कांग्रेस और आम आदमी पार्टी के बीच सियासत की नूराकुश्ती चल रही है। दिल्ली में भारतीय जनता पार्टी के खिलाफ विपक्षी एकजुटता की बात आती है तो दोनों दल एक मंच पर नजर आते हैं। इंडिया गठबंधन के बैनर तले साथ खड़े होकर भाजपा को चुनौती देने का संकल्प भी जताते हैं, लेकिन पंजाब की धरती पर पहुंचते ही सियासत के समीकरण बदल जाते हैं। दोनों पार्टियां एक-दूसरे के खिलाफ चुनाव मैदान में उतर जाती हैं। आरोप-प्रत्यारोप के सिलसिले के बीच परस्पर हराने के लिए लड़ती नजर आती हैं। पंजाब विधानसभा का चुनाव से पहले कांग्रेस दोहरे मोर्चे पर मुश्किल में है। एक तो उसकी गठबंधन सहयोगी रही आप ही उसके खिलाफ है। दूसरा, पंजाब कांग्रेस में गुटबाजी और आपसी मतभेद चरम पर हैं। अब 2027 के पंजाब विधानसभा चुनाव की तैयारियां शुरू हो चुकी हैं। ऐसे में कांग्रेस के सामने चुनौती केवल भगवंत मान सरकार को घेरने की ही नहीं, बल्कि अपने संगठन को एकजुट रखने की भी है। राष्ट्रीय स्तर पर विपक्षी एकता का संदेश देने वाली कांग्रेस को पंजाब में अपने दम पर लड़ाई लड़नी है। यही विरोधाभास उसके राजनीतिक अभियान की सबसे बड़ी उलझनों में से एक है।
महत्वाकांक्षाओं और नेतृत्व के सवालों ने कांग्रेस की मुश्किलें बढ़ाई
कांग्रेस नेता राहुल गांधी चार नवंबर को संगरूर से पंजाब विधानसभा चुनाव के अभियान का बिगुल फूंकने जा रहे हैं। पंजाब कांग्रेस अध्यक्ष परगट सिंह ने इस कार्यक्रम की घोषणा की है और पार्टी इसे मिशन 2027 की दिशा में अहम शुरुआत बता रही है। लेकिन राहुल गांधी के सामने चुनौती सिर्फ एक बड़ी रैली करने या भगवंत मान सरकार पर हमला बोलने तक सीमित नहीं है। उन्हें उस पार्टी में चुनावी ऊर्जा भरनी है, जिसके भीतर लंबे समय से नेतृत्व, संगठन और राजनीतिक वर्चस्व को लेकर मतभेद सामने आते रहे हैं। चरणजीत सिंह चन्नी, सुखजिंदर सिंह रंधावा, प्रताप सिंह बाजवा और अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग जैसे वरिष्ठ नेताओं के बीच राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं और नेतृत्व के सवालों ने कांग्रेस की मुश्किलें बढ़ाई हैं। परगट सिंह को प्रदेश अध्यक्ष बनाए जाने और सचिन पायलट को पंजाब का प्रभारी नियुक्त किए जाने के बाद भी पार्टी में एकजुटता के बजाए दरारें और बढ़ी हैं। ऐसे में यह सवाल उठ रहा है कि क्या नेतृत्व में बदलाव से गुटबाजी की जड़ें भी खत्म हो गई हैं, या चार नवंबर की संगरूर रैली में एकता का प्रदर्शन करने के बाद पार्टी फिर पुराने अंतर्विरोधों में उलझ जाएगी?
