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कांग्रेस सरकारों के दौर में 10 बार हुआ SIR, तब लोकतंत्र सुरक्षित था, आज खतरा कैसे?

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एक मजबूत और जीवंत लोकतंत्र की नींव हमेशा एक सटीक, अद्यतन और पारदर्शी मतदाता सूची पर टिकी होती है। चुनाव आयोग द्वारा समय-समय पर कराया जाने वाला विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision – SIR) इसी दिशा में उठाया गया वह संवैधानिक कदम है, जो फर्जी, दोहरे और स्थानांतरित मतदाताओं को हटाकर पात्र नागरिकों के मताधिकार की रक्षा करता है। आज जब चुनाव आयोग ने मतदाता सूची को शुद्ध करने के लिए राष्ट्रव्यापी अभियान चलाया है, तो कांग्रेस और इंडी गठबंधन की पार्टियां इसे ‘वोट काटने की साजिश’ बताकर जनता में भ्रम फैला रही हैं। विडंबना यह है कि देश के चुनावी इतिहास में कुल 12 प्रमुख गहन पुनरीक्षणों में से 10 स्वयं कांग्रेस सरकारों के शासनकाल में संपन्न हुए थे। जब 10 बार यही प्रक्रिया उनके दौर में हुई, तब वह लोकतंत्र को मजबूत करने वाला ‘चुनावी सुधार’ थी, लेकिन आज वही पारदर्शी प्रक्रिया विपक्ष के लिए ‘लोकतंत्र पर हमला’ कैसे बन गई?

1952-1956 (नेहरू सरकार): आजादी के बाद पहली बार घर-घर सत्यापन
स्वतंत्र भारत के पहले आम चुनाव के तत्काल बाद यह महसूस किया गया कि एक मजबूत लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए केवल चुनाव कराना पर्याप्त नहीं है, बल्कि मतदाता सूची का प्रामाणिक होना अनिवार्य है। जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व वाली तत्कालीन कांग्रेस सरकार के दौर में चुनाव आयोग ने देश के इतिहास का पहला राष्ट्रव्यापी सघन सत्यापन अभियान चलाया। उस समय चुनाव कर्मियों ने घर-घर जाकर नागरिकों का विवरण जुटाया ताकि देश का पहला आधिकारिक मतदाता डेटाबेस तैयार हो सके। उस दौर में कांग्रेस ने स्वयं इसे लोकतंत्र की नींव को सुदृढ़ करने वाला अत्यंत महत्वपूर्ण और अनिवार्य कदम घोषित किया था। तब किसी ने भी घर-घर जाकर जांच करने को किसी नागरिक के अधिकारों का हनन नहीं बताया था।

1957 (नेहरू सरकार): दूसरे आम चुनाव के बाद सघन पुनरीक्षण
वर्ष 1957 में संपन्न हुए दूसरे आम चुनावों के ठीक बाद देश में तेजी से बढ़ती जनसंख्या और आंतरिक पलायन के कारण मतदाता सूचियों में भारी फेरबदल की आवश्यकता सामने आई। नेहरू सरकार के इसी कार्यकाल में चुनाव आयोग ने दूसरा बड़ा सघन पुनरीक्षण लागू किया। इसका मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि काम की तलाश में विस्थापित हुए वैध नागरिक मतदान से वंचित न रहें और किसी भी क्षेत्र में फर्जी प्रविष्टियों के जरिए चुनावी धांधली न हो सके। उस समय कांग्रेस के प्रवक्ताओं ने इसे स्वच्छ चुनाव की गारंटी करार दिया था। आज उसी प्रक्रिया को चुनावी षड्यंत्र बताने वाले विपक्षी दलों को अपने ही इतिहास के इस पन्ने को फिर से पढ़ने की आवश्यकता है।

1961 (नेहरू सरकार): तीसरे आम चुनाव से पहले शुद्धिकरण अभियान, बताया गया संवैधानिक प्रक्रिया
तीसरे लोकसभा चुनाव (1962) से ठीक पहले वर्ष 1961 में नेहरू सरकार के दौरान एक बार फिर देशव्यापी स्तर पर गहन पुनरीक्षण अभियान चलाया गया। इस प्रक्रिया के माध्यम से लाखों ऐसे नामों को मतदाता सूची से बाहर किया गया जो या तो दिवंगत हो चुके थे या फिर कई स्थानों पर दर्ज थे। तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने संसद से लेकर सड़क तक इस बात का समर्थन किया था कि मतदाता सूचियों की निरंतर छंटाई और शुद्धिकरण एक सामान्य व आवश्यक संवैधानिक प्रक्रिया है। तब आयोग की इस सख्ती को प्रशासनिक दक्षता माना गया था, जबकि आज उसी कार्य पर विपक्ष विलाप कर रहा है।

