पश्चिम बंगाल और केरल में होने वाले विधानसभा चुनाव से ठीक पहले कांग्रेस ने वामपंथी दलों के साथ अपना गठबंधन तोड़ दिया है। इससे पश्चिम बंगाल की राजनीति में नए सियासी समीकरण बन रहे हैं। अब तक विपक्षी राजनीति में जो संभावित तालमेल दिखता था, वह अचानक बिखरता हुआ नजर आ रहा है। ऐसे में सवाल उठता है कि इस रणनीतिक फैसले से किसे लाभ होगा और किसे नुकसान? राहुल गांधी के इस कदम का कांग्रेस पार्टी को फायदा हो या ना हो, लेकिन तृणमूल कांग्रेस को जरूर नुकसान होने वाला है। क्योंकि कांग्रेस को जो भी वोट मिलेगा, वह तृणमूल कांग्रेस के हिस्से का होगा। ऐसे में कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस की एकला चलो की लड़ाई का फायदा बीजेपी को अगले विधानसभा चुनाव में मिलने जा रहा है। वर्तमान में पश्चिम बंगाल में मुख्य मुकाबला ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली तृणमूल कांग्रेस और बीजेपी के बीच माना जा रहा है। लेकिन इन सबके बीच सबसे अहम सवाल ये है कि कांग्रेस को अकेले चुनाव लड़ने का दांव का क्या उसके लिए अपने पैर पर कुल्हाड़ी मारने जैसा नहीं होगा? कांग्रेस को पिछले विधानसभा चुनाव में जीरो सीट मिली थी। ऐसे में अगले चुनाव में जीरो से शुरुआत करने वाली कांग्रेस का बिना किसी राजनीतिक बैसाखी के अपना सफर तय कर पाएगी।
कांग्रेस की बड़ी चुनौती खोए जनाधार को पुनर्जीवित करना
पिछले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को शून्य सीटों पर सिमटना पड़ा था। यह परिणाम केवल चुनावी हार नहीं, बल्कि संगठनात्मक कमजोरी का संकेत भी था। ऐसे में, शून्य से शुरुआत करने वाली पार्टी के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपने खोए हुए जनाधार को पुनर्जीवित करना है। बिना मजबूत गठबंधन के मैदान में उतरना, कुछ विश्लेषकों के अनुसार, अपने पैर पर कुल्हाड़ी मारने जैसा कदम भी साबित हो सकता है। क्योंकि फिलहाल तो पार्टी मतदाताओं को ठोस विकल्प के रूप में खुद को स्थापित करती नजर नहीं आती। ऐसे में कांग्रेस का वामपंथी दलों से अलग होकर चुनावी मैदान में उतरना बेहत चुनौतीपूर्ण निर्णय है। यह तर्क भी अपने आप में ही दिलचस्प है कि भारत की सबसे पुरानी पार्टी और पश्चिम बंगाल में राज करने के बाद भी अब स्थिति यह बन गई है कि कांग्रेस को किसी सहारे के साथ नहीं, बल्कि अपनी स्वतंत्र पहचान बनाने के लिए लड़ना पड़ रहा है। “एकला चलो” की यह रणनीति जितनी चुनौतीपूर्ण है, उससे कहीं ज्याद जोखिम भरी भी है। आने वाला चुनाव यह तय करेगा कि “एकला चलो” की रणनीति कांग्रेस के लिए कितनी आत्मघाती साबित होती है। इतना निश्चित है कि बंगाल का राजनीतिक परिदृश्य पहले से अधिक रोचक और प्रतिस्पर्धी हो चुका है।
तृणमूल कांग्रेस बनान कांग्रेस का असर ममता बनर्जी पर
