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मुलायम से अखिलेश तक: कारसेवकों के लहू से ग्रंथों के अपमान तक, सपा का सनातन विरोधी इतिहास

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30 अक्टूबर और 2 नवंबर 1990 का दिन आजाद भारत के इतिहास का सबसे काला अध्याय माना जाता है। अयोध्या में शांति से जुटे निहत्थे रामभक्त कारसेवकों पर तत्कालीन मुलायम सरकार के इशारे पर पुलिस ने अंधाधुंध गोलियां चलाईं, जिससे सरयू का पानी तक लाल हो गया। इस खूनी खेल पर दुख जताने के बजाय 16 की जगह 30 जानें भी जातीं तो परवाह नहीं थी, ऐसा बयान देकर हिंदू समाज के घावों पर गहरा वार किया गया। 84 कोसी परिक्रमा रोकने के लिए संतों पर लाठियां चलाई गईं और पूरी अयोध्या को पुलिस छावनी बनाकर भक्तों को दर्शन से रोक दिया गया। प्रभु श्रीराम के अस्तित्व पर सवाल उठाए गए और राम मंदिर निर्माण को महज एक राजनीतिक साजिश बताकर अदालतों में रोड़े अटकाए गए। हद तो तब हो गई जब सपा राज में कचहरी और संकट मोचन मंदिर बम धमाकों के आरोपियों पर से मुकदमे वापस लेने की तैयारी हुई, जिसे हाई कोर्ट ने फटकार लगाकर रोका। संतों का अपमान करना, पवित्र धर्मग्रंथों का उपहास उड़ाना और आतंकियों के प्रति हमदर्दी दिखाना ही मुलायम सिंह से लेकर अखिलेश यादव तक समाजवादी पार्टी की असली राजनीति रही है।

मुलायम सिंह यादव और अयोध्या गोलीकांड: जब सरयू में बहाया गया निहत्थे कारसेवकों का लहू
30 अक्टूबर और 2 नवंबर 1990 को अयोध्या में प्रभु श्रीराम के मंदिर निर्माण की मांग कर रहे निहत्थे कारसेवकों पर सीधी गोलियां चलाई गईं। मुलायम सिंह यादव की सरकार ने शांति से भजन-कीर्तन कर रहे रामभक्तों पर खाकी का क्रूर पहरा बैठा दिया था। अयोध्या की गलियों में कोठारी बंधुओं सहित अनेक संतों और नौजवानों को चुन-चुनकर सिर और छाती में गोलियां मारी गईं। सच्चाई छिपाने के लिए श्रद्धालुओं के शवों को चोरी-छिपे बालू में दबाने और सरयू नदी में बहाने के गंभीर आरोप तत्कालीन प्रशासन पर लगे। यह पूरी बर्बरता सिर्फ इसलिए की गई ताकि एक खास वर्ग को संदेश दिया जा सके कि सरकार उनकी खातिर अपनों का खून बहाने से भी नहीं चूकेगी। अपने ही देश में आस्था लेकर पहुंचे नागरिकों पर ऐसी क्रूरता किसी भी लोकतांत्रिक सरकार के दौर में कभी नहीं देखी गई थी। इस गोलीकांड ने साबित कर दिया कि सत्ता की कुर्सी बचाने के लिए सपा बहुसंख्यक समाज की आस्था को रौंदने में जरा भी नहीं हिचकी।

गोलीकांड पर बेशर्म बयान: 16 की जगह 30 जानें भी जातीं तो परवाह नहीं थी
अयोध्या के उस बड़े गोलीकांड पर पश्चाताप करने के बजाय मुलायम सिंह यादव ने बार-बार रैलियों में इस पुलिस कार्रवाई को अपनी प्रशासनिक बहादुरी बताकर पेश किया। उन्होंने जनता के बीच खुलेआम बयान दिया कि अगर बाबरी मस्जिद बचाने के लिए 16 की जगह 30 जानें भी जातीं, तो भी वे पीछे नहीं हटते। निहत्थे कारसेवकों के बलिदान का इस तरह सरेआम मजाक उड़ाना और मौतों पर सीना ठोकना उनकी नफरत भरी सोच को दिखाता है। मुख्यमंत्री के संवैधानिक पद पर बैठकर अपनी ही निहत्थी जनता की हत्या को सही ठहराना देश के लोकतंत्र के लिए बेहद शर्मनाक था। मुलायम सिंह ने इस बयान से अपने वोट बैंक को साधने के फेर में पूरे हिंदू समाज के सीने पर आघात करने का काम किया। जिन घरों के चिराग बुझे थे, उन रोते-बिलखते परिजनों के आंसुओं का मुलायम सिंह ने सार्वजनिक मंचों से खुला उपहास उड़ाया। इस सोच ने साफ कर दिया कि सपा के लिए संतों और रामभक्तों की जिंदगी की कोई कीमत नहीं थी, उन्हें सिर्फ अपनी सत्ता प्यारी थी।

मुलायम सिंह ने संसद में राम के अस्तित्व को नकारा, अयोध्या में मंदिर होने से किया था इनकार
संसद के पटल से लेकर चुनावी मंचों तक मुलायम सिंह यादव ने प्रभु श्रीराम के जन्म और मंदिर के ऐतिहासिक वजूद को लगातार नकारा। उन्होंने बाबरी ढांचे के बचाव में जांच का हवाला देकर सनातन समाज के आराध्य के अस्तित्व पर ही सीधे सवाल खड़े किए थे। उन्होंने खुले तौर पर संसद में दावा किया था कि अयोध्या में कभी कोई मंदिर नहीं था और न ही वहां भगवान राम का जन्म हुआ था। आज चुनावी मौसम आते ही जो अखिलेश यादव अचानक बड़े रामभक्त बनकर घूम रहे हैं, यह उनके पिता और पार्टी का खुला रिकॉर्ड है। जो दल भगवान राम के जन्मस्थान पर सवाल उठाता रहा और आस्था का अनादर करता रहा, उसका अचानक मंदिर प्रेमी बनना महज पाखंड है। संसद में प्रभु श्रीराम के अस्तित्व को झुठलाने वाली यह मानसिकता साबित करती है कि सपा ने हमेशा आस्था के खिलाफ राजनीति की। इतिहास गवाह है कि समाजवादी पार्टी की असली जड़ें प्रभु श्रीराम के अस्तित्व और बहुसंख्यक समाज की श्रद्धा को रौंदने पर ही टिकी रही हैं।