1965 (शास्त्री सरकार): सीमावर्ती क्षेत्रों और जनसांख्यिकीय बदलावों पर कड़ा पहरा
लाल बहादुर शास्त्री के प्रधानमंत्री कार्यकाल के दौरान देश ने युद्ध और गंभीर बाहरी चुनौतियों का सामना किया। इस संवेदनशील दौर में सीमावर्ती राज्यों और जनसांख्यिकी में आए अप्रत्याशित परिवर्तनों को देखते हुए गहन पुनरीक्षण कराया गया। इसका सीधा उद्देश्य यह था कि देश की सुरक्षा और संप्रभुता के साथ कोई समझौता न हो और केवल प्रामाणिक भारतीय नागरिक ही मतदान प्रक्रिया का हिस्सा बनें। इस कदम को राष्ट्रहित में उठाया गया सबसे सटीक प्रशासनिक कदम माना गया था, जिससे मतदाता सूची की राष्ट्रीय शुचिता सुरक्षित रह सकी।

1966 (इंदिरा गांधी सरकार): चौथे आम चुनाव से पूर्व महाभियान, नए मतदाताओं का स्वागत और फर्जी नामों पर वार
वर्ष 1967 के चौथे आम चुनाव से ठीक पहले श्रीमती इंदिरा गांधी के प्रधानमंत्री बनते ही चुनाव आयोग ने व्यापक स्तर पर गहन पुनरीक्षण लागू किया। इस अभियान के तहत नए बालिग मतदाताओं को बड़े पैमाने पर सूची में जोड़ा गया, वहीं पुरानी पड़ चुकी सूचियों से मृत और अनुपस्थित मतदाताओं के नाम तेजी से हटाए गए। इंदिरा गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस पार्टी ने इस कदम का पूरा श्रेय लेते हुए कहा था कि मृत मतदाताओं के नाम हटाना निष्पक्ष चुनाव की पहली शर्त है। आज जब 2026 में वही मृत नाम हटाए जा रहे हैं, तो कांग्रेस को इसमें दुर्भावना नजर आने लगी है।

1983-1984 (इंदिरा गांधी सरकार): राजनीतिक अस्थिरता के बीच विश्वसनीयता बहाल करने की बड़ी पहल
अस्सी के दशक की शुरुआत में देश के कई राज्यों में गंभीर आंतरिक उथल-पुथल, अलगाववादी प्रवृत्तियों और तेजी से बढ़ते शहरीकरण का दौर था। ऐसी परिस्थिति में मतदाता सूचियों की निष्पक्षता पर उठ रहे सवालों को खत्म करने के लिए इंदिरा गांधी सरकार के समय पुनः एक व्यापक सघन पुनरीक्षण छेड़ा गया। बूथ स्तर पर कर्मचारियों ने घर-घर दस्तक दी ताकि संदिग्ध प्रविष्टियों को छांटा जा सके। इस अभियान को मतदाता सूची की खोई हुई साख वापस लाने वाला ऐतिहासिक कदम बताया गया और पूरी सरकार चुनाव आयोग के साथ खड़ी दिखाई दी।

1987-1989 (राजीव गांधी सरकार): मतदान की आयु 18 वर्ष होते ही देश का सबसे बड़ा गहन सत्यापन
राजीव गांधी के कार्यकाल में 61वें संविधान संशोधन के माध्यम से मतदान की आयु 21 वर्ष से घटाकर 18 वर्ष की गई। करोड़ों युवाओं को पहली बार वोट देने का अधिकार मिला, जिसके लिए 1987 से 1989 के बीच स्वतंत्र भारत का सबसे सघन पुनरीक्षण अभियान संचालित हुआ। चुनाव कर्मियों ने एक-एक घर जाकर करोड़ों युवा मतदाताओं को पंजीकृत किया और लाखों फर्जी नामों को सूची से बाहर का रास्ता दिखाया। कांग्रेस ने तब अपनी पीठ थपथपाते हुए कहा था कि यह ‘नए भारत का निर्माण’ है। आज वही घर-घर सत्यापन कांग्रेस और इंडी गठबंधन के लिए ‘अत्याचार’ कैसे बन गया?

1992 (नरसिम्हा राव सरकार): चुनावी सुधारों की आधारशिला और सूची की विसंगतियों पर अंतिम प्रहार
नब्बे के दशक की शुरुआत में जब देश में बड़े आर्थिक सुधार हो रहे थे, उसी समय पी.वी. नरसिम्हा राव की सरकार के दौरान चुनाव आयोग ने राज्यों में सघन पुनरीक्षण कराया। बूथ कैप्चरिंग और बोगस वोटिंग की बढ़ती शिकायतों के बीच इस पुनरीक्षण का मुख्य लक्ष्य यह था कि मतदाता सूची में किसी भी प्रकार की विसंगति शेष न रहे। राव सरकार ने आयोग के इस कदम को चुनावी व्यवस्था के शुद्धिकरण के लिए उठाया गया मील का पत्थर बताया था और इसे प्रशासनिक सुधार का आदर्श मॉडल माना था।

