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पब्लिसिटी की भूख, संवैधानिक संस्थाओं पर वार, देखिए लेफ्ट-लिबरल के ‘पोस्टर बॉय’ पूर्व जस्टिस कौल का नया अवतार

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भारतीय लोकतंत्र में न्यायपालिका, कार्यपालिका और विधायिका प्रमुख संवैधानिक संस्थाएं हैं। संविधान के तहत इन संस्थाओं के बीच शक्ति का एक ऐसा संतुलन तय किया गया है, जिसके दायरे में रहकर हर संस्था को काम करना होता है। लेकिन समय-समय पर निजी स्वार्थ के लिए इस नाजुक संतुलन को बिगाड़ने की कोशिश होती रहती है। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जस्टिस संजय किशन कौल की आने वाली संस्मरण पुस्तक ‘विदाउट फियर ऑफ फेवर’ के कुछ अंश सामने आए हैं, जिसमें इस संतुलन पर गंभीर सवाल उठाए गए हैं। साथ ही कुछ ऐसे खुलासे किए गए हैं, जिनसे सवाल उठ रहे हैं कि सेवानिवृत्ति के ठीक बाद लेफ्ट-लिबरल गैंग के ‘पोस्टर बॉय’ जस्टिस कॉल द्वारा सुप्रीम कोर्ट की संस्थागत गोपनीयता भंग करना और संस्मरण के जरिए सुर्खियों में आना “पब्लिसिटी स्टंट” या व्यक्तिगत व वैचारिक एजेंडे को हवा देने का प्रयास तो नहीं है।

जस्टिस कौल की संस्मरण पुस्तक ‘विदाउट फियर ऑफ फेवर’
दरअसल, जस्टिस संजय किशन कौल ने अपनी संस्मरण पुस्तक ‘विदाउट फियर ऑफ फेवर’ में पूर्व सीजेआई डी.वाई.चंद्रचूड़ और कार्यपालिका (सरकार) के बीच जजों की नियुक्तियों को लेकर अपनाए गए तौर-तरीकों पर सवाल उठाए हैं। पूर्व जस्टिस कौल नसीहत देते हैं कि न्यायपालिका की अपनी कुछ सीमाएं और मर्यादाएं हैं। न्यायालय नियंत्रण और संतुलन बनाए रखने वाली एक संस्था है। वह ऐसा रुख अपना सकता है, जो सत्ताधारी प्रतिष्ठान को पसंद न हो, लेकिन वह विपक्ष की ओर से लड़ाई लड़ने वाला मोर्चा नहीं बन सकता है।

संस्मरण के वे खुलासे, जिनसे मचा है बवाल
1. पुस्तक में दावा किया गया है कि पूर्व मुख्य न्यायाधीश डी.वाई. चंद्रचूड़ जजों की नियुक्तियों के मामले में सरकार के प्रति “ज़रूरत से ज़्यादा नरम या दब्बू” रुख अपनाते थे।

2. जस्टिस कौल के अनुसार, कॉलेजियम की औपचारिक बैठकों से पहले ही उम्मीदवारों के नामों पर सरकार की अनौपचारिक रजामंदी लेने या टोह लेने की जो प्रथा थी, वह न्यायिक स्वतंत्रता के अनुकूल नहीं है।

3. किताब में एक घटना का जिक्र है जहां एक अल्पसंख्यक उम्मीदवार की नियुक्ति और जाति/पृष्ठभूमि को लेकर जब कथित तौर पर सवाल उठे और सरकार की राय थोपने की बात आई, तो विरोधस्वरूप वे बैठक से उठकर बाहर चले गए थे।

4. पुस्तक में यह भी रेखांकित किया गया है कि सरकार उन जजों और संस्थानों की अधिक इज़्ज़त करती है जो अपनी स्वतंत्रता पर टिके रहते हैं, और यदि दबाव बनाया जाए तो मजबूत रुख अपनाने पर सरकार पीछे हटने को भी तैयार हो जाती है।