हवा में उड़ गए जय श्री राम: चुनावी मंचों से भगवान राम के नाम का खुला विरोध
वर्ष 1993 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में सपा और बसपा गठबंधन ने भगवान राम के नाम के विरोध को अपना मुख्य चुनावी हथियार बनाया था। उस चुनाव में गठबंधन का सबसे चर्चित और आधिकारिक नारा था, ‘मिले मुलायम-कांशीराम, हवा में उड़ गए जय श्री राम’। यह नारा सीधे तौर पर साबित करता है कि सपा की चुनावी रणनीति की बुनियाद ही प्रभु श्रीराम के नाम और सनातन प्रतीकों के खुले विरोध पर रखी गई थी। केवल एक खास वर्ग को खुश करने और सत्ता हासिल करने के लिए करोड़ों हिंदुओं के आराध्य देव के जयकारे का इस तरह सड़कों पर उपहास उड़ाया गया। चुनावी मंचों से भगवान राम के नाम को मिटाने और हवा में उड़ाने की बातें करके बहुसंख्यक समाज की धार्मिक आस्था को खुली चुनौती दी गई थी। मर्यादा पुरुषोत्तम के नाम के खिलाफ इतना जहरीला नारा देकर चुनाव लड़ना भारतीय राजनीति में आस्था के अपमान का सबसे घटिया उदाहरण था। इस ऐतिहासिक नारे ने साफ कर दिया था कि समाजवादी पार्टी के लिए हिंदू विरोधी मानसिकता कोई संयोग नहीं, बल्कि सोचा-समझा चुनावी फार्मूला रही है।

परिक्रमा और संतों पर प्रतिबंध: अयोध्या को छावनी बनाकर आस्था की घेराबंदी
मुलायम सिंह ने वर्ष 1990 में अयोध्या में संतों और कारसेवकों के प्रवेश पर रोक लगाकर कहा था कि वहां परिंदा भी पर नहीं मार सकेगा। इसी विरासत को आगे बढ़ाते हुए अखिलेश यादव सरकार ने अगस्त 2013 में विहिप की 84 कोसी परिक्रमा यात्रा पर पूरी तरह प्रतिबंध लगा दिया था। अयोध्या सहित आसपास के छह जिलों की सीमाओं को सील कर रेल और बस सेवाएं अचानक रोक दी गई थीं। अपने आराध्य के दर्शन और परिक्रमा को आ रहे पूज्य संतों, धर्माचार्यों और आम श्रद्धालुओं को जबरन जेलों में बंद किया गया। भक्ति और कीर्तन के इस पावन धाम को कंटीले तारों और पुलिस की बंदूकों के दम पर पूरी तरह छावनी में बदल दिया गया था। अपने ही देश में हिंदुओं को उनके धार्मिक आयोजनों से रोकने का यह तानाशाही रवैया विदेशी आक्रांताओं के दौर की याद दिलाता था। वर्ष 1990 से 2013 तक संतों पर लाठियां चलाना और यात्राएं रोकना सपा के मुस्लिम तुष्टिकरण का सबसे खुला प्रमाण रहा।

रामलला के अस्तित्व पर आघात: राम मंदिर आंदोलन को लगातार नकारा
मुलायम सिंह यादव ने राम मंदिर आंदोलन का हमेशा उपहास उड़ाया और भगवान राम के अस्तित्व व जन्मभूमि के ऐतिहासिक साक्ष्यों पर उंगली उठाई। उन्होंने संसद से लेकर सड़क तक यही प्रचार करने की कोशिश की कि राम मंदिर की मांग सिर्फ एक चुनावी साजिश के सिवा कुछ नहीं है। जमीन की खुदाई में मिले तमाम ऐतिहासिक साक्ष्यों और जन-आस्था को दरकिनार कर वे लगातार बाबरी ढांचे के पक्ष में खुलकर खड़े रहे। करोड़ों हिंदुओं के आराध्य प्रभु श्रीराम को काल्पनिक साबित करने के लिए सपा ने पूरी ताकत से एकतरफा अभियान चलाया। सपा के मंचों से राम जन्मभूमि आंदोलन से जुड़े पूज्य संतों और नेताओं को दंगाई कहकर बार-बार लांछित किया गया। इस साजिश का मकसद हिंदू समाज को मानसिक रूप से दबाना और अपने खास वोट बैंक को यह यकीन दिलाना था कि सपा ही उनकी ढाल है। करोड़ों लोगों की सदियों पुरानी आस्था के केंद्र को अदालतों और कानूनी दांवपेचों में उलझाए रखने का सबसे बड़ा काम मुलायम सिंह ने ही किया।

अयोध्या में शिला पूजन पर रोक: रामभक्तों की आस्था को कानून-व्यवस्था का संकट बताया
वर्ष 2002 में जब राम मंदिर आंदोलन के दौरान अयोध्या में शिला दान और सांकेतिक पूजन का शांतिपूर्ण कार्यक्रम तय किया गया था। उस समय समाजवादी पार्टी ने पूरे जिले में धारा 144 और कर्फ्यू जैसे सख्त हालात पैदा करने के लिए सरकार पर भारी दबाव बनाया। रामभक्तों की किसी भी धार्मिक गतिविधि को कानून-व्यवस्था का भारी संकट बताकर बदनाम करना सपा का पुराना राजनीतिक हथकंडा रहा है। अयोध्या में भगवान राम के भक्तों के शांतिपूर्ण जुटने को भी खतरे के तौर पर दिखाकर पूरे इलाके को छावनी बनाने की वकालत की गई। आस्थावान संतों और श्रद्धालुओं को उनके ही पवित्र धाम में पूजा-अर्चना करने से रोकने के लिए सपा ने संसद से लेकर सड़क तक माहौल गरमाया। अयोध्या को हमेशा एक तनावग्रस्त और बंदिशों वाला क्षेत्र बनाए रखने की राजनीति सपा के इसी एजेंडे का हिस्सा रही है। इस रवैये ने साफ किया कि रामभक्तों के शांतिपूर्ण पूजन को भी सपा हमेशा अपने राजनीतिक लाभ के लिए बड़ा खतरा मानती रही।

