एक ओर दिल्ली में राहुल गांधी के विरोध-प्रदर्शनों की सियासी नौटंकी करने में मस्त हैं, दूसरी ओर पंजाब कांग्रेस में राजा वड़िंग के इस्तीफे के बाद अंदरूनी गुटबाजी चरम पर पहुंच गई है। राष्ट्रीय स्तर पर अपनी राजनीतिक साख बचाने और पंजाब जैसे अहम राज्य में बिखरते संगठन को एकजुट रखने की दोहरी चुनौती ने कांग्रेस आलाकमान को बेहद मुश्किल मोड़ पर खड़ा कर दिया है। पंजाब कांग्रेस का अंदरूनी घमासान इस समय उस मुकाम पर पहुंच चुका है, जहां पार्टी की हर नई करवट और फैसला सुलह कराने के बजाय दरारों को और चौड़ा कर रहा है। 2027 के विधानसभा चुनाव के मुहाने पर खड़ी कांग्रेस ने गुटबाजी को खत्म करने के लिए सचिन पायलट को प्रदेश प्रभारी बनाया और लंबे आंतरिक घमासान के बाद अमरिंदर सिंह की जगह पूर्व ओलंपियन परगट सिंह को प्रदेश अध्यक्ष की कमान सौंपी। लेकिन राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा गर्म है कि इन हाई-प्रोफाइल नियुक्तियों के बाद पंजाब कांग्रेस में गुटबाजी थमने के बजाय और तेज हो गई है। एक तरफ प्रभारी सचिन पायलट खुद अपने गृह राज्य राजस्थान में इसी गुटबाजी के चक्रव्यूह में उलझकर मुख्यमंत्री की कुर्सी से चूक गए थे, वहीं दूसरी ओर परगट सिंह की अपनी छवि भी पूर्व में एक ‘बागी’ नेता की रही है। ऐसे में इन दोनों के लिए पंजाब के दिग्गज क्षत्रपों के अहं और स्वार्थ को शांत करना ‘लोहे के चने चबाने’ के समान बन गया है।
तीन दिग्गजों चन्नी, वड़िंग और रंधावा के त्रिकोण में फंसी कांग्रेस
पंजाब कांग्रेस की इस दिनों-दिन बर्बाद होती कहानी में तीन प्रमुख किरदार हैं। पूर्व मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी, पूर्व प्रदेश अध्यक्ष व लोकसभा सांसद अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग और वरिष्ठ नेता सुखजिंदर सिंह रंधावा। राजा वड़िंग के अध्यक्ष रहते हुए चन्नी और रंधावा गुट ने उनके खिलाफ खुल्लम-खुल्ला मोर्चा खोल रखा था। अंदरूनी बैठकों में वड़िंग समर्थकों द्वारा विरोधी गुट को ‘पार्टी विरोधी’ तक कहे जाने के बाद चन्नी और रंधावा ने प्रभारी पायलट के सामने साफ कह दिया था कि वे वड़िंग के नेतृत्व में काम नहीं कर सकते। यहां दिलचस्प तथ्य यह है कि राजस्थान में कांग्रेस पार्टी में गहलोत वर्सेज पाटलट के घमासान के दौरान यही सुखजिंदर सिंह रंधावा प्रदेश प्रभारी बनकर राजस्थान आए थे। लेकिन गुटबाजी को खत्म नहीं करा पाए थे। अब पायलट को पंजाब में रंधावा और अन्य कांग्रेस दिग्गजों की गुटबाजी को दूर करने की जिम्मेदारी सौंपी गई है।
पायलट की रिपोर्ट पर अमरिंदर को हटाने से गुटबाजी और तेज
