Home चुनावी हलचल सिखों के संहार की बरसी पर राहुल गांधी ने जलसा कर ज़ख्मों...

सिखों के संहार की बरसी पर राहुल गांधी ने जलसा कर ज़ख्मों पर नमक छिड़का, पंजाब में सिखाएंगे सबक

SHARE

सिखों के संहार की बरसी (1 नवंबर) पर राहुल गांधी ने दिल्ली में जलसा करके ज़ख्मों पर नमक छिड़का है। इसी दिन 1984 में दिल्ली में ही हजारों सिखों का बर्बरता के कत्लेआम किया था। यह कत्लेआम भी राहुल के पिता राजीव गांधी के कांग्रेस नेताओं को छूट देने के चलते हुआ था। तब उन्होंने कहा था कि जब कोई बड़ा पेड़ गिरता है, तो धरती भी हिलती है। राहुल गांधी की दिल्ली रैली के विरोध में भाजपा ने देशभर में ‘लोकतंत्र बचाओ अराजकता हटाओ’ की रैलियां निकाली हैं। जिसमें भाजपा के कद्दावर नेताओं ने शिरकत करते कांग्रेस पर पलटवार किया है। दरअसल, यह सबसे बड़ी विडंबना यह है कि जिस तारीख को हजारों सिख परिवार अपने प्रियजनों को याद करते हैं, उसी दिन दिल्ली में कांग्रेस के नेतृत्व वाले विपक्षी गठबंधन की राजनीतिक रैली आयोजित हुई। राजनीति में केवल आयोजन का घोषित उद्देश्य ही नहीं, उसकी तारीख और उसका ऐतिहासिक संदर्भ भी मायने रखता है। 1984 के जख्मों से गुजरे परिवारों के लिए एक नवंबर महज कैलेंडर की तारीख नहीं, बल्कि उस भयावह दौर की स्मृति है, जब राजधानी की सड़कों पर निर्दोष सिखों को निशाना बनाया गया, घर और दुकानें जलाई गईं और परिवार उजड़ गए। ऐसे दिन पर बड़े राजनीतिक आयोजन का फैसला संवेदनहीनता और राजनीतिक अविवेक का परिचायक है।भाजपा ने ‘लोकतंत्र बचाओ, अराजकता हटाओ’ रैली निकाली
भाजपा ने इस अवसर पर दिल्ली में सिख संगठनों के साथ 1984 के कत्लेआम के विरोध मार्च निकला, जबकि हरियाणा के रोहतक में भाजपा अध्यक्ष नितिन नबीन ने ‘लोकतंत्र बचाओ, अराजकता हटाओ’ पदयात्रा का नेतृत्व किया। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने चंडीगढ़ में राहुल गांधी पर निशाना साधा और कहा कि 1984 के सिख-विरोधी नरसंहार की बरसी पर दिल्ली में रैली करके कांग्रेस ने पीड़ित परिवारों के जख्मों पर नमक छिड़का है। इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर कांग्रेस के इतिहास, राजीव गांधी के विवादित बयान, पार्टी नेताओं पर लगे आरोपों और 42 साल बाद भी न्याय की प्रतीक्षा कर रहे पीड़ित परिवारों के सवालों को राष्ट्रीय बहस के केंद्र में ला दिया है।