राम जन्मभूमि पर आतंकी हमला: लचर सुरक्षा और संदिग्धों पर नरम रवैया
जुलाई 2005 में जब लश्कर के भारी हथियारों से लैस आतंकियों ने अयोध्या में श्रीराम जन्मभूमि परिसर पर आत्मघाती हमला किया, तब प्रदेश में सपा की सरकार थी। उस नाजुक दौर में मुलायम सिंह प्रशासन की ओर से रामलला परिसर की सुरक्षा में भारी ढिलाई और लचर रवैया साफ दिखाई दिया। करोड़ों हिंदुओं के पवित्र धाम को धमाकों से उड़ाने की इतनी बड़ी साजिश के बाद भी सरकार आतंकियों की जड़ों पर कड़ा प्रहार करने से बचती रही। जांच एजेंसियों द्वारा पकड़े गए संदिग्धों और उनके मददगारों पर सख्त कानूनी शिकंजा कसने के बजाय तुष्टिकरण के चलते नरमी बरती गई। भगवान राम के पावन मंदिर पर हुए इतने बड़े हमले को कड़ा सबक सिखाने के बजाय इसे एक सामान्य घटना बताकर दबाने की कोशिश हुई। तुष्टिकरण के दबाव में आकर आतंकियों और उनके आकाओं को कड़ा सबक सिखाने का जरूरी राजनीतिक साहस सरकार ने कभी नहीं दिखाया। इस ढीली-ढाली नीति ने साफ कर दिया कि सपा राज में देश की सुरक्षा और हिंदू समाज के सबसे बड़े तीर्थ स्थल सुरक्षित नहीं थे।

अमरनाथ भूमि विवाद पर अलगाववादी सुर: शिवभक्तों की सुविधाओं का खुला विरोध
वर्ष 2008 में जब अमरनाथ यात्रियों की सुरक्षा और सुविधाओं के लिए श्राइन बोर्ड को थोड़ी सी जमीन दी गई, तब कश्मीर के कट्टरपंथियों ने बखेड़ा खड़ा किया। उस नाजुक समय में मुलायम सिंह यादव ने देश के करोड़ों शिवभक्तों का साथ देने के बजाय कश्मीर के अलगाववादियों की बोली बोलना शुरू कर दिया। सपा सुप्रीमो ने अमरनाथ यात्रियों को जमीन दिए जाने का कड़ा विरोध किया और खुलेआम मांग की कि यह जमीन तुरंत वापस ली जाए। बर्फ से ढके दुर्गम रास्तों पर बाबा बर्फानी के दर्शन को जाने वाले निर्दोष श्रद्धालुओं के अधिकारों पर सपा ने खुलकर हमला बोला। पूरे देश में सपा के इस रुख पर भारी गुस्सा फूटा, क्योंकि किसी भी राजनीतिक दल ने हिंदू तीर्थयात्रियों की सुविधाओं का ऐसा खुला विरोध नहीं किया था। केवल एक खास वर्ग को खुश करने के लिए शिवभक्तों की जान और सुविधा को दांव पर लगा दिया गया था। अमरनाथ भूमि विवाद पर सपा के इस अलगाववादी सुर ने उनकी हिंदू विरोधी मानसिकता को देश के सामने पूरी तरह उजागर कर दिया था।

राम सेतु को काल्पनिक बताने वाले हलफनामे पर सपा का मौन: यूपीए सरकार को दिया अंधा समर्थन
केंद्र में जब कांग्रेस की यूपीए सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा देकर प्रभु श्रीराम और पवित्र राम सेतु के ऐतिहासिक वजूद को नकार दिया था। उस दौर में समाजवादी पार्टी केंद्र सरकार को बाहर से बिना शर्त समर्थन दे रही थी और इस घोर सनातन विरोधी कदम पर पूरी तरह मुंह सिले बैठी रही। करोड़ों हिंदुओं की आस्था के केंद्र भगवान राम को एक काल्पनिक कहानी बताने की साजिश का सपा ने संसद में कभी कोई विरोध नहीं किया। सत्ता में हिस्सेदारी और केंद्रीय जांच से अपने परिवार को बचाने के लिए मुलायम और अखिलेश ने हिंदू समाज की आस्था का खुला सौदा किया। जिस राम सेतु की प्रमाणिकता पूरे भारत का सांस्कृतिक स्वाभिमान है, उसे तोड़ने के प्रोजेक्ट पर सपा की यह चुप्पी उनका असली चेहरा दिखाती है। कुर्सी के लालच और राजनीतिक सौदेबाजी के लिए अपने ही आराध्य के अस्तित्व को झुठलाने वालों का साथ देना सपा की हमेशा से आदत रही है। इस अवसरवादी रवैये ने साफ कर दिया कि सपा के लिए हिंदू समाज के आत्मसम्मान और धार्मिक आस्था की कोई अहमियत नहीं है।

आतंकी मुकदमों की वापसी की राजनीति: ब्लास्ट के आरोपियों को बचाने का प्रयास
समाजवादी पार्टी के राज में वोट बैंक की लालच ने देश की सुरक्षा और कानून के राज को सबसे गहरे खतरे में डाल दिया था। 2012 में सत्ता की कुर्सी संभालते ही अखिलेश सरकार ने वाराणसी कचहरी और संकट मोचन मंदिर बम धमाकों के आरोपियों पर से मुकदमे वापस लेने की प्रक्रिया शुरू कर दी। वकीलों और मंदिर में दर्शन कर रहे बेकसूर श्रद्धालुओं का खून बहाने वाले आरोपियों को बेगुनाह बताकर छोड़ने की इस तैयारी से पूरा देश दंग रह गया था। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने सरकार की इस हरकत पर कड़ी फटकार लगाते हुए पूछा था कि क्या सरकार कल आतंकियों को पद्म भूषण देगी। अदालत ने सरकार के इस फैसले पर तुरंत रोक लगाकर तुष्टिकरण की इस खौफनाक साजिश को नाकाम कर दिया था। बेकसूर नागरिकों की जान लेने वालों के प्रति ऐसी हमदर्दी दिखाकर सपा ने मुस्लिम तुष्टिकरण की सारी सीमाएं लांघ दी थीं। इस घटना ने साबित कर दिया कि सपा सत्ता पाने के लिए देश पर हमला करने वालों को भी गले लगाने से परहेज नहीं करती।

