पंजाब में भगवंत मान की आप सरकार से जनता का विश्वास उठ रहा है। युवाओं से लेकर कर्मचारियों तक और किसानों से लेकर नारीशक्ति तक आप सरकार के वादे पूरे ना करने से निराश हैं। जनता-जनार्दन का आप सरकार के खिलाफ यही आक्रोश हाल ही में हुए एक ओपिनियन पोल में साफ-साफ नजर आया है। इस पोल के मुताबिक वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव में ‘एक मौका’ के नारे पर 117 में से 92 सीटों की ऐतिहासिक प्रचंड जीत हासिल करने वाली आम आदमी पार्टी (AAP) के लिए अगले साल विधानसभा चुनाव किसी बड़े झटके से कम नहीं होगा। इस नए सर्वे के अनुसार, पंजाब में अगले चुनाव में आप की सीटें घटकर आधे से भी कम रह सकती हैं। पोल के मुताबिक हालात ऐसे हैं कि राज्य में किसी भी एक राजनीतिक दल को स्पष्ट बहुमत मिलता हुआ नहीं दिखाई दे रहा है, जिससे राज्य में त्रिशंकु विधानसभा की मजबूत संभावना बनती दिख रही है। जहां एक तरफ जनता का सत्ताधारी दल से मोहभंग होता दिख रहा है, वहीं दूसरी तरफ विपक्षी कांग्रेस भी पूर्ण बहुमत का भरोसा जीतने में पूरी तरह कामयाब नहीं हो पाया है।
पंजाब में त्रिशंकु विधानसभा के आसार, आप की सीटें आधी
दरअसल, हाल ही में जारी हुए News Leader-Matrize ओपिनियन पोल ने पंजाब की राजनीतिक फिजा में एक नया सस्पेंस पैदा कर दिया है। इस ओपिनियन पोल के मुताबिक, पंजाब की 117 विधानसभा सीटों में से बहुमत के लिए जरूरी 59 सीटों के जादुई आंकड़े तक कोई भी दल अकेले पहुंचता नहीं दिख रहा है। सर्वे के अनुसार, आम आदमी पार्टी को पिछले चुनाव से आधी से भी कम यानि 40-45 सीटें ही मिल सकती हैं। वहीं, मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस 35 से कम सीटों पर सिमट सकती है। दरअसल, पंजाब की जनता ने जब 2022 में आम आदमी पार्टी को एकतरफा और अभूतपूर्व जनादेश दिया था, तो उसके पीछे पारंपरिक राजनीतिक दलों के प्रति भयंकर नाराजगी और बदलाव की एक गहरी तड़प थी। लेकिन आप सरकार जनता की उम्मीदों पर खरी नहीं उतरी।
बदलाव की प्रचंड लहर, भाजपा हो सकती है मजबूत
केंद्रीय सत्ता पर काबिज भारतीय जनता पार्टी (BJP) पंजाब में अपनी जमीन मजबूत करते हुए 30 से ज्यादा सीटें हासिल कर सकती है। जबकि पारंपरिक क्षेत्रीय दल शिरोमणि अकाली दल को 15 से 25 सीटें मिलने का अनुमान जताया गया है। अन्य और निर्दलीयों के खाते में 5 से 10 सीटें जा सकती हैं। पोल के मुताबिक वोट शेयर की बात करें तो आम आदमी पार्टी को 30% और कांग्रेस को 27% वोट मिलने का अनुमान है। यह आंकड़े स्पष्ट करते हैं कि 2022 की एकतरफा लहर अब एक बेहद कड़े और बहुकोणीय मुकाबले में तब्दील हो चुकी है, जहां हर सीट पर चुनावी समीकरण बेहद पेचीदा हो गए हैं।
जनता की उम्मीदों पर खरा साबित न होने से एंटी-इंकंबेंसी
