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कांग्रेस राज में हिमाचल दिवालिया! पहली बार बजट में कटौती और कर्ज 1 लाख करोड़ पार, IAS,IPS,IFS अधिकारियों को वेतन देने के पैसे नहीं

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हिमाचल प्रदेश में कांग्रेस की सुखविंदर सिंह सुक्खू सरकार ने राज्य को दिवालिया बना दिया है। वित्तीय कुप्रबंधन, मुफ्त की योजनाओं, राहुल गांधी और प्रियंका गांधी के चुनावी वादों (‘रेवड़ी कल्चर’) के कारण राज्य का खजाना खाली हो गया है। स्थिति इतनी खराब हो गई है कि सरकार को मंत्रियों और कर्मचारियों को वेतन देने के लिए भी कर्ज लेना पड़ रहा है, जिसकी वजह से कर्ज का बोझ लगातार बढ़ रहा है। इस आर्थिक संकट से निपटने के लिए कांग्रेस की सुक्खू सरकार तरह तरह के हथंकडे अपना रही है। अब सरकार ने राज्य में भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS), भारतीय पुलिस सेवा (IPS) और भारतीय वन सेवा (IFS) के काडर की स्वीकृत संख्या को कम करने के लिए केंद्र सरकार को प्रस्ताव भेजने का निर्णय लिया है, ताकि प्रशासनिक खर्चों और भारी भरकम प्रशासनिक तंत्र के बोझ को कम किया जा सके।

खर्च में कटौती का नया हथकंडा, कैडर कटौती का प्रस्ताव

आईएएस (IAS) पद: स्वीकृत संख्या 153 से घटाकर 130 करने का प्रस्ताव, (यानी 23 अधिकारियों की कमी)

आईएफएस (IFS) पद: स्वीकृत संख्या 118 से घटाकर 83 करने का प्रस्ताव, (यानी 35 अधिकारियों की कमी)

आईपीएस (IPS) पदों की संख्या में भी कटौती पर विचार, फिलहाल 96 IPS पद

सीएम सुक्खू ने बनाया अवश्यकता से अधिक अधिकारियों का बहाना 
हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू ने राज्य सरकार के मुफ्त की योजनाओं में कटौती की जगह अखिल भारतीय सेवा के अधिकारियों की संख्या में कमी करने का फैसला लिया है। उन्होंने दलील दी है कि IAS, IPS और IFS के बहुत अधिक पद हिमाचल प्रदेश में है। इतने अधिक अधिकारियों की हिमाचल प्रदेश को जरूरत नहीं है। हिमाचल प्रदेश में 153 IAS अफसर हैं। हमने IAS कैडर को 153 से 130 करने की कोशिश की है। मेरा विचार इसे 110 करना है लेकिन पहले 130 किया है। इससे सरकार के राजस्व खर्चे में 100-150 करोड़ की कमी आई है। बड़े कैडर को बनाए रखने पर राज्य को हर साल करीब 200 करोड़ रुपये खर्च करने पड़ते हैं। उन्होंने कहा कि सरकार अखिल भारतीय सेवा के अधिकारियों को केंद्रीय प्रतिनियुक्ति का विकल्प चुनने की इजाज़त देती रहेगी और उन्हें तुरंत जाने की मंजूरी भी देगी। 

जल्द ही केंद्र सरकार को भेजा जाएगा प्रस्ताव
अधिकारियों के मुताबिक, अखिल भारतीय सेवा के अधिकारियों की संख्या कम करने का एक औपचारिक प्रस्ताव जल्द ही केंद्र सरकार को भेजा जाएगा। अभी 20 से ज्यादा आईएएस अधिकारी और 12 से ज्यादा आईपीएस और आईएफएस अधिकारी प्रतिनियुक्ति पर हैं, जिनमें से कुछ राज्य में गैर संवर्ग पदों पर हैं। हिमाचल की सुक्खू सरकार ने केंद्र सरकार से अपील करने का फैसला किया है कि केंद्र सरकार राज्य को और ज्यादा केंद्रीय सेवा अधिकारी आवंटित न करे, क्योंकि अनुमान है कि हर अधिकारी पर सालाना खर्च 40 से 50 लाख रुपये के बीच होता है जिसमें वेतन, महंगाई भत्ता, उनसे जुड़े कर्मी और दूसरी सुविधाएं शामिल हैं।