कांग्रेस के अलग रास्ता चुनने से सबसे अधिक असर तृणमूल कांग्रेस पर पड़ सकता है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि कांग्रेस को मिलने वाला हर अतिरिक्त वोट कहीं न कहीं तृणमूल के संभावित समर्थन आधार से कटेगा। बंगाल में विपक्षी वोटों का बिखराव पहले भी निर्णायक साबित हुआ है। यदि कांग्रेस अपने परंपरागत वोट बैंक विशेषकर कुछ क्षेत्रों में अल्पसंख्यक और पारंपरिक समर्थकों को वापस खींचने में सफल होती है, तो इसका सीधा असर तृणमूल की सीटों पर पड़ सकता है। बंगाल की राजनीति में केवल वोट प्रतिशत नहीं, बल्कि उसका वितरण अधिक महत्त्वपूर्ण होता है। यदि कांग्रेस कुछ क्षेत्रों में 5–10 प्रतिशत वोट भी जुटा लेती है, तो वह परिणामों को प्रभावित कर सकती है। भले ही उसे सीटें न मिलें, पर उसका वोट शेयर बीजेपी की जीत और तृणमूल कांग्रेस की हार तय कर सकता है। यही कारण है कि गठबंधन टूटने को केवल कांग्रेस का निर्णय नहीं, बल्कि पूरे चुनावी परिदृश्य में संभावित बदलाव के रूप में देखा जा रहा है।
कांग्रेस और टीएमसी के “एकला चलो” से बीजेपी को लाभ
कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस के बीच “एकला चलो” की प्रतिस्पर्धा का लाभ भाजपा को मिल सकता है। वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में राज्य में मुख्य मुकाबला तृणमूल कांग्रेस और भाजपा के बीच माना जा रहा है। यदि विपक्षी वोटों में विभाजन होता है, तो भाजपा को कई सीटों पर सीधे लाभ की संभावना बन सकती है। बहुकोणीय मुकाबले में अक्सर वह दल आगे निकल जाता है, जिसका कोर वोट बैंक अपेक्षाकृत स्थिर और संगठित हो। भाजपा ने बूथ लेवल पर अपना कोर वोटर बनाया है। दूसरी ओर कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती संगठन को पुनर्जीवित करने की है। बिना मजबूत बूथ स्तर की संरचना के, केवल राजनीतिक संदेश के सहारे चुनावी सफलता हासिल करना कठिन होता है। कांग्रेस को पहले अपने पुराने कार्यकर्ताओं को पुनः सक्रिय करना होगा और युवाओं को जोड़ने की कवायद करनी होगी। क्योंकि आज की राजनीति के दौर में महिला और युवा वर्ग पूरी तरह से बीजेपी के साथ जुड़ा हुआ है।
केरल में अलग समीकरण, बंगाल में पड़ेगा बहुत गहरा असर
हालाँकि केरल और बंगाल दोनों राज्यों में गठबंधन टूटने की खबर है, लेकिन दोनों जगह राजनीतिक समीकरण भिन्न हैं। केरल में कांग्रेस और वामपंथी दल पारंपरिक प्रतिद्वंद्वी हैं और सत्ता का सीधा मुकाबला करते रहे हैं। वहीं बंगाल में परिस्थिति अधिक जटिल है, जहाँ तृणमूल कांग्रेस प्रमुख शक्ति है और भाजपा मुख्य चुनौती के रूप में उभरी है। ऐसे में कांग्रेस का अकेले चुनाव लड़ना बंगाल में अधिक जोखिमपूर्ण माना जा रहा है। गठबंधन टूटने के बाद तृणमूल कांग्रेस को भी अपनी रणनीति में बदलाव करना पड़ सकता है। उसे यह सुनिश्चित करना होगा कि उसका परंपरागत वोट बैंक खिसके नहीं। साथ ही, भाजपा की चुनौती से निपटने के लिए उसे अपने संगठनात्मक ढांचे को और मजबूत करना होगा। कांग्रेस और वाम दलों की मौजूदगी से कई सीटों पर बहु-कोणीय मुकाबले की स्थिति बन सकती है, जो चुनावी गणित के हिसाब से तृणमूल कांग्रेस के खिलाफ जाएगा।