पंजाब कांग्रेस प्रदेश प्रभारी पायलट की रिपोर्ट के बाद भले ही आलाकमान के हस्तक्षेप से राजा वड़िंग की विदाई हो गई हो, लेकिन यह आग बुझने के बजाए और तेज हो गई है। चन्नी खुद को दलित चेहरे के रूप में पेश कर 2027 के लिए मुख्यमंत्री पद की दावेदारी ठोक रहे हैं, जबकि राजा वड़िंग का खेमा अपनी इस संगठनात्मक हार को आसानी से पचाने को तैयार नहीं है। अमरिंदर के समर्थकों को लग रहा था कि विधानसभा चुनाव में टिकटों के वितरण में उन्हें फायदा होगा। लेकिन चुनाव से पहले ही अमरिंदर की कुर्सी छिन जाने से समर्थकों में काफी रोष है। वहीं सुखजिंदर सिंह रंधावा जैसे कद्दावर नेता अपनी वरिष्ठता और प्रभाव के दम पर किसी भी नए समीकरण को चुनौती देने की ताकत रखते हैं। यह तीनों गुट मिलकर पंजाब कांग्रेस को एक ऐसा अखाड़ा बना चुके हैं जहां दुश्मन बाहरी दल नहीं, बल्कि पार्टी के ही साथी हैं।
सचिन पायलट अपने राज्य में ही गुटबाजी के चक्रव्यूह में फंसे रहे
इस गुटबाजी को खत्म करने के लिए आलाकमान ने जिन दो चेहरों को आगे किया है, उनकी अपनी सीमाएं और राजनीतिक इतिहास इस लड़ाई को और पेचीदा बनाता है। पायलट के प्रदेश प्रभारी बनने के बाद पंजाब में उनके विरोधी नेता उन पर यह तंज कसने से नहीं चूकते कि जो नेता अशोक गहलोत के ‘जादू’ के सामने अपनी राजनीतिक जमीन पूरी तरह नहीं बचा पाया और डिप्टी सीएम से आगे नहीं बढ़ सका, वह पंजाब के दिग्गज नेताओं को कैसे अनुशासित करेगा? पंजाब में पायलट की भूमिका एक निष्पक्ष पंच की जरूर है, लेकिन गुटों के इस दलदल में न्यूट्रल दिखना उनके लिए सबसे बड़ी अग्निपरीक्षा है। यह वाकई तार्किक सवाल है कि जो नेता खुद अपने ही राज्य राजस्थान की आंतरिक गुटबाजी और सत्ता संघर्ष (अशोक गहलोत बनाम सचिन पायलट) के चक्रव्यूह से बाहर नहीं निकल पाया, वह पंजाब कांग्रेस में अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग, चरणजीत सिंह चन्नी प्रताप सिंह बाजवा जैसे धुरंधरों के बीच की गहरी खाई को कैसे पाट पाएगा? कांग्रेस आलाकमान द्वारा पिछले माह में सचिन पायलट को पंजाब का प्रभारी बनाए जाने के पीछे यही सबसे बड़ी चुनौती है। पंजाब प्रभारी बनने के बाद उन्होंने बिना किसी मुख्यमंत्री चेहरे के सामूहिक नेतृत्व में विधानसभा चुनाव लड़ने की बात कही है, लेकिन यह सीएम पद के दावेदार नेताओं के गले नहीं उतर रही है।
खुद राजनीतिक विद्रोही रहे परगट कैसे संभालेंगे पार्टी में बगावत
