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कृषि कानून पर पीएम मोदी ने देश से मांगी माफी: 2007 में लेफ्ट के सीएम ने जमीन के लिए नंदीग्राम को बना दिया था ‘बूचड़खाना’

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देशहित के लिए, अन्नदाता के आंदोलन का सम्मान करते हुए, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 19 नवंबर, 2021 की सुबह 9 बजे राष्ट्र के नाम संबोधन में तीन कृषि कानूनों को वापस लेने की घोषणा कर दी। प्रधानमंत्री मोदी ने जो फैसला किया उसे सारे देश का समर्थन मिल रहा है। कृषि कानूनों की वापसी का ऐलान करते हुए पीएम मोदी ने क्षमा मांगते हुए जो बातें कहीं, उसने देशवासियों का दिल जीत लिया। लेकिन देश में दूसरे दलों की सरकारों ने किसानों के आंदोलनों के दौरान, हैवानियत का कैसे खेल खेला इसके कई उदाहरण देखने को मिलते हैं। नंदीग्राम में अन्नदाता के खिलाफ लाल ताण्डव को सारी दुनिया ने देखा। 

साल 2007 में नंदीग्राम में किसानों ने हक की आवाज उठाई तो अंजाम देखिए-10 महीने के आंदोलन में 42 लोगों की गई थी जान 

पश्चिम बंगाल में लेफ्ट के राज में हुई इस हिंसा का मंजर दिल दहलाने वाला था, महज 10 महीनों के किसानों के आंदोलन में 42 किसानों को अपनी जान गंवानी पड़ी थी, 100 से ज्यादा लोग लापता हो गए। आरोप लगे की इनमें से कई किसानों की लाशें तक नहीं मिल पाईं। टीएमसी पश्चिम बंगाल में लंबे वक्त तक सत्ता में रहने के बाद भी अपराधियों को सज़ा दिलाने के लिए कुछ क्यों नहीं कर पाई?

लेफ्ट के राज में पुलिस ने 14 लोगों को गोलियों से भूना

नंदीग्राम में एसईजेड बनाने को लेकर, तब की लेफ्ट की सरकार ने जम कर हिंसा का तांडव मचाया था। दरअसल नदींग्राम में SEZ नीति के लिए किसानों के स्वामित्व वाली 10,000 एकड़ (4,000 हेक्टेयर) जमीन की जरूरत थी। लेकिन किसानों ने जमीन अधिग्रहण का विरोध शुरू कर दिया। नंदीग्राम के किसानों को अपनी जमीन बचाने के लिए 14 साल पहले बड़ी कुर्बानी देनी पड़ी थी, कभी बेहद शांत रहने वाले इस इलाके में सीविल वॉर के हालात बन गए। नंदीग्राम में जमीन बचाने के लिए किसानों का प्रदर्शन प्रचंड बहुमत के साथ सत्ता में आए बुद्धदेब सरकार को रास नहीं आ रहे थे। 14 मार्च 2007 को सीएम बुद्धदेब भट्टाचार्य के आदेश पर 2500 पुलिसकर्मियों का दस्ता नंदीग्राम में दाखिल हो गया। साथ थे सीपीएम के 400 कट्टर कार्यकर्ता। नंदीग्राम में किसानों और भूमि उच्छेद प्रतिरोध कमेटी के सदस्यों को निशाना बनाया गया, उनकी हत्या की गई। उस काले दिन पश्चिम बंगाल में लेफ्ट की सरकार ने निर्दोष किसानों पर फायरिंग की, इस हिंसा के तांडव में कई किसानों की लाशें तक नहीं मिली। पुलिस से हुए टकराव के दौरान पुलिस फायरिंग में 14 किसानों की मौत हो गई और 70 लोग घायल हो गए। पश्चिम बंगाल के नदीग्राम में हिंसा का मंजर दिल दहलाने वाला था।

2007 नंदीग्राम  हिंसा के दौरान 40 से अधिक महिलाओं के साथ बलात्कार-बलात्कार पीड़िताओं को अब भी न्याय का इंतजार

2007 में नंदीग्राम हिंसा के दौरान बड़ी तादाद में महिलाओं की आबरू पर हमला हुआ। नंदीग्राम हिंसा के दौरान सीपीआई (एम) के कार्यकर्ताओं पर करीब  300 महिलाओं से छेड़छाड़ और बलात्कार के आरोप लगे। नंदीग्राम आंदोलन को 14 साल गुजर चुके हैं । लेकिन इस आंदोलन में जिन परिवारों ने अपनों को खोया और जिन महिलाओं की आबरू पर हमला हुआ, उन्हें आज भी इंसाफ का इंतजार है। नंदीग्राम में किसानों के दमन के बाद साल 2007 में SEZ परियोजना को रद्द कर दिया गया। तब नंदीग्राम में अपनी पार्टी के कार्यकर्ताओं द्वारा हिंसा का समर्थन करते हुए, बुद्धदेव भट्टाचार्य ने पहले कहा था “उन्हें (विपक्षों को) एक ही सिक्के में वापस भुगतान किया गया है।”

नंदीग्राम में किसानों के खिलाफ हुई हिंसा ने देश को शर्मसार कर दिया 

नंदीग्राम में हुई लेफ्ट के इशारे पर हुई हिंसा ने देश को शर्मसार कर दिया, इस हिंसा के बाद कई लापता लोगों का पता नहीं चला। हिंसा से जुड़ी खबरों को दबाने के लिए तब की पश्चिम बंगाल सरकार ने हर दांव आजमाया। बात में पता चला की नंदीग्राम में पुलिस और किसानों के बीच हिंसा के दौरान मौके से भारी मात्रा में ऐसी गोलियों की बरामदगी भी हुई, जो पुलिस टीम की नहीं थी। एमनेस्टी इंटरनेशनल जैसी संस्थाओं ने भी नंदीग्राम में हुई हिंसा के लिए तब की पश्चिम बंगाल सरकार की आलोचना की, जिससे दुनियाभर का ध्यान इस घटना की तरफ गया। 12 नवंबर 2007 को, राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने भी पश्चिम बंगाल के मुख्य सचिव को नंदीग्राम के हालात पर 10 दिनों के भीतर रिपोर्ट देने को कहा।

नंदीग्राम में लेफ्ट सरकार के हिंसा के तांडव पर भड़का गुस्सा 

हिंसा के लोकर तब फिल्म निर्देशक अपर्णा सेन ने तब कहा था ” नंदीग्राम एक बूचड़खाना बन गया है जहां हर दिन खून बहाया जा रहा है” लेकिन नंदीग्राम में हिंसा की आग 2007 में ही नहीं बुझी, साल 2008 में भी बीयूपीसी और सीपीआई (एम) समर्थकों के बीच हिंसा हुई। एक बार फिर महिलाओं के साथ ज्यादती की गई।

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