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चौतरफा घिरी मान सरकार! नशे का चक्रव्यूह, कर्मचारियों का अल्टीमेटम और पंजाब में बढ़ता जनआक्रोश

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पंजाब की भगवंत मान सरकार अगले साल विधानसभा चुनाव से पहले लगातार नए मोर्चों से घिरती दिखाई दे रही है। नशे के मुद्दे पर विपक्ष के हमले, कानून-व्यवस्था को लेकर उठते सवाल और अब सरकारी कर्मचारियों का असंतोष सरकार के सामने चुनौती बन रहा है। दरअसल, पंजाब में नशा अब केवल कानून-व्यवस्था का मुद्दा नहीं रह गया है। यह परिवारों के टूटने, युवाओं के भविष्य के बिखरने और गांव-गांव तक सामाजिक संकट का सवाल बन चुका है। इसी पृष्ठभूमि में भाजपा ने 18 सितंबर 2026 से ‘नशा मुक्त पंजाब यात्रा’ शुरू की है। दूसरी ओर पंजाब रोडवेज, PUNBUS और PRTC के संविदा कर्मचारियों ने लंबे समय से लंबित मांगों को लेकर सरकार को 24 सितंबर तक का अल्टीमेटम दिया है। यदि उनकी मांगे नहीं मानी गईं तो इस दिन परिवहन मंत्री से बैठक के बाद वे बसों का चक्का जाम कर देंगे। पंजाब सरकार से और भी विभागों के कर्मचारी नाराज हैं और आंदोलित हैं। कर्मचारियों का आरोप है कि चार वर्षों में करीब 59 दौर की बातचीत के बावजूद भी सरकार ठोस समाधान निकालने में नाकाम रही है। पंजाब को चुनावी नारों से ज्यादा प्रशासनिक स्थिरता चाहिए। अब कर्मचारियों को केवल आश्वासन नहीं, आदेश चाहिए।

‘नशा मुक्त यात्रा’ के साथ पंजाब की सड़कों पर उतरी भाजपा
नशे के खिलाफ पंजाब में सड़कों पर उतरी भाजपा की ‘नशा मुक्त यात्रा’ जनआंदोलन बन रही है। यह यात्रा राज्य की चार दिशाओं से निकली है। ये यात्राएं करीब 4,000 किलोमीटर की दूरी तय करते हुए राज्य की सभी 117 विधानसभा सीटों को कवर करेगी। नशे के खिलाफ जनता को जागरुक करने वाली इस यात्रा का 30 सितंबर को जालंधर में समापन होगा। भाजपा ने इसे नशे के खिलाफ जनअभियान बनाने का लक्ष्य रखा है। ‘नशा मुक्त पंजाब’ का नारा तब गंभीर अर्थ ग्रहण करता है, जब माताएं अपने बच्चों को खोने की कहानियां सुनाती हैं और परिवार इलाज, पुनर्वास तथा नशे की उपलब्धता को लेकर सवाल उठाते हैं। महिलाएं रोते हुए बताती हैं कि कैसे उनके बच्चे नशे से जाल में फंसते चले गए, लेकिन सरकार ने उन्हें नशे से बचाने और उसके पुनर्वास के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाए। ऐसे में असली सवाल यह है कि पंजाब की जमीन पर नशे की आपूर्ति और उससे होने वाली मौतों में निर्णायक कमी कब दिखाई देगी?