पश्चिम बंगाल की राजनीति में सियासी समीकरण फिर उफान पर
राज्य से तृणमूल कांग्रेस सरकार का कुशासन हटाने और बीजेपी का सुशासन लाने के लिए नौ अलग-अलग स्थानों कूचबिहार, कृष्णानगर, कुल्टी, गरबेटा, रैदिघी, इस्लामपुर, हसनाबाद, संदेशखाली और आमता से BJP की परिवर्तन यात्रा का शानदार आगाज हो गया है। यात्रा को मिले जनता-जनार्दन के अपार समर्थन ने बीजेपी कार्यकर्ताओं को एक नए जोश से भर दिया है। बीजेपी नेताओं के मुताबिक तीन और चार मार्च को ‘डोल यात्रा’ और 4 मार्च को ‘होली’ के कारण कहीं रैली का आयोजन नहीं होगा। परिवर्तन यात्रा इसके बाद पांच मार्च से फिर से शुरू होगी। यह पश्चिम बंगाल के सभी 294 विधानसभा क्षेत्रों को कवर करने के बाद पूरी होगी। आगामी विधानसभा चुनावों से पहले भारतीय जनता पार्टी ने राज्यव्यापी ‘परिवर्तन यात्रा’ की शुरुआत कर चुनावी रणभूमि को नई दिशा दे दी है। नौ दिशाओं से एक साथ यात्रा का आगाज को केवल एक राजनीतिक कार्यक्रम के रूप में नहीं, बल्कि एक व्यापक जनसंपर्क अभियान के रूप में देखा जा रहा है। यह पहल बीजेपी के लिए संगठनात्मक ऊर्जा, राजनीतिक संदेश और चुनावी रणनीति तीनों का संगम बनती दिखाई दे रही है।
नौ दिशाओं से एक संदेश: सत्ता परिवर्तन की तूफानी तैयारी
राज्य के नौ अलग-अलग हिस्सों से एक साथ शुरुआत करने का निर्णय प्रतीकात्मक और रणनीतिक दोनों है। इससे भाजपा यह संदेश देने की कोशिश कर रही है कि उसका अभियान किसी एक क्षेत्र तक सीमित नहीं, बल्कि पूरे बंगाल की आकांक्षाओं को समेटने का प्रयास है। उत्तर से दक्षिण और ग्रामीण से शहरी इलाकों तक समानांतर रैलियाँ संगठन की व्यापकता और चुनावी गंभीरता को रेखांकित करती हैं। यात्रा में भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व की सक्रिय भागीदारी इसे और अहम बनाया है। प्रधानमंत्री मोदी की प्रस्तावित कोलकाता रैली, गृह मंत्री अमित शाह और अन्य वरिष्ठ नेताओं की उपस्थिति से यह स्पष्ट है कि पार्टी बंगाल को रणनीतिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण मानती है। 2019 के लोकसभा चुनाव में 18 सीटें जीतकर भाजपा ने खुद को मुख्य विपक्ष के रूप में स्थापित किया था। अब वह उसी आधार को विधानसभा चुनाव में व्यापक समर्थन में बदलने जा रही है। चुनावी अभियान को सामाजिक-सांस्कृतिक आयोजनों के साथ संतुलित रखने की कोशिश की जा रही है। इसी के चलते दो दिन के विराम के बाद पांच मार्च से रैलियों का पुनः आरंभ कर अभियान को और तेज गति दी जाएगी।
परिवर्तन यात्रा में 5,000 किलोमीटर की राजनीतिक परीक्षा
