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मोदी विजन से आजादी के 79 साल बाद रेल नक्शे पर रावघाट, बस्तर में लिखी विकास की नई इबारत

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आजादी के सात दशकों से अधिक समय तक जिस बस्तर और रावघाट की पहचान बारूदी सुरंगों, नक्सली वारदातों और खूनी संघर्ष के रूप में कराई जाती रही, आज उसी धरती पर भारतीय रेल की गूंजती सीटी ने एक नए युग का सूत्रपात कर दिया है। 79 वर्षों तक देश की मुख्यधारा और रेल नेटवर्क से कटे रहे छत्तीसगढ़ के अति संवेदनशील इलाके रावघाट तक आखिरकार रेलवे ट्रैक बिछाने का भागीरथ कार्य संपन्न हो चुका है। 1,628 करोड़ रुपये की लागत वाली महत्वाकांक्षी 95 किलोमीटर लंबी दल्ली-राजहरा-रावघाट परियोजना के अंतिम 17.5 किलोमीटर लंबे ताड़ोकी-रावघाट रेल खंड के पूरा होते ही यह पूरा अंचल सीधे राष्ट्रीय मानचित्र पर दर्ज हो गया है। यह केवल लोहे की पटरियों का बिछना नहीं, बल्कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के उस दृढ़ राजनीतिक संकल्प की विजय है, जिसने विकास और सुरक्षा के समन्वय से दशकों पुराने लाल आतंक को निर्णायक रूप से पीछे धकेल दिया है।

दशकों की उपेक्षा का अंत और डबल इंजन सरकार का संकल्प
दल्ली-राजहरा से रावघाट तक रेल लाइन की परिकल्पना दशकों पहले की गई थी, लेकिन पूर्ववर्ती सरकारों के दौर में यह योजना केवल फाइलों, आश्वासनों और लेतलतीफी की शिकार बनी रही। पिछली सरकारों ने भौगोलिक विषमताओं और सुरक्षा चुनौतियों का बहाना बनाकर इस पूरे क्षेत्र को उपेक्षित रखा, जिससे जनजातीय समाज बुनियादी सुविधाओं से दूर रहा। वर्ष 2014 के बाद केंद्र में आई मोदी सरकार ने इस जड़ता को तोड़ा। सुरक्षाबलों के अदम्य साहस, रेलवे इंजीनियरों की तकनीकी दक्षता और डबल इंजन सरकार की साझा प्रतिबद्धता के दम पर घने जंगलों और दुर्गम पहाड़ियों के बीच ट्रैक बिछाने का काम पूरा हुआ। छत्तीसगढ़ को हालिया बजट में रेलवे विस्तार के लिए 7,000 करोड़ रुपये से अधिक का ऐतिहासिक आवंटन मिला, जिसने ऐसे दूरगामी प्रोजेक्ट्स को अभूतपूर्व गति दी।

पीएम गति शक्ति और मल्टीमॉडल कनेक्टिविटी का आदर्श मॉडल
रावघाट परियोजना को पीएम गति शक्ति राष्ट्रीय मास्टर प्लान के तहत समन्वित कार्य योजना से जोड़ा गया है। इससे पहले रेल, सड़क, वन और खनन विभागों के बीच तालमेल की कमी के कारण बुनियादी परियोजनाएं दशकों तक लटकी रहती थीं। गति शक्ति पोर्टल के माध्यम से विभिन्न मंत्रालयों ने भौगोलिक सूचना प्रणाली (GIS) डेटा का उपयोग करके पर्यावरण और वन स्वीकृतियों को समयबद्ध तरीके से निपटाया। अब रावघाट रेलवे स्टेशन को निकटवर्ती राष्ट्रीय और राज्य राजमार्गों के साथ मल्टीमॉडल हब के रूप में जोड़ा जा रहा है, जिससे माल ढुलाई और यात्रियों की निर्बाध आवाजाही सुनिश्चित हो रही है।