पिछले विधानसभा चुनाव के बाद आम आदमी पार्टी और जनता की उम्मीदें दोनों सातवें आसमान पर थीं। हालांकि, सत्ता संभालने के बाद सरकार के लिए उन उम्मीदों पर तुरंत खरा उतरना एक बहुत बड़ी चुनौती साबित हुआ। बेरोजगारी को दूर करने, युवाओं को रोजगार के व्यापक अवसर देने और सरकारी तंत्र में अमूल्य सुधार करने के जो वादे किए गए थे, वे धरातल पर बदल पाए। इस प्रशासनिक लापरवाही के कारण आम जनता में एक स्वाभाविक ‘एंटी-इंकंबेंसी’ (सत्ता विरोधी लहर) पैदा होने लगी। वादों और दावों के बीच का यह फासला आज मतदाताओं को यह सोचने पर मजबूर कर रहा है कि क्या यह बदलाव वाकई उतना क्रांतिकारी था, जितना चुनाव के वक्त महसूस हो रहा था। यही कारण है कि ‘आप’ की सीटों का ग्राफ 92 से गिरकर 40-45 के आसपास सिमटता दिख रहा है।
पंजाब की जनता संदेश दे चुकी है कि सरकारें बदलने से हिचकिचाती नहीं
पंजाब की राजनीति हमेशा अपेक्षाओं और असंतोष के बीच झूलती रही है। कांग्रेस और अकाली दल के लंबे शासन से निराश होकर जनता ने आम आदमी पार्टी को जिताया। आज वही जनता यह मूल्यांकन कर रही है कि क्या मान सरकार में शासन शैली वास्तव में बदली है या केवल राजनीतिक चेहरे बदले हैं राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि 2027 का चुनाव केवल सरकार की उपलब्धियों या विफलताओं पर नहीं, बल्कि इस बात पर भी निर्भर करेगा कि अगले डेढ़-दो वर्षों में सरकार कई सारे लंबित मुद्दों पर कितनी निर्णायक प्रगति दिखा पाती है। यदि किसानों, युवाओं, महिलाओं और कर्मचारियों के बीच विश्वास मजबूत नहीं होता है और कानून-व्यवस्था और नशे जैसे मुद्दों पर ठोस परिणाम सामने नहीं आते हैं, तो आम आदमी पार्टी की वापसी नामुमकिन है। यदि वर्तमान असंतोष व्यापक जनमत में बदल गया, धार्मिक विवादों की गूंज बनी रही, आर्थिक चुनौतियां गहराती गईं और चुनावी वादों पर सवाल कायम रहे, तो 2022 जैसा एकतरफा जनादेश दोहराना सरकार के लिए अत्यंत कठिन होगा। पंजाब की जनता अतीत में कई बार यह संदेश दे चुकी है कि वह सरकारें बदलने से हिचकिचाती नहीं है।
आइए, जानते हैं कि पंजाब में आप की भगवंत मान सरकार की लापरवाह कार्यशैली से किन मुद्दों को हवा मिल रही है…
मुद्दा नंबर-7
नशे के खिलाफ जंग का वादा खोखला, चुनौतियां बरकरार
नशा पंजाब की राजनीति का सबसे संवेदनशील मुद्दा रहा है। 2022 के चुनाव में आम आदमी पार्टी ने ड्रग्स माफिया के खिलाफ निर्णायक कार्रवाई का वादा किया था। सरकार बनने के बाद पंजाब पुलिस ने दिखावे के लिए एनडीपीएस एक्ट में कुछ गिरफ्तारियां की। विशेषज्ञों का मानना है कि नशे की समस्या केवल पुलिस कार्रवाई से समाप्त नहीं होगी। इसके लिए पुनर्वास केंद्रों, युवाओं को रोजगार, खेल संस्कृति और सीमा पार तस्करी पर कड़ी निगरानी की समानांतर आवश्यकता है। विपक्ष का तर्क है कि जब तक गांवों और कस्बों में ड्रग्स की उपलब्धता पूरी तरह समाप्त नहीं होती, तब तक नशे के खिलाफ जंग के सरकारी दावे खोखले ही साबित होंगे। दरअसल, केवल गिरफ्तारियों से यह साबित नहीं होता कि नशे की समस्या समाप्त हो गई है। समय-समय पर ओवरडोज से मौतों की घटनाएं सामने आती रही हैं। पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय ने भी विभिन्न मामलों की सुनवाई के दौरान राज्य में ड्रग्स की चुनौती पर गंभीर चिंता व्यक्त की है और सरकार को प्रभावी रणनीति बनाने के निर्देश दिए हैं। राजनीतिक ही नहीं सामाजिक दृष्टि से भी यह मुद्दा अहम है। क्योंकि नशे से प्रभावित लगभग हर परिवार सीधे या परोक्ष रूप से इस समस्या से जुड़ा है।