मुजफ्फरनगर दंगे और एकतरफा तुष्टिकरण: जब राहत शिविरों के बीच चला सैफई महोत्सव
2013 में अखिलेश यादव के कार्यकाल में मुजफ्फरनगर में भीषण दंगे भड़के, जिसने सपा सरकार के तुष्टिकरण की पोल खोलकर रख दी। दंगों की आग में 60 से ज्यादा बेकसूर लोग मारे गए और हजारों परिवार अपनी पुश्तैनी जमीन छोड़कर बेघर होने को मजबूर हो गए। प्रशासन पर ऊपर से दबाव डालकर एकतरफा कार्रवाई कराई गई और बहुसंख्यक समाज के नेताओं पर झूठे मुकदमे थोपकर जेलों में डाला गया। कड़ाके की ठंड में जब राहत शिविरों में पड़े बेघर परिवारों के मासूम बच्चे तड़प-तड़पकर दम तोड़ रहे थे, तब अखिलेश सरकार सैफई में जश्न मना रही थी। बॉलीवुड के कलाकारों को बुलाकर नचाने और मौज-मस्ती करने पर सरकारी तिजोरी का करोड़ों रुपया पानी की तरह बहाया गया। जनता के आंसुओं और मासूमों की मौतों के बीच सरकारी नाच-गाना सपा की चरम संवेदनहीनता का सबसे घटिया सबूत था। मुजफ्फरनगर के दंगों ने दिखा दिया कि वोट बैंक को खुश रखने के लिए अखिलेश सरकार कानून, इंसाफ और इंसानियत तीनों को कुचल सकती है।

बजट और योजनाओं में खुला भेदभाव: कब्रिस्तान बनाम श्मशान का विवादित मॉडल
अखिलेश यादव के पूरे पांच साल के कार्यकाल में सरकारी खजाने और योजनाओं के पैसों के बंटवारे में हिंदू समाज के साथ खुला भेदभाव हुआ। सरकार ने अपने बजट में कब्रिस्तानों की चहारदीवारी बनवाने के लिए सैकड़ों करोड़ रुपये का भारी-भरकम फंड एक झटके में जारी कर दिया। दूसरी तरफ गांवों और कस्बों में बने हिंदू समाज के पारंपरिक श्मशान घाटों पर शेड, पानी और रास्ते तक के लिए एक पैसा नहीं दिया गया। कब्रिस्तानों की बाउंड्री पर करोड़ों बहाने वाली सरकार ने हिंदू अंतिम संस्कार स्थलों को बदहाली और कीचड़ में छोड़ दिया था। कन्या विद्या धन और छात्रवृत्ति जैसी योजनाओं में भी एक खास वर्ग के बच्चों को चुन-चुनकर लाभ देकर बाकी गरीब बच्चों को नजरअंदाज किया गया। सरकारी पैसे के इस खुले सांप्रदायिक बंटवारे ने प्रदेश के करोड़ों आम नागरिकों के मन में यह साफ कर दिया कि सरकार सिर्फ एक वर्ग की है। इस बजट ने साबित कर दिया कि सपा का समाजवाद असल में हिंदू समाज के हक पर डाका डालकर तुष्टिकरण करने का जरिया था।

हमारी बेटी उसका कल योजना: सरकारी खजाने से गरीब हिंदू बेटियों के साथ भेदभाव
अखिलेश सरकार ने 2012 में सत्ता में आते ही बेटियों की मदद से जुड़ी सरकारी योजना में भी मजहब की दीवार खड़ी कर दी थी। ‘हमारी बेटी उसका कल’ योजना शुरू करके ऐलान किया गया कि सिर्फ मुस्लिम वर्ग की 10वीं पास छात्राओं को ही 30-30 हजार रुपये का चेक मिलेगा। इस योजना से गरीब हिंदू, दलित और पिछड़े परिवारों की बेटियों को पूरी तरह बाहर रखकर उनके साथ खुला सौतेला व्यवहार किया गया। गरीबी और मुफलिसी किसी का धर्म देखकर नहीं आती, लेकिन अखिलेश सरकार ने मदद देने के लिए भी मजहब का पैमाना तय कर दिया। जब इस घोर भेदभाव वाली योजना पर जनता भड़की और कोर्ट में सवाल उठे, तब जाकर सरकार को भारी फजीहत झेलनी पड़ी थी। बेटियों की पढ़ाई और शादी के नाम पर भी सिर्फ अपने वोट बैंक को साधना सपा की विभाजनकारी सोच को सामने लाता है। यह योजना इस बात का जीता-जागता सबूत है कि अखिलेश सरकार के लिए गरीब हिंदू बेटियों के सपनों और भविष्य की कोई कीमत नहीं थी।

धर्मांतरण और पीड़ित हिंदू परिवारों की उपेक्षा: शिकायतों पर थानों में ताले और चुप्पी
सपा के पांच साल के शासनकाल में पश्चिमी उत्तर प्रदेश के तमाम जिलों से सुनियोजित धर्मांतरण और हिंदू परिवारों के भयभीत होने के मामले सामने आए थे। बेटियों के साथ छल-कपट और जबरन मतांतरण की वारदातों पर जब लाचार हिंदू परिवार थानों में गुहार लगाने जाते, तो उनकी रिपोर्ट तक दर्ज नहीं होती थी। पुलिस प्रशासन पर ऊपर से इतना राजनीतिक दबाव रहता था कि गंभीर अपराधों को भी आपसी कहासुनी बताकर दबा दिया जाता था। बहुसंख्यक समाज की सुरक्षा को पूरी तरह दरकिनार कर अपराधियों और कट्टरपंथी तत्वों को खुला संरक्षण दिया जाता रहा। अपनी ही बेटियों की अस्मत और जान बचाने के लिए गरीब परिवारों को पुलिस थानों से रोते हुए बैरंग लौटना पड़ता था। थानों को तुष्टिकरण का अड्डा बनाकर न्याय की उम्मीद खोने वाले पीड़ित समाज की चीखें सपा सरकार ने कभी नहीं सुनीं। पीड़ित हिंदू परिवारों की यह खुली अनदेखी साबित करती है कि सपा के राज में इंसाफ भी धर्म देखकर ही तय होता था।