1993 (नरसिम्हा राव व टी.एन. शेषन काल): फोटोयुक्त पहचान पत्र (EPIC) की शुरुआत और ऐतिहासिक पुनरीक्षण
वर्ष 1993 का दौर भारतीय चुनावी इतिहास का सबसे निर्णायक मोड़ माना जाता है। तत्कालीन मुख्य चुनाव आयुक्त टी.एन. शेषन ने जब पहली बार फोटोयुक्त मतदाता पहचान पत्र (EPIC) जारी करने का ऐतिहासिक निर्णय लिया, तो उसके साथ पूरे देश में सघन गहन पुनरीक्षण अनिवार्य किया गया। हर नागरिक के भौतिक अस्तित्व की पुष्टि के बाद ही उसका फोटो पहचान पत्र बनाया गया। नरसिम्हा राव के शासनकाल में हुए इस कड़े कदम को स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव का स्वर्ण काल कहा गया। जब शेषन के कड़े नियमों पर कांग्रेस को गर्व था, तो आज उसी पारदर्शी तकनीकी सत्यापन से विपक्ष क्यों भाग रहा है?

1995 (नरसिम्हा राव सरकार): 1996 के आम चुनाव से पहले बोगस वोटरों की सफाई का देशव्यापी अभियान
वर्ष 1996 के लोकसभा चुनावों से ठीक पहले नरसिम्हा राव सरकार के दौर में अंतिम बार देशव्यापी स्तर पर वृहद गहन सत्यापन अभियान छेड़ा गया। इसका एकमात्र लक्ष्य था कि देश से जाली मतदान और बोगस मतदाताओं की समस्या को सदा के लिए समाप्त किया जाए। घर-घर जाकर की गई इस जांच के माध्यम से लाखों अवैध और दोहरे पहचान पत्रों को निरस्त किया गया। तब इस कठोर कदम को भारतीय लोकतंत्र की जीत बताया गया था।

’13 करोड़ वोटर्स हटाने’ के फर्जी दावों का सच: विपक्ष का सफेद झूठ बेनकाब
विपक्ष देश भर में यह मनगढ़ंत अफवाह फैला रहा है कि एसआईआर के माध्यम से 13 करोड़ मतदाताओं के नाम काट दिए गए हैं। यह दावा पूरी तरह भ्रामक और निराधार है। आधिकारिक तथ्य यह है कि ड्राफ्ट सूची में केवल उन्हीं नामों को चिन्हित (Flag) किया गया है जो विसंगतिपूर्ण पाए गए। वर्ष 2026 के सत्यापन आंकड़ों के अनुसार इनमें लगभग 2.8 करोड़ नाम दिवंगत व्यक्तियों के हैं, करीब 3 करोड़ नाम ऐसे हैं जो उस पते से स्थायी रूप से स्थानांतरित हो चुके हैं और 1 करोड़ से अधिक दोहरी प्रविष्टियां (डुप्लीकेट वोटर्स) हैं। अंतिम मतदाता सूची 20 लाख राजनीतिक दलों के बूथ एजेंट्स (BLA) द्वारा जांचे जाने और सत्यापन के बाद ही जारी की जाती है। किसी भी पात्र नागरिक का नाम बिना विधिक प्रक्रिया के नहीं कटता।

इंडी गठबंधन के 7 बड़े झूठ और उनके 7 अकाट्य सच
इंडी गठबंधन द्वारा एसआईआर को लेकर फैलाए जा रहे सात बड़े दुष्प्रचारों की जमीनी हकीकत इस प्रकार है:

झूठ: 13 करोड़ वोटर्स के नाम सूची से सीधे हटा दिए गए।

सच: ड्राफ्ट सूची में केवल मृत, स्थानांतरित, अनुपस्थित या डुप्लीकेट नामों को चिन्हित किया गया है। 20 लाख पार्टी एजेंट्स के सत्यापन के बिना किसी भी वैध वोटर का नाम नहीं कटता।

झूठ: युवाओं को रोकने के लिए फॉर्म-6 बदल दिया गया।

सच: फॉर्म-6 में कोई मूल बदलाव नहीं हुआ है; केवल सुविधा के लिए एक सामान्य घोषणा जोड़ी गई है, जिसे सर्वसम्मति से मंजूरी मिली और जिसे सुप्रीम कोर्ट ने भी सही ठहराया।

झूठ: वोटर डेटाबेस को सेंट्रलाइज्ड (केंद्रीकृत) कर दिया गया है।

सच: यह पूरी तरह विकेंद्रीकृत है। राज्यों की मतदाता सूचियों पर संबंधित राज्यों का ही पूरा नियंत्रण है।

झूठ: युवा मतदाताओं को रोका जा रहा है।

सच: एसआईआर शुरू होने के बाद से 2.37 करोड़ नए युवा मतदाता जोड़े जा चुके हैं। वर्ष के 365 दिन रोजाना 50,000 से अधिक नए नाम जोड़े जा रहे हैं।

