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सबूत नंबर 8: मुस्लिम वोटों पर निर्भर सपा ममता की तरह मात खायेगी?

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उत्तर प्रदेश की राजनीति में समाजवादी पार्टी की रणनीति लंबे समय से मुस्लिम मतदाताओं के मजबूत समर्थन पर आधारित रही है। लेकिन 2027 के चुनावी रण में परिस्थितियां पूरी तरह बदल चुकी हैं। कांग्रेस का जनाधार लगभग समाप्त हो चुका है और बसपा भी पहले जैसी निर्णायक लड़ाई में दिखाई नहीं देती। ऐसे में मुकाबला सीधा भाजपा और सपा के बीच होने की संभावना है, जहां एक तरफ अखिलेश यादव की मुस्लिम केंद्रित राजनीति पर सवाल उठेंगे तो दूसरी तरफ योगी आदित्यनाथ का “एक हैं तो सेफ हैं” का संदेश और हिंदू एकजुटता की रणनीति होगी। यही समीकरण आगामी चुनाव की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभा सकते हैं। हाल ही में हुए पश्चिम बंगाल के चुनाव परिणामों को देखते हुए आसानी से कहा जा सकता है कि उत्तर प्रदेश में भी बंगाल की तरह व्यापक हिंदू राजनीतिक एकजुटता बनी रहती है, तो केवल मुस्लिम समर्थन के सहारे किसी दल के लिए सत्ता तक पहुंचना बेहद कठिन होगा।प्रदेश की 80 प्रतिशत से अधिक गैर-मुस्लिम आबादी होगी अहम
उत्तर प्रदेश में मुस्लिम मतदाता लगभग 19 प्रतिशत हैं और कई सीटों पर उनकी भूमिका प्रभावी है, लेकिन प्रदेश की 80 प्रतिशत से अधिक गैर-मुस्लिम आबादी के सामने केवल इसी आधार पर सत्ता तक पहुंचने की चुनौती आसान नहीं मानी जाती। पिछले वर्षों में भाजपा ने सवर्ण, पिछड़े, दलित और अन्य वर्गों के बीच अपनी पहुंच मजबूत करने का प्रयास किया है। यदि हिंदू मतों का बड़ा हिस्सा जातीय सीमाओं से ऊपर उठकर एकजुट रहता है, तो चुनावी गणित पूरी तरह बदल सकता है। यही वजह है कि 2027 की लड़ाई केवल वोट बैंक की नहीं, बल्कि व्यापक सामाजिक स्वीकार्यता और राजनीतिक विस्तार की परीक्षा होगी। पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी के सामने जिस तरह हिंदू ध्रुवीकरण की चुनौती उभरी, उसी प्रकार उत्तर प्रदेश में भी अखिलेश यादव के सामने सबसे बड़ा प्रश्न यह होगा कि क्या वे मुस्लिम-यादव समर्थन के सहारे अपनी नैया पार लगा पाएंगे। वह भी तब जब एक दशक में योगी आदित्यनाथ ने प्रदेश में चतुर्दिक विकास औ सौहार्द्र और सुशासन की गंगा-यमुना बहा दी है।

आइए, सबूतों और तथ्यों के आधार पर जानते हैं कि समाजवादी पार्टी का MY (मुस्लिम प्लस यादव) फेक्टर अगले साल के विधानसभा चुनाव में कितना प्रभावी रह सकता है….