पंजाब में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस की लगातार बढ़ती आंतरिक गुटबाजी के बीच आलाकमान ने पूर्व हॉकी प्लेयर परगट सिंह को पंजाब कांग्रेस का नया अध्यक्ष बनाया है। कांग्रेस ने जिनको पार्टी में विद्रोह को थामने की जिम्मेदारी सौंपी है, वो परगठ सिंह खुद ही कभी राजनीतिक विद्रोही रह चुके हैं। दरअसल, भारतीय पुरुष हॉकी टीम के कप्तान रह चुके परगट सिंह ने 2012 में शिरोमणि अकाली दल के साथ चुनावी राजनीति में कदम रखा और सीट जीत ली। लेकिन अगले कुछ वर्षों में पार्टी नेतृत्व के साथ उनके संबंध बदतर होते गए। उनके राजनीतिक विद्रोह के चलते 2016 में उन्हें शिअद से निलंबित कर दिया गया। इसके बाद उन्होंने कुछ समय के लिए नवजोत सिंह सिद्धू और बैंस बंधुओं के साथ मिलकर आवाज-ए-पंजाब बनाई। लेकिन यह मोर्चा भी मतभेदों के चलते ज्यादा समय तक नहीं चला। 2017 के विधानसभा चुनाव से पहले परगट कांग्रेस में शामिल हो गए। अब करीब एक दशक बाद उन्हें पंजाब कांग्रेस के अध्यक्ष की जिम्मेदारी मिली है। सवाल यही है कि बगावती तेवरों वाले परगट सिंह पार्टी में गुटबाजी का थाम पाएंगे, या फिर अपना एक और गुट बनाएंगे।
पंजाब कांग्रेस चल रही गुटबाजी और नेताओं के मतभेदों का खामियाजा पार्टी को विधानसभा चुनावों में इन कारणों से भुगतना पड़ सकता है…
चन्नी बनाम वड़िंग खेमे में सीधा टकराव: परगट सिंह को पूर्व मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी का बेहद करीबी माना जाता है। चन्नी की सिफारिश पर ही परगट सिंह को कमान मिली है, जिससे चन्नी खेमा मजबूत हुआ है। ऐसे में राजा वड़िंग के समर्थक इस नए नेतृत्व को आसानी से स्वीकार नहीं कर पा रहे हैं।
समानांतर शक्ति केंद्रों का टकराव: जुलाई 2026 में हाईकमान ने वड़िंग को अध्यक्ष बनाए रखा था और चन्नी को चुनाव अभियान समिति का अध्यक्ष बनाया था। अब संगठन का नेतृत्व बदलने से दोनों गुटों के बीच वर्चस्व की यह लड़ाई और ज्यादा खुलकर सामने आ गई है।
संगठनात्मक ढांचे में फेरबदल का डर: राजा वड़िंग ने अपने कार्यकाल के दौरान पंजाब के कई जिलों में अपने करीबी नेताओं को जिला अध्यक्ष नियुक्त या बरकरार रखा था। नए अध्यक्ष परगट सिंह के आने के बाद इन पदों पर बदलाव की पूरी संभावना है, जिससे जमीनी स्तर के नेताओं में असंतोष बढ़ेगा।
प्रताप सिंह बाजवा की भूमिका: पंजाब विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष प्रताप सिंह बाजवा का भी राज्य कांग्रेस में अपना एक अलग मजबूत आधार है। पहले वड़िंग और बाजवा के बीच तालमेल की कमी की खबरें थीं, और अब चन्नी-परगट गुट के हावी होने से त्रिकोणीय सत्ता संघर्ष (चन्नी बनाम बाजवा बनाम वड़िंग) तेज हो सकता है।
विधानसभा के लिए टिकटों की होड़: पंजाब में 2027 के विधानसभा चुनाव नजदीक आ रहे हैं। नया नेतृत्व आने से अब सभी धड़े अपने-अपने समर्थकों को टिकट दिलवाने के लिए लॉबिंग तेज करेंगे, जिससे टिकट बंटवारे के दौरान अंदरूनी कलह चरम पर पहुंच सकती है।