राज्य की चार दिशाओं से निकली चार यात्राएं
भाजपा ने इस अभियान को चार समानांतर यात्राओं में बांटा है। पहली यात्रा 18 सितंबर को पठानकोट जिले के माधोपुर स्थित एकता स्थल से भाजपा राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन ने रवाना की। दूसरी 19 सितंबर को फतेहगढ़ साहिब, तीसरी 20 सितंबर को फाजिल्का के सादिकी बॉर्डर स्थित आसफवाला 1971 वार मेमोरियल और चौथी 21 सितंबर को तलवंडी साबो के तख्त श्री दमदमा साहिब से शुरू हुई। पहली यात्रा पठानकोट से शुरू होकर सुझानपुर, पठानकोट, भोआ, दीनानगर, गुरदासपुर, कादियां, श्री हरगोबिंदपुर, बटाला, फतेहगढ़ चूड़ियां, डेरा बाबा नानक, अजनाला, राजा सांसी, अटारी, अमृतसर की पांचों विधानसभा सीटों, मजीठा, जंडियाला, बाबा बकाला, तरनतारन, खडूर साहिब, खेमकरण, पट्टी, फिरोजपुर सिटी, गुरुहरसहाय, फिरोजपुर ग्रामीण, जीरा, सुल्तानपुर लोधी, भुलत्थ, कपूरथला, नकोदर और शाहकोट होते हुए जालंधर कैंट तक जाती है। घोषित सूची में 35 विधानसभा क्षेत्र हैं।

‘नशा मुक्त यात्राएं’ भरपूर समर्थन से जनांदोलन में बदलीं
दूसरी यात्रा 19 सितंबर को फतेहगढ़ साहिब से शुरू हुई। इसका घोषित मार्ग समराला, पायल, खन्ना, अमलोह, फतेहगढ़ साहिब, बस्सी पठाना, डेरा बस्सी, एसएएस नगर, खरड़, चमकौर साहिब, रोपड़, आनंदपुर साहिब, गढ़शंकर, चब्बेवाल, होशियारपुर, शाम चौरासी, दसूया, मुकेरियां, उर्मर, आदमपुर, बलाचौर, नवांशहर, बंगा और फगवाड़ा है। इस यात्रा में कुल 24 विधानसभा क्षेत्र कवर होंगे। 20 सितंबर को फाजिल्का के सादिकी बॉर्डर से शुरू हुई तीसरी यात्रा मालवा के बड़े हिस्से से होकर गुजर रही है। इसमें फाजिल्का, बल्लुआना, अबोहर, जलालाबाद, श्री मुक्तसर साहिब, मलोट, गिद्दड़बाहा, जैतो, कोटकपूरा, फरीदकोट, बाघा पुराना, निहाल सिंह वाला, धर्मकोट, मोगा, जगरांव, रायकोट, दाखा, मलेरकोटला, अमरगढ़, गिल, साहनेवाल और लुधियाना अर्बन शामिल हैं। तीसरी नशा मुक्त पंजाब यात्रा कुल 22 विधानसभा क्षेत्रों में जाएगी।

‘मावां मांगदियां जवाब’ के दर्द से निकली यात्रा
इसी तरह 21 सितंबर को तलवंडी साबो के तख्त श्री दमदमा साहिब से चौथी यात्रा शुरू हुई। इसका मार्ग तलवंडी साबो, मौड़, रामपुरा फूल, भुच्चो मंडी, बठिंडा ग्रामीण, बठिंडा शहरी, मानसा, सरदूलगढ़, बुधलाडा, भदौर, बरनाला, महल कलां, धूरी, संगरूर, सुनाम, दिड़बा, लहरा, शुतराना, नाभा, पटियाला ग्रामीण, पटियाला शहरी, सनौर और राजपुरा से होकर जालंधर पहुंचने का है। चारों यात्राओं का अंतिम पड़ाव जालंधर है, जहां 30 सितंबर को समापन रैली प्रस्तावित है। इस यात्रा की पृष्ठभूमि में भाजपा का ‘मावां मांगदियां जवाब’ कार्यक्रम भी रहा, जिसमें पंजाब के नशे से प्रभावित 50 से अधिक परिवारों ने अपने अनुभव साझा किए। इन परिवारों की पीड़ा ने इस अभियान को केवल राजनीतिक मंच से आगे एक सामाजिक मुद्दे का रूप देने की कोशिश की है। इसे मिल रहा व्यापक जन समर्थन ने यात्रा को जनआंदोलन का वास्तविक रूप दे दिया है। दरअसल, पंजाब सरकार की लापरवाही के चलते राज्य में नशे की समस्या विकराल रूप लेती जा रही है। NCRB के 2024 के आंकड़ों के अनुसार पंजाब में 106 लोगों की ड्रग ओवरडोज से मौत दर्ज हुई, जो 2023 के 89 से अधिक थी। यह आंकड़ा सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज ओवरडोज मौतों का है। जबकि वास्तविकता में इससे कहीं ज्यादा युवा नशे के चलते काल के गाल में समाए हैं।