झूठ: चुनाव आयोग ‘वन-मैन शो’ की तरह चल रहा है।

सच: सभी बड़े निर्णय तीनों चुनाव आयुक्तों की आम सहमति से लिए जाते हैं। आंतरिक विचार-विमर्श का अर्थ मतभेद नहीं होता।

झूठ: वोट चोरी की साजिश हो रही है।

सच: घर-घर भौतिक सत्यापन, 20 लाख पार्टी एजेंट्स की सीधी निगरानी और 100 प्रतिशत वेबकास्टिंग के चलते वोट चोरी का कोई सवाल ही नहीं उठता।

झूठ: मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति असंवैधानिक है।

सच: वर्ष 2023 से पहले इस नियुक्ति के लिए कोई लिखित कानून ही नहीं था। वर्तमान पारदर्शी कानून में विपक्ष के नेता को भी चयन समिति में स्थान दिया गया है।

सर्वोच्च न्यायालय की विधिक मुहर: निष्पक्ष चुनाव लोकतंत्र का मूल ढांचा
सर्वोच्च न्यायालय ने ऐतिहासिक निर्णयों में बार-बार रेखांकित किया है कि स्वतंत्र, निष्पक्ष चुनाव और प्रामाणिक मतदाता सूची संविधान के ‘मूल ढांचे’ (Basic Structure) का अभिन्न अंग हैं। संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत भारत निर्वाचन आयोग को निष्पक्ष चुनाव कराने का पूर्ण अधिकार प्राप्त है। मतदाता सूची से फर्जी और अवैध नामों को हटाना आयोग का सर्वोच्च संवैधानिक दायित्व है। सुप्रीम कोर्ट ने भी विशेष गहन पुनरीक्षण पर चुनाव आयोग के कदमों को पूरी तरह विधि-सम्मत मानते हुए इसका समर्थन किया है। जब चुनाव आयोग शीर्ष अदालत की इसी मूल भावना के तहत काम कर रहा है, तब विपक्ष का विरोध सीधे तौर पर न्यायपालिका द्वारा तय किए गए लोकतांत्रिक मानकों को चुनौती देना है।

सीमा सुरक्षा, अवैध घुसपैठ और ‘तख्तापलट’ का खतरनाक षड्यंत्र
तेलंगाना से बीजेपी सांसद कोंडा विश्वेश्वर रेड्डी ने एसआईआर विरोध के पीछे छिपे बड़े भू-राजनीतिक षड्यंत्र को उजागर किया है। वर्ष 2015 के ऐतिहासिक भारत-बांग्लादेश भूमि सीमा समझौते से लेकर एसआईआर के तहत मतदाता सूची के पुनरीक्षण तक का उद्देश्य बिल्कुल स्पष्ट रहा है—भारत की सीमाओं को सुरक्षित करना, अवैध घुसपैठ को चिन्हित करना और देश की लोकतांत्रिक शुचिता की रक्षा करना। पश्चिम बंगाल, असम और सीमावर्ती राज्यों में दशकों से चल रही तुष्टीकरण की राजनीति के तहत अवैध प्रवासियों और रोहिंग्या-बांग्लादेशी घुसपैठियों के जाली दस्तावेज बनवाकर उन्हें मतदाता सूचियों में घुसाया गया था। जब भौतिक सत्यापन से ये फर्जी पहचान पत्र रद्द हो रहे हैं, तो विपक्ष सड़कों पर उपद्रव मचा रहा है। यह विरोध केवल राजनीति तक सीमित नहीं है, बल्कि अराजकता के सहारे सरकार को अस्थिर करने वाले खतरनाक ‘रिजीम चेंज’ (Regime Change) एजेंडे का हिस्सा प्रतीत होता है।

वैश्विक संकट से सबक: अनियंत्रित जनसांख्यिकी और सुरक्षा पर दुनिया की चेतावनी
यूरोप के कई देश आज अनियंत्रित जनसांख्यिकीय बदलावों, अवैध प्रवासन और फर्जी पहचान पत्रों के कारण गंभीर आंतरिक संकट और दंगों की आग में झुलस रहे हैं। फ्रांस की मौजूदा सामाजिक स्थिति पूरी दुनिया के सामने एक कड़ा सबक है। यदि समय रहते नागरिकता, पहचान और मतदाता सूचियों का कड़ाई से सत्यापन नहीं किया गया, तो देश की सुरक्षा और संप्रभुता खतरे में पड़ सकती है। यही कारण है कि भारत में एसआईआर जैसे सघन सत्यापन अभियान राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए अपरिहार्य हैं, ताकि कोई भी विदेशी घुसपैठिया देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था को बंधक न बना सके।