पुराने-नए नेताओं का वैचारिक मतभेद: परगट सिंह और चन्नी का गुट पार्टी में अलग रणनीति चाहता है, जबकि कैप्टन अमरिंदर सिंह के जाने के बाद से ही कांग्रेस में पुराने वफादारों और नए उभरे नेताओं के बीच एक अदृश्य जंग चल रही है जो इस बदलाव से और भड़क सकती है।
एक-दूसरे पर हार का ठीकरा फोड़ना: 2022 की विधानसभा चुनाव में मिली करारी हार के बाद से ही नेता एक-दूसरे पर आरोप लगाते रहे हैं। राजा वड़िंग के इस्तीफे को वड़िंग विरोधी खेमा अपनी जीत के रूप में देख रहा है, जिससे वड़िंग समर्थक बदला लेने की फिराक में रहेंगे।
हाईकमान के हस्तक्षेप पर नाराजगी: प्रभारी सचिन पायलट की रिपोर्ट के बाद राहुल गांधी के निर्देश पर राजा वड़िंग को हटाया गया है। पंजाब कांग्रेस के एक धड़े का मानना है कि दिल्ली दरबार स्थानीय समीकरणों को समझे बिना फैसले ले रहा है, जिससे अंदरूनी असंतोष और गहरा गया है। आलाकमान ने उस नेता की रिपोर्ट पर एक्शन लिया है, जो अपने राज्य में गुटबाजी से पार नहीं पा पाया था।
कैडर और कार्यकर्ताओं में भ्रम की स्थिति: राजा वड़िंग ने हाल ही में सोशल मीडिया और जमीनी स्तर पर कार्यकर्ताओं के साथ सीधा संवाद (साप्ताहिक संवाद) शुरू किया था। अचानक नेतृत्व बदलने से जमीनी कार्यकर्ता असमंजस में हैं कि वे किस धड़े के प्रति अपनी वफादारी दिखाएं।
विपक्षी दलों के लिए रास्ता साफ: कांग्रेस की इस निरंतर अंदरूनी खींचतान का सीधा फायदा भाजपा को मिल सकता है, क्योंकि राज्य में सत्ताधारी आम आदमी पार्टी के खिलाफ एंटी इन्क्मबेंसी दिख रही है। जब पार्टी के बड़े नेता आपस में लड़ेंगे, तो असंतुष्ट नेताओं का दूसरे दलों में जाने का सिलसिला और तेज हो सकता है, जो गुटबाजी का सबसे बड़ा दुष्परिणाम होगा।
क्या विधानसभा चुनाव से पहले थमेगा कांग्रेस पार्टी का बवंडर?
अमृतसर के प्रसिद्ध स्वर्ण मंदिर में दोनों नेताओं की हालिया संयुक्त यात्रा के जरिए पार्टी ने एकजुटता दिखाने का कुछ औपचारिक प्रयास तो किया है, लेकिन अंदरूनी लावा अभी उबल रहा है। दरअसल, राजनीति में तस्वीरें जितनी सहज दिखती हैं, धरातल पर परिस्थितियां उतनी ही जटिल होती हैं। पंजाब कांग्रेस में नेताओं के व्यक्तिगत स्वार्थ और अहं की लड़ाई इस स्तर पर है कि यहां कई नेता खुद को भावी मुख्यमंत्री मानकर चल रहे हैं। आगामी विधानसभा चुनाव के लिए टिकट वितरण के समय यह असंतोष और बड़े धमाके के रूप में सामने आ सकता है। यदि पायलट और परगट इन दिग्गज क्षत्रपों के व्यक्तिगत हितों को पार्टी के हित के पीछे झुकाने में नाकाम रहते हैं, तो पंजाब में कांग्रेस की सत्ता में वापसी की उम्मीदें इस अंतहीन गुटबाजी की भेंट चढ़ जाएंगी।
ਭਾਜਪਾ ਪਾਰਟੀ ਪੰਜਾਬ ਨੂੰ 2 ਸਾਲ ‘ਚ ਕਰੇਗੀ ਨਸ਼ਾ ਮੁਕਤ – ਸ.ਕੇਵਲ ਸਿੰਘ ਢਿੱਲੋਂ, ਸੂਬਾ ਪ੍ਰਧਾਨ ਭਾਜਪਾ ਪੰਜਾਬ https://t.co/K2VtHP6Wos
— BJP PUNJAB (@BJP4Punjab) October 9, 2026