नशामुक्ति के वादे के सत्ता में आई आप सरकार हुई फेल
आम आदमी पार्टी के सत्ता में आने से पहले नशामुक्ति को लेकर किए गए वादे अब राजनीतिक बहस का हिस्सा बन चुके हैं। भाजपा इन वादों और बाद की कार्रवाई के बीच अंतर को अपना मुख्य हमला बना रही है। कांग्रेस भी सरकार की जिम्मेदारी का मुद्दा उठा रही है। यानी नशे का सवाल अब तीनों प्रमुख राजनीतिक धाराओं के बीच आरोप-प्रत्यारोप का केंद्र बन चुका है। भाजपा ने यात्रा के दौरान नशा तस्करों के नेटवर्क पर कार्रवाई, सप्लाई चेन तोड़ने, ड्रग कारोबार से जुड़ी संपत्ति जब्त करने, पीड़ितों के मुफ्त इलाज और पुनर्वास तथा धार्मिक-सामाजिक संस्थाओं को जोड़ने जैसे संकल्प सामने रखे हैं। यात्रा को मिल रहे भरपूर समर्थन से भाजपा कार्यकर्ता उत्साहित हैं। गुरदासपुर समेत विभिन्न स्थानों पर सभाओं और जनसंपर्क में लोगों की काफी भागीदारी रही।

जालंधर में 30 सितंबर को सिर्फ समापन नहीं, सवाल भी होंगे
यह चारों यात्राएं 30 सितंबर को जालंधर में मिलेंगी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के समापन संबोधन होगा। तब यह अभियान अपने पहले चरण को पूरा करेगा। लेकिन पंजाब के लिए असली परीक्षा उसके बाद शुरू होगी। क्योंकि पंजाब की लड़ाई किसी एक पार्टी की जीत-हार से बड़ी है। भाजपा की यात्रा ने नशे के मुद्दे को फिर राज्य के राजनीतिक केंद्र में ला दिया है। अब सरकार हो या कांग्रेस, सभी से एक ही सवाल पूछा जाना चाहिए कि पंजाब के घरों में नशा पहुंचने से पहले उसे रोकने और नशे से टूट चुके घरों को फिर संभालने की ठोस, समयबद्ध और मापी जा सकने वाली व्यवस्था क्या है? इस सवाल का जवाब जमीन पर बदलती वास्तविक तस्वीर से ही मिलेगा।