अमृत भारत स्टेशन योजना से रावघाट को आधुनिक और विश्वस्तरीय स्वरूप
रावघाट रेलवे स्टेशन को केवल एक साधारण हॉल्ट नहीं, बल्कि मोदी सरकार की अमृत भारत स्टेशन योजना के तहत भविष्य की जरूरतों को ध्यान में रखकर एक आधुनिक टर्मिनल के रूप में विकसित किया गया है। स्टेशन परिसर में स्थानीय बस्तर कला और जनजातीय संस्कृति को दर्शाने वाले भित्तिचित्रों के साथ-साथ रूफटॉप प्लाजा, चौड़े फुट ओवरब्रिज, लिफ्ट, एस्केलेटर, मुफ्त वाई-फाई और दिव्यांगजन अनुकूल सुविधाएं स्थापित की गई हैं। यह स्टेशन स्थानीय कला का सम्मान करते हुए आधुनिक भारत के विश्वस्तरीय इंफ्रास्ट्रक्चर का सशक्त उदाहरण प्रस्तुत करता है।

लाल आतंक पर निर्णायक प्रहार और नक्सल मुक्त भारत का संकल्प
रावघाट तक रेल नेटवर्क का विस्तार केवल आवागमन की सुविधा नहीं, बल्कि केंद्रीय गृह मंत्रालय के मार्च 2026 तक देश से नक्सलवाद के पूर्ण खात्मे के राष्ट्रीय संकल्प की सीधी परिणति है। गृह मंत्री अमित शाह की प्रत्यक्ष निगरानी में सुरक्षाबलों ने लाल आतंक के कोर क्षेत्रों में नए फॉरवर्ड ऑपरेटिंग बेस (FOB) स्थापित किए, जिससे हिंसक घटनाओं में 70 प्रतिशत से अधिक की गिरावट दर्ज की गई। कभी दहशत फैलाने वाले सैकड़ों नक्सलियों द्वारा आत्मसमर्पण कर मुख्यधारा को चुनना यह साबित करता है कि केंद्र सरकार की सख्त सुरक्षा रणनीति और समानांतर विकास नीति ने बस्तर में आतंक की रीढ़ पूरी तरह तोड़ दी है।

सुरक्षाबलों के त्वरित आवागमन और लॉजिस्टिक्स में सामरिक बढ़त
भौगोलिक दुर्गमता और बारूदी सुरंगों के खतरे के कारण पहले सुरक्षाबलों की टुकड़ियों, भारी सैन्य उपकरणों और रसद को अबूझमाड़ के मुहाने तक पहुंचाना जोखिम भरा और अत्यधिक समय लेने वाला कार्य था। रावघाट तक सीधी ब्रॉडगेज लाइन बिछने से केंद्रीय अर्धसैनिक बलों (CRPF, BSF, ITBP) और कोबरा कमांडो की त्वरित तैनाती को अभूतपूर्व सामरिक गति मिली है। सुरक्षित और त्वरित लॉजिस्टिक सपोर्ट मिलने से सीमावर्ती इलाकों में गश्त और नक्सल विरोधी अभियानों की क्षमता कई गुना बढ़ गई है, जिसने लाल आतंक के बचे-खुचे नेटवर्क को पूरी तरह बैकफुट पर ला दिया है।

आत्मसमर्पित नक्सलियों का पुनर्वास और रेलवे आधारित रोजगार से मुख्यधारा में वापसी
मोदी सरकार की आत्मसमर्पण और पुनर्वास नीति के तहत हथियार छोड़कर लौटे सैकड़ों पूर्व नक्सलियों को विकास के इस नए प्रवाह से जोड़ा जा रहा है। रेलवे द्वारा स्थानीय स्टेशनों के रखरखाव, सुरक्षा कार्यों, पार्सल हैंडलिंग और कैटरिंग इकाइयों में स्थानीय युवाओं और आत्मसमर्पण करने वालों को कौशल प्रशिक्षण देकर आजीविका के साधन उपलब्ध कराए गए हैं। यह पहल इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण है कि हाथ में बंदूक की जगह सम्मानजनक रोजगार देकर सरकार ने न केवल लाल आतंक का अंत किया है, बल्कि हिंसा से प्रभावित परिवारों को आत्मसम्मान के साथ जीवन जीने का नया मार्ग दिखाया है। 