कांवड़ यात्रा और शोभायात्राओं पर बंदिशें: डीजे और लाउडस्पीकर पर लगा सरकारी पहरा
सपा के शासनकाल में सावन के महीने में शिवभक्तों की कांवड़ यात्राओं और पारंपरिक हिंदू शोभायात्राओं पर तरह-तरह की प्रशासनिक बंदिशें लगाई जाती थीं। कांवड़ मार्गों पर डीजे बजाने, भजन-कीर्तन के लाउडस्पीकर लगाने और शोभायात्राओं के पुराने रास्तों पर भी भारी पाबंदियां थोप दी जाती थीं। हिंदू त्योहारों के समय पुलिस-प्रशासन इतनी सख्ती दिखाता था जैसे कोई धार्मिक उत्सव नहीं बल्कि कोई जुर्म होने जा रहा हो। दूसरी तरफ अन्य समुदायों के धार्मिक जलसों, रैलियों और तेज आवाज वाले लाउडस्पीकरों पर प्रशासन पूरी तरह आंखें मूंदे रहता था। सनातनी आस्था के उल्लास को नियमों के नाम पर दबाना और केवल बहुसंख्यक समाज के आयोजनों पर डंडा चलाना सरकार की पहचान बन गया था। इस दोहरे रवैये ने प्रदेश के शिवभक्तों और हिंदू समाज को अपने ही त्योहारों पर मानसिक रूप से प्रताड़ित करने का काम किया। आस्था के उत्सवों को बंदिशों में कैद करना सपा की हिंदू विरोधी मानसिकता और तुष्टिकरण का सबसे साफ उदाहरण था।


दुर्गा पूजा और गणेश प्रतिमा विसर्जन पर पाबंदियां: हिंदू अनुष्ठानों पर प्रशासनिक दबाव
सपा शासनकाल में प्रदेश भर में दुर्गा पूजा और गणेश उत्सव के पावन पर्वों पर भी प्रशासनिक अड़ंगे लगाने की सुनियोजित नीति चलाई गई। फैजाबाद, बरेली और सुल्तानपुर सहित कई संवेदनशील जिलों में प्रतिमा विसर्जन के पारंपरिक रास्तों और विसर्जन की तारीखों पर मनमानी रोक लगा दी गई। मां दुर्गा की मूर्तियों के विसर्जन जुलूस को जबरन रोककर पुलिस प्रशासन ने कई जगह श्रद्धालुओं पर लाठियां भांजने का काम किया। शांतिपूर्ण धार्मिक अनुष्ठान कर रहे हिंदू समाज को अपनी ही पूजा-अर्चना के लिए अदालतों और थानों के चक्कर लगाने को मजबूर किया गया। दूसरी तरफ एक खास वर्ग के त्योहारों और जुलूसों के दौरान पूरे शहर की व्यवस्थाओं को उनकी मनमर्जी के मुताबिक खोल दिया जाता था। सनातन पर्वों पर इस तरह की सरकारी रोक-टोक और पहरेदारी ने श्रद्धालुओं के मन में भारी पीड़ा और असंतोष पैदा किया। यह बर्ताव साफ साबित करता है कि सपा सरकार में हिंदू त्योहारों की गरिमा को कुचलना प्रशासनिक तुष्टिकरण का हिस्सा बन चुका था।

शिक्षा और संस्कृति की उपेक्षा: मदरसों को अनियंत्रित बजट और संस्कृत पाठशालाओं से मुंह मोड़ा
सपा की सरकारों में स्कूलों की पढ़ाई से भारतीय संस्कृति, रामायण और भगवद्गीता के जीवन मूल्यों और नैतिक शिक्षा को पूरी तरह बाहर रखा गया। प्रदेश की प्राचीन संस्कृत पाठशालाओं और पारंपरिक गुरुकुलों को मिलने वाले अनुदान को काटकर उन्हें बंद होने की कगार पर पहुंचा दिया गया। इसके बिल्कुल उलट बिना किसी पारदर्शी निगरानी के मदरसों को चमकाने के नाम पर सरकारी खजाने से करोड़ों रुपये लुटाए गए। भारी संख्या में उर्दू शिक्षकों की खास भर्तियां निकालकर सरकारी नौकरियों में एकतरफा तुष्टिकरण को बढ़ावा दिया गया। भारतीय भाषाओं, संस्कारों और सनातन संस्कृति की पढ़ाई को बढ़ावा देने की हर अच्छी कोशिश को सपा नेताओं ने फौरन सांप्रदायिक बता दिया। अपनी ही मिट्टी की महान ज्ञान परंपरा और संस्कृत भाषा को सरकारी मदद से वंचित करना सपा के सोचे-समझे एजेंडे का हिस्सा था। नई पीढ़ी को अपने गौरवशाली इतिहास और संस्कारों से दूर रखने की यह चाल सपा के सनातन विरोधी रवैये को साफ दिखाती है।

धर्मांतरण विरोधी कानून का विरोध: बेटियों की सुरक्षा पर वोट बैंक को दी प्राथमिकता
उत्तर प्रदेश में जब छल-कपट, झूठी पहचान और जबरन धर्मांतरण के जाल से बेटियों को बचाने के लिए कड़ा कानून लाया गया, तब सपा ने भारी विरोध किया। विधानसभा से लेकर टीवी चैनलों तक अखिलेश यादव और उनकी पार्टी के नेताओं ने इस सुरक्षा कानून को अल्पसंख्यकों के खिलाफ बताकर हंगामा खड़ा किया। झूठे प्यार के नाम पर अपनी बेटियों को गंवा चुके बेबस माता-पिता के आंसुओं की परवाह किए बिना सपा ने इस सख्त कानून को रोकने की कोशिश की। कानून का कड़ा विरोध करके सपा नेतृत्व ने परोक्ष रूप से जबरन धर्म बदलवाने वाले गिरोहों और उनके मददगारों का ही हौसला बढ़ाया। समाज में बहन-बेटियों की सुरक्षा और सम्मान से जुड़े इतने बड़े संवेदनशील मुद्दे को भी सपा ने अपनी गंदी राजनीति का अखाड़ा बना दिया। हिंदू समाज के परिवारों की सुरक्षा को ताक पर रखकर कट्टरपंथियों के पक्ष में खड़े होना सपा की पुरानी फितरत रही है। इस कानून का विरोध करके अखिलेश यादव ने फिर साबित कर दिया कि उनके लिए बेटियों की जान से ज्यादा अपने वोट बैंक की फिक्र है।

