प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भारत के डिजिटल सफर में एक बड़ा मील का पत्थर जुड़ गया है। यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस यानी UPI- यूपीआई ने अपने 10 गौरवशाली साल पूरे कर लिए हैं। साल 2016 में शुरू हुआ यह प्लेटफॉर्म आज देश की डिजिटल अर्थव्यवस्था की रीढ़ बन चुका है और आम लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी का अहम हिस्सा भी।

आज से 10 साल पहले जब 11 अप्रैल 2016 को भारतीय रिजर्व बैंक की निगरानी में नेशनल पेमेंट्स कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (NPCI) ने UPI को लॉन्च किया था, तब यह एक छोटा सा प्रयोग नजर आता था। उस वक्त महज 21 बैंक इसके साथ जुड़े थे। लेकिन आज, एक दशक बाद, यह दुनिया का सबसे बड़ा रियल-टाइम पेमेंट प्लेटफॉर्म बन चुका है। जो भारत कभी नकदी पर निर्भर था, आज वही भारत दुनिया के कुल रियल-टाइम डिजिटल ट्रांजैक्शन का करीब 49 प्रतिशत हिस्सा अकेले संभाल रहा है।

ट्रांजैक्शन में 12,000 गुना की छलांग
पिछले एक दशक में यूपीआई ने जो रफ्तार पकड़ी है, वह किसी डिजिटल क्रांति से कम नहीं है। वित्त वर्ष 2016-17 में जहां पूरे साल में सिर्फ 2 करोड़ ट्रांजैक्शन हुए थे, वहीं वित्त वर्ष 2025-26 में यह आंकड़ा बढ़कर 24,162 करोड़ के पार निकल गया है। यह लेन-देन की मात्रा में लगभग 12,000 गुना की जबरदस्त बढ़ोत्तरी है।

सिर्फ ट्रांजैक्शन की संख्या ही नहीं, बल्कि उनकी वैल्यू में भी भारी उछाल देखने को मिला है। वैल्यू की बात करें तो 2016-17 में शुरुआत 0.07 लाख करोड़ रुपये से हुई थी, जो अब बढ़कर 314 लाख करोड़ रुपये से अधिक हो गई है। यह दिखाता है कि यूपीआई अब छोटे भुगतानों के साथ-साथ बड़े ट्रांजैक्शन का भी भरोसेमंद माध्यम बन गया है।

आम आदमी की पहली पसंद: चाय की टपरी से मॉल तक
यूपीआई की सबसे बड़ी ताकत इसकी सरलता और तेजी है। मोबाइल फोन के जरिए कुछ सेकंड में पैसे ट्रांसफर करना आज आम बात हो गई है। यही वजह है कि देश में डिजिटल भुगतान का करीब 85 प्रतिशत हिस्सा अब यूपीआई के जरिए ही हो रहा है। इसने सबसे बड़ा बदलाव हमारे रोजमर्रा के खर्चों में किया है।

रिपोर्ट बताती है कि कुल ट्रांजैक्शन में 63 प्रतिशत हिस्सा पर्सन-टू-मर्चेंट (P2M) यानी दुकानों को भुगतान का है, जो इसकी लोकप्रियता को दर्शाता है। इसमें भी चौंकाने वाली बात यह है कि 86 प्रतिशत मर्चेंट पेमेंट 500 रुपये से कम के होते हैं। यह साबित करता है कि चाय, सब्जी और छोटे किराना सामान के लिए अब लोग चिल्लर की जगह यूपीआई को ही प्राथमिकता दे रहे हैं। वहीं, पर्सन-टू-पर्सन ट्रांजैक्शन वैल्यू के लिहाज से सबसे आगे हैं और कुल वैल्यू में 71 प्रतिशत योगदान देते हैं। इसका मतलब साफ है कि लोग अब बड़े अमाउंट के ट्रांसफर के लिए भी यूपीआई पर भरोसा कर रहे हैं।

700+ बैंकों का साथ और वैश्विक पहचान
शुरुआत में सिर्फ 21 बैंकों के साथ शुरू हुआ यह सफर आज 703 सक्रिय बैंकों तक पहुंच गया है। अब चाहे सरकारी बैंक हो, प्राइवेट हो या गांव का सहकारी बैंक, यूपीआई ने सबको एक धागे में पिरो दिया है। आईएमएफ (IMF) ने भी अपनी जून 2025 की रिपोर्ट में माना है कि भारत का यह सिस्टम न केवल स्केलेबल है, बल्कि पूरी दुनिया के लिए एक मिसाल है।

सात समंदर पार ‘मेड इन इंडिया’ का जलवा
यूपीआई अब सिर्फ भारत तक सीमित नहीं है। यह एक ग्लोबल ब्रांड बन चुका है। दुनिया के कुल रियल-टाइम डिजिटल ट्रांजैक्शन में भारत का हिस्सा करीब 49 प्रतिशत हो गया है। औसतन हर दिन 66 करोड़ से अधिक लेन-देन के साथ, यूपीआई ने वैश्विक भुगतान नेटवर्क को पीछे छोड़ दिया है। वर्तमान में संयुक्त अरब अमीरात (UAE), सिंगापुर, फ्रांस, भूटान, नेपाल, श्रीलंका और मॉरीशस जैसे 8 देशों में यूपीआई का परचम लहरा रहा है। कतर में भी इसके जल्द शुरू होने की तैयारी है। अब भारतीय पर्यटकों को विदेश में विदेशी मुद्रा के लिए परेशान नहीं होना पड़ता, उनका मोबाइल ही उनका ग्लोबल वॉलेट बन गया है।

दिसंबर 2025: रिकॉर्ड्स का महीना
बीते कुछ महीने यूपीआई के लिए ऐतिहासिक रहे हैं। अगस्त 2025 में पहली बार मासिक लेन-देन 2,000 करोड़ के पार पहुंचा, वहीं दिसंबर 2025 ने 2,163 करोड़ ट्रांजैक्शन के साथ सर्वकालिक रिकॉर्ड बनाया। यह रफ्तार दिखाती है कि डिजिटल इंडिया का सपना अब एक हकीकत है।

यूपीआई के अगले 10 साल और भी रोमांचक होने वाले हैं। सरकार और एनपीसीआई अब इसे नए उपयोगकर्ताओं और व्यापारियों तक ले जाने के लिए तकनीकी बदलावों पर काम कर रहे हैं। जिस तरह से पिछले 10 वर्षों में यूपीआई ने अर्थव्यवस्था का आधार बनकर 85 प्रतिशत डिजिटल भुगतान पर कब्जा किया है, उससे साफ है कि आने वाले समय में वित्तीय समावेशन और अधिक गहरा होगा।