मान सरकार और कर्मचारी यूनियन की 59 बैठकें रही बेनतीजा
एक ओर नशा मुक्त यात्राएं आंदोलन में बदल रही हैं, वहीं दूसरी ओर पंजाब के कई कर्मचारी संगठन भी अपनी मांगों को लेकर आंदोलित हैं। कर्मचारी संगठनों का सबसे तीखा आरोप यही है कि सरकार बार-बार सिर्फ बातचीत ही करती है। इस बातचीत के बाद मांगों को पूरा करने की सिर्फ लॉलीपॉप थमा दी जाती है, लेकिन मांगे पूरी नहीं होती। हार कर्मचारी फिर विरोध पर उतारू होते हैं तो सरकार अगली बातचीत की तारीख दे देती है। लेकिन कभी मांगों को पूरा करने लिए समाधान जमीन पर नहीं उतरा है। संगठन के मुताबिक पिछले चार वर्षों में करीब 59 बैठकें हो चुकी हैं। इसके बावजूद संविदा व्यवस्था, नौकरी नियमित करने, EPF-ESI और सेवा शर्तों से जुड़े सारे सवाल लंबित हैं। जब एक ही मुद्दे पर वर्षों तक बैठकें चलें और कर्मचारी फिर सड़क पर उतरने को मजबूर हों, तो सवाल केवल कर्मचारियों की मांगों का नहीं, बल्कि सरकार की निर्णय लेने की क्षमता का भी बनता है।संविदा व्यवस्था पर टालमटोल से कर्मचारियों में बड़ी नाराजगी
अब PUNBUS और PRTC के संविदा कर्मचारियों ने पहले 22 सितंबर से अनिश्चितकालीन हड़ताल की चेतावनी दी थी। लेकिन 21 सितंबर को नए परिवहन सचिव अनुराग वर्मा के साथ बातचीत के बाद संगठन ने फिलहाल बस संचालन जारी रखने का फैसला किया। अब कर्मचारी संगठनों ने 24 सितंबर तक का समय दिया है। कर्मचारियों का कहना है कि यदि उनकी मांगों पर ठोस फैसला नहीं हुआ तो राज्यभर में चक्का जाम का रास्ता अपनाया जाएगा। दरअसल, PUNBUS और PRTC कर्मचारी लंबे समय से संविदा व्यवस्था खत्म करने और नियमितीकरण की मांग कर रहे हैं। उनका आरोप है कि अस्थायी रोजगार व्यवस्था कर्मचारियों को असुरक्षा में रखती है। EPF और ESI अंशदान से जुड़े कथित अनियमितताओं तथा संविदा भर्ती में कथित गड़बड़ियों की शिकायतें भी संगठन ने उठाई हैं। इससे स्पष्ट है कि संविदा कर्मचारी और सरकार के बीच भरोसे का संकट गहरा चुका है।

पुराने कर्मचारियों को कांट्रैक्ट पर लेने का प्रस्ताव खटाई में
यह सिर्फ पंजाब रोडवेज, बस कर्मचारियों की नाराजगी का मामला ही नहीं है। पिछले कुछ महीनों में पंजाब के सरकारी कर्मचारी भी DA के बकाये, पुरानी पेंशन योजना और सेवा संबंधी मांगों को लेकर बड़े आंदोलन कर चुके हैं। 27 अगस्त को राज्यव्यापी ‘महाहड़ताल’ तक की स्थिति बनी, जिसमें विभिन्न सरकारी विभागों के कर्मचारियों की भागीदारी हुई। सरकार और कर्मचारियों के बीच टकराव इतना बढ़ा कि ‘नो वर्क, नो पे’ तक लागू करना पड़ा। कर्मचारियों के आक्रोश ने इतना दबाव बनाया कि सरकार पिछले सप्ताह ही कर्मचारियों-पेंशनरों के लिए 8 प्रतिशत DA बढ़ाने की घोषणा करने को मजबूर हो गई। लेकिन तमाम मांगों का समाधान अभी भी बाकी है, जिसके लिए कर्मचारी विरोध की राह पकड़ हुए हैं। यूनियन के प्रधान रेशमजीत सिंह ने कहा कि बैठक में कांट्रैक्ट भर्ती को लेकर भी चर्चा हुई। कर्मचारियों का कहना था कि पुराने कर्मचारियों को कांट्रैक्ट पर लेने के लिए सरकार विधानसभा में प्रस्ताव लेकर आई है, लेकिन अभी तक किसी कर्मचारी को कांट्रैक्ट पर नहीं लिया गया है। कांट्रैक्ट भर्ती की प्रक्रिया शुरू करने को लेकर भी कर्मचारियों ने आपत्ति जताई।