लेफ्ट-लिबरल गैंग के ‘पोस्टर बॉय’ बने जस्टिस कौल
इस समय पूर्व जस्टिस कौल कांग्रेस सहित तमाम लेफ्ट-लिबरल गैंग के ‘पोस्टर बॉय’ बन गए हैं, क्योंकि उन्होंने खुलासा कर मोदी सरकार पर हमला करने का मौका दे दिया है। राजनीतिक गलियारों में न्यायपालिका पर सरकार के प्रभाव को लेकर बहस छिड़ गई। कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों ने इन खुलासों को आधार बनाकर केंद्र सरकार पर न्यायपालिका के भीतर अप्रत्यक्ष हस्तक्षेप करने और संस्थागत स्वायत्तता को कमजोर करने के आरोप तेज कर दिए हैं। उदारवादी और मानवाधिकार समर्थक यह मान रहे हैं कि जस्टिस कौल ने न्याय प्रणाली के भीतर के उन सचों को सामने रखा है जो लोकतांत्रिक संस्थाओं की रक्षा के लिए जरूरी हैं।

आइए जानते हैं जस्टिस कौल कितने निष्पक्ष रहे हैं और अपने कार्यकाल में कितना न्याय किया है। हालांकि उनका कार्यकाल ऐसे विवादास्पद फैसलों से भरा था, जिसमें देश की अखंडता से लेकर बार-बार धार्मिक और सांस्कृतिक भावनाओं को आहत किया गया। प्रशासनिक उत्पीड़न और जाति-आधारित भेदभाव के गंभीर आरोप लगे। वहीं विवादास्पद हस्तियों के साथ उनके संदेहास्पद सामाजिक संबंध भी चर्चा के विषय बने हैं…

जस्टिस कौल और सौरव दास का दिवाली मिलन
पूर्व जस्टिस कौल और ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ के सह-संयोजक सौरव दास की दिवाली पार्टी की एक तस्वीर सोशल मीडिया पर वायरल हो रही है। तस्वीर में जस्टिस कौल और सौरव दास को बातचीत करते हुए देखा जा सकता है। दावा किया जा रहा है कि यह तस्वीर पिछले साल (2025) सौरव दास के आवास पर हुई दिवाली पार्टी की है। इससे उनकी राजनीतिक निष्पक्षता पर सवाल खड़े हो गए हैं। जस्टिस कौल के हालिया बयानों और इस मुलाक़ात के बीच कथित तौर पर संबंध जोड़े जा रहे हैं। आलोचकों का तर्क है कि ऐसे सार्वजनिक या सामाजिक मेल-मिलाप से न्यायपालिका की निष्पक्षता को लेकर सवाल खड़े होते हैं।

जस्टिस कौल का संस्मरण जारी होने का समय अमंगलसूचक-जेठमलानी
सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील और पूर्व राज्यसभा सांसद महेश जेठमलानी ने सर्वोच्च न्यायालय के रिटायर्ड जस्टिस संजय किशन कौल और कॉकरोच जनता पार्टी के नेता सौरव दास के संबंधों को लेकर कुछ बड़े दावे किए हैं। महेश जेठमलानी ने एक्स पर जस्टिस कौल को संबोधित कर लिखा है, ‘जस्टिस कौल, न्यायिक स्वतंत्रता एक संवैधानिक सिद्धांत है।’ उन्होंने कहा है कि ‘सुप्रीम कोर्ट के किसी रिटायर्ड जज का अपने मुंह से यह दावा करना की पद पर रहते हुए उन्होंने स्वतंत्रता के साथ काम किया, शोभा नहीं देता। यह फैसला जनता पर छोड़ना चाहिए, जो उनके फैसलों के आधार पर ये सब तय कर सकती है।’

महेश जेठमलानी ने कहा कि जस्टिस कौल के संस्मरणों के जारी होने का समय उतना ही अमंगलसूचक है, जितना कि उसका कंटेंट। यह ऐसे समय में सामने आया है, जब सुप्रीम कोर्ट में चुनाव आयोग के भीतर कथित मतभेदों और उसके द्वारा शुरू किए गए कुछ कार्यों की वैधता से जुड़े मामले पर सुनवाई होने वाली है और फैसला आने वाला है। महेश जेठमलानी का आरोप है कि सबकुछ सोच-समझकर हो रहा है। उनका दावा है कि ‘कॉकरोच न्यायपालिका पर दबाव डालना चाहते हैं, क्योंकि एसआईआर प्रक्रिया ने फर्जी वोटरों को बाहर कर दिया है। इससे वामपंथी और कट्टरपंथी मुस्लिमवादी बहुत ही ज्यादा भड़क गए हैं। इनमें कांग्रेस और इंडिया ब्लॉक की कुछ पार्टियां भी शामिल हैं।’