अखिलेश यादव और राम मंदिर प्राण-प्रतिष्ठा का बहिष्कार: ऐतिहासिक क्षण से बनाई जानबूझकर दूरी
मुलायम सिंह यादव की उसी सनातन विरोधी सोच को आगे बढ़ाते हुए अखिलेश यादव ने भव्य राम मंदिर के प्राण-प्रतिष्ठा कार्यक्रम का खुला बहिष्कार किया। 500 सालों के लंबे संघर्ष और पीढ़ियों के बलिदान के बाद जब रामलला अपने भव्य मंदिर में पधार रहे थे, तब अखिलेश अयोध्या जाने से बचते रहे। श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट ने पूरे सम्मान के साथ न्योता भेजा था, लेकिन अखिलेश ने अपने वोट बैंक की नाराजगी के डर से उसे ठुकरा दिया। जब पूरा भारत और दुनिया भर के करोड़ों रामभक्त इस ऐतिहासिक दिन पर दीए जला रहे थे, तब सपा के बड़े नेता घरों में दुबक कर बैठे थे। इस पावन अवसर से मुंह मोड़कर अखिलेश यादव ने साबित कर दिया कि वे अपने पूर्वजों की उस विभाजनकारी लाइन से एक इंच भी अलग नहीं हैं। उन्होंने साफ संदेश दिया कि उनके लिए करोड़ों रामभक्तों की खुशी कोई मायने नहीं रखती, उन्हें सिर्फ अपने खास वोटरों को खुश रखना है। राम मंदिर के उत्सव से दूरी बनाकर अखिलेश यादव ने दिखा दिया कि वे तुष्टिकरण के संकीर्ण दायरे से कभी बाहर नहीं आ सकते।

अयोध्या में श्रीराम की भव्य प्रतिमा का उपहास: आस्था के प्रतीक को बताया फिजूलखर्ची
जब अयोध्या में भगवान श्रीराम की विशाल प्रतिमा और सरयू तट को संवारने का बड़ा काम शुरू हुआ, तब अखिलेश यादव ने उसका सरेआम मजाक उड़ाया। अखिलेश यादव और उनकी पार्टी के प्रवक्ताओं ने राम की प्रतिमा के निर्माण को पैसों की बर्बादी और पत्थर लगाने का खेल कहकर नीचा दिखाया। उन्होंने तंज कसते हुए बयान दिए कि मूर्तियों से किसी का पेट नहीं भरता, जबकि अपनी सरकार में वे पार्कों और स्मारकों पर जनता का भारी फंड बहा चुके थे। प्रभु श्रीराम की पावन जन्मभूमि को दुनिया का सबसे सुंदर और भव्य धाम बनाने के हर सरकारी प्रयास पर सपा ने सिर्फ मीन-मेख निकाला। करोड़ों सनातनियों के आराध्य भगवान राम के गौरव को फिर से स्थापित करने के काम में रोड़े अटकाना सपा नेताओं का रोज का काम बन गया। जो पार्टी सैफई में अपने निजी जश्न और स्टेडियमों पर करोड़ों फूंकती रही, उसे भगवान राम की प्रतिमा लगाने में फिजूलखर्ची नजर आने लगी। यह विरोध साफ बताता है कि भगवान राम के वैभव और सनातन संस्कृति के सम्मान को स्वीकार करना सपा के बस की बात नहीं है।

मठों और संतों पर अनर्गल प्रहार: चिलमजीवी कहकर सनातन परंपरा का अपमान
अखिलेश यादव ने अपनी राजनीतिक बौखलाहट में सनातन धर्म के पूज्य साधु-संतों, संन्यासियों और मठ-मंदिरों की महान परंपराओं पर कीचड़ उछालने का काम किया। भगवा कपड़े पहनने वाले संतों और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पर हमला बोलने के लिए उन्होंने कई बार बेहद अमर्यादित शब्दों का सहारा लिया। जनसभाओं और प्रेस वार्ताओं में मंच पर बैठकर साधु-संतों को चिलमजीवी कहकर बुलाना और उनके पहनावे का उपहास उड़ाना अखिलेश की जुबान पर चढ़ गया। भारत की संस्कृति में त्याग, तपस्या और ज्ञान के प्रतीक माने जाने वाले भगवा रंग और साधु समाज का ऐसा सरेआम अपमान कभी नहीं देखा गया। गोरखपुर की ऐतिहासिक और पूज्य गोरखनाथ पीठ को भी संकीर्ण राजनीति के चश्मे से देखकर बदनाम करने की घटिया कोशिश की गई। सनातन परंपरा के पूजनीय संतों को नशे और पाखंड से जोड़कर अखिलेश ने करोड़ों भक्तों के आत्मसम्मान और श्रद्धा पर गहरी चोट की। यह आचरण दिखाता है कि सपा नेताओं के मन में संतों के प्रति कोई आदर नहीं है, वे सिर्फ गंदी राजनीति के लिए किसी भी हद तक गिर सकते हैं।