मुद्दा नंबर-6
गैंगस्टर, ड्रोन और बिगड़ती कानून-व्यवस्था पर उठते सवाल
भगवंत मान सरकार के सामने सबसे बड़ी प्रशासनिक चुनौती कानून-व्यवस्था रही है। चुनाव के दौरान आम आदमी पार्टी ने दावा किया था कि वह पंजाब को गैंगस्टर और माफिया संस्कृति से मुक्त करेगी। यह दावा सिर्फ कागजी साबित हुआ। राज्य में गैंगवार, फिरौती, लक्षित हत्याएं और सीमा पार से हथियार तथा नशीले पदार्थ भेजने की घटनाएं नियंत्रित नहीं हो सकीं। पाकिस्तान सीमा से ड्रोन के माध्यम से हथियार और ड्रग्स भेजे जाने की घटनाएं लगातार सुरक्षा एजेंसियों के लिए चुनौती बनी हुई हैं। पंजाब पुलिस और सीमा सुरक्षा बल ने बड़ी संख्या में ड्रोन, हथियार और हेरोइन बरामद की है, लेकिन विपक्ष का कहना है कि इतनी बरामदगी स्वयं यह संकेत देती है कि नशे का नेटवर्क अभी भी कितना ज्यादा सक्रिय है। व्यापारियों और उद्योगपतियों के बीच रंगदारी और सुरक्षा को लेकर समय-समय पर उठने वाली चिंताओं ने भी विपक्ष को सरकार पर हमला करने का अवसर दिया। विपक्ष का आरोप है कि निवेश तभी आएगा जब उद्योग सुरक्षित महसूस करेगा। सच्चाई भी यही है कि कानून-व्यवस्था का मूल्यांकन केवल पुलिस कार्रवाई से नहीं, बल्कि जनता-जनार्दन के बीच सुरक्षा की भावना से होता है।
मुद्दा नंबर-5
बेरोजगारी और पलायन : युवाओं के लिए नहीं बन रहे अवसर
पंजाब में विदेश जाना अब केवल रोजगार का विकल्प नहीं, बल्कि सामाजिक प्रवृत्ति बन चुका है। दोआबा, मालवा और माझा के अनेक गांव ऐसे हैं, जहां लगभग हर परिवार का कोई न कोई सदस्य कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, ब्रिटेन, इटली या न्यूज़ीलैंड में बसने को मजबूर हो रह रहा है। दरअसल, युवाओं को राज्य में पर्याप्त रोजगार नहीं मिल रहा, इसलिए वे लाखों रुपये खर्च कर विदेश जाने को मजबूर हैं। पंजाब में IELTS कोचिंग सेंटरों की संख्या लगातार बढ़ती रही है। अनेक परिवार खेती की जमीन तक बेचकर बच्चों को विदेश भेज रहे हैं। यदि राज्य के शिक्षित युवा लगातार बाहर जाते रहेंगे, तो भविष्य में पंजाब को कुशल मानव संसाधन की कमी का सामना करना पड़ सकता है। नीति आयोग और विभिन्न सरकारी रिपोर्टों के अनुसार पंजाब की बेरोजगारी दर लंबे समय तक राष्ट्रीय औसत से अधिक रही है। विशेषज्ञों का कहना है कि पंजाब में हर वर्ष लाखों युवा रोजगार बाजार में प्रवेश करते हैं। यही कारण है कि निजी निवेश और उद्योगों का विस्तार सबसे बड़ी आवश्यकता बन गया है। चुनावी दृष्टि से यह मुद्दा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि युवाओं और उनके परिवारों में भविष्य को लेकर बढ़ती चिंता सरकार के प्रति असंतोष में बदल रही है।
मुद्दा नंबर-4
बढ़ता कर्ज : क्या विकास की कीमत भविष्य की पीढ़ियां चुकाएंगी?