सिखों का सुनियोजित संहार: कांग्रेस के माथे पर बदनुमा कलंक
31 अक्टूबर 1984 को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की उनके दो सिख सुरक्षाकर्मियों ने हत्या कर दी थी। इसके अगले दिन से दिल्ली सहित देश के कई हिस्सों में सिख समुदाय के विरुद्ध हिंसा भड़क उठी। राजधानी में तीन दिनों तक जो कुछ हुआ, वह किसी भी सभ्य समाज को बेहद शर्मसार करने वाला था। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, 1984 की हिंसा में देशभर में 3,325 लोगों की जान गई, जिनमें अकेले दिल्ली के 2,733 लोग शामिल थे। हजारों परिवारों की दुनिया उजड़ गई। लोगों को घरों से निकालकर मारा गया, दुकानों और मकानों को आग के हवाले किया गया और महिलाओं-बच्चों ने भयावह यातनाएं झेलीं। यह कोई सामान्य कानून-व्यवस्था की विफलता नहीं थी, बल्कि उस समय की शासन व्यवस्था और राजनीतिक नेतृत्व के सामने खड़ा एक ऐसा प्रश्न था, जिसका जवाब पीड़ित परिवार आज भी मांग रहे हैं।तत्कालीन पीएम राजीव का बयान जख्मों पर नमक के समान
सिखों के खिलाफ हिंसा के लगभग तीन सप्ताह बाद, 19 नवंबर 1984 को तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने दिल्ली के बोट क्लब में एक जनसभा को संबोधित करते हुए कहा था, “जब कोई बड़ा पेड़ गिरता है तो धरती थोड़ी हिलती है।” यह बयान इंदिरा गांधी की हत्या के बाद देश में हुए दंगों और लोगों के गुस्से के संदर्भ में दिया गया था। राजीव गांधी के पूरे भाषण में शांति और राष्ट्रीय एकता की अपील भी थी, लेकिन सिखों के नरसंहार के बाद आया यह रूपक उनके राजनीतिक जीवन के सबसे विवादास्पद बयानों में शामिल हो गया। पीड़ित परिवारों और आलोचकों ने इसे हिंसा की गंभीरता को कम करके आंकने वाला और पीड़ितों के प्रति असंवेदनशील बयान माना। किसी प्रधानमंत्री से अपेक्षा होती है कि वह नागरिकों की हत्या पर स्पष्ट निंदा करे, दोषियों को सजा दिलाने का संकल्प जताए और पीड़ित समुदाय को भरोसा दे। ऐसे समय में यह बयान मरहम के बजाय घाव को और गहरा करने वाला साबित हुआ।

कांग्रेस नेताओं पर आरोप और जांच आयोग की गंभीर टिप्पणियां
एक नवंबर और उसके बाद की हिंसा में स्थानीय कांग्रेस नेताओं और कार्यकर्ताओं की भूमिका को लेकर गंभीर आरोप लगे थे। यह केवल राजनीतिक दलों के बीच एक-दूसरे पर लगाए गए आरोपों का विषय नहीं रहा, बल्कि जांच आयोगों ने भी इसकी पड़ताल की। न्यायमूर्ति जी.टी. नानावती आयोग ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि अनेक हलफनामों में स्थानीय कांग्रेस नेताओं और कार्यकर्ताओं पर भीड़ को उकसाने अथवा हमलों में सहायता करने के आरोप लगाए गए। आयोग ने हिंसा के संगठित स्वरूप और पुलिस की निष्क्रियता पर गंभीर टिप्पणियां कीं। रिपोर्ट में यह भी दर्ज किया गया कि एक नवंबर से हमलों का स्वरूप अधिक विकराल होता गया और पुलिस की प्रभावी कार्रवाई न होने से जान-माल का नुकसान बढ़ा।