डिजिटल तकनीक और एआई आधारित पारदर्शिता: 90 के दशक के कागजी ढर्रे से मुक्ति
अतीत में जब गहन पुनरीक्षण होते थे, तब पूरी प्रक्रिया कागजी रजिस्टरों, फाइलों और स्थानीय स्तर पर कर्मचारियों के व्यक्तिगत निर्णयों पर टिकी होती थी। उस ढीली व्यवस्था में राजनीतिक दबाव और स्थानीय मिलीभगत से फर्जी नाम जुड़वा लेना आसान था। आज वर्ष 2026 में चुनाव आयोग ने आधुनिक डिजिटल डेटाबेस, डेमोग्राफिक मैचिंग सॉफ्टवेयर और एआई (AI) आधारित छवि पहचान तकनीकों का समावेश किया है। अब एक ही व्यक्ति का फोटो लगाकर अलग-अलग विधानसभाओं या राज्यों में फर्जी पहचान पत्र बनवाना असंभव हो चुका है। जब आधुनिक तकनीक ने फर्जीवाड़े के हर छिद्र को बंद कर दिया है, तो स्वाभाविक रूप से बिचौलियों और फर्जी वोट बैंक के सहारे चुनावी नैया पार लगाने वालों को इस डिजिटल पारदर्शिता से सबसे अधिक परेशानी हो रही है।

वोटर हेल्पलाइन ऐप से जनता का सीधा सशक्तिकरण: दलाल तंत्र पर कड़ा प्रहार
पहले के दौर में मतदाता सूची में अपना नाम देखने, पता बदलवाने या नया नाम दर्ज कराने के लिए आम नागरिकों को सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटने पड़ते थे या राजनीतिक दलों के स्थानीय दलालों की खुशामद करनी पड़ती थी। आज चुनाव आयोग ने ‘वोटर हेल्पलाइन ऐप’ (VHA) और आधुनिक ऑनलाइन पोर्टल के माध्यम से हर नागरिक के हाथ में उसका अधिकार सौंप दिया है। कोई भी व्यक्ति अपने मोबाइल से घर बैठे अपनी प्रविष्टि देख सकता है, नाम जोड़ सकता है या सुधार के लिए आवेदन कर सकता है। इस व्यवस्था से पूरी प्रक्रिया में बिचौलियों और फर्जी फॉर्म भरने वाले सिंडिकेट की भूमिका शून्य हो गई है। विपक्ष की नाराजगी वास्तव में आम जनता के लिए नहीं, बल्कि चुनावी मौसम में सक्रिय रहने वाले उसी दलाल तंत्र के ध्वस्त होने की छटपटाहट है।

विपक्ष शासित राज्यों में भी वही तंत्र: अपने ही मुख्यमंत्रियों और प्रशासन पर सवाल क्यों?
चुनाव आयोग पूरे देश में संविधान के एक समान नियमों के तहत विशेष गहन पुनरीक्षण संचालित कर रहा है। कर्नाटक, तेलंगाना, हिमाचल प्रदेश जैसे विपक्ष और कांग्रेस शासित राज्यों में भी यही सत्यापन कार्य वहां के स्थानीय जिलाधिकारियों और राज्य कर्मचारियों द्वारा ही संपन्न किया जा रहा है। यदि यह प्रक्रिया किसी दुर्भावना या वोट काटने की साजिश से प्रेरित है, तो क्या कांग्रेस पार्टी अपने ही मुख्यमंत्रियों, अपने ही मंत्रियों और अपने ही राज्य प्रशासन पर यह आरोप लगा रही है कि वे जनता के वोट काट रहे हैं? अपने राज्यों में उसी प्रशासनिक मशीनरी से काम लेना और केंद्र पर झूठे आरोप लगाना कांग्रेस के राजनीतिक पाखंड को उनकी अपनी ही सरकारों के आईने में उजागर कर देता है।

वैश्विक लोकतांत्रिक मानकों पर भारत की मिसाल: पश्चिमी देशों में अनिवार्य, फिर भारत में विरोध क्यों?
अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस और कनाडा जैसे परिपक्व लोकतंत्रों में भी हर चुनाव से पहले मतदाता सूचियों की नियमित और अनिवार्य सफाई (Voter List Cleaning) कानूनी प्रक्रिया का हिस्सा है। वहां मृत या स्थानांतरित नागरिकों के नाम हटाना निष्पक्ष चुनाव का अनिवार्य पैमाना माना जाता है। जो विपक्षी नेता विदेशी मंचों पर जाकर भारत के लोकतंत्र पर उपदेश देते हैं, वे उन्हीं लोकतांत्रिक देशों की मानक व्यवस्थाओं को भारत में लागू होने पर ‘तानाशाही’ बताने लगते हैं। वर्ष 2026 में भारत तकनीक और भौतिक सत्यापन के समन्वय से दुनिया का सबसे बड़ा, सटीक और पारदर्शी चुनावी सत्यापन मॉडल प्रस्तुत कर रहा है, जिसकी वैश्विक स्तर पर सराहना की जानी चाहिए।