संगरूर में भगवंत मान के गढ़ में कितना भेद पाएंगे राहुल गांधी
राहुल गांधी ने अपनी चुनावी मुहिम की शुरुआत के लिए संगरूर को चुना है। यह चयन अपनेआप में आम आदमी पार्टी के खिलाफ लड़ाई के खिलाफ हैं। दरअसल, संगरूर मुख्यमंत्री भगवंत मान का गृह क्षेत्र है और मालवा का वह इलाका है, जो पंजाब की चुनावी राजनीति में निर्णायक भूमिका निभाता है। कांग्रेस के लिए यहां से अभियान शुरू करने का अर्थ है सीधे उस क्षेत्र में चुनौती पेश करना, जहां आम आदमी पार्टी का मजबूत राजनीतिक आधार रहा है। कांग्रेस रणनीति तो बना रही है कि मालवा से चुनावी माहौल बनाए और कार्यकर्ताओं को सक्रिय कर भगवंत मान सरकार को घेरे, लेकिन इसमें सबसे अधिक चुनौती उसके पार्टी के अंदर से ही मिल रही है। वैसे भी किसी मुख्यमंत्री के गृह क्षेत्र में रैली कर देना और वहां के मतदाताओं का विश्वास जीत लेना दो अलग-अलग बातें हैं। राहुल गांधी को यह साबित करना होगा कि कांग्रेस केवल विरोध की राजनीति नहीं कर रही है।
आप से मुकाबला, गठबंधन की राजनीति का विरोधाभास
कांग्रेस और आम आदमी पार्टी के बीच पंजाब में मुकाबला इसलिए भी दिलचस्प है कि दोनों राष्ट्रीय राजनीति में भाजपा विरोधी खेमे का हिस्सा रही हैं, लेकिन राज्य में उनके हित टकराते हैं। पंजाब में आप की सरकार है और कांग्रेस उसे हटाकर सत्ता में लौटना चाहती है। ऐसे में कांग्रेस के लिए आप की नीतियों और सरकार के कामकाज की आलोचना करना स्वाभाविक है। लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर विपक्षी एकता की बात करते हुए राज्य में एक-दूसरे के खिलाफ आक्रामक प्रचार करना राजनीतिक विरोधाभास को जनता के बीच उजागर कर देता है। पंजाब में कांग्रेस को अपनी अलग राजनीतिक पहचान और संगठन के आधार पर चुनाव लड़ना है। उसकी चुनौती यह है कि वह भाजपा विरोधी राष्ट्रीय राजनीति और पंजाब में आप विरोधी चुनावी रणनीति का संदेश जनता के बीच नहीं रख पा रही है। मतदाता के सामने भ्रम की स्थिति बन गई है कि कांग्रेस की असली लड़ाई आखिर किससे है और वह सत्ता में आकर क्या बदलना चाहती है?
कांग्रेस में गुटबाजी की पुरानी बीमारी, नए नेतृत्व की परीक्षा
पंजाब कांग्रेस की सबसे बड़ी कमजोरी लंबे समय से चली आ रही गुटबाजी रही है। प्रदेश नेतृत्व को लेकर विवाद इतना बढ़ा कि पार्टी हाईकमान को संगठन में बदलाव करना पड़ा। अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग ने प्रदेश अध्यक्ष पद से इस्तीफा दिया और दो अक्टूबर को परगट सिंह को पंजाब कांग्रेस की कमान सौंपी गई। इससे पहले पांच सितंबर को सचिन पायलट को पंजाब का प्रभारी बनाया गया था। ये फैसले पार्टी के भीतर संतुलन बनाने और चुनाव से पहले संगठन को सक्रिय करने की कोशिश का हिस्सा हैं। लेकिन किसी नए नेता को जिम्मेदारी सौंपना और सभी वरिष्ठ नेताओं को एक साझा लक्ष्य के लिए साथ लाना अलग-अलग काम हैं। कांग्रेस के लिए असली कसौटी यह है कि क्या परगट सिंह सभी गुटों को साथ लेकर चल पाते हैं और क्या सचिन पायलट संगठनात्मक मतभेदों को चुनावी ताकत में बदलने का रास्ता निकाल पाते हैं? फिलहाल कांग्रेस की सियासत में यह बहुत मुश्किल नजर आता है।
चरणजीत चन्नी, रंधावा, बाजवा और वड़िंग के बीच संतुलन का अभाव
पूर्व मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी की मुख्यमंत्री पद पर वापसी की राजनीतिक महत्वाकांक्षा, सुखजिंदर सिंह रंधावा की संगठनात्मक भूमिका, प्रताप सिंह बाजवा की वरिष्ठता और अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग की अपनी राजनीतिक जमीन तलाशने के इन समीकरणों को साधना कांग्रेस नेतृत्व के लिए आसान नहीं है। पंजाब कांग्रेस में नेतृत्व को लेकर मतभेद सार्वजनिक रूप से सामने आ चुके हैं। पूर्व मुख्यमंत्री चन्नी के समर्थकों और वड़िंग खेमे के बीच खींचतान ने पार्टी के कार्यक्रमों तक को प्रभावित किया था। यदि वरिष्ठ नेता चुनाव अभियान को अपनी व्यक्तिगत राजनीतिक हैसियत बढ़ाने के मंच की तरह इस्तेमाल करेंगे, तो यह चुनाव भी कांग्रेस के हाथ से निकल सकता है। विधानसभा चुनाव में मुख्यमंत्री पद का चेहरा कौन होगा, टिकटों का बंटवारा कैसे होगा और किस नेता को कितनी जिम्मेदारी मिलेगी, ये ऐसे सवाल हैं जिनका समाधान कांग्रेस आलाकमान के अभी तो नहीं सूझ रहा है।

चंडीगढ़ में एक मंच पर आए नेता, पर क्या दिलों में भी है एकता?