भगवंत मान सरकार के सामने सबसे कठिन आर्थिक चुनौती पंजाब का बढ़ता सार्वजनिक कर्ज है। चुनाव प्रचार के दौरान स्वयं आम आदमी पार्टी ने कहा था कि राज्य पर लगभग तीन लाख करोड़ रुपये का कर्ज है और प्रत्येक पंजाबी पर लगभग एक लाख रुपये का ऋण बोझ है। सरकार बनने के बाद भी यह चुनौती कम होने के बजाए और बढ़ गई है। सार्वजनिक रिपोर्टों के अनुसार पंजाब का कुल सार्वजनिक कर्ज लगातार बढ़ता गया और 2026 तक इसके चार लाख करोड़ रुपये से अधिक पहुंचने का अनुमान है। नीति आयोग की रिपोर्ट के अनुसार पंजाब का Debt-to-GSDP Ratio देश के सबसे अधिक कर्जग्रस्त बड़े राज्यों में शामिल है। इसका अर्थ यह है कि राज्य की आय का बड़ा हिस्सा ब्याज और ऋण अदायगी में खर्च हो जाता है। विपक्ष का यह आरोप एकदम सही है कि सरकार ने केवल लोकलुभावन योजनाओं पर अत्यधिक व्यय किया, जबकि राजस्व बढ़ाने के ठोस उपाय पर्याप्त नहीं किए।
मुद्दा नंबर-3
हरित क्रांति का केंद्र रहे पंजाब के किसानों की नाराजगी भारी पड़ेगी
यदि पंजाब की राजनीति की आत्मा किसी वर्ग में बसती है तो वह हमारे अन्नदाता ही हैं। यही कारण है कि राज्य की किसी भी सरकार का मूल्यांकन केवल विकास योजनाओं या निवेश के आधार पर नहीं, बल्कि किसानों और धार्मिक संस्थाओं के प्रति उसके व्यवहार से भी किया जाता है। हरित क्रांति का केंद्र रहे पंजाब में किसान केवल आर्थिक नहीं, बल्कि राजनीतिक शक्ति भी हैं। आम आदमी पार्टी ने चुनाव के दौरान किसानों के हितों की रक्षा और कृषि संकट के समाधान का भरोसा दिलाया था। लेकिन सरकार बनने के बाद किसानों की अनेक मांगें अब भी अधूरी हैं। संयुक्त किसान मोर्चा और अन्य किसान संगठनों की मुख्य मांग केवल एमएसपी घोषित करना नहीं, बल्कि स्वामीनाथन आयोग के C2+50% फार्मूले पर सभी फसलों की कानूनी गारंटी देना है। इसके अलावा किसानों की बड़ी शिकायत खरीद व्यवस्था को लेकर रही है। कई अवसरों पर मंडियों में उठान में देरी, बारिश के कारण खराब हुई फसल का समय पर मुआवजा न मिलना तथा धान के विकल्प के रूप में दूसरी फसलें अपनाने के बावजूद पर्याप्त बाजार न मिलने की शिकायतें लगातार सामने आती रही हैं। किसान मजदूर मोर्चा और अन्य संगठनों ने कई बार मुख्यमंत्री के साथ प्रस्तावित बैठकें रद्द होने का आरोप लगाते हुए विरोध प्रदर्शन भी किए हैं।
मुद्दा नंबर-2
‘दिल्ली से रिमोट कंट्रोल’ : विपक्ष का सबसे बड़ा राजनीतिक नैरेटिव