सरकारी राजस्व और सुरक्षा बलों के संसाधनों की बचत: जनता की गाढ़ी कमाई का सदुपयोग
जब मतदाता सूची में करोड़ों मृत, स्थानांतरित और फर्जी नाम दर्ज रहते हैं, तो चुनाव आयोग को उसी अनुपात में अतिरिक्त मतदान केंद्र (Polling Booths), अतिरिक्त ईवीएम, चुनाव सामग्री और भारी संख्या में सुरक्षा बलों की तैनाती करनी पड़ती है। बोगस नामों की छंटाई से देश के करदाताओं (Taxpayers) के करोड़ों रुपयों और सुरक्षा बलों के प्रशासनिक श्रम की सीधी बचत हो रही है। फर्जी नामों के प्रबंधन पर होने वाला यह भारी सरकारी खर्च अब जनहित और विकास कार्यों में उपयोग किया जा सकेगा। विपक्ष का विरोध असल में सरकारी धन और सुरक्षा संसाधनों की अकारण बर्बादी को बनाए रखने की वकालत करने जैसा है।

मतदान प्रतिशत का यथार्थवादी चित्र: कृत्रिम आंकड़ों और भ्रामक प्रचार पर विराम
पुरानी मतदाता सूचियों में करोड़ों दिवंगत, विस्थापित और अनुपस्थित नागरिकों के नाम दर्ज होने के कारण चुनावों के बाद वोटिंग प्रतिशत कृत्रिम रूप से कम (जैसे 60 से 62 प्रतिशत) दिखाई देता था। इस विकृति के आधार पर देश और दुनिया में भारतीय लोकतांत्रिक भागीदारी को लेकर गलत धारणाएं बनाई जाती थीं। विशेष गहन पुनरीक्षण से जब मृत और फर्जी नाम सूची से बाहर हो रहे हैं, तो मतदान का वास्तविक और प्रामाणिक प्रतिशत सामने आ रहा है। इससे ‘शहरी उदासीनता’ के नाम पर चलने वाले मनगढ़ंत विश्लेषणों का अंत हो रहा है और देश के जागरूक, वास्तविक मतदाताओं की सक्रिय भागीदारी का सही मूल्यांकन संभव हो रहा है।

वरिष्ठ नागरिकों और दिव्यांगजनों के लिए घर से मतदान का मार्ग सुगम
चुनाव आयोग द्वारा 85 वर्ष से अधिक आयु के वरिष्ठ नागरिकों और दिव्यांगजनों (PwD) के लिए ‘घर से मतदान’ (Vote from Home) की ऐतिहासिक सुविधा लागू की गई है। इस सुविधा को धरातल पर उतारने के लिए सटीक और अद्यतन डेटाबेस आवश्यक है। विशेष गहन पुनरीक्षण के तहत घर-घर पहुंच रहे बीएलओ (BLO) ऐसे वरिष्ठ नागरिकों और विशेष योग्यजनों का सत्यापन कर रहे हैं, ताकि उन्हें बिना किसी असुविधा के उनके घर पर ही मताधिकार मिल सके। विपक्ष द्वारा इस घर-घर सत्यापन पर सवाल उठाना वास्तव में देश के वयोवृद्ध नागरिकों और दिव्यांगों को मिलने वाली इस सम्मानजनक सुविधा के मार्ग में बाधा डालना है।

ईमानदार नागरिक के वोट के मूल्य की रक्षा: फर्जी मतों पर सीधा वार
लोकतंत्र में हर वैध नागरिक के मत का मूल्य समान और अमूल्य होता है। यदि किसी मतदान केंद्र पर फर्जी, मृत या स्थानांतरित व्यक्तियों के नाम पर बोगस मतदान करा दिया जाए, तो वह उस क्षेत्र के ईमानदार, जागरूक और वैध नागरिकों के संवैधानिक अधिकार और उनकी पसंद को पूरी तरह शून्य कर देता है। विशेष गहन पुनरीक्षण वास्तव में किसी नागरिक का हक छीनने का नहीं, बल्कि आम और ईमानदार भारतीय मतदाता के मत के वास्तविक मूल्य को सुरक्षित करने की संवैधानिक ढाल है। विपक्ष जिस फर्जीवाड़े पर पर्दा डालने की चेष्टा कर रहा है, वह सीधे तौर पर कानून का पालन करने वाले करोड़ों सच्चे नागरिकों के अधिकारों पर खुला डाका है।

चुनावी हार का अग्रिम बहाना: ईवीएम के बाद अब मतदाता सूची पर हमला
विपक्ष का यह सुनियोजित राजनीतिक पैटर्न अब देश की जनता के सामने पूरी तरह उजागर हो चुका है। जब भी कांग्रेस और उसके सहयोगी दलों को जनता के बीच अपनी खिसकती जमीन और आसन्न चुनावी पराजय का आभास होता है, वे संवैधानिक संस्थाओं को कटघरे में खड़ा करने की पटकथा लिखने लगते हैं। पहले वर्षों तक इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (EVM) पर झूठे और मनगढ़ंत आरोप लगाए गए, फिर चुनाव की तारीखों और आचार संहिता पर अनर्गल प्रलाप किया गया। अब जब पराजय का नया चक्रव्यूह सामने दिख रहा है, तो मतदाता सूची के शुद्धिकरण को साजिश बताकर हार का अग्रिम बहाना तैयार किया जा रहा है, ताकि चुनावों के बाद अपनी विफलता का ठीकरा चुनाव आयोग के सिर फोड़ा जा सके।