करीब 5,000 किलोमीटर लंबी यह परिवर्तन यात्रा राज्य के सभी 294 विधानसभा क्षेत्रों को कवर करेगी। इस दौरान 63 बड़ी सभाएं और सैकड़ों जनसभाएं करने की रणनीति है। यह इस बात का संकेत हैं कि भाजपा इस बार बूथ स्तर तक पहुंचने की व्यापक योजना पर काम कर रही है। यह यात्रा केवल भीड़ जुटाने का कार्यक्रम नहीं, बल्कि कार्यकर्ताओं की सक्रियता, संगठन की क्षमता और मतदाता संपर्क की कसौटी भी है। दरअसल, लगातार दो कार्यकाल से सत्ता में रही तृणमूल कांग्रेस के सामने स्वाभाविक रूप से सत्ता-विरोधी लहर की बड़ी चुनौती है। कई क्षेत्रों में स्थानीय मुद्दों जैसे रोजगार, उद्योग, कानून-व्यवस्था और ग्रामीण विकास को लेकर असंतोष की चर्चाएँ होती रही हैं। इसके अलावा ममता सरकार का मुस्लिम तुष्टिकरण के लिए हिंदू विरोधी चेहरा भी कई बार उजागर हुआ है। भाजपा इन मुद्दों को प्रमुखता से उठाकर यह संदेश दे रही है कि वह राज्य सुशासन मॉडल प्रस्तुत कर सकती है।
मतदाता सूची संशोधन में 63 लाख फर्जी नाम हटने का मिलेगा फायदा
स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) के बाद संशोधित मतदाता सूची के प्रकाशन के तुरंत बाद यात्रा का आरंभ होना भी राजनीतिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण है। लगभग 63 लाख से अधिक नाम हटाए जाने के बाद मतदाता संरचना में बदलाव आया है। ऐसे में सभी दल अपने-अपने समर्थन आधार को पुनर्गठित करने में जुटे हैं। भाजपा के लिए यह अवसर है कि वह नए मतदाताओं और पहली बार वोट देने वाले युवाओं से सीधा संवाद स्थापित करे। राज्य की जनसांख्यिकी को देखते हुए युवा और महिला मतदाता निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं। भाजपा रोजगार, स्टार्टअप, कौशल विकास और महिला सुरक्षा जैसे मुद्दों को प्रमुखता दे रही है। दूसरी ओर, तृणमूल कांग्रेस को तुष्टिकरण और बढ़ते महिला अपराध और भ्रष्टाचार के आरोपरों से जूझना पड़ रहा है। ऐसे में दोनों दलों के बीच यह प्रतिस्पर्धा चुनावी दंगल को और रोचक बनाएगी।
पारदर्शिता, विकास और केंद्र-राज्य समन्वय से राज्य को नई दिशा
परिवर्तन शब्द बंगाल की राजनीति में नया नहीं है। 2011 में इसी भावनात्मक आह्वान ने सत्ता परिवर्तन का मार्ग प्रशस्त किया था। भाजपा अब उसी शब्द को नए संदर्भ में पुनर्परिभाषित अपने सुशासन की राह बना रही है। बीजेपी का दावा है कि प्रशासनिक पारदर्शिता, विकास की गति और केंद्र-राज्य समन्वय से राज्य को नई दिशा दी जा सकती है। यह नैरेटिव मतदाताओं के बीच बेहद प्रभावी होने वाला है और इसका पता आने वाले कुछ महीनों में और अधिक स्पष्ट हो जाएगा। दरअसल, भाजपा के पक्ष में कुछ कारक स्पष्ट दिखाई देते हैं, जैसे मजबूत संगठनात्मक ढाँचा, केंद्र में सत्तारूढ़ होने का लाभ, राष्ट्रीय नेतृत्व की लोकप्रियता और विपक्षी मतों के विभाजन की पूरी संभावना। पार्टी इन कारकों को प्रभावी रणनीति के साथ जोड़कर विधानसभा चुनाव में मजबूत चुनौती पेश करेगी।