सबूत नंबर-1:
यूपी में मुस्लिम मतदाताओं की संख्या और उनकी राजनीतिक सीमा
उत्तर प्रदेश में मुस्लिम आबादी लगभग 19-20 प्रतिशत के आसपास मानी जाती है। कई जिलों विशेषकर पश्चिमी उत्तर प्रदेश, रुहेलखंड और कुछ पूर्वी इलाकों में इनकी संख्या काफी प्रभावशाली है। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार करीब एक चौथाई विधानसभा सीटों पर मुस्लिम मतदाता चुनावी परिणामों को प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं, क्योंकि वहां उनकी जनसंख्या 20 प्रतिशत या उससे अधिक है। वे अपने अकेले के दम पर किसी सीट को जिता पाएं, यह क्षमता मुस्लिम वोटों में कहीं नहीं है। यही वजह है कि आगामा चुनाव में दूसरे पक्ष का गणित मजबूत हो जाता है। उत्तर प्रदेश में लगभग 80 प्रतिशत आबादी गैर-मुस्लिम है। किसी भी दल को राज्य की विधानसभा सीटों पर स्पष्ट बहुमत प्राप्त करने के लिए व्यापक सामाजिक गठबंधन की आवश्यकता होती है। केवल एक समुदाय या सीमित जातीय समीकरण के आधार पर पूरे प्रदेश में विजय प्राप्त करना कठिन है। फिलहाल अखिलेश यादव इसी रास्ते पर चल रहे हैं।सबूत नंबर- 2:
मुस्लिम तुष्टिकरण की नीति से ममता जैसा हो सकता है हश्र
उत्तर प्रदेश की समाजवादी पार्टी की तरह ही पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस को मुस्लिम मतों का बड़ा समर्थन मिलता रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक उनकी पिछली जीतों में मुस्लिमों का भी योगदान रहा है। लेकिन इस बार मुस्लिमों के साथ ही हिंदू मतों के भी ध्रुवीकरण से सारी कहानी बदल गई। पश्चिम बंगाल में भारी संख्या में हिंदू मतदाताओं ने बीजेपी के पक्ष में मतदान किया और नतीजों ने तृणमूल कांग्रेस को बाहर का रास्ता दिखा दिया। चुनाव के बाद तो टूटती-फूटती तृणमूल कांग्रेस की स्थिति और भी बदतर हो गई है। जानकारों का कहना है कि अभी तो अखिलेश यादव सिर्फ मुस्लिम तुष्टिकरण की नीति पर ही काम करने में लगे हैं, जिनका हश्र ममता बनर्जी जैसा हो सकता है। विश्लेषकों का तर्क है कि यदि उत्तर प्रदेश में भी हिंदू वोटों का व्यापक ध्रुवीकरण होता है, तो केवल मुस्लिम समर्थन के आधार पर किसी दल के लिए सत्ता तक पहुंचना नामुमकिन ही है।सबूत नंबर-3:
MY फेक्टर बनने के बाद ही अखिलेश के लिए चुनौती क्यों?
जातीय राजनीति करने वाली समाजवादी पार्टी का एक और आधार यादव समुदाय भी है। यादवों की आबादी उत्तर प्रदेश में लगभग 9-10 प्रतिशत के आसपास आंकी जाती है। यदि मुस्लिम और यादव (माई फेक्टर) मतों का बड़ा हिस्सा सपा के पक्ष में एकजुट हो भी जाता है, तो भी यह कुल मत प्रतिशत का लगभग 28-30 प्रतिशत ही बनते हैं। उत्तर प्रदेश की चुनावी राजनीति में बहुमत के लिए अक्सर 40 प्रतिशत या उससे अधिक मतों का समर्थन निर्णायक साबित होता है। यही कारण है कि राजनीतिक विशेषज्ञ लगातार कहते रहे हैं कि बीजेपी गैर-यादव पिछड़ा वर्ग, दलितों और सामान्य वर्ग के मतदाताओं में भी अपनी पकड़ मजबूत बना चुकी है। ऐसे में बीजेपी के किले में सेंध लगाना अखिलेश के लिए मुश्किल होगा।सबूत नंबर-4:
यूपी में गैर-यादव ओबीसी राजनीति का बदलता समीकरण
2014 के बाद भारतीय जनता पार्टी की सबसे बड़ी रणनीतिक सफलता गैर-यादव पिछड़े वर्गों जैसे कुर्मी, मौर्य, शाक्य, निषाद, लोध, राजभर और अन्य कई समुदायों के बीच अपना जबर्दस्त प्रभाव को बढ़ाना रही है। ना सिर्फ राज्य स्तर पर, बल्कि केंद्र के स्तर पर इन समुदायों के फायदे के लिए कई योजनाएं आई हैं, जिनसे एक बड़ा वर्ग लाभांवित हुआ है। सपा की सबसे बड़ी चुनौती यह रही है कि वह सिर्फ मुस्लिम-यादव-केंद्रित राजनीति करती है। हालांकि सपा इन आरोपों को खारिज करते हुए खुद को सभी पिछड़ों की पार्टी बताती है, लेकिन चुनावी आंकड़े दिखाते हैं कि गैर-यादव ओबीसी वर्ग में उसे व्यापक विस्तार की आवश्यकता है। यह पूरा वर्ग बीजेपी के साथ शिद्दत से जुड़ा है।सबूत नंबर-5:
“एक हैं तो सेफ हैं” और हिंदू एकीकरण की राजनीति
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ द्वारा दिया गया “एक हैं तो सेफ हैं” का संदेश भाजपा की व्यापक हिंदुत्व आधारित राजनीतिक रणनीति का हिस्सा माना जाता है। भाजपा की कोशिश रही है कि विभिन्न जातियों में बंटे हिंदू मतदाता एक साझा राजनीतिक पहचान के आधार पर मतदान करें। यही रणनीति पश्चिम बंगाल के चुनाव में प्रभावी रही थी और इसी को अब उत्तर प्रदेश के चुनाव में भी लागू किया जाएगा। यह रणनीति चुनाव में प्रभावी रहती है और बड़ी संख्या में हिंदू मतदाता भाजपा के साथ एकजुट रहेंगे, तो मुस्लिम मतों का असर केवल उन्हीं सीटों तक सीमित हो सकता है जहां उनकी जनसंख्या बहुत अधिक है।