श्रीरामचरितमानस के अपमान पर मौन समर्थन: स्वामी प्रसाद मौर्य को दिया खुला संरक्षण
सपा के राष्ट्रीय महासचिव रहे स्वामी प्रसाद मौर्य ने जब करोड़ों हिंदुओं के पूज्य ग्रंथ श्रीरामचरितमानस की चौपाइयों पर पाबंदी की मांग की, तब अखिलेश चुप साधे रहे। राजधानी लखनऊ की सड़कों पर पवित्र रामचरितमानस की प्रतियों को फाड़कर पैरों तले रौंदने और सरेआम आग के हवाले किया गया। जन-जन के आराध्य और जीवन का मार्ग दिखाने वाले इस पावन ग्रंथ को भेदभाव फैलाने वाली किताब बताकर समाज को लड़ाने का खेल खेला गया। इस पूरे विवाद के दौरान पार्टी मुखिया अखिलेश यादव ने न तो ग्रंथ जलाने वालों को रोका और न ही उनके खिलाफ कोई कार्रवाई की। उल्टा भगवान राम के ग्रंथ को अपमानित करने वाले नेता को पार्टी में ऊंचा ओहदा दिया गया और विधान परिषद का टिकट देकर सम्मानित किया गया। इस खामोश समर्थन ने साबित कर दिया कि रामचरितमानस को गाली दिलवाना और हिंदू समाज को बांटना सपा के चुनावी एजेंडे का हिस्सा था। हिंदू धर्मग्रंथों का अपमान कराकर एक वर्ग को खुश करने की इस चाल ने अखिलेश यादव की असलियत सबके सामने ला दी।

कांवड़ यात्रा और हिंदू पर्वों पर सवाल: आस्था के आयोजनों को बताया फिजूलखर्ची
अखिलेश यादव ने शिवभक्तों की पवित्र कांवड़ यात्रा और हिंदू त्योहारों की सुरक्षा व व्यवस्था पर हमेशा सवाल खड़े करने की मानसिकता दिखाई। सावन के महीने में कांवड़ियों पर हेलीकॉप्टर से फूल बरसाने और उनके रास्तों पर साफ-सफाई व सुरक्षा देने को अखिलेश ने पैसों की बर्बादी बताया। भगवान शिव के भक्तों के लिए किए जाने वाले अच्छे सरकारी प्रबंधों को सांप्रदायिक तुष्टिकरण कहकर बदनाम करने का भरसक प्रयास किया गया। अयोध्या के भव्य दीपोत्सव और काशी की देव दीपावली जैसे पावन त्योहारों पर भी सपा नेताओं ने लगातार तंज कसे और खोट तलाशी। दूसरी तरफ अपनी सरकारों के दौर में जब खास आयोजनों पर सरकारी खजाना पानी की तरह बहाया जाता था, तब सपा के मुंह पर ताला लग जाता था। हिंदू आस्था के महापर्वों को प्रदेश के गौरव के रूप में देखने के बजाय उनका मजाक उड़ाना सपा के हिंदू विरोधी नजरिए को साबित करता है। आस्था के इन बड़े आयोजनों का विरोध करके अखिलेश यादव ने यह जता दिया कि वे शिवभक्तों और हिंदू समाज के उत्साह को पचा नहीं पाते।

काशी विश्वनाथ और मथुरा का विरोध: ऐतिहासिक तीर्थों के पुनरुद्धार पर साधा निशाना
काशी विश्वनाथ धाम और मथुरा में श्रीकृष्ण जन्मभूमि के कायाकल्प और कानूनी लड़ाई पर भी समाजवादी पार्टी ने हमेशा रुकावट डालने वाला रुख अपनाया। जब भव्य काशी विश्वनाथ कॉरिडोर बनने से बाबा विश्वनाथ के दरबार की अलौकिक तस्वीर सामने आई, तब सपा नेताओं ने इसे पुरानी धरोहर का नुकसान बताया। सनातन आस्था के सबसे पावन तीर्थों को उनका खोया हुआ गौरव लौटाने के काम को भी सपा ने गंदी राजनीति से जोड़कर श्रद्धालुओं को ठेस पहुंचाई। मथुरा में कान्हा की पावन जन्मभूमि और शाही ईदगाह के कानूनी सर्वे और अदालती प्रक्रिया का भी सपा ने शुरू से कड़ा विरोध किया। हिंदू समाज के ऐतिहासिक और धार्मिक अधिकारों का साथ देने के बजाय सपा हमेशा विवादित ढांचों की वकालत में आगे खड़ी दिखाई दी। हिंदू तीर्थों के जीर्णोद्धार और उनके विस्तार के हर कदम पर रोड़ा अटकाना समाजवादी पार्टी की पुरानी फितरत रही है। इस रुख ने पूरी तरह साफ कर दिया कि सनातन धर्म के महान तीर्थों का विकास और उनका भव्य रूप सपा को बिल्कुल हजम नहीं होता।

संभल जामा मस्जिद सर्वे पर भड़काऊ राजनीति: अदालती प्रक्रिया और पुरातात्विक साक्ष्यों का विरोध
संभल के ऐतिहासिक हरिहर मंदिर के दावे पर जब अदालत के आदेश से जामा मस्जिद का निष्पक्ष सर्वे शुरू हुआ, तब सपा नेताओं ने माहौल बिगाड़ दिया। संभल से सपा सांसद और पार्टी के प्रवक्ताओं ने अदालत के आदेश पर हो रही कानूनी जांच को ही गलत ठहराकर जनता को उकसाने का काम किया। सर्वे करने गई प्रशासनिक टीम और वकीलों पर पत्थर चलाने वाले और उपद्रव करने वाले तत्वों के साथ सपा नेता खुलेआम खड़े नजर आए। जमीन का सच और पुरातात्विक सबूत बाहर लाने की न्यायिक प्रक्रिया को रोकने के लिए सपा ने सड़क से लेकर संसद तक माहौल गरमाने की कोशिश की। अयोध्या, काशी और मथुरा की तरह संभल में भी सनातन समाज की कानूनी लड़ाई और ऐतिहासिक सच्चाई को दबाने की पूरी कोशिश की गई। कोर्ट के फैसले का सम्मान करने के बजाय तुष्टिकरण की आग भड़काकर तनाव पैदा करना सपा की सोची-समझी रणनीति का हिस्सा रहा। इस हंगामे ने दिखा दिया कि जब भी इतिहास की सच्चाई सामने आने लगती है, सपा फौरन तुष्टिकरण की ढाल बनकर खड़ी हो जाती है।