‘परिवर्तन यात्रा’ बनेगी ममता की विदाई का करिश्माई अभियान
पश्चिम बंगाल का राजनीतिक परिदृश्य इस समय संक्रमण के दौर से गुजर रहा है। ‘परिवर्तन यात्रा’ ने चुनावी माहौल को निश्चित रूप से गति दी है और राजनीतिक बहस को नई दिशा दी है। किसी भी राजनीतिक यात्रा की सफलता भीड़ से नहीं, बल्कि उस भीड़ को मत में बदलने की क्षमता से तय होती है। भाजपा बूथ स्तर तक संगठन को सक्रिय कर इसी रणनीति पर काम कर रही है। स्थानीय मुद्दों को प्रभावी ढंग से संबोधित करके यह यात्रा उसके लिए निर्णायक साबित हो सकती है। आने वाले महीनों में यह और स्पष्ट हो जाएगा, जब भाजपा इस ऊर्जा को स्थायी समर्थन में बदल देगी। एक बात स्पष्ट है कि बंगाल की राजनीति फिर एक बार राष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में है, और आगामी चुनाव केवल सत्ता परिवर्तन का प्रश्न नहीं, बल्कि राज्य की भावी दिशा और तृणमूल कांग्रेस का भविष्य तय करने वाले होंगे।
बंगाल में 300 से अधिक रैलियां और 170 प्लस सीटों का लक्ष्य
पश्चिम बंगाल में आगामी विधानसभा चुनाव अब केवल सत्ता की लड़ाई नहीं रह गए हैं, बल्कि यह शासन मॉडल बनाम कुशासन के बीच निर्णायक मुकाबले का रूप ले चुके हैं। बिहार के बाद अब बंगाल में भी भारतीय जनता पार्टी ने बड़े पैमाने पर चुनावी तैयारी शुरू कर दी है। 170 प्लस सीटों का लक्ष्य, 300 से अधिक रैलियां और “परिवर्तन यात्रा” ये सब संकेत साफ बताते हैं कि पार्टी इस बार केवल चुनाव नहीं लड़ रही, बल्कि राज्य की जनता-जनार्दन के कल्याण, विकास और सुशासन के लिए सत्ता परिवर्तन का पूरा रोडमैप लेकर मैदान में उतरी है। दूसरी ओर, तृणमूल कांग्रेस अपने बिछाए चक्रव्यूह में खुद ही फंसती जा रही है। मुस्लिम तुष्टिकरण और हिंदुओं के विरोध की राजनीति ममता बनर्जी की सियासत पर इस बार भारी पड़ने वाली है। दरअसल, बंगाल आज एक निर्णायक मोड़ पर खड़ा है। एक तरफ भाजपा विकास, सुशासन और राष्ट्रीय एकीकरण की बात कर रही है, दूसरी ओर ममता सरकार बचाव की मुद्रा में है। बाबरी यात्रा से लेकर परिवर्तन यात्रा तक हर घटना इस चुनाव को और तीखा बनाने जा रही है। जनता के सामने अब स्पष्ट विकल्प है: पुरानी राजनीति या नई दिशा। आने वाले महीने तय करेंगे कि बंगाल की जनता जनार्दन किस तरह परिवर्तन से नई दिशा दय करने वाली है।
भाजपा ने सीटें तीन कैटेगरी में बांटकर बनाई रणनीति
पश्चिम बंगाल में भाजपा अपने मिशन 170 प्लस के लिए मजबूत सीटों पर ज्यादा जोर लगाएगी। इनमें पिछली बार जीती 77 सीटे ए श्रेणी की हैं। इसके अलावा विभिन्न सामाजिक समीकरणों से उसके लिए अनुकूल स्थिति बनाने वाली 50 सीटें बी और पचास सीटें सी श्रेणी की हैं। पिछले विधानसभा चुनाव में भाजपा व तृणमूल कांग्रेस में साढ़े छह फीसदी से ज्यादा का वोट अंतर था। भाजपा के रणनीतिकारों का मानना है कि ममता सरकार के कुशासन और इंटी इंकम्बेंसी के