भारत की पहचान दुनिया के सामने तिरंगे से है। जम्मू-कश्मीर से कन्याकुमारी और गुजरात से अरुणाचल प्रदेश तक, तिरंगा ही हमारी राष्ट्रीय एकता और संप्रभुता का प्रतीक है। भारतीय संविधान में देश के तिरंगे के अलावा किसी अन्य राज्य के लिए अलग आधिकारिक झंडे का कोई विशेष प्रावधान या अनिवार्यता नहीं है। लेकिन देश की राजनीति में एक बार फिर अलग-अलग राज्यों के अपने झंडे की मांग जोर पकड़ रही है। कांग्रेस और कई क्षेत्रीय दलों द्वारा अपनी स्थानीय राजनीतिक जमीन मजबूत करने और क्षेत्रीय पहचान को राष्ट्रीय पहचान के समकक्ष दिखाने के लिए इसे एक सियासी मुद्दे के रूप में पेश किया जा रहा है। हाथ में संविधान लेकर घूमने वाली विपक्षी पार्टियां ही संविधान विरोधी मांग कर देश की एकता और अखंडता को खतरे में डालने की कोशिश कर रही हैं।
Tamil Nadu’s demand for a separate state flag has resurfaced, with TVK leader Adhavarjuna urging CM Vijay to hoist it on November 1. The 50-year-old demand has drawn BJP opposition, with the party warning against encouraging separatist sentiments. @nimumurali with more | @aakaaanksha #TN #Adhavarjuna #CM #BJP
— News18 (@CNNnews18) November 2, 2026
तमिलनाडु का अपना झंडा होना चाहिए- आधव अर्जुन
एक बार फिर तमिलनाडु में तमिलागा वेत्री कड़गम (टीवीके) पार्टी के नेता और राज्य की विजय सरकार के मंत्री आधव अर्जुन ने शनिवार (31 अक्टूबर) को राज्य के लिए अलग झंडे की मांग को हवा दी। उनका कहना है कि तमिलनाडु का अपना झंडा होना चाहिए और उसे राष्ट्रीय ध्वज के बराबर दर्जा मिलना चाहिए। इसके बाद इसे राज्य के हर घर में फहराया जाना चाहिए। मंत्री आधव अर्जुन ने कहा कि इस ध्वज में तमिलनाडु को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। इतना ही नहीं, उन्होंने मुख्यमंत्री विजय से इस झंडे को 18 जुलाई (तमिलनाडु दिवस) और 1 नवंबर को फहराने की अपील भी की।
करुणानिधि का तमिलनाडु के लिए अलग झंडे का प्रस्ताव
यह पहली बार नहीं है, जब तमिलनाडु में अलग झंडे की मांग हो रही है। इसकी शुरुआत करीब 56 साल पहले 1970 में तत्कालीन मुख्यमंत्री एम. करुणानिधि के दौर में हुई थी। तत्कालीन मुख्यमंत्री एम. करुणानिधि ने राज्य की स्वायत्तता और संघवाद को बढ़ावा देते हुए तमिलनाडु के लिए एक अलग झंडे का प्रस्ताव रखा था। इस प्रस्तावित झंडे के डिजाइन में भूरे रंग की पृष्ठभूमि, ऊपरी-बाएं कोने में भारतीय तिरंगा और राज्य का ‘गोपुरम’ (मंदिर टॉवर) प्रतीक चिन्ह शामिल करने की योजना थी। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की सरकार ने इसे आगे नहीं बढ़ाया, और मैसूर के मुख्यमंत्री वीरेंद्र पाटिल सहित कई नेताओं ने इसका कड़ा विरोध किया था।

टीवीके सरकार में शामिल कांग्रेस की मौन सहमति
यहां गौर करने वाली बात यह है कि टीवीके सरकार को कांग्रेस का समर्थन प्राप्त है और कांग्रेस के नेता सरकार में भी शामिल हैं। गौरतलब है कि मई 2026 के तमिलनाडु विधानसभा चुनावों में टीवीके के बहुमत के आंकड़े से कुछ सीटें कम रहने के बाद, कांग्रेस ने डीएमके से अपना पुराना गठबंधन तोड़कर टीवीके को सरकार बनाने के लिए शर्त के साथ समर्थन दिया था। तमिलनाडु के मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय के नेतृत्व वाली सरकार में कांग्रेस पार्टी के दो मंत्री शामिल है। ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि क्या कांग्रेस इस मांग से सहमत है? क्या पार्टी अपने सहयोगी दल के इस राजनीतिक एजेंडे पर अपना रुख स्पष्ट करेगी? लेकिन इन सवालों के जवाब कांग्रेस के अब तक मौन से मिल रहे हैं।

कर्नाटक में सीएम सिद्धारमैया ने की थी अलग झंडे की मांग
तमिलनाडु से पहले कर्नाटक में अलग झंडे की राजनीति सामने आ चुकी है। 2017-18 में सिद्धारमैया के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार ने कर्नाटक के लिए अलग आधिकारिक झंडे का प्रस्ताव तैयार कराया था। पीले, सफेद और लाल रंग की पट्टियों वाले इस प्रस्तावित झंडे के बीच में राज्य का प्रतीक चिह्न था। कर्नाटक के लिए एक अलग राज्य ध्वज के डिजाइन और कानूनी पहलुओं पर विचार करने के लिए नौ सदस्यीय समिति का गठन किया गया था। मार्च 2018 में विधानसभा चुनाव से ठीक पहले इस प्रस्ताव को मंजूरी देकर केंद्र सरकार के पास भेजा गया था, जिसे केंद्र ने स्वीकार नहीं किया था।

कर्नाटक में अलग झंडे पर सीएम शिवकुमार करेंगे चर्चा
कर्नाटक में एक बार फिर कन्नड़ झंडे को आधिकारिक मान्यता देने की मांग उठी है। डीके शिवकुमार ने पारंपरिक पीले और लाल रंग के कन्नड़ ध्वज को ‘आधिकारिक राज्य ध्वज’ का दर्जा देने की तैयारी का ऐलान किया है। उन्होंने स्पष्ट किया है कि सरकार एक ऐसा कानूनी ढांचा तैयार करने जा रही है जिससे राज्य के सभी सरकारी भवनों पर राष्ट्रीय ध्वज (तिरंगे) के साथ-साथ कन्नड़ ध्वज को भी फहराया जा सके। इस प्रस्ताव और कानूनी रूपरेखा पर बेलगावी के सुवर्णा सौध में 30 नवंबर से 11 दिसंबर 2026 तक होने वाले विधानमंडल के शीतकालीन सत्र के दौरान चर्चा की जाएगी।
कांग्रेस सरकार कन्नड़ ध्वज के पारंपरिक स्वरूप और डिजाइन में कुछ संशोधन करने पर भी विचार कर रही है, जिसके तहत झंडे के बीच में कर्नाटक का आधिकारिक राज्य प्रतीक चिन्ह लगाया जा सकता है। सरकारी कार्यालयों के साथ-साथ आईटी और बीटी जैसी निजी कंपनियों व संस्थानों में भी कन्नड़ ध्वज फहराने को बढ़ावा देने या अनिवार्य करने के लिए नियम और दिशा-निर्देश तय किए जाएंगे। डीके शिवकुमार का कहना है कि जिस तरह राज्य का अपना एक अलग राज्य गीत है, उसी तरह एक आधिकारिक राज्य ध्वज भी होना चाहिए जो कन्नड़ लोगों के आत्मसम्मान और सांस्कृतिक पहचान का प्रतिनिधित्व करे।

अब बात जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 370 की वापसी की
अनुच्छेद 370 के तहत जम्मू-कश्मीर का अपना अलग आधिकारिक झंडा था। 2019 में विशेष संवैधानिक व्यवस्था समाप्त होने के बाद यह व्यवस्था भी खत्म हो गई। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री सैफुद्दीन सोज जुलाई 2026 में अनुच्छेद 370 की बहाली की मांग उठा चुके हैं। सोज ने कहा था कि जम्मू-कश्मीर का असली मुद्दा सिर्फ राज्य का दर्जा बहाल करना नहीं है, बल्कि आंतरिक स्वायत्तता और अनुच्छेद 370 की वापसी है। उन्होंने नेशनल कॉन्फ्रेंस (NC) और अन्य दलों से इसके लिए संयुक्त रूप से शांतिपूर्ण आंदोलन चलाने का आह्वान किया था। सैफुद्दीन सोज ने यहां तक कहा था कि नेशनल कॉन्फ्रेंस को जम्मू-कश्मीर का पूर्ण राज्य का दर्जा बहाल करने की मांग को लेकर जंतर-मंतर तक ही अपना विरोध सीमित नहीं रखना चाहिए, बल्कि पूर्ववर्ती राज्य को विशेष दर्जा देने वाले संविधान के अनुच्छेद 370 को बहाल करने की मांग करनी चाहिए।
#BreakingNews: कांग्रेस नेता सैफुद्दीन सोज का विवादित बयान, कहा- ” J&K की आंतरिक स्वायत्तता असली मुद्दा”- – ” 370 की बहाली के लिए लड़ना चाहिए”- सैफुद्दीन सोज #Pakistan #PoK #PakistanArmy #Ranbhoomi #IndiaPakistanRelations | @gauravcsawant | @sunilJbhat https://t.co/GMSpdElLjy
— AajTak (@aajtak) July 15, 2026
देश का प्रशासन केवल केंद्र सरकार द्वारा नहीं चलाया जा सकता- कांग्रेस घोषणापत्र
कांग्रेस ने अपने 2024 के लोकसभा चुनाव के घोषणापत्र (न्याय पत्र) में संघवाद और राज्यों की स्वायत्तता (Federalism and State Autonomy) की वकालत की। कांग्रेस ने इस बात पर जोर दिया कि भारत “राज्यों का संघ” है और देश का प्रशासन केवल केंद्र सरकार द्वारा नहीं चलाया जा सकता। कांग्रेस ने अपने घोषणापत्र में बीजेपी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार पर संघ और राज्यों के बीच आपसी विश्वास से सिले गए भारत के संघवाद के ताने-बाने को नष्ट करने का आरोप लगाया। कांग्रेस संघवाद में राज्यों को ज्यादा से ज्याद अधिकार देने के पक्ष में हैं। उसका मानना है कि राज्य सीधे तौर पर लोगों के दैनिक जीवन से जुड़ा हुआ है।

राहुल गांधी की ‘यूनियन ऑफ स्टेट्स’ पर लगी क्लास
नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने फरवरी 2022 में संसद में राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव पर चर्चा के दौरान कहा था कि भारत को एक ‘राष्ट्र’ (Nation) के रूप में नहीं, बल्कि ‘राज्यों के संघ’ (Union of States) के रूप में वर्णित किया गया है और केंद्र सरकार को राज्यों के साथ बातचीत और संघीय ढांचे का सम्मान करना चाहिए। बाद में उन्होंने ब्रिटेन के कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी और अन्य मंचों पर भी इसे दोहराया था। कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी में भारतीय छात्र और सिविल सेवा अधिकारी सिद्धार्थ वर्मा ने राहुल गांधी के बयान को चुनौती दी। उन्होंने कहा कि भले ही संविधान के अनुच्छेद 1 में ‘यूनियन ऑफ स्टेट्स’ लिखा हो, लेकिन यदि आप एक पन्ना पीछे पलटकर संविधान की प्रस्तावना (Preamble) को देखेंगे, तो उसमें स्पष्ट रूप से भारत को एक ‘राष्ट्र’ (Nation) के रूप में संबोधित किया गया है।
कांग्रेस पार्टी ने जो राहुल गांधी का कैंब्रिज वाला कार्यक्रम अपलोड किया उसमें इस हिस्से को एडिट कर दिया इसमें आई आर टी एस अधिकारी सिद्धार्थ वर्मा ने @RahulGandhi से यह सवाल पूछा कि आप बार-बार विदेश में यह क्यों कहते हैं कि भारत एक राष्ट्र नहीं है?? #पप्पू_पगलेट https://t.co/0SZFWtFubo
— श्रीष त्रिपाठी 🇮🇳 (@Shrish_1987) May 27, 2022
अब हम भाजपा, आरएसएस और इंडियन स्टेट से लड़ रहे हैं-राहुल
इसके अलावा राहुल गांधी भी कई अवसरों पर जता चुके हैं कि उनकी लड़ाई इंडियन स्टेट (यहां पर स्टेट यानी केंद्र) है। जनवरी 2025 में कांग्रेस मुख्यालय इंदिरा भवन के उद्घाटन भाषण के दौरान इंडियन स्टेट के खिलाफ लड़ाई लड़ने की बात की दी। राहुल गांधी ने कहा था, “यह मत सोचिए कि हम निष्पक्ष लड़ाई लड़ रहे हैं… अगर आपको लगता है कि हम भाजपा या आरएसएस जैसे किसी राजनीतिक संगठन से लड़ रहे हैं, तो आपने स्थिति को नहीं समझा है। भाजपा और आरएसएस ने हमारे देश की हर संस्था पर कब्जा कर लिया है। अब हम भाजपा, आरएसएस और स्वयं इंडियन स्टेट से लड़ रहे हैं।”
राहुल गांधी का बेहद विवादित बयान! “हम भारत और भारतीय राज्य से लड़ रहे हैं।” “हमारी लड़ाई केवल BJP-RSS से नहीं है, हमारी लड़ाई इंडियन स्टेट से है।” : राहुल गांधी, कांग्रेस नेता https://t.co/6pDKXr1iNi
— Panchjanya (@epanchjanya) January 15, 2025
आइए जानते हैं, कांग्रेस और उसके सहयोगी दलों द्वारा अपने राज्यों में की जा रही अलग झंडे की मांग कितनी खतरनाक साबित हो सकती है। किस तरह राष्ट्रीय झंडे का अपमान और संविधान का उल्लंघन कर सकता है। साथ ही देश की एकता और अखंडता को खतरा उत्पन्न हो सकता है…
क्षेत्रीय पहचान को उभारकर देश विभाजन की साजिश
यहां सवाल केवल झंडे का नहीं, बल्कि कांग्रेस की राजनीतिक सोच और उसकी प्राथमिकताओं का भी है। क्या ये महज क्षेत्रीय अस्मिता और संघीय व्यवस्था से जुड़े मुद्दे हैं या इनके पीछे देश की राजनीति में क्षेत्रीय पहचान को नए सिरे से उभारकर देश को तोड़ने की कोशिश हो रही है? इसके साथ ही सवाल उठते हैं कि क्या कांग्रेस के अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग राजनीतिक रुख हैं? क्या कांग्रेस और उसके सहयोगी दल राष्ट्रीय एकता और क्षेत्रीय अस्मिता के बीच के महीन लेकिन मजबूत धागे को तोड़कर देश को फिर से 1947 के दौर में ले जाना चाहते हैं, जिसकी यादें रूह कंपा देती हैं। इतिहास गाव है कि जब जब केंद्रीय सत्ता कमजोर हुई, देश या राज्यों में आंतरिक विद्रोह, अराजकता और कानून-व्यवस्था की चुनौतियां बढ़ीं और बाहरी आक्रमणकारियों को देश पर आक्रमण करने का अवसर मिला।
तिरंगे की गरिमा सर्वोपरि, राष्ट्रीय ध्वज से ऊपर कोई नहीं
भारतीय कानून के तहत राष्ट्रीय ध्वज का अपमान या उसकी गरिमा के विरुद्ध कोई भी आचरण ‘राष्ट्रीय सम्मान अपमान निवारण अधिनियम, 1971’ (Prevention of Insults to National Honour Act, 1971) के तहत दंडनीय अपराध है। अनुच्छेद 51A(a) प्रत्येक नागरिक को राष्ट्रीय ध्वज का सम्मान करने का कर्तव्य सौंपता है। इसके अतिरिक्त, किसी भी क्षेत्रीय या राज्य ध्वज को फहराते समय यह सुनिश्चित करना अनिवार्य है कि उसका स्थान राष्ट्रीय ध्वज (तिरंगे) से ऊपर या उसके बराबर न हो और तिरंगे की गरिमा सर्वोपरि बनी रहे।
तिरंगे का सम्मान कम करने की खतरनाक कोशिश
‘एक देश, एक झंडा’ की भावना से ही राष्ट्र की पहचान मजबूत होती है। अलग-अलग झंडे होने से राष्ट्रीय ध्वज (तिरंगे) का सम्मान और उसका प्रभाव कमजोर हो सकता है। भारतीय ध्वज संहिता के अनुसार, किसी भी अन्य झंडे या पताका को राष्ट्रीय ध्वज से ऊंचा या उसके बराबर स्थान नहीं दिया जा सकता। तिरंगा हमेशा सर्वोच्च और विशिष्ट स्थान पर होना चाहिए। कानूनी और राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि राज्यों या अलग-अलग संस्थाओं के स्वतंत्र झंडे होने से देश की संप्रभुता और राष्ट्रीय एकता पर विपरीत प्रभाव पड़ सकता है तथा तिरंगे का सम्मान कम हो सकता है।
अलगाववादी और क्षेत्रीय ताकतों को बढ़ावा
विश्लेषकों के अनुसार, इस तरह की मांगें ‘भानुमती का पिटारा’ खोल सकती हैं, जिससे भविष्य में उप-क्षेत्रीयतावाद या अलग देश जैसी प्रवृत्तियां सिर उठा सकती हैं और देश की अखंडता पर आंच आ सकती है। सरदार वल्लभभाई पटेल के ‘एक राष्ट्र, एक संविधान और एक झंडा’ के सपने से ही देश एकजुट हुआ था। राज्यों के अलग प्रतीक होने से लोगों की निष्ठा राष्ट्रीय पहचान के बजाय क्षेत्रीय पहचान की तरफ झुक सकती है। जम्मू-कश्मीर में पूर्व में रहे अलग झंडे और उसके बाद उपजे अलगाववाद इसका प्रमाण है। अलग झंडा क्षेत्रीय ताकतों को देश से अलग राह चुनने के लिए उकसा सकता है। संविधान निर्माताओं को डर था कि विविधताओं वाले भारत में यदि हर राज्य को अपने संप्रभु प्रतीक दिए गए, तो यह देश की संप्रभुता और अखंडता को कमजोर करेगा।
राज्यों के बीच टकराव को मिल सकता है बढ़ावा
अमेरिका या जर्मनी जैसे संघीय देशों का हवाला भले दिया जाता है, लेकिन भारत की सामाजिक, भाषाई और सांस्कृतिक विविधता अधिक संवेदनशील है। इससे राज्यों के बीच और राज्य व केंद्र के बीच अनावश्यक राजनीतिक टकराव बढ़ सकते हैं। जैसा कि संविधान निर्माता डॉ. बी.आर. आंबेडकर ने भी आगाह किया था, क्षेत्रीय पहचान का अत्यधिक राजनीतिकरण होने से राज्यों में ‘प्रांतीय राष्ट्रवाद’ (Linguistic or Provincial Nationalism) की भावना बढ़ सकती है, जो केंद्र-राज्य संबंधों में अनावश्यक कटुता पैदा करती है।
राज्यों के अलग झंडे से नागरिक भावना में कमी
भारतीय संविधान के तहत केवल एकल नागरिकता का प्रावधान है। अमेरिका की तरह भारत में राज्यों की अपनी अलग नागरिकता नहीं होती। हर व्यक्ति सिर्फ और सिर्फ भारत का नागरिक है। अलग-अलग राज्यों के अपने झंडे होने से संविधान में निहित ‘बंधुत्व’ (Fraternity) और साझा नागरिकता की भावना पर प्रतिकूल असर पड़ सकता है, जहां लोग खुद को पहले किसी राज्य का नागरिक और बाद में भारत का समझने लग सकते हैं। लोगों का मानना है कि अलग राज्य ध्वज होने से लोगों में देश के बजाय अपने राज्य के प्रति प्राथमिकता की भावना आ सकती है, जो ‘एक राष्ट्र, एक ध्वज’ की भावना के विपरीत है। इससे देश के भीतर क्षेत्रीय भेदभाव और राजनीतिक लाभ के लिए उप-राष्ट्रवाद को हवा मिल सकती है, जिससे राष्ट्रीय एकता कमजोर हो सकती है।