दिल्ली हिंसा में 2,733 मौतें, केवल 587 FIR दर्ज हुईं थीं
1984 की हिंसा के बाद न्याय की प्रक्रिया जिस तरह वर्षों तक धीमी रही, उसने भारतीय लोकतंत्र और न्याय व्यवस्था की विश्वसनीयता पर भी सवाल खड़े किए। मानवाधिकार संगठन ह्यूमन राइट्स वॉच के अनुसार, दिल्ली पुलिस ने हिंसा के दौरान हुई 2,733 मौतों के बावजूद केवल 587 एफआईआर दर्ज की थीं और इनमें से 241 मामलों को जांच के बिना बंद कर दिया गया था। बाद के वर्षों में कई मामलों की दोबारा जांच हुई और कुछ दोषियों को सजा भी मिली। लेकिन न्याय की यह प्रक्रिया इतनी लंबी रही कि अनेक पीड़ित अपने जीवनकाल में इंसाफ देखने की प्रतीक्षा करते रह गए। कांग्रेस के लिए यह इतिहास केवल अतीत का काला अध्याय है। जब तक पीड़ित परिवारों के सवालों का संतोषजनक जवाब नहीं मिलता और दोषियों को लेकर जवाबदेही सुनिश्चित नहीं होती, तब तक पार्टी को इस अध्याय पर राजनीतिक सवालों का सामना करना पड़ेगा।एक नवंबर को रैली: तारीख पर राजनीतिक और नैतिक सवाल
कांग्रेस के नेतृत्व वाले INDIA गठबंधन ने एक नवंबर को दिल्ली के रामलीला मैदान में ‘वोट बचाओ, देश बचाओ’ रैली आयोजित की। इसका घोषित उद्देश्य मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार और मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण को लेकर विपक्ष की आपत्तियां उठाना था। चुनाव प्रक्रिया पर सवाल उठाना विपक्ष का लोकतांत्रिक अधिकार है और इस अधिकार पर किसी को आपत्ति नहीं होनी चाहिए। लेकिन क्या इतनी बड़ी राजनीतिक रैली के लिए एक नवंबर के अलावा कोई दूसरा दिन नहीं चुना जा सकता था? क्या पार्टी के रणनीतिकारों को यह ध्यान नहीं आया कि इस तारीख का सिख समुदाय के लिए कितना गहरा ऐतिहासिक और भावनात्मक अर्थ है? पंजाब में विधानसभा चुनाव सिर पर हैं। ऐसे में इन चुनावों में कांग्रेस के खिलाफ सिख समाज का जायज गुस्सा और अधिक हो सकता है। भाजपा ने इसी सवाल को उठाया है कि तारीख का चयन जानबूझकर पीड़ितों की भावनाओं को आहत करने के लिए किया गया। इस आयोजन के समय पर उठी आपत्तियां निराधार नहीं हैं। राजनीतिक दलों से अपेक्षा की जाती है कि वे लोकतांत्रिक अधिकारों के साथ सामाजिक संवेदनशीलता का भी ध्यान रखें।अमित शाह का हमला: राहुल गांधी को माफी मांगनी चाहिए
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने चंडीगढ़ में एक कार्यक्रम के दौरान राहुल गांधी पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि 1984 के सिख-विरोधी नरसंहार की बरसी पर दिल्ली में रैली आयोजित करके कांग्रेस ने पीड़ितों के जख्मों पर नमक छिड़का है। शाह ने राजीव गांधी के ‘बड़ा पेड़’ वाले बयान का उल्लेख करते हुए कांग्रेस से इस इतिहास पर जवाब देने की मांग की। उनका तर्क था कि जिस पार्टी के शासनकाल में हजारों निर्दोष लोगों की हत्या हुई, उसे पीड़ित परिवारों की भावनाओं का ध्यान रखना चाहिए था। शाह ने कहा कि पंजाब चुनाव में कांग्रेस को इस गलती के लिए जनता-जनार्दन सबक सिखाएगी। राहुल गांधी को भी निशाने पर लेते हुए कहा कि यदि वह प्रधानमंत्री बनने की आकांक्षा रखते हैं तो उन्हें देश के इतिहास और लोकतांत्रिक मर्यादाओं के प्रति संवेदनशील होना चाहिए। भाजपा का यह हमला केवल रैली की तारीख तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उसने कांग्रेस की ऐतिहासिक जवाबदेही पर भी सवाल उटाए।