सबूत नंबर-6:
2012 की जीत और वर्तमान परिस्थितियों में अंतर
2012 में समाजवादी पार्टी को बसपा सरकार के खिलाफ सत्ता विरोधी लहर का फायदा मिला था। मुस्लिम-यादव समीकरण के साथ-साथ उसे अन्य पिछड़े वर्गों और कुछ अन्य समूहों से भी समर्थन प्राप्त हुआ था। लेकिन इस बार सेवा, सुशासन और समृद्धि की त्रिवेणी के बीच एंटी एन्कम्बेंसी नजर नहीं आ रही है। पीएम मोदी की सबका साथ, सबका विकास की नीति उत्तर प्रदेश में भी तेजी से काम कर रही है। योगी की युवाओं के बीच लोकप्रियता और कई सामाजिक वर्गों के समर्थन का लाभ बीजेपी को मिल रहा है। इसलिए वर्तमान राजनीतिक परिस्थिति एकदम अलग है। भाजपा लगातार तीन लोकसभा चुनावों में उत्तर प्रदेश में मजबूत प्रदर्शन कर चुकी है और संगठनात्मक स्तर पर बूथ तक अपनी पहुंच मजबूत कर चुकी है। इसलिए सपा के सामने चुनौती पहले की तुलना में कहीं अधिक जटिल है।

सबूत नंबर-7:
चुनाव जीतने के लिए व्यापक सामाजिक गठबंधन की जरूरत
भारत जैसे विविधतापूर्ण समाज में कोई भी बड़ा राजनीतिक दल केवल अपने पारंपरिक समर्थकों के सहारे लंबे समय तक सत्ता में नहीं रह सकता। भाजपा ने अपने आधार को गैर-परंपरागत वर्गों तक फैलाने की कोशिश की है, वहीं समाजवादी पार्टी के लिए भी गैर-यादव पिछड़े, दलित, महिला और युवा मतदाताओं के बीच स्वीकार्यता बढ़ाना राजनीतिक आवश्यकता बन गई है। इसलिए 2027 की लड़ाई केवल MY बनाम हिंदू एकता के साथ-साथ व्यापक जनसमर्थन पाने की भी होगी। उत्तर प्रदेश का आगामी चुनाव केवल जातीय या धार्मिक गणित का मुकाबला नहीं होगा, बल्कि यह इस बात की परीक्षा भी होगी कि कौन सा दल अपने पारंपरिक वोट बैंक से आगे बढ़कर नए सामाजिक वर्गों को अपने साथ जोड़ पाता है।सबूत नंबर – 8:
स्थिरता, सेवा, सुशासन और विकास की त्रिवेणी
उत्तर प्रदेश में सालों बाद किसी एक सरकार को कार्यकाल पूरा करने के बाद भी जनता ने रिपीट किया था। सालों बाद ही सीएम के रूप में लगातार दस साल पूरा करने वाले योगी की लोकप्रियता हर वर्ग में निरंतर बढ़ रही है। अपराधियों, माफिया और गुंडा तत्वों के लिए काल बन जाने वाले योगी देशभर में बुलडोजर बाबा के नाम से यूं ही मशहूर नहीं है। उन्होंने ना सिर्फ कानून-व्यवस्था पर मजबूत पकड़ बनाई है, बल्कि अपने कार्यकाल में यूपी में कोई बड़ा दंगा भी नहीं होने दिया। यूपी के धार्मिक स्थलों का उनके कार्यकाल में निरंतर कायाकल्प हो रहा है। इसलिए 2027 की असली राजनीतिक लड़ाई विकासवाद बनाम माफियावाद के बीच भी होगी। अखिलेश यादव MY समीकरण भाजपा के “एक हैं तो सेफ हैं” के संदेश के बीच भी होगी।

 

 

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