडियो स्टेशन में एक रेडियो कार्यक्रम के दौरान बच्ची द्वारा राजीव गांधी को चोर कह देने को लेकर यूथ कांग्रेस ने गुंडागर्दी की थी। इतना ही नहीं इस मामले को लेकर यूथ कांग्रेस के कार्यकर्ताओं ने सागर विश्वविद्यालय के पत्रकारिता विभाग के हेड ऑफ द डिपार्टमेंट प्रोफेसर प्रदीप कृष्णात्रेय पर हमला किया था।
राजीव गांधी के शासनकाल में प्रोफेसर की पीटाई
जब 1988 में बोफोर्स घोटाला सामने आया उस समय राजीव गांधी के खिलाफ ‘गली-गली में शोर है राजीव गांधी चोर है’ का नारा काफी प्रचलन में था। 27 मई 1988 को पटना रेडियो स्टेशन में एक कार्यक्रम के प्रसारण के दौरान जब एक लड़की से चुटकुला सुनाने को कहा गया तो उसने ‘गली गली में शोर है, राजीव गांधी चोर है’ बोल दिया। बाद में इस घटना को लेकर सागर विश्वविद्यालय के पत्रकारिता विभाग की प्रवेश परीक्षा में एक सवाल पूछा गया था कि ‘ऑल इंडिया रेडियो के किस स्टेशन ने ‘राजीव गांधी चोर है’ वाक्य प्रसारित किया था?’ राजीव गांधी पर पूछा गया यह सवाल पत्रकारिता विभाग के हेड ऑफ द डिपार्टमेंट प्रदीप कृष्णात्रेय पर बहुत भारी पड़ा। युवक कांग्रेस के कार्यकर्ताओं ने पत्रकारिता विभाग में जाकर प्रोफेसर के साथ न केवल जमकर मारपीट की, बल्कि उनके चेहरे पर कालिख पोतकर पूरे कैंपस में घुमाया।
राजीव गांधी लाए थे पत्रकारों के खिलाफ मानहानि विधेयक
स्वतंत्र और निष्पक्ष आवाज हमेशा से कांग्रेस के कान में चुभती रही है। तभी तो कांग्रेस हमेशा से देश में एक बंधुआ प्रेस के पक्ष रही है। पत्रकारों के खिलाफ समय-समय पर कानून बनाना कांग्रेस की पुरानी आदत रही है। इंदिरा गांधी ने पत्रकारिता को खत्म करने के लिए आपातकाल के दौरान प्रतिबंध लगा दिया तो राजीव गांधी ने अपने कार्यकाल के दौरान पूरी पत्रकारिता को ही खत्म करने की ठान ली थी। तभी तो राजीव गांधी पत्रकारों की आवाज बंद करने के उद्देश्य से संसद में पत्रकारों के खिलाफ मानहानि विधेयक लेकर आए थे। वे अपने खिलाफ उठने वाली आवाज को बंद करने के लिए ही इस प्रकार का कानून लाए थे।
यूपीए के कार्यकाल में पत्रकार सुधीर चौधरी पर हमला
कांग्रेस पार्टी की पुरानी आदत रही है। जब भी वह सत्ता में रही है अपने खिलाफ आवाज उठाने वाले पत्रकारों की आवाज दबाती रही है। वह चाहे जो भी दौर रहा हो। यूपीए-2 के कार्यकाल में भी पत्रकारिता और पत्रकारों की आवाज दबाने के लिए पर हमले होते रहे। इसके लिए कांग्रेस ने हमेशा साम दाम दंड और भेद का इस्तेमाल किया है। साल 2012 में कांग्रेस सांसद नवीन जिंदल ने वरिष्ठ पत्रकार सुधीर चौधरी पर अपनी कंपनी के कथित तौर पर कोयला घोटाले में शामिल होने की खबर प्रसारित नहीं करने के बदले में 100 करोड़ रुपये मांगने का आरोप लगाया था। इस आरोप के चलते सुधीर चौधरी को जेल तक जाना पड़ा। हालांकि बाद में सुधीर चौधरी ने कांग्रेस सांसद नवीन जिंदल के खिलाफ मानहानि का मामला दाखिल किया। उन्होंने जिंदल पर उन्हें एफआईआर में झूठे तरीके से फंसाने और संवाददाता सम्मेलन में झूठा बयान देने का आरोप लगाया।
राहुल ने महिला पत्रकार पर की अमर्यादित टिप्पणी
अपनी ड्योढ़ी पर खुद के सुविधानुसार पत्रकारों को इंटरव्यू देने के आदि राहुल गांधी ने स्मिता प्रकाश जैसी वरिष्ठ पत्रकार पर अपने प्रश्नों का स्वयं उत्तर देने का आरोप लगाते हुए उन पर हमला किया था। यह वाकया उस समय का है जब स्मिता प्रकाश ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का साक्षात्कार किया था, और उसकी चर्चा भी काफी हुई थी। उसी समय राहुल गांधी ने भद्दे तरीके से उस पर आरोप लगाते हुए हमला किया था। वरिष्ठ महिला पत्रकार के खिलाफ राहुल गांधी के इस अमर्यादित हमले के बाद भी किसी ने राहुल गांधी से सवाल पूछने की हिम्मत कर पाई।
सोनिया से सवाल क्या पूछ लिया, कांग्रेस हमले पर उतर आई
हिंदी में एक कहावत है कि रस्सी जल जाती है लेकिन बल नहीं जाता है। कांग्रेस पार्टी के साथ यह कहावत बिल्कुल सटीक बैठती है। कांग्रेस की रस्सी तो जल गई लेकिन बल नहीं गया। पत्रकारिता और पत्रकारों के प्रति असहिष्ण रवैया अभी तक जारी है। ध्यान रखिए इस बार भी नामी पत्रकार अर्णब गोस्वामी पर वहीं हमला हुआ है जहां कांग्रेस सत्ता में है। खास बात है कि अर्णब गोस्वामी के सोनिया गांधी से सवाल पूछने के बाद ही राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने अर्नब गोस्वामी को रिपब्लिक भारत से हटान की मांग की थी और उन्हें सनकी तक घोषित कर दिया था। इसके बाद ही रात को उन पर हमला हो गया।
दिल्ली की कांग्रेस नेता अलका लांबा ने इस घटना के बाद अपने ट्वीट पर यूथ कांग्रेस जिंदाबाद का नारा लगाते हुए अर्णब गोस्वामी पर हुए हमले की प्रसंशा की थी। ये वही अलका लांबा जिन्होंने सोशल मीडिया पर कमेंट करने पर एक युवक को पीटने के लिए उनके घर चली गई थी। मालूम हो कि मुंबई के नजदीक पालघर में दो साधुओं और उनके ड्राइवर की भीड़ ने पीट-पीटकर निर्मम हत्या कर दी। दोनों साधुओं की हत्या हुए करीब छह दिन हो गए, लेकिन हत्या के पीछे का सच का खुलासा नहीं हुआ है। चूंकि यह हत्या महाराष्ट्र के पालघर में हुई है, जहां सरकार में कांग्रेस शामिल है। इसी संदर्भ में अर्नब गोस्वामी ने कांग्रेस की अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गांधी से सवाल पूछ लिया। इसी से कांग्रेस के बौखलाए नेता और यूथ कांग्रेस ने अर्णब गोस्वामी और उनकी पत्नी पर रात बारह बजे के करीब हमला कर दिया। अब सवाल उठता है कि कांग्रेस शासित सरकार के संदर्भ में सोनिया गांधी से सवाल पूछना भी अपराध हो गया है?