नई भर्ती और नया काम नहीं, 30% संस्थानों को बंद करने का सुझाव
फरवरी 2026 में सीएम सुखविंदर सिंह सुक्खू ने वित्त विभाग से एक प्रेजेंटेशन तैयार करने को कहा था। उस प्रेजेंटेशन में हिमाचल के खजाने की सारी स्थितियों को स्पष्ट करने के लिए कहा था। प्रधान वित्त सचिव देवेश कुमार ने फरवीर के प्रजेंटेशन में कहा था कि कोई नई भर्ती की स्थिति में सरकार नहीं है। मौजूदा स्थिति में जो स्टाफ है, उसी का युक्तिकरण करना होगा, जो संस्थान हैं, उनमें से 30 फीसदी बंद किए जाएं, कोई भी नए काम शुरू करने की स्थिति में सरकार नहीं है। हिमाचल की स्थिति ये है कि नया पे-स्केल तो छोड़ दें, हम पे-रिवीजन का भी नहीं सोच सकते। एचआरटीसी को कोई सब्सिडी नहीं दे पाएंगे। पानी-बिजली के बिल चार्ज करने की सलाह है। एमआईएस की सब्सिडी भी जीरो करनी पड़ेगी।

अधिकारियों और कर्मचारियों के वेतन का 20-30% छह महीने के लिए स्थगित  
वित्त विभाग द्वारा अप्रैल 2026 में जारी एक अधिसूचना के अनुसार, वित्तीय संसाधनों के कुशल प्रबंधन के लिए हिमाचल प्रदेश सरकार के अधिकारियों और कर्मचारियों के वेतन का एक हिस्सा छह महीने के लिए स्थगित कर दिया गया। ये कटौती 30 सितंबर 2026 तक जारी रहेगी। अधिसूचना के अनुसार, यह स्थगन मई 2026 से प्रभावी हुआ। मुख्य सचिव, अतिरिक्त मुख्य सचिवों, प्रधान सचिवों, पुलिस महानिदेशक, अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक, प्रधान मुख्य वन संरक्षक और अतिरिक्त प्रधान मुख्य वन संरक्षक के वेतन का तीस प्रतिशत स्थगित किया गया। इसके अलावा सचिवों, विभागाध्यक्षों, पुलिस महानिरीक्षकों, उप पुलिस महानिरीक्षकों, पुलिस अधीक्षकों, एसपी स्तर तक के पुलिस अधिकारियों, मुख्य वन संरक्षकों, वन संरक्षकों और जिला वन अधिकारी स्तर तक के अन्य वन अधिकारियों के वेतन का बीस प्रतिशत स्थगित कर दिया गया।

कर्मचारियों को 15 फीसदी डीए का भुगतान लंबित, सोशल मीडिया में तंज 
हिमाचल प्रदेश में इस समय कर्मचारियों को 15 फीसदी डीए का भुगतान लंबित है। यदि सारा डीए देना हो तो सरकार के खजाने में करीब दस हजार करोड़ रुपए की रकम इसी मद में चाहिए। गौरतलब है कि
केंद्र सरकार के कर्मचारी 60% डीए पा रहे हैं, जबकि हिमाचल के कर्मचारियों को 45% ही मिल रहा है। फिर कर्मचारी एक्ट खारिज होने के बाद सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर सीनियोरिटी से उपजे वित्तीय लाभ भी करीब-करीब इतने ही होंगे। यानी इन दो मदों में ही 20 हजार करोड़ रुपए चाहिए। यदि चरणबद्ध तरीके से भी भुगतान किया जाए तो भी सरकार को कुछ न कुछ अतिरिक्त इंतजाम करना होगा। वहीं हिमाचल सर्व अनुबंध कर्मचारी संघ ने 15 अगस्त,2026 से पहले सोशल मीडिया में पोस्ट करते हुए लिखा, ‘क्या 15 अगस्त को हिमाचल के कर्मचारियों को डीए मिल जाएगा ? आप सबको कितनी उम्मीद है’ इसके जवाब में नसीब सैनी ने लिखा ‘ओपीएस मिल गई…डीए भूल जाओ’ 