अबूझमाड़ का पहली बार सिविल एडमिनिस्ट्रेशन और बैंकिंग नेटवर्क से जुड़ाव
दशकों तक जिस अबूझमाड़ को सुरक्षा कारणों से नो गो जोन माना जाता था, रावघाट रेल संपर्क ने वहां तक नागरिक प्रशासन और संस्थागत सेवाओं की स्थायी पहुंच सुनिश्चित कर दी है। रेलवे स्टेशन और सहायक कार्यालयों के बनने से इस सीमावर्ती क्षेत्र में डाकघर, डिजिटल इंडिया कॉमन सर्विस सेंटर (CSC) और राष्ट्रीयकृत बैंकों की शाखाएं खुली हैं। केंद्र सरकार की प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (DBT) योजनाओं का पैसा अब बिचौलियों के बिना सीधे आदिवासियों के बैंक खातों में पहुंच रहा है, जिससे इलाके में समानांतर सत्ता का प्रभाव पूरी तरह समाप्त हो गया है।

डिजिटल साक्षरता और कॉमन सर्विस सेंटर क्रांति से पारदर्शी सुशासन
रेलवे नेटवर्क के साथ बिछे ऑप्टिकल फाइबर केबल (OFC) ने बस्तर के दूरदराज जंगलों में डिजिटल क्रांति ला दी है। रावघाट स्टेशन और उसके आसपास के गांवों में हाई स्पीड इंटरनेट कनेक्टिविटी पहुंचने से कॉमन सर्विस सेंटर सक्रिय हो चुके हैं। जहां पहले जाति, निवास, आय प्रमाण पत्र और किसान क्रेडिट कार्ड बनवाने के लिए आदिवासियों को कई दिनों का सफर तय करना पड़ता था, वहीं अब फेस ऑथेंटिकेशन और बायोमेट्रिक के जरिए यह कार्य कुछ ही मिनटों में हो रहा है। डिजिटल साक्षरता ने प्रशासन और जनता के बीच की दूरी को पाटकर सरकारी योजनाओं में शत प्रतिशत पारदर्शिता सुनिश्चित की है।

औद्योगिक आत्मनिर्भरता और कच्चे माल की ढुलाई को नई मजबूती
रावघाट तक रेल नेटवर्क का पहुंचना भारतीय उद्योग और बस्तर की स्थानीय अर्थव्यवस्था, दोनों के लिए मील का पत्थर है। रावघाट में मौजूद समृद्ध उच्च श्रेणी लौह अयस्क (आयरन ओर) का विशाल भंडार देश के प्रमुख इस्पात संयंत्रों, विशेष रूप से भिलाई स्टील प्लांट (SAIL) के लिए जीवनरेखा की तरह कार्य करेगा। अभी तक कच्चे माल की ढुलाई में लगने वाले भारी समय, सड़क परिवहन लागत और सुरक्षा जोखिमों से अब स्थाई मुक्ति मिलेगी। रेल मार्ग से सुगम आपूर्ति होने से देश के इस्पात उत्पादन को बल मिलेगा और औद्योगिक आत्मनिर्भरता के लक्ष्य को नई गति प्राप्त होगी।

किसान रेल से बस्तर की प्राकृतिक और जैविक उपज को मिला नया बाजार
बस्तर के वनांचल में पारंपरिक रूप से होने वाली बिना रासायनिक खाद वाली जैविक खेती और सुगंधित धान (जैसे जीराफूल और दुबराज) के लिए यह रेल लाइन समृद्धि का नया द्वार लेकर आई है। पूर्व में खराब होने वाली ताजी सब्जियों और फलों जैसे पपीता, सीताफल और काजू को महानगरों तक पहुंचाना कोल्ड चेन और तेज परिवहन के अभाव में बहुत कठिन था। अब किसान रेल सेवाओं और विशेष पार्सल वैन की सुविधा से बस्तर के जैविक उत्पाद सीधे रायपुर, विशाखापट्टनम और नागपुर जैसे बड़े शहरी बाजारों तक 24 घंटे में पहुंच रहे हैं, जिससे स्थानीय किसानों को अपनी उपज का बेहतर मूल्य मिलना सुनिश्चित हुआ है।

जल जीवन मिशन और ग्रामीण विकास परियोजनाओं की सामग्री ढुलाई में तेजी
दुर्गम पहाड़ियों और बारूदी सुरंगों के भय के कारण बस्तर के अंदरूनी गांवों में जल जीवन मिशन के तहत पाइपलाइन बिछाने, पानी की टंकियां बनाने और सौर ऊर्जा उपकरण पहुंचाने में भारी लॉजिस्टिक समस्याएं आती थीं। रावघाट तक रेल संपर्क जुड़ने से भारी निर्माण सामग्री जैसे सीमेंट, लोहे की पाइपें और सोलर पैनल सीधे नजदीकी डिपो तक पहुंच रहे हैं। इसने हर घर नल से जल पहुंचाने के सरकारी अभियान को अभूतपूर्व गति दी है, जिससे दूरदराज के आदिवासी परिवारों को शुद्ध पेयजल की उपलब्धता सुनिश्चित हो सकी है।