चलते इस बार ऐसा नहीं होगा। चूंकि राज्य में लगभग सीधा मुकाबला है इसलिए जो भी जनादेश होगा स्पष्ट होगा। पिछली बार तृणमूल कांग्रेस ने 44.91 फीसद मत पाकर 211 सीटें जीती थी, जबकि भाजपा ने 38.15 फीसद वोट हासिल कर 77 सीटें जीती थी। साढ़े छह फीसदी वोट के इस अंतर ने सीटों को लेकर बड़ा अंतर पैदा कर दिया था। आम तौर पर बदलाव की स्थिति में दो से तीन फीसद वोटों का अंतर आता है, भाजपा को सफलता के लिए तृणमूल के लगभग साढ़े तीन फीसद वोट अपनी तरफ लाने होंगे। इसके लिए पार्टी ने सभी सीटों के लिए अलग-अलग रणनीति पर काम शुरू कर दिया है।
परिवर्तन यात्रा: सिर्फ रैली नहीं, माइक्रो-मैनेजमेंट मॉडल
भारतीय जनता पार्टी ने बिहार से बाद पश्चिम बंगाल में प्रचंड जीत हासिल करने के लिए अपने अभियान की रणनीति अभी से बनाना शुरू कर दिया है। यही वजह है कि होली से पहले एक मार्च से शुरू हुई ऐतिहासिक परिवर्तन यात्रा को भाजपा केवल रैलियों की श्रृंखला नहीं, बल्कि एक व्यापक जनसंवाद अभियान बना रही है। इस परिवर्तन यात्रा को गांवों, कस्बों और शहरी इलाकों में एक साथ पहुंचाने की रणनीति बनाई गई है। ताकि हर आयु और हर वर्ग के लोगों के बीच राज्य सरकार के परिवर्तन का बिगुल पूरे जोर-शोर से बज सके। इस यात्रा में बीजेपी के कई स्टार प्रचारकों की मौजूदगी और बूथ स्तर तक संगठनात्मक सक्रियता यह सब संकेत देते हैं कि पार्टी अपने माइक्रो-मैनेजमेंट मॉडल के साथ चुनाव लड़ने जा रही है।
पीएम मोदी का विकास फैक्टर बनाम ममता का विनाश मॉडल
इस चुनाव का सबसे बड़ा ध्रुव प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की लोकप्रियता और केंद्र सरकार की हर वर्ग के लिए जनकल्याणकारी नीतियां हैं। उज्ज्वला से लेकर पीएम आवास, आयुष्मान से लेकर रोजगार मेले, डिजिटल इंडिया से लेकर स्टार्टअप इंडिया और इंफ्रास्ट्रक्चर से लेकर मैन्युफेक्चिंग तक बीते एक दशक से ज्यादा समय में जिस तरह सबका साथ-सबका विकास के मंत्र से योजनाएं जमीन पर उतरी हैं, उसने आम मतदाता के मन में भरोसे की एक मजबूत लकीर खींची है। इसके उलट, ममता बनर्जी का शासन मॉडल लगातार सवालों के घेरे में रहा है। चाहे वह कानून-व्यवस्था हो, निवेश का माहौल हो या फिर युवाओं के लिए रोजगार। महिलाओं के खिलाफ अत्याचार हो या फिर तृणमूल कांग्रेस का भ्रष्टाचार। यह सब भारतीय जनता पार्टी के लिए अगले चुनाव में फायदेमंद होने वाला है।
हर सेक्टर में फेलियर के ठप्पे से जनता में बढ़ रहा असंतोष
इतना ही नहीं, पश्चिम बंगाल में उद्योगों का पलायन, शिक्षक भर्ती से जुड़े विवाद, स्वास्थ्य ढांचे की बदहाली और पंचायत स्तर तक फैला भ्रष्टाचार आदि मुद्दे अब केवल विपक्षी आरोप नहीं रह गए हैं, बल्कि आम नागरिक की रोजमर्रा की बातचीत का हिस्सा बन चुके हैं। भाजपा इन्हीं सवालों को लेकर घर-घर पहुंचने की तैयारी में है। पार्टी का दावा है कि ममता सरकार के दस सालों में बंगाल विकास की दौड़ में बहुत पीछे छूट गया, जबकि पड़ोसी राज्य तेज गति से आगे बढ़ रहे हैं। मोदी सरकार के टकराने की चाहत में ममता बनर्जी से सबसे ज्यादा नुकसान बंगाल की जनता-जनार्दन का ही किया है। यही वजह है कि तृणमूल सरकार के खिलाफ अब हर वर्ग में असंतोष है।