15 अगस्त को भी कर्मचारियों के उम्मीदों पर फिरा पानी
15 अगस्त,2026 के आगमन से पहले ही सोशल मीडिया पर कर्मचारी ग्रुप्स में डीए व एरियर को लेकर तरह-तरह की चर्चाएं थीं। कुछ को उम्मीद थी कि कम से कम तीन फीसदी की किश्त मिल जाएगी, लेकिन बहुत से लोग ये मान कर चल रहे थे कि डीए की घोषणा नहीं होगी। न्यू पेंशन स्कीम कर्मचारी महासंघ के नेता राजिंद्र मन्हास ने कर्मचारियों से सवाल किया था कि कितने साथियों को मेरी तरह लगता है कि डीए की घोषणा नहीं होगी? उसमें कमेंट बॉक्स में अधिकांश का मत यही था कि डीए मिलने के आसार न के बराबर हैं। जैसे ही 15 अगस्त को सीएम सुखविंदर सिंह सुक्खू का संबोधन खत्म हुआ, सोशल मीडिया कर्मचारियों के तंज से भर गया।

खजाना खाली, डीए फ्रीज करने और OPS की जगह UPS का सुझाव
प्रधान वित्त सचिव देवेश कुमार ने फरवरी 2026 के प्रेजेंटेशन में सभी आंकड़ों को स्पष्ट करते हुए राज्य सरकार को सलाह दी थी कि अभी स्थिति ऐसी है कि डीए फ्रीज करना होगा और एरियर की देनदारी संभव नहीं है। यही नहीं, ओपीएस की जगह यूपीएस का विकल्प देखने की बात भी देवेश कुमार ने कही थी। देवेश कुमार ने याद दिलाया कि ओपीएस जब लागू की थी तो हिमाचल को 1800 करोड़ रुपए के एडिशनल लोन की कटौती का सामना करना पड़ा था। देवेश कुमार ने प्रेजेंटेशन में बताया था कि कर्मचारियों व पेंशनर्स के लिए पिछले वेतन आयोग के एरियर का 8500 करोड़ रुपए बकाया है। इसके अलावा पांच हजार करोड़ रुपए का डीए व डीआर एरियर बकाया है, सरकार ये नहीं दे पाई है। वित्त सचिव ने इसी दौरान टिप्पणी की-सर, मैं यहां कहना चाहूंगा कि ये रकम हम दे भी नहीं पाएंगे। क्योंकि हमारे पास धन ही नहीं है। इसके साथ ही आगे भी डीए व डीआर देने की स्थिति में नहीं है। 

इतिहास में पहली बार बजट के आकार में कटौती 
फरवरी में प्रधान वित्त सचिव ने अपनी प्रेजेंटेशन में खजाने की दयनीय हालत का वर्णन किया और फिर मार्च महीने में सुक्खू सरकार के बजट में उसका असर दिख गया। हिमाचल के इतिहास में पहली बार बजट के आकार में कटौती की गई। गौरतलब है कि इस बार वित्त वर्ष 2026-27 के लिए सीएम सुक्खू ने 54,928 करोड़ रुपये का बजट पेश किया। जबकि पिछली बार वित्त वर्ष 2025-26 के लिए 58,514 करोड़ का बजट था। इस हिसाब से ये अंतर 3586 करोड़ रुपये का था। यही नहीं, सीएम, कैबिनेट मिनिस्टर्स व अफसरों-कर्मियों की सेलेरी भी स्थगित (डेफर) की गई।