पीएम जनमन से विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूहों का कायाकल्प
रावघाट और आसपास के अबूझमाड़ अंचल में निवासरत विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूहों (PVTG) जैसे माड़िया और कमर समुदाय के लिए यह रेल मार्ग वरदान सिद्ध हुआ है। प्रधानमंत्री जनजातीय आदिवासी न्याय महाअभियान (पीएम-जनमन) के तहत रेल नेटवर्क के साथ-साथ इन बस्तियों तक पक्के मकान, स्वच्छ पेयजल और बिजली की आपूर्ति पहुंचाई गई है। रेल लाइन के आने से इस अति पिछड़े समूह के लोगों का अलगाव समाप्त हुआ है और उन्हें मुख्यधारा के आर्थिक अवसरों से जुड़ने का सीधा मंच मिला है।

वन धन योजना से जनजातीय मातृशक्ति का सशक्तिकरण
रेलवे नेटवर्क के जुड़ने का सबसे सकारात्मक प्रभाव बस्तर की जनजातीय महिलाओं और उनके स्वयं सहायता समूहों (SHGs) पर पड़ा है। प्रधानमंत्री वन धन योजना और ट्राइफेड (TRIFED) के माध्यम से इमली, महुआ, हर्रा और चिरौंजी जैसे लघु वनोपजों (MFP) का स्थानीय स्तर पर प्रसंस्करण हो रहा है। पहले परिवहन साधन न होने के कारण आदिवासियों को अपनी उपज औने-पौने दामों में बिचौलियों को बेचनी पड़ती थी, लेकिन अब सीधी रेल कनेक्टिविटी से ये उत्पाद सीधे राष्ट्रीय स्तर के ट्राइब्स इंडिया आउटलेट्स और बड़े बाजारों तक पहुंच रहे हैं, जिससे ग्रामीण महिलाओं की आर्थिक आत्मनिर्भरता कई गुना बढ़ गई है।

बस्तर के पारंपरिक ढोकरा शिल्प और जीआई उत्पादों को वैश्विक पहचान
रावघाट रेल लाइन बस्तर के ऐतिहासिक ढोकरा शिल्प (बेल मेटल क्राफ्ट), लौह शिल्प और काष्ठ कला से जुड़े जनजातीय कारीगरों के लिए सीधा संबल बनी है। पूर्ववर्ती दशकों में परिवहन साधनों के अभाव और अलगाव के कारण इन कारीगरों की कला स्थानीय बाजारों तक सिमट कर रह गई थी। अब रेल नेटवर्क के माध्यम से एक स्टेशन एक उत्पाद (OSOP) योजना और भौगोलिक संकेत (GI Tag) के तहत बस्तर की हस्तशिल्प कृतियां सीधे देश के प्रमुख अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डों, मेट्रो शहरों और वैश्विक प्रदर्शनियों तक पहुंच रही हैं। इससे कारीगरों को अपनी कला का उचित पारिश्रमिक मिल रहा है।

पीएम विश्वकर्मा योजना से पारंपरिक आदिवासी औजार निर्माताओं को संबल
बस्तर के लोहार, बढ़ई और पारंपरिक औजार बनाने वाले कारीगरों के लिए यह रेल संपर्क वरदान साबित हुआ है। पीएम विश्वकर्मा योजना के तहत आधुनिक टूलकिट और रियायती ऋण प्राप्त कर रहे कारीगरों द्वारा बनाए गए कृषि और घरेलू उपकरणों को अब रेल कनेक्टिविटी के जरिए राज्य के दूसरे जिलों और राष्ट्रीय बाजारों तक भेजा जा रहा है। पहले परिवहन के अभाव में इनका कार्य गांव के हाट-बाजारों तक सीमित था, लेकिन अब सीधे माल परिवहन की सुविधा ने पारंपरिक शिल्पकारों को आर्थिक स्वावलंबन और सम्मानजनक आजीविका दी है।