तुष्टिकरण की राजनीति और बाबरी यात्रा का सियासी असर
मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की मुस्लिम तुष्टिकरण नीति किसी से छिपी नहीं है। यहां तक कि वो इसके लिए सनातन और हिंदू विरोध तक उतर आती हैं। अब उन्हीं की पार्टी में विधायक रहे हुमायूं कबीर की बाबरी यात्रा ने आग में घी की काम किया है। बाबरी मस्जिद विवाद के बाद राज्य की राजनीति में तुष्टिकरण का मुद्दा एक बार फिर केंद्र में आ गया है। भाजपा का कहना है कि यह साफ-साफ ममता सरकार की “वोट बैंक आधारित राजनीति” का जीवंत उदाहरण है। पार्टी का तर्क है कि धार्मिक ध्रुवीकरण की इस राजनीति ने सामाजिक ताने-बाने को कमजोर किया है और पश्चिम बंगाल के विकास को पीछे धकेला है। यही कारण है कि भाजपा अब “संतुलित विकास बनाम चयनित तुष्टिकरण” की बहस को धार दे रही है।
तृणमूल कांग्रेस में अंदरूनी खींचतान से रक्षात्मक मुद्रा में आई ममता
भाजपा की आक्रामक तैयारी के बीच तृणमूल कांग्रेस रक्षात्मक मोड में दिखाई दे रही है। नेताओं के बयान बदल रहे हैं, रणनीति बार-बार संशोधित हो रही है और संगठन के भीतर असंतोष की खबरें सामने आ रही हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि जब कोई सत्ताधारी दल विकास के बजाय सफाई देने लगे, तो यह उसके लिए खतरे की घंटी होती है। इस बार चुनावी मैदान में तीसरे विकल्प की गुंजाइश लगभग खत्म होती दिख रही है। पश्चिम बंगाल में कांग्रेस एक ओर हार की तैयारी कर रही है तो मुकाबले से वाम दल भी काफी दूर हैं। इसलिए चुनावी घमासान साफ तौर पर भाजपा और तृणमूल कांग्रेस के बीच सिमट गया है। एक ओर “डबल इंजन सरकार” का वादा है, दूसरी ओर “बंगाल का कुशासन मॉडल” है। मतदाता अब भावनात्मक अपील से आगे बढ़कर ठोस प्रदर्शन की तुलना कर रहा है।
युवा शक्ति, महिला शक्ति और शहरी मतदाता हैं निर्णायक वर्ग
भाजपा की रणनीति में युवा रोजगार, महिलाओं की सुरक्षा और शहरी इंफ्रास्ट्रक्चर प्रमुख मुद्दे हैं। स्टार्टअप संस्कृति, स्किल डेवलपमेंट और केंद्रीय योजनाओं का लाभ—इन सबको उदाहरण बनाकर पार्टी नए मतदाताओं से जुड़ने की कोशिश कर रही है। वहीं, ममता सरकार पर आरोप है कि उसने इन वर्गों की आकांक्षाओं को गंभीरता से नहीं लिया। बंगाल का चुनाव केवल राज्य की सत्ता तय नहीं करेगा, बल्कि यह राष्ट्रीय राजनीति की दिशा भी प्रभावित करेगा। अगर भाजपा यहां मजबूत प्रदर्शन करती है, तो पूर्वी भारत में उसका आधार और गहरा होगा। यही कारण है कि यह चुनाव दोनों दलों के लिए प्रतिष्ठा की लड़ाई बन गया है।