विधिक प्रक्रिया और सर्वदलीय सहभागिता: सड़क पर झूठ फैलाने का कोई आधार नहीं
मतदाता सूची का पुनरीक्षण कोई बंद कमरों में चलने वाली मनमानी प्रक्रिया नहीं है, बल्कि यह जनप्रतिनिधित्व अधिनियम के कड़े विधिक प्रावधानों के तहत संचालित होती है। चुनाव आयोग के स्पष्ट नियमों के तहत हर मान्यता प्राप्त राजनीतिक दल को प्रत्येक मतदान केंद्र पर अपना बूथ लेवल एजेंट (BLA) नियुक्त करने का वैधानिक अधिकार प्राप्त है। इसके अतिरिक्त ड्राफ्ट मतदाता सूची को सार्वजनिक रूप से चस्पा किया जाता है और किसी भी नाम को जोड़ने के लिए फॉर्म-6 तथा आपत्ति दर्ज कराने के लिए फॉर्म-7 भरने का पर्याप्त समय दिया जाता है। जब हर राजनीतिक दल के पास कानूनी रूप से आपत्ति दर्ज कराने और जांच में शामिल होने का पूरा अधिकार मौजूद है, तब संस्थागत प्रक्रिया में भाग लेने के बजाय सड़कों पर भ्रम, अराजकता और अफवाह फैलाना केवल गैर-जिम्मेदाराना राजनीति का परिचायक है।

जनकल्याणकारी योजनाओं की सुरक्षा: गरीबों के हक पर डाका डालने वालों पर रोक
मतदाता पहचान पत्र केवल मतदान करने का साधन मात्र नहीं है, बल्कि यह देश के कई हिस्सों में राशन, आवास और अन्य प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (DBT) से जुड़ी सरकारी योजनाओं के सत्यापन का आधार भी बनता है। जब अवैध घुसपैठियों और जाली पहचान के दम पर फर्जी वोटर कार्ड तैयार किए जाते हैं, तो उसी की आड़ में गरीब और जरूरतमंद भारतीय नागरिकों के हक का राशन और कल्याणकारी योजनाओं का लाभ भी हड़प लिया जाता है। मतदाता सूची का यह शुद्धिकरण वास्तव में सरकारी संसाधनों की चोरी रोकने और वास्तविक लाभार्थियों तक योजनाओं का शत-प्रतिशत लाभ पहुंचाने का सबसे बड़ा सामाजिक सुरक्षा कवच है।

जमीनी बीएलओ और कर्मचारियों की निष्ठा का अपमान कर रहा विपक्ष
घर-घर जाकर सत्यापन का कठिन कार्य कोई विदेशी या अनजान लोग नहीं, बल्कि हमारे ही समाज के शिक्षक, आंगनवाड़ी कार्यकर्ता और स्थानीय स्तर के सरकारी कर्मचारी बूथ लेवल ऑफिसर (BLO) के रूप में करते हैं। कड़ी धूप, बारिश और विपरीत परिस्थितियों में गांव-गांव जाकर देश के लोकतंत्र की नींव को मजबूत करने वाले इन लाखों समर्पित कर्मचारियों पर ‘वोट काटने की साजिश’ का झूठा आरोप लगाना अत्यंत शर्मनाक है। विपक्ष अपने संकीर्ण राजनीतिक स्वार्थ के लिए इन लाखों निष्ठावान कर्मचारियों के दिन-रात के पसीने और उनकी ईमानदारी पर कालिख पोतने का अक्षम्य अपराध कर रहा है।

‘एक राष्ट्र, एक मतदाता सूची’ का विजन: चुनावी विसंगतियों और फिजूलखर्ची से मुक्ति
देश में लंबे समय से लोकसभा, विधानसभा और स्थानीय निकायों (पंचायत व नगर पालिका) के लिए अलग-अलग मतदाता सूचियां तैयार होने के कारण भारी प्रशासनिक उलझनें और जनता के पैसे की बर्बादी होती रही है। अक्सर ऐसा देखने को मिलता था कि किसी नागरिक का नाम नगर निकाय चुनाव में तो था, लेकिन विधानसभा सूची से गायब मिलता था। वर्ष 2026 का यह सघन पुनरीक्षण अभियान पूरे देश में एक ही सटीक, प्रामाणिक और केंद्रीयकृत मतदाता सूची तैयार करने की दिशा में ठोस कदम है। इससे बार-बार होने वाले भारी खर्च और दोहरी मशक्कत से मुक्ति मिलेगी। आधुनिक सुधारों का विरोध करने की अपनी पुरानी नकारात्मक सोच के तहत विपक्ष इस राष्ट्रव्यापी दूरगामी विजन में भी रोड़े अटकाने का प्रयास कर रहा है।