कांग्रेस नेतृत्व हाल में एकजुटता दिखाने की कोशिश कर रहा है। 26 अक्टूबर को चंडीगढ़ में राहुल गांधी की रैली की तैयारियों और चुनावी रणनीति पर वरिष्ठ नेताओं के बीच बैठक हुई। पार्टी महासचिव के.सी. वेणुगोपाल ने दावा किया कि कांग्रेस के नेता मिलकर चुनाव लड़ेंगे। लेकिन भारतीय राजनीति में एक मंच पर खड़े होने की तस्वीर और जमीनी स्तर पर मिलकर काम करने की वास्तविकता के बीच अक्सर अंतर दिखाई देता है। कार्यकर्ताओं को यह भरोसा चाहिए कि उनके नेता एक-दूसरे के खिलाफ बयानबाजी नहीं करेंगे, उम्मीदवारों के चयन में गुटीय पक्षपात नहीं होगा और चुनाव के बाद सत्ता की दावेदारी को लेकर सार्वजनिक संघर्ष नहीं छिड़ेगा। परगट सिंह और सचिन पायलट के लिए यह जरूरी है कि एकजुटता केवल प्रेस कॉन्फ्रेंस और रैलियों तक सीमित न रहे, बल्कि बूथ स्तर पर भी दिखाई दे।
भगवंत मान सरकार को घेरने के लिए ठोस मुद्दे जरूरी
पंजाब में नशे की समस्या, कानून-व्यवस्था, किसानों की परेशानियों और युवाओं के रोजगार जैसे बड़े मुद्दे हैं। ये पंजाब के लिए अहम विषय हैं और इनके आधार पर सरकार को जवाबदेह ठहराना विपक्ष का अधिकार है। लेकिन कांग्रेस को समझना होगा कि केवल आरोप लगाने, नारेबाजी करने से चुनाव नहीं जीते जाते। कांग्रेस को बताना होगा कि नशे के कारोबार पर अंकुश लगाने के लिए उसकी ठोस योजना क्या है? युवाओं के लिए रोजगार के अवसर कैसे बढ़ाए जाएंगे, किसानों की आय और कृषि की चुनौतियों पर उसका रोडमैप क्या होगा? और कानून-व्यवस्था में सुधार के लिए वह कौन-से ठोस कदम उठाएगी? मतदाता को केवल यह सुनने में दिलचस्पी नहीं होगी कि वर्तमान सरकार विफल है; वह यह भी जानना चाहेगा कि कांग्रेस सत्ता में आई तो बदलाव किस तरह और कितने समय में दिखाई देगा।
गुटबाजी के चलते कहीं संगरूर रैली राजनीतिक शोशा न बन जाए
चार नवंबर को संगरूर में राहुल गांधी के सामने दोहरी चुनौती होगी। भगवंत मान सरकार को घेरना और अपनी पार्टी के नेताओं को एक साझा राजनीतिक दिशा देना। राहुल गांधी की संगरूर रैली कांग्रेस के लिए चुनावी अभियान का शुरुआती शक्ति-प्रदर्शन होगी। इसमें जुटने वाली भीड़, नेताओं की मौजूदगी और भाषणों की सुर्खियां बताएंगी कि पंजाब कांग्रेस में कितना दम है या फिर कितनी अधिक गुटबाजी है। रैली की सफलता का असली पैमाना केवल मंच के सामने जमा लोगों की संख्या नहीं होगा। क्या इससे कांग्रेस कार्यकर्ताओं में नई ऊर्जा पैदा होगी? क्या पार्टी के अलग-अलग गुट साझा अभियान में सक्रिय होंगे? क्या राहुल गांधी पंजाब के मतदाताओं के सामने ऐसा संदेश रख पाएंगे, जो उन्हें कांग्रेस की ओर आकर्षित करे? इन सवालों के जवाब ही बताएंगे कि यह रैली महज एक राजनीतिक आयोजन रही या राहुल गांधी की अन्य चुनावी रैलियों की तरह एक शोशा मात्र साबित हुई। क्योंकि अगर नेताओं की व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाएं पार्टी के सामूहिक लक्ष्य पर भारी पड़ती हैं, तो चुनावी अभियान की शुरुआत में पैदा हुआ उत्साह भी जल्द ठंडा पड़ सकता है।
आइए, अब जानते हैं कि राहुल गांधी और कांग्रेस नेताओं के खिलाफ आप के संयोजक अरविंद केजरीवाल कब-कब पर आरोप लगाने की नौटंकी कर चुके हैं…
नौटंकी नंबर -18
2026: राहुल के धरने से चिढ़ी आप बोली- यह मिलीभगत