नितिन नबीन की पदयात्रा और भाजपा का जवाबी अभियान
भाजपा ने कांग्रेस की रैली के समानांतर अपने राजनीतिक अभियान को भी आगे बढ़ाया। पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन ने हरियाणा के रोहतक में ‘लोकतंत्र बचाओ, अराजकता हटाओ’ पदयात्रा का नेतृत्व किया। उन्होंने कांग्रेस से 1984 की हिंसा के लिए माफी मांगने की मांग की और राहुल गांधी पर संवैधानिक संस्थाओं के विरुद्ध निराधार आरोप लगाने का आरोप लगाया। इस पदयात्रा में केंद्रीय मंत्री जयंत चौधरी, भाजपा की हरियाणा प्रभारी स्मृति ईरानी और प्रदेश भाजपा अध्यक्ष डॉ. अर्चना गुप्ता सहित कई नेता शामिल हुए। भाजपा ने इस अभियान को विपक्ष की कथित अराजक राजनीति के जवाब के रूप में पेश किया। पार्टी का संदेश था कि लोकतंत्र में विरोध का अधिकार है, लेकिन संस्थाओं पर सवाल उठाने के नाम पर अविश्वास और भ्रम का वातावरण पैदा करना उचित नहीं है।

दिल्ली में सिख समुदाय का हरिनगर से तिलक नगर तक विरोध मार्च
दिल्ली में भाजपा ने सिख समुदाय के सदस्यों के साथ पश्चिमी दिल्ली के हरिनगर से तिलक नगर तक विरोध मार्च निकाला। इसमें पूर्व केंद्रीय मंत्री हरदीप सिंह पुरी, दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता, प्रदेश भाजपा अध्यक्ष हर्ष मल्होत्रा और दिल्ली सरकार के मंत्री मनजिंदर सिंह सिरसा सहित कई नेता शामिल हुए। सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता एच.एस. फुल्का और सिख संगठनों के प्रतिनिधियों की भागीदारी ने इस विरोध को पीड़ित समुदाय की भावनाओं से जोड़ने का प्रयास किया। प्रदर्शनकारियों ने कांग्रेस से 1984 की हिंसा के लिए माफी मांगने और पीड़ित परिवारों को न्याय दिलाने की मांग की। हरदीप सिंह पुरी ने इस हिंसा को सुनियोजित नरसंहार बताया। भाजपा का यह संदेश साफ था कि कांग्रेस को केवल वर्तमान राजनीति पर भाषण देने के बजाय अपने शासनकाल के इस काले अध्याय पर भी जवाब देना चाहिए।

सिखों के जख्मों और न्याय में देरी से कांग्रेस बच नहीं सकती
चार दशक से ज्यादा बीत जाने के बाद भी 1984 की हिंसा भारतीय लोकतंत्र के इतिहास का ऐसा काला अध्याय है, जिसे भुलाया नहीं जा सकता। उस त्रासदी में जिन परिवारों ने अपने प्रियजनों को खोया, उनके लिए हर वर्ष एक नवंबर स्मृति, पीड़ा और न्याय की अधूरी उम्मीद लेकर आता है। राहुल गांधी की रैली का घोषित एजेंडा चुनावी प्रक्रिया से जुड़ा था, लेकिन तारीख के चयन ने कांग्रेस को एक और गंभीर राजनीतिक विवाद में ला खड़ा किया। राजीव गांधी का बयान, कांग्रेस नेताओं पर लगे आरोप और न्याय में हुई देरी, ये सभी ऐसे सवाल हैं जिनसे कांग्रेस पार्टी बच नहीं सकती। क्योंकि लोकतंत्र केवल चुनाव जीतने, रैलियां करने और सत्ता हासिल करने का नाम नहीं है; यह नागरिकों के जीवन, सम्मान और न्याय की रक्षा करने की व्यवस्था भी है। सिख समुदाय के घावों पर वास्तविक मरहम तभी लगेगा, जब एक-एक पीड़ित को न्याय मिलेगा।

Leave a Reply