आप के संयोजक अरविंद केजरीवाल कांग्रेस सरकारों पर दिल्ली से रिमोट कंट्रोल के जरिए चलने का आरोप लगाते रहे हैं। लेकिन दिल्ली के बाद पंजाब में सरकार बनने के बाद खुद आप की सरकार दिल्ली के रिमोट से चल रही है। खासकर दिल्ली में आप की करारी हार के बाद केजरीवाल का भी पूरा फोकस पंजाब पर हो गया है। भगवंत मान सरकार के खिलाफ विपक्ष का सबसे लगातार दोहराया जाने वाला आरोप यह है कि पंजाब की सरकार वास्तव में चंडीगढ़ से नहीं, बल्कि दिल्ली से संचालित होती है। कांग्रेस, भाजपा और शिरोमणि अकाली दल समय-समय पर आरोप लगाते रहे हैं कि महत्वपूर्ण नीतिगत निर्णयों में आम आदमी पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व की मनमानी ही चलती है। मुख्यमंत्री होने के बावजूद भगवंत मान कई महत्वपूर्ण राजनीतिक निर्णयों में स्वतंत्र दिखाई नहीं देते। यदि यह धारणा मतदाताओं के बीच और मजबूत होती है कि राज्य सरकार स्वतंत्र निर्णय लेने में सक्षम नहीं है, तो यह आम आदमी पार्टी के लिए चुनावी चुनौती बन सकती है।
मुद्दा नंबर-1
बेअदबी कानून, अकाल तख्त की सख्त नाराजगी और अल्टीमेटम
यह सबसे ताजा और विवादित मुद्दा है। पंजाब की राजनीति में धर्म केवल आस्था का विषय नहीं, बल्कि सामाजिक और राजनीतिक विश्वास का भी केंद्र है। यही कारण है कि जब भगवंत मान सरकार ने ‘जगत ज्योत श्री गुरु ग्रंथ साहिब सत्कार (संशोधन) अधिनियम-2026’ पारित किया तो इसकी भावना को लेकर सरकार पर गंभीर सवाल लगे। श्री अकाल तख्त साहिब के सामने 29 जून को पंजाब के 78 सिख विधायकों और 9 सिख मंत्रियों को तलब किया गया। दरअसल, जगत ज्योत श्री गुरु ग्रंथ साहिब सत्कार (संशोधन) एक्ट-2026 को लेकर जो घटनाक्रम सामने आया, उसने केवल एक कानून की तकनीकी खामियों का प्रश्न नहीं उठाया, बल्कि यह भी दिखाया कि धार्मिक आस्था से जुड़े विषयों पर राजनीतिक जल्दबाजी कितनी भारी पड़ सकती है। सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि सुनवाई के दौरान कई आम आदमी पार्टी के विधायकों ने स्वयं स्वीकार किया कि उन्होंने इतने संवेदनशील विधेयक को बिना पढ़े ही पारित कर दिया था। यह केवल आप विधायकों की व्यक्तिगत चूक नहीं, बल्कि पूरी विधायी प्रक्रिया पर प्रश्नचिह्न है। अकाल तख्त ने आप सरकार को एक महीने के भीतर कानून में संशोधन करने का अल्टीमेटम जारी कर दिया है। इसके साथ ही स्पष्ट संकेत दिया है कि सिख पंथ से जुड़े विषयों पर केवल राजनीतिक बहुमत पर्याप्त नहीं, बल्कि धार्मिक परामर्श और पंथ की मर्यादा का सम्मान भी अनिवार्य है। पंजाब में ग्रामीण सिख मतदाता पर धार्मिक संस्थाओं का प्रभाव आज भी व्यापक माना जाता है। यदि चुनाव तक सरकार और अकाल तख्त के बीच यह दूरी बनी रहती है तो यह “धार्मिक असंवेदनशीलता” बनाम “पंथ सम्मान” की बहस का मुद्दा बन जाएगा।