प्रवासी भारतीय कामगारों के अधिकारों की ढाल: दोहरी प्रविष्टियों से मुक्ति और पते का सम्मान
रोजी-रोटी की तलाश में अपने गृह राज्य से दूसरे राज्यों में जाकर राष्ट्र निर्माण में योगदान देने वाले करोड़ों असंगठित कामगार और श्रमिक अक्सर मतदान से वंचित रह जाते थे। उनके नाम या तो गांव में छूटे रहते थे या नए कार्यस्थल पर दर्ज नहीं हो पाते थे, जिससे कई बार उनकी दोहरी प्रविष्टियां दर्ज हो जाती थीं। एसआईआर का यह भौतिक और तकनीकी सत्यापन उन करोड़ों प्रवासी कामगारों के लिए वरदान साबित हो रहा है। इसके माध्यम से उनके पुराने पते की निष्क्रिय प्रविष्टि को हटाकर वर्तमान निवास पर मतदाता के रूप में सम्मानपूर्वक पंजीकरण सुनिश्चित किया जा रहा है। विपक्ष द्वारा इस शुद्धिकरण का विरोध करना वास्तव में देश के पसीना बहाने वाले मेहनतकश प्रवासी श्रमिकों के मताधिकार का विरोध है।

नारी शक्ति का सशक्तिकरण: वैवाहिक विस्थापन के बाद सुगम पंजीकरण
भारतीय समाज में विवाह के पश्चात करोड़ों महिलाओं का निवास स्थान और कई बार उपनाम भी परिवर्तित होता है। पुरानी कागजी व्यवस्था के कारण महिलाओं के नाम मायके की सूची में बरसों तक दर्ज रह जाते थे और ससुराल में नया नाम जुड़वाने के लिए उन्हें जटिल प्रशासनिक प्रक्रियाओं से गुजरना पड़ता था। इस विशेष गहन पुनरीक्षण में बीएलओ (BLO) द्वारा घर-घर जाकर नवविवाहित महिलाओं के नाम नए पते पर तुरंत जोड़ने और पुराने पते से सुगमता से हटाने का कार्य मिशन मोड में किया जा रहा है। यह अभियान नारी शक्ति के संवैधानिक अधिकार को बिना किसी अनावश्यक भागदौड़ के सुरक्षित करने का काम कर रहा है। विपक्ष जिस अभियान को बदनाम करने की कोशिश कर रहा है, वह लाखों माताओं-बहनों के मताधिकार को सरल और सुलभ बना रहा है।

फर्जी वोट बैंक और तुष्टीकरण का तंत्र ध्वस्त होने से विपक्ष में बेचैनी
जब 12 में से 10 पुनरीक्षण कांग्रेस सरकारों के समय हुए और तब चुनाव आयोग का यही घर-घर सत्यापन ‘लोकतांत्रिक मर्यादा’ था, तो आज उसी पारदर्शी प्रक्रिया पर कांग्रेस और उसके सहयोगी दल छाती क्यों पीट रहे हैं? दरअसल, डिजिटल तकनीक और घर-घर सत्यापन से बोगस वोटरों, मृत नामों और अवैध घुसपैठियों के फर्जी पहचान पत्रों के सहारे चलने वाली तुष्टीकरण की वोट बैंक राजनीति पर ताला लग रहा है। दशकों से जाली मतदान के दम पर चुनावी लाभ लेने का जो तंत्र खड़ा किया गया था, वह पूरी तरह ध्वस्त हो रहा है। यही कारण है कि जब चुनावी हार सामने दिखने लगती है, तो विपक्ष संवैधानिक संस्थाओं की साख पर हमला करने का पुराना पैंतरा आजमाने लगता है।

पारदर्शी मतदाता सूची ही सशक्त लोकतंत्र की वास्तविक पहचान
भारतीय जनता पार्टी का स्पष्ट मानना है कि मजबूत लोकतंत्र केवल नारों और भाषणों से नहीं, बल्कि बेदाग, प्रामाणिक और पारदर्शी मतदाता सूची से बनता है। हर एक वैध भारतीय नागरिक के मत का मूल्य अमूल्य है, और उस मूल्य की रक्षा तभी संभव है जब मतदाता सूची से बोगस और फर्जी नामों की सफाई हो। कांग्रेस और इंडी गठबंधन द्वारा फैलाए जा रहे झूठे भ्रम और अफवाहों से देशवासियों को सावधान रहने की जरूरत है। एसआईआर किसी नागरिक का अधिकार छीनने का नहीं, बल्कि भारत के हर वैध नागरिक के मताधिकार को पूर्ण सुरक्षा प्रदान करने का सबसे बड़ा संवैधानिक सुरक्षा कवच है। 

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