आम आदमी पार्टी के नेताओं ने कांग्रेस पर बीजेपी के साथ मिलकर खेल खेलने का आरोप दोहराया है। दरअसल, कभी राहुल के सहयोगी रहे केजरीवाल को अब राहुल के धरने से पेट में दर्द हो गया। आप नेताओं का कहना है कि मोदी सरकार ने राहुल के नेतृत्व में उनके आवास के बाहर हुए प्रदर्शन पर तो तुरंत प्रतिक्रिया दी, लेकिन जंतर-मंतर पर सोनम वांगचुक और कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के कई सप्ताह तक चले आंदोलन की लगातार अनदेखी करती रही। सभी जानते हैं कि आम आदमी पार्टी कांग्रेस का विरोध करके ही बनी थी और दिल्ली में उसने कांग्रेस को ही सत्ता से बेदखल किया था। लेकिन मौकापरस्त केजरीवाल पहली बार 2013 में दिल्ली के मुख्यमंत्री कांग्रेस के समर्थन से ही बने थे। अब AAP और कांग्रेस के बीच राजनीतिक दूरी दिखावे के लिए फिर से बढ़ी है। जंतर-मंतर के ताजा घटनाक्रम में कांग्रेस और AAP के बीच दूरी ही बनी रही। दोनों का अलग-अलग विरोध ही सामना आया।
नौटंकी नंबर -17
2025 : National Herald से गांधी परिवार पर फिर हमला
दिल्ली विधानसभा चुनाव के दौरान कांग्रेस और राहुल गांधी पर केजरीवाल का हमला फिर तीखा हुआ। केजरीवाल ने कहा कि लोग पूछ रहे हैं कि राहुल गांधी जी “राजमहल” पर चुप क्यों है? राहुल ने दिल्ली में पूरा बीजेपी वालों का भाषण दोहराया है। राहुल गांधी ने भी शीशमहल और शराब घोटाले पर केजरीवाल को घेरा। AAP ने राहुल गांधी को ‘dishonest’ नेताओं वाले पोस्टर में शामिल किया, जिस पर कांग्रेस ने चुनाव आयोग में शिकायत की। इसके अलावा केजरीवाल ने National Herald मामले को उठाते हुए राहुल गांधी और गांधी परिवार पर सवाल खड़े किए तथा पूछा कि यदि मामला इतना गंभीर है तो गांधी परिवार के बड़े नेता जेल क्यों नहीं गए।
नौटंकी नंबर -16
2025: कांग्रेस अपने विधायकों को थोक में बीजेपी को बेचती है
अरविंद केजरीवाल ने 2027 के गोवा विधानसभा चुनावों के लिए कांग्रेस के साथ किसी भी गठबंधन से साफ इनकार किया है। उन्होंने कांग्रेस पर गोवा के लोगों को धोखा देने और उसके विधायकों के थोक में भाजपा में शामिल होने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि 2017 से 2019 के बीच 13 कांग्रेस विधायक BJP में चले गए थे। इसके बाद, 2022 में 10 और कांग्रेस विधायक BJP में शामिल हो गए। केजरीवाल ने पूछा कि क्या कांग्रेस यह भरोसा दे सकती है कि चुनाव जीतने के बाद कोई भी विधायक BJP में नहीं जाएगा।
#WATCH | Mayem | AAP National Convenor Arvind Kejriwal says, “…There will be no alliance with the Congress party under any circumstance…Congress deceived the people of Goa the most. Between 2017 and 2019, 13 Congress MLAs joined the BJP, and in 2022, 10 more Congress MLAs… pic.twitter.com/F127WJU9rH
— ANI (@ANI) October 4, 2025
नौटंकी नंबर -15
2025: कांग्रेस-भाजपा के बीच ‘जुगलबंदी’ का आरोप
आप संयोजक केजरीवाल ने आरोप लगाया कि कांग्रेस और भाजपा के बीच राजनीतिक ‘जुगलबंदी’ है और दिल्ली चुनाव इस कथित मिलीभगत को उजागर करेगा। बाद में उन्होंने AAP नेताओं पर हुई कार्रवाई को भी इसी कथित कांग्रेस-BJP सहयोग से जोड़ने की कोशिश की।
नौटंकी नंबर -14
2024: जिस कांग्रेस पर हमला किया, केजरी का उसी से गठबंधन
इस वर्ष केजरीवाल की कांग्रेस-विरोधी राजनीति में सबसे बड़ा नाटकीय मोड़ आया। एक-दूसरे पर जबर्दस्त आरोप लगाने वाले AAP और कांग्रेस ने INDIA गठबंधन के तहत दिल्ली में लोकसभा चुनाव साथ लड़ा। यहां तक कि केजरीवाल ने कांग्रेस उम्मीदवारों के लिए प