जम्मू-कश्मीर की आंतरिक संप्रभुता का समर्थन
जस्टिस कौल जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाने के मामले पर फैसला सुनाने वाली 5 जजों की संविधान पीठ का हिस्सा थे। हालांकि उन्होंने बहुमत के फैसले का समर्थन किया, लेकिन जम्मू-कश्मीर की आंतरिक संप्रभुता को लेकर एक अलग और महत्वपूर्ण दृष्टिकोण रखा था यानी जम्मू-कश्मीर की आंतरिक संप्रभुता का अप्रत्यक्ष रूप से समर्थन किया था। जस्टिस कौल ने अपने अलग फैसले में माना कि महाराजा हरि सिंह द्वारा भारत डोमिनियन के साथ विलय पत्र पर हस्ताक्षर करने के बावजूद, जम्मू-कश्मीर राज्य ने आंतरिक संप्रभुता का एक तत्व बरकरार रखा था। उन्होंने कहा कि भारतीय संविधान का अनुच्छेद 370 राज्य की संविधान सभा को मान्यता देकर इसी आंतरिक संप्रभुता को स्वीकार करता था, जिसने बाद में जम्मू-कश्मीर का अपना संविधान तैयार किया। यह दृष्टिकोण मुख्य न्यायाधीश चंद्रचूड़ के नेतृत्व वाली संविधान पीठ के बहुमत के फैसले से अलग था, जिसमें यह माना गया था कि भारत में विलय के साथ ही जम्मू-कश्मीर ने अपनी संप्रभुता पूरी तरह समाप्त कर दी थी और उसकी कोई अलग आंतरिक संप्रभुता नहीं बची थी।

पुलिस और सेना द्वारा मानवाधिकार हनन की जांच की मांग
जम्मू-कश्मीर से आर्टिकल 370 हटाने के केंद्र सरकार के फैसले को सुप्रीम कोर्ट ने बरकरार रखा। पांच जजों की बेंच में शामिल जस्टिस संजय किशन कौल ने अपने फैसले में मानव अधिकार के उल्लंघनों की जांच की सिफारिश की। उन्होंने कहा- मैं एक “ट्रूथ एंड रिकन्सि‌लीएश कमीशन” की सिफारिश करता हूं, जो 1980 के बाद से जम्मू-कश्मीर में राज्य (पुलिस और सेना) और गैर-राज्य (आतंकवादियों) द्वारा किए गए मानव अधिकार उल्लंघनों की जांच करें और इसकी रिपोर्ट पेश करें।” उन्होंने लिखा, “इस आयोग का गठन शीघ्रता से किया जाना चाहिए, इससे पहले कि स्मृति लुप्त हो जाए,” और साथ ही यह भी कहा कि यह प्रक्रिया समयबद्ध होनी चाहिए।

जम्मू-कश्मीर में सेना की मौजदूगी पर उठाया सवाल
जस्टिस कौल ने कहा- 1980 में कश्मीरी पंडितों को जम्मू-कश्मीर छोड़ना पड़ा था। इससे भारत की एकता और संप्रभुता खतरे में पड़ गई थी और स्थिति काबू में करने के लिए सेना को बुलाना पड़ा था। सेना की मौजदूगी से वहां के लोगों ने कई पीढ़ियों तक भारी कीमत चुकाई है। वहां के लोगों ने जो अनुभव किया मैं उससे मैं दूखी हूं। उन्होंने कहा, “सेना स्टेट के दुश्मनों के साथ लड़ाई लड़ने के लिए है, न कि स्टेट के भीतर कानून और व्यवस्था की स्थिति को नियंत्रित करने के लिए। लेकिन तब, ये अजीब समय था। सेना के प्रवेश ने अपनी खुद की जमीनी हकीकत पैदा की और विदेशी घुसपैठ के खिलाफ राज्य और राष्ट्र की अखंडता को संरक्षित करने की उनकी कोशिशों के कारण राज्य के पुरुषों, महिलाओं और बच्चों ने भारी कीमत चुकाई।”

भोपाल गैस कांड के पीड़ितों का मुआवजा बढ़ाने से इनकार
मार्च 2023 में, जस्टिस कौल की अगुवाई वाली पांच जजों की संविधान बेंच ने 1984 के भोपाल गैस त्रासदी के पीड़ितों को दिए जाने वाले मुआवज़े को बढ़ाने के लिए केंद्र की मोदी सरकार की क्यूरेटिव पिटीशन को एकमत से खारिज कर दिया। बेंच की तरफ से फैसला लिखते हुए जस्टिस कौल ने कहा कि मुआवज़े का कोई और क्लेम पेंडिंग नहीं है, और सारा मुआवज़ा देने के बाद भी, काफी सरप्लस अभी भी बचा हुआ है। यह सरप्लस रकम पीड़ितों को दो बार पेमेंट करने के लिए काफी थी और अभी भी 50 करोड़ रुपये बाकी हैं। इसलिए, उन्होंने निर्देश दिया कि यूनियन उस रकम का इस्तेमाल मुआवज़े के सभी भविष्य के क्लेम के लिए करे।

हिन्दू देवी-देवताओं के अपमान वाले पेंटिंग्स को क्लीन चीट
पूर्व जस्टिस कौल की संस्मरण पुस्तक का शीर्षक ‘विदाउट फियर ऑफ फेवर’ और पुस्तक में उनकी नसीहत यह समीक्षा करने के लिए प्रेरित करती हैं कि खुद लेखक ने बिना किसी डर और पक्षपात के अपने पद के कर्त्तव्यों और दायित्वों के साथ कितना न्याय किया है। अपने कार्यकाल के दौरान पूर्व जस्टिस संजय किशन कौल के कई फैसले और विचार संस्थागत संतुलन के बजाय वाम-उदारवादी प्राथमिकताओं के अधिक अनुकूल रहे हैं। दिल्ली उच्च न्यायालय में अपने कार्यकाल के दौरान (2008 में), उन्होंने प्रसिद्ध चित्रकार एम.एफ. हुसैन की पेंटिंग्स और उनकी कलात्मक स्वतंत्रता के खिलाफ दायर मुकदमों को खारिज कर दिया था। उन्होंने व्यवस्था दी थी कि कलाकारों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा की जानी चाहिए और अश्लील होने के मामलों को आम आदमी के सामान्य विवेक के चश्मे से देखना चाहिए, न कि हर बात पर धार्मिक या सांस्कृतिक भावनाओं के आधार पर पाबंदी लगाकर। इसे सेक्युलर और उदारवादी तबके में बड़ी जीत माना गया था।

गौरतलब है कि एमएफ हुसैन ने 2004 में ‘भारत माता’ शीर्षक से एक पेंटिंग बनाई थी, जिसमें भारत को एक नग्न महिला के रूप में चित्रित किया गया था। इसके अलावा उनकी पुरानी पेंटिंग्स (जो हिंदू देवी-देवताओं पर आधारित थीं) को लेकर भी विवाद था। 2006 में इस पेंटिंग के ऑनलाइन चैरिटी नीलामी में आने के बाद विभिन्न जगहों पर मामले दर्ज हुए, जिन्हें सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिल्ली ट्रांसफर किया गया। 2008 के दौरान दिल्ली उच्च न्यायालय और निचली अदालतों में इसके खिलाफ मामलों और याचिकाओं पर सुनवाई हुई थी। हिंदू संगठनों के भारी विरोध, मुकदमों और धमकियों के चलते एमएफ हुसैन को भारत छोड़ना पड़ा। उन्होंने अपने जीवन के अंतिम वर्ष लंदन और दोहा (कतर) में बिताए।

अर्धनारीश्वर मंदिर की छवि खराब करने वाले उपन्यास को क्लीन चिट
मद्रास उच्च न्यायालय के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश जस्टिस संजय किशन कौल और जस्टिस पुष्पा सत्यनारायण की खंडपीठ ने 5 जुलाई 2016 को तमिल लेखक पेरुमल मुरुगन के खिलाफ सभी एफआईआर को खारिज करने का आदेश दिया था। पीठ ने विवादित उपन्यास ‘माधोरुबगन’ की प्रतियों को जब्त करने या उन पर प्रतिबंध लगाने की मांग करने वाली सभी याचिकाओं को सिरे से खारिज कर दिया था। जस्टिस कौल ने फैसले में एक बेहद चर्चित टिप्पणी की थी— “यदि आपको कोई पुस्तक पसंद नहीं है, तो बस उसे बंद कर दें। उसे पढ़ने की कोई मजबूरी नहीं है।” इसके साथ ही उन्होंने आदेश दिया कि लेखक को दोबारा से उसी काम पर लौट जाना चाहिए जिसमें वह सबसे बेहतर हैं। उन्होंने आगे कहा कि उपन्यास को कई अवॉर्ड मिले थे, जो इस बात का संकेत था कि इसे बड़े पैमाने पर समाज ने स्वीकार किया था।

यह विवाद तमिल लेखक पेरुमल मुरुगन के 2010 में प्रकाशित उपन्यास ‘माधोरुबगन’ के कथानक और उसमें चित्रित एक पुरानी धार्मिक-सांस्कृतिक परंपरा से जुड़ा था। विवाद की जड़ तिरुचेंगोडु के अर्धनारीश्वर मंदिर के वार्षिक रथ उत्सव के एक प्राचीन परंपरा के चित्रण पर थी। उपन्यास में दिखाया गया था कि इस उत्सव की आखिरी रात को सामाजिक और धार्मिक तौर पर यह छूट थी कि कोई भी महिला संतान प्राप्ति के लिए अपनी पसंद के किसी भी पुरुष के साथ सहमति से संबंध बना सकती थी। इस तरह पैदा हुए बच्चे को समाज में नाजायज नहीं माना जाता था। दिसंबर 2014 में इस उपन्यास के खिलाफ हिंसक विरोध प्रदर्शन हुए। तिरुचेंगोडु के स्थानीय लोगों और कोंगु वेल्लालर जाति के संगठनों ने लेखक पर अपनी महिलाओं, संस्कृति और उनके पवित्र अर्धनारीश्वर मंदिर की छवि को खराब करने का आरोप लगाया था।

सनातन परंपरा के खिलाफ समलैंगिक विवाह का समर्थन
समलैंगिक विवाह को सनातन परंपरा के अनुकूल नहीं माना जाता है। लेकिन साल 2023 के समलैंगिक विवाह (Same-sex Marriage) मामले में जब सुप्रीम कोर्ट के बहुमत ने क्वीर जोड़ों (ट्रांसजेंडर) को कानूनी मान्यता या शादी का अधिकार देने से मना कर दिया था, तब जस्टिस कौल ने एक असहमति का नोट (Dissenting Judgment) लिखा था। उन्होंने तर्क दिया था कि जेंडर और यौन झुकाव या रुझान से परे सभी नागरिकों को ‘सिविल यूनियन’ का अधिकार मिलना चाहिए। उनके इस रुख की मानवाधिकार कार्यकर्ताओं, LGBTQ+ समूहों और उदारवादी संगठनों ने खुलकर प्रशंसा की थी।

दलित न्यायाधीश के साथ भेदभाव और उत्पीड़न का आरोप
मद्रास हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के रूप में जस्टिस कौल का कार्यकाल गंभीर विवादों में घिरा था। वर्ष 2015-16 में हाई कोर्ट के साथी जस्टिस सी.एस. कर्णन के साथ उनका टकराव देखने को मिला था। जस्टिस कर्णन ने मुख्य न्यायाधीश कौल पर उनके खिलाफ जातिगत भेदभाव, मानसिक उत्पीड़न और तुच्छ काम देने का आरोप लगाया था। उन्होंने इस संबंध में मुख्य न्यायाधीश कौल को पत्र लिखे थे और इसकी प्रतियां भारत के राष्ट्रपति और सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को भी भेजी थीं। उन्होंने उत्पीड़न के कारण लंबी छुट्टी पर जाने की इच्छा भी जताई थी। जस्टिस कर्णन ने आरोप लगाया था कि उन्हें प्रशासनिक समितियों से दूर रखा गया और उनके न्यायिक अधिकारों को सीमित किया गया। उन्होंने आरोप लगाया कि कॉलेजियम व्यवस्था योग्यता के बजाय भाई-भतीजावाद, पसंदीदा लोगों को चुनने (Favouritism) और ऊंचे पदों पर बैठे लोगों के रिश्तेदारों को बढ़ावा देने का काम करती है।

संस्थाओं में टकराव और अराजकता चाहते हैं जस्टिस कौल
जस्टिस कौल द्वारा समन्वय और संतुलन की जगह जरूरत से ज्यादा स्वतंत्रता की वकालत करना कही संस्थागत टकराव को बढ़ावा देना और देश में अराजकता पैदा करना तो नहीं हैं। दरअसल, किसी भी संवैधानिक संस्था को “अंतिम” या पूर्ण स्वतंत्रता मिलना, यदि उस पर कोई नियंत्रण या जवाबदेही न हो, तो वह तानाशाही (Dictatorship), निरंकुशता (Tyranny) और संस्थागत अराजकता को जन्म देता है। लोकतंत्र में निर्वाचित सरकार (कार्यपालिका) जनता के प्रति चुनाव के माध्यम से जवाबदेह होती है, लेकिन न्यायाधीश निर्वाचित नहीं होते। ऐसे में नीतिगत मामलों में उनका सीधा हस्तक्षेप लोकतांत्रिक जवाबदेही पर सवाल उठाता है।

भारतीय संविधान में सरकार के तीनों अंगों—विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका—में से किसी को भी पूर्ण या असीमित संप्रभुता नहीं दी गई है, बल्कि वे ‘नियंत्रण और संतुलन’ (Checks and Balances) के सिद्धांत के तहत काम करते हैं। भारत में ‘शक्तियों के सख्त पृथक्करण’ (Strict Separation of Powers) के बजाय एक ऐसा लचीला संतुलन अपनाया गया है, जहां तीनों अंग एक-दूसरे की शक्तियों को नियंत्रित भी करते हैं और अपनी सीमाओं में रहकर काम भी करते हैं। ति न्यायिक सक्रियता (Judicial Overreach) तब हानिकारक हो जाती है जब न्यायपालिका अपनी तय संवैधानिक सीमाओं को लांघकर कार्यपालिका और विधायिका के कार्यों में अत्यधिक दखल देने लगती है। इसलिए देश को विकास के रास्ते पर तेजी से ले जाने के लिए टकराव नहीं, बल्कि समन्यव की जरूरत है। सभी संवैधानिक संस्थाएं प्रतिस्पर्धी न बनकर मिलकर काम करे और देश के विकास के लक्ष्य को पूरा कर सके।

पूर्व जस्टिस संजय किशन कौल का न्यायिक सफर
आखिर में जानते हैं कि संजय किशन कौल कौन है और उनका न्यायिक सफर कैसे शुरू हुआ। जस्टिस संजय किशन कौल का जन्म 26 दिसंबर 1958 को हुआ था। उन्होंने अपनी स्कूली शिक्षा मॉडर्न स्कूल, नई दिल्ली से पूरी की और सेंट स्टीफेंस कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय से अर्थशास्त्र में स्नातक (ऑनर्स) की उपाधि प्राप्त की। इसके बाद उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय के कैंपस लॉ सेंटर से एलएलबी (LLB) किया। उन्होंने 1982 में दिल्ली बार काउंसिल में एक वकील के रूप में अपना पंजीकरण कराया और मुख्य रूप से दिल्ली उच्च न्यायालय तथा सुप्रीम कोर्ट में कमर्शियल, सिविल और रिट मामलों की पैरवी की। मई 2001 में वे दिल्ली उच्च न्यायालय के अतिरिक्त न्यायाधीश नियुक्त हुए। इसके बाद उन्होंने मद्रास उच्च न्यायालय और पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के रूप में भी सेवा दी। फरवरी 2017 में उन्हें भारत के सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में पदोन्नत किया गया और दिसंबर 2023 में वे सेवानिवृत्त हुए।

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