बस्तर के युवाओं को मिला मुख्यधारा में उच्च शिक्षा और प्रतिस्पर्धी मंच
रावघाट रेल लाइन बस्तर के होनहार छात्र-छात्राओं के सपनों को नई उड़ान दे रही है। रेल मार्ग के अभाव में सुदूर गांवों के प्रतिभाशाली युवा रायपुर, बिलासपुर और दिल्ली जैसे बड़े शैक्षिक केंद्रों में उच्च शिक्षा, प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी और तकनीकी डिग्री के लिए जाने से कतराते थे। अब सुरक्षित, नियमित और रियायती रेल यात्रा उपलब्ध होने से बस्तर के आदिवासी युवा मेडिकल, इंजीनियरिंग और सिविल सेवा जैसी राष्ट्रीय स्तर की परीक्षाओं की कोचिंग और उच्च शिक्षण संस्थानों तक आसानी से पहुंच रहे हैं। यह कदम बंदूक के डर को पूरी तरह मिटाकर किताबों और कलम की ताकत से युवाओं को राष्ट्र की मुख्यधारा में स्थापित कर रहा है।

खेलो इंडिया और एकलव्य खेल परिसरों से राष्ट्रीय पटल पर बस्तर की खेल प्रतिभाएं
रेलवे नेटवर्क के आने से बस्तर और अबूझमाड़ के नैसर्गिक रूप से दक्ष जनजातीय एथलीटों के लिए राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिताओं के दरवाजे खुल गए हैं। तीरंदाजी, फुटबॉल, एथलेटिक्स और मलखंब में बस्तर के आदिवासी युवाओं की प्राकृतिक क्षमता जगजाहिर रही है, लेकिन परिवहन के साधनों के अभाव में वे राज्य और राष्ट्रीय स्तर के ट्रायल्स में भाग लेने से चूक जाते थे। अब सीधी, सुरक्षित और नियमित रेल सेवा मिलने से खिलाड़ी बिलासपुर और रायपुर स्थित खेलो इंडिया स्टेट सेंटर ऑफ एक्सीलेंस और राष्ट्रीय खेल अकादमियों तक आसानी से पहुंच रहे हैं, जिससे देश को नए पदक विजेता मिलने का मार्ग प्रशस्त हुआ है।

आपातकालीन स्वास्थ्य सेवाओं और जीवन रक्षक संजीवनी का विस्तार
रेल कनेक्टिविटी ने बस्तर के दूरदराज आदिवासी परिवारों के लिए बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं की दूरी को हमेशा के लिए समेट दिया है। पूर्ववर्ती दशकों में एंबुलेंस और सड़कों के अभाव में गंभीर रूप से बीमार मरीजों और गर्भवती महिलाओं को खाट पर उठाकर मीलों चलना पड़ता था, जिससे रास्ते में ही कई जानें चली जाती थीं। अब रावघाट से जगदलपुर और रायपुर के लिए सीधी और सस्ती रेल सेवा मिलने से स्थानीय निवासी एम्स रायपुर और मेडिकल कॉलेजों में विशेषज्ञ डॉक्टरों तक कुछ ही घंटों में पहुंच पा रहे हैं। आयुष्मान भारत योजना के साथ मिलकर यह रेल मार्ग जनजातीय अंचल के लिए एक जीवन रक्षक संजीवनी सिद्ध हो रहा है।

पर्यावरण अनुकूल हरित परिवहन और कार्बन उत्सर्जन में कमी
रावघाट से भिलाई स्टील प्लांट तक प्रतिदिन हजारों टन लौह अयस्क ले जाने के लिए पहले सैकड़ों भारी ट्रकों और डीजल वाहनों पर निर्भर रहना पड़ता था, जिससे संकरे जंगलों की सड़कें क्षतिग्रस्त होती थीं और भारी कार्बन उत्सर्जन से बस्तर की संवेदनशील जैव विविधता पर बुरा असर पड़ता था। रेलवे द्वारा इस पूरे खंड को सीधे शत प्रतिशत विद्युतीकृत ब्रॉडगेज लाइन के रूप में विकसित किया गया है। माल ढुलाई का सड़क से रेल मार्ग पर शिफ्ट होना न केवल रसद लागत को घटा रहा है, बल्कि केंद्र सरकार के नेट जीरो कार्बन एमिशन विजन के अनुरूप बस्तर के घने वनों और वन्यजीवों को प्रदूषण मुक्त रखकर सतत विकास की मिसाल पेश कर रहा है।

बस्तर पर्यटन और इको-कल्चरल इकोनॉमी का राष्ट्रीय पटल पर उदय
रेलवे ट्रैक बिछने से बस्तर के विश्व प्रसिद्ध पर्यटन स्थलों जैसे चित्रकोट जलप्रपात, तीरथगढ़ और कांगेर घाटी राष्ट्रीय उद्यान तक देश भर के पर्यटकों की पहुंच बेहद सुगम हो गई है। पूर्ववर्ती सरकारों के दौर में नक्सली भय के कारण जो अंचल पर्यटकों की दृष्टि से अछूता रह गया था, वह अब इको-टूरिज्म और होमस्टे संस्कृति के नए केंद्र के रूप में उभर रहा है। सीधी ट्रेन सेवा से स्थानीय युवाओं के लिए गाइड, परिवहन, हॉस्पिटैलिटी और सांस्कृतिक आयोजनों के क्षेत्र में स्वरोजगार के व्यापक अवसर खुले हैं, जिससे क्षेत्र की छवि बारूद के गढ़ से बदलकर पर्यटन के स्वर्ग के रूप में स्थापित हो रही है।

रावघाट से जगदलपुर का अगला चरण और संपूर्ण बस्तर रेल कॉरिडोर का विजन
रावघाट तक रेल का पहुंचना इस ऐतिहासिक क्रांति का पहला चरण है। मोदी सरकार ने इसके दूसरे चरण यानी रावघाट से जगदलपुर तक 140 किलोमीटर लंबी नई रेल लाइन के निर्माण को भी सर्वोच्च प्राथमिकता पर आगे बढ़ाया है। 3,400 करोड़ रुपये से अधिक की लागत वाले इस दूसरे चरण के पूरा होते ही रायपुर से सीधे बस्तर के संभागीय मुख्यालय जगदलपुर और वहां से विशाखापट्टनम बंदरगाह तक एक वैकल्पिक और सीधा आर्थिक गलियारा तैयार हो जाएगा। यह कॉरिडोर न केवल दक्षिण छत्तीसगढ़ के संपूर्ण इलाके को सीधे तटीय व्यापार मार्गों से जोड़ेगा, बल्कि रणनीतिक रूप से पूरे दंडकारण्य क्षेत्र के आर्थिक एकीकरण को नई ऊंचाई प्रदान करेगा।

वोट बैंक की राजनीति पर भारी पड़ा अंत्योदय का मॉडल
विपक्षी दलों ने दशकों तक जनजातीय समाज को केवल चुनावी नारों और वोट बैंक तक सीमित रखा, किंतु मोदी सरकार ने सबका साथ, सबका विकास के मूलमंत्र के साथ वास्तविक अंत्योदय को जमीन पर उतारा है। बस्तर के अंदरूनी इलाकों में जहां कभी नक्सलियों का भय था, आज वहां एकलव्य मॉडल आवासीय विद्यालय, हर गांव तक 4G और 5G मोबाइल कनेक्टिविटी, पक्की सड़कें और अब सीधे ब्रॉडगेज रेल लाइन पहुंच चुकी है। बंदूक थमाने वाले नेटवर्क के सामने जब युवाओं को आधुनिक शिक्षा, तकनीकी कौशल और रेल संपर्क की सौगात मिली, तो आतंक की जमीन स्वतः समाप्त हो गई।

विकसित भारत 2047 के निर्माण में बस्तर की सशक्त भागीदारी
79 वर्षों के लंबे इंतजार और अलगाव को समाप्त कर रावघाट पहुंची यह रेलगाड़ी स्पष्ट संदेश देती है कि मोदी सरकार में देश का कोई भी भूभाग उपेक्षित नहीं रहेगा। वर्ष 2047 तक विकसित भारत के लक्ष्य की प्राप्ति में जनजातीय अंचलों की सक्रिय हिस्सेदारी सुनिश्चित की जा रही है। जहां कभी बारूदी धमाकों की दहशत थी, वहां अब विकास, विश्वास और खुशहाली की छुक-छुक सुनाई दे रही है। बस्तर में अब गोलियों का दौर समाप्त हो चुका है और राष्ट्र निर्माण की एक नई गाथा लिखी जा चुकी है।

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