अलग-अलग विभागों के सरकारी कर्मचारियों का भी खुला मोर्चा
पंजाब की मान सरकार के खिलाफ बस कर्मचारियों का असंतोष अकेला नहीं है। अगस्त में पंजाब के लाखों सरकारी कर्मचारियों ने DA बकाये और अन्य मांगों को लेकर आंदोलन किया। 27 अगस्त की ‘महा हड़ताल’ में प्रशासनिक कार्यालयों से लेकर स्कूल, कॉलेज और अस्पताल तक प्रभावित होने की आशंका जताई गई थी। बाद में कर्मचारियों ने आंदोलन आगे बढ़ाया और सरकार ने ‘नो वर्क, नो पे’ का आदेश भी जारी किया। दरअसल, पंजाब में कर्मचारियों की मांगों की इतनी अनदेखी की गई है कि सरकार को एक मोर्चा संभालते ही दूसरा मोर्चा घेर रहा है। यही सवाल मान सरकार के लिए सबसे असहज हो रहा है। लगातार अलग-अलग विभागों से नई मांगें और विरोध सामने आ रहे हैं।विधानसभा चुनाव से पहले कर्मचारी सबसे संवेदनशील मुद्दा
पंजाब में अगले विधानसभा चुनाव फरवरी 2027 के आसपास होने हैं। ऐसे में सरकारी कर्मचारी वर्ग का असंतोष किसी भी सरकार के लिए राजनीतिक रूप से संवेदनशील विषय बन जाता है। कर्मचारी स्वयं चुनावी वोट बैंक नहीं हैं, लेकिन उनका संपर्क राज्य के लगभग हर जिले, तहसील और गांव के प्रशासनिक ढांचे से होता है। इसलिए वेतन, DA, पेंशन, नौकरी की सुरक्षा और सेवा शर्तों से जुड़ी नाराजगी का असर आम आदमी पार्टी पर पता दिखाई दे रहा है। कर्मचारियों की ओर से उठाई जा रही अन्य मांगें बताती हैं कि केवल DA बढ़ाने से पूरा विवाद समाप्त नहीं हुआ है।

राज्य में बसें रुकीं तो मान सरकार पर भी सवाल उठेंगे
PUNBUS और PRTC पंजाब के सार्वजनिक परिवहन की रीढ़ का हिस्सा हैं। यदि कर्मचारी फिर अनिश्चितकालीन चक्का जाम पर जाते हैं तो इसका सीधा असर रोज बसों से सफर करने वाले यात्रियों, विद्यार्थियों, कर्मचारियों और ग्रामीण क्षेत्रों से शहरों तक आने-जाने वाले लोगों पर पड़ेगा। इसलिए 24 सितंबर की बैठक को केवल एक कर्मचारी संगठन की बैठक मानना भूल होगी। यह सरकार के लिए समझौते और टकराव के बीच चुनाव का क्षण है। PUNBUS और PRTC कर्मचारियों ने फिलहाल सरकार को बातचीत का एक और अवसर दिया है। 24 सितंबर की बैठक इसलिए महत्वपूर्ण है कि उसके बाद फैसला केवल बसों के पहियों का नहीं होगा, बल्कि सरकार और कर्मचारी संगठनों के बीच भरोसे का भी होगा। यदि बातचीत फिर आश्वासनों तक सीमित रह गई तो चक्का जाम की वापसी सरकार के लिए नया संकट पैदा कर सकती है। आम आदमी पार्टी की सरकार जब सत्ता में आई थी तो उसने बदलाव, पारदर्शिता और आम आदमी की सरकार का बड़ा राजनीतिक संदेश दिया था। अब सरकार अपने कार्यकाल के अंतिम चरण में है और कर्मचारी पूछ रहे हैं कि उनकी लंबित मांगों का स्थायी समाधान कब होगा। सरकार के पास उपलब्धि गिनाने के लिए योजनाएं और फैसले हो सकते हैं, लेकिन चुनाव से पहले जनता और कर्मचारी यह भी देखेंगे कि सरकार अपने ही कर्मचारियों के साथ कितनी तेजी और संवेदनशीलता से समस्याओं का समाधान करती है।

 

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