वक्फ संशोधन बिल का आक्रामक विरोध: मठ-मंदिरों और सार्वजनिक जमीनों की उपेक्षा
संसद में जब वक्फ संपत्तियों में मनमानी और अवैध कब्जों को रोकने के लिए नया वक्फ संशोधन बिल पेश हुआ, तब सपा ने सबसे ज्यादा हंगामा किया। अखिलेश यादव और उनकी पार्टी के सांसदों ने वक्फ बोर्ड की मनमानी शक्तियों पर लगाम लगाने वाले इस जरूरी कानून को पूरी तरह गलत ठहराया। देश भर में हिंदू मठों, प्राचीन मंदिरों, किसानों के खेतों और सरकारी जमीनों पर वक्फ के एकतरफा दावों की सपा ने पूरी तरह अनदेखी की। जमीनों के सही रिकॉर्ड और पारदर्शी जांच कराने का विरोध करके सपा ने सिर्फ कट्टरपंथी ताकतों के हितों की वकालत करने का काम किया। वक्फ की जमीन पर चल रही धांधली को रोकने और आम मुसलमानों व हिंदुओं की जमीन सुरक्षित करने के कानून पर सपा ने संसद ठप कर दी। कानून के राज और गरीबों की जमीन बचाने की बात करने के बजाय सपा ने फिर से सिर्फ एकतरफा तुष्टिकरण की राह चुनी। इस बिल का संसद में अंधा विरोध करके सपा ने जनता को बता दिया कि उनके लिए संविधान और न्याय से ऊपर सिर्फ उनका वोट बैंक है।

महाकुंभ और दीपोत्सव पर प्रहार: वैश्विक सांस्कृतिक गौरव का निरंतर उपहास
प्रयागराज में लगने वाले पावन महाकुंभ और अयोध्या के दीपोत्सव जैसे अलौकिक आयोजनों को भी सपा नेताओं ने कभी अपनी संस्कृति का हिस्सा नहीं माना। जब पूरी दुनिया से करोड़ों श्रद्धालु संगम की पावन धारा में डुबकी लगाने आते हैं, तब सपा के नेता इसे सिर्फ सरकारी पैसे की बर्बादी बताते हैं। महाकुंभ में आने वाले श्रद्धालुओं की सुविधा और सुरक्षा के लिए सड़कों, घाटों और पुलों के निर्माण को सपा ने चुनावी नौटंकी करार दिया। अयोध्या में सरयू किनारे जलने वाले लाखों दीयों की रोशनी का मजाक उड़ाते हुए सपा नेताओं ने इसे गरीबों के तेल का नुकसान बताया। जिन सांस्कृतिक उत्सवों से उत्तर प्रदेश का नाम पूरी दुनिया में चमकता है, उनसे सपा नेतृत्व को हमेशा तकलीफ और खीझ ही होती रही। हिंदू आस्था के इतने बड़े समागम पर गर्व करने के बजाय उसमें कमियां निकालना सपा की सनातन विरोधी सोच को साबित करता है। करोड़ों लोगों की आस्था के इस महापर्व का अपमान करके इस पार्टी ने दिखा दिया कि सनातन संस्कृति से उनका कोई भावनात्मक जुड़ाव नहीं है।

समाजवादी पार्टी के नेताओं की विषैली बयानबाजी: सनातन प्रतीकों का खुला तिरस्कार
समाजवादी पार्टी के बड़े नेताओं की तरफ से समय-समय पर हिंदू आस्था, वंदे मातरम और राष्ट्रीय मान-सम्मान को चोट पहुंचाने वाले बयान आते रहे। आजम खान, शफीकुर्रहमान बर्क और एसटी हसन जैसे नेताओं ने संसद से लेकर रैलियों तक सनातन मान्यताओं के खिलाफ खुलकर बयानबाजी की। देश की संसद में खड़े होकर भारत माता की जय और राष्ट्रगीत वंदे मातरम गाने से इनकार करना इन नेताओं की सियासत का हिस्सा बन चुका था। हिंदू संतों के खिलाफ अपमानजनक भाषा बोलना और आतंकियों व उपद्रवियों पर दर्ज मुकदमे वापस लेने की मांग करना इनकी पहचानी हुई शैली रही है। अयोध्या से लेकर काशी तक हिंदू समाज के हर सांस्कृतिक उत्थान का विरोध करके इन नेताओं ने हमेशा बहुसंख्यक समाज को नीचा दिखाने का प्रयास किया। पार्टी के बड़े नेताओं ने कभी भी अपने इन विवादित सांसदों और विधायकों के खिलाफ कोई अनुशासनात्मक कार्रवाई करने की हिम्मत नहीं दिखाई। यह संगठित रवैया इस बात का पक्का प्रमाण है कि समाजवादी पार्टी का पूरा ढांचा ही सनातन मान्यताओं को अपमानित करने की नींव पर टिका है।

तुष्टिकरण की नीति का स्याह सच: सनातन समाज के साथ निरंतर विश्वासघात
इतिहास गवाह है कि समाजवादी पार्टी की पूरी राजनीति बहुसंख्यक समाज की धार्मिक भावनाओं को दबाकर वोट बैंक जुटाने पर ही टिकी रही है। मुलायम सिंह के दौर में निहत्थे कारसेवकों पर गोलियां चलवाकर जिस तुष्टिकरण की शुरुआत हुई, उसे अखिलेश यादव ने संतों और ग्रंथों का अपमान कराकर आगे बढ़ाया। सिर्फ चुनाव जीतने के लिए भगवान राम के वजूद पर सवाल उठाने से लेकर भव्य मंदिर की प्राण-प्रतिष्ठा का बहिष्कार करने तक सपा का हर कदम एक जैसा रहा। हिंदू धर्मग्रंथों को फाड़ने वालों को पार्टी में इनाम देना और कांवड़ यात्रा जैसी पवित्र परंपराओं पर सवाल खड़े करना इनकी आदत बन चुकी है। परिवार की सत्ता और विशेष वोट बैंक के मोह में इस दल ने भारतीय संस्कृति के गौरवशाली प्रतीकों से हमेशा बैर मोल लिया है। निहत्थों पर गोलियां, संतों का अपमान और धार्मिक ग्रंथों का उपहास उड़ाने वाला यह पूरा काला चिट्ठा आज जनता के सामने साफ-साफ आ चुका है। हिंदू समाज ने इस दोहरे चरित्र और तुष्टिकरण की राजनीति को अच्छी तरह पहचान लिया है और इसे पूरी तरह खारिज करने का मन बना लिया है।

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