इतिहास में पहली बार कर्ज 1 लाख करोड़ के पार 
हिमाचल सरकार की बजट रिपोर्ट के अनुसार, 31 मार्च 2025 तक हिमाचल प्रदेश की कुल देनदारियां 1 लाख 4 हजार 410 करोड़ रूपए तक पहुंच गई हैं, जो राज्य के इतिहास में पहली बार 1 लाख करोड़ के पार गई। पिछले वित्तीय वर्ष में यह आंकड़ा 96 हजार 522 करोड़ रूपए था, जिससे साफ है कि कर्ज का बोझ तेजी से बढ़ रहा है। वित्तीय वर्ष 2024-25 की रिपोर्ट में राज्य का सार्वजनिक कर्ज भी बढ़कर 75 हजार 554 करोड़ रुपये हो गया है, जबकि एक साल पहले यह 70 हजार 369 करोड़ था। वर्ष 2024–25 के दौरान सरकार ने 26 हजार 622 करोड़ रुपये का नया कर्ज लिया और 18 हजार 168 करोड़ की अदायगी की, जिससे कुल कर्ज में शुद्ध वृद्धि दर्ज हुई। कैग (Comptroller and Auditor General of India) की रिपोर्ट के अनुसार कुल राजस्व का लगभग 79% केवल वेतन, पेंशन, और कर्ज के ब्याज के भुगतान में चला जाता है।

हिमाचल पर कैसे बढ़ा कर्ज का बोझ ?

पुरानी पेंशन योजना (OPS) :  पुरानी पेंशन योजना (OPS) को पुनः लागू करने के कारण राज्य सरकार के बजट पर अतिरिक्त वार्षिक वित्तीय बोझ पड़ा है, जिससे प्रतिबद्ध देनदारियां बढ़ गई हैं। ओपीएस बहाल होने से राज्य के लगभग 1.36 लाख कर्मचारियों को लाभ मिला, लेकिन कैग (CAG) और रिजर्व बैंक ने चेतावनी दी है कि इससे भविष्य में पेंशन का खर्च कई गुना बढ़ जाएगा। 

महिलाओं को 1500 रुपये प्रतिमाह : राज्य की लाखों महिलाओं को 1500 रुपये प्रतिमाह देने के वादे से सरकारी खजाने पर सालाना सैकड़ों करोड़ रुपये का अतिरिक्त बोझ पड़ा। सीमित राजस्व संग्रह के कारण इस योजना को पूरी तरह लागू करने में सरकार को भारी कठिनाई का सामना करना पड़ रहा है।

मुफ्त बिजली और पानी : राज्य में घरेलू उपभोक्ताओं को मुफ्त बिजली और ग्रामीण क्षेत्रों में मुफ्त पानी देने से राज्य बिजली बोर्ड (HPSEB) और जल शक्ति विभाग का घाटा काफी बढ़ गया। सब्सिडी का भुगतान समय पर न होने से इन बोर्डों की वित्तीय स्थिति चरमरा गई।

कृषि और पशुपालन से जुड़ी सब्सिडी:  कृषि और पशुपालन से जुड़ी सब्सिडी योजनाओं ने भी राज्य के बजट में गैर-उत्पादक व्यय (Non-Developmental Expenditure) को बढ़ाया।

वेतन, पेंशन और सब्सिडी पर बढ़ते खर्च :  राजस्व स्रोत सीमित होने के कारण, राज्य इन प्रतिबद्धताओं को पूरा करने के लिए उधार पर तेजी से निर्भर हो गया है। प्रदेश का सालाना वेतन और पेंशन का भुगतान लगभग 27,000 करोड़ रुपये है, जबकि अपने स्रोतों से कुल राजस्व करीब 18,000 करोड़ रुपये ही आता है।

आंतरिक आय के साधन सीमित : पर्यटन, जलविद्युत और कृषि पर आधारित अर्थव्यवस्था होने के कारण राज्य के आंतरिक आय के साधन सीमित हैं, जबकि कल्याणकारी योजनाओं और प्रशासनिक खर्चों का दबाव लगातार बना हुआ है।

बढ़ता बजट घाटा (Budget Deficit) : हिमाचल सरकार की सलाना आय – 42 हजार करोड़ रुपये, सलाना खर्च – 48 हजार करोड़ रुपये और हर साल 6000 करोड़ रुपये से अधिक का बजट घाटा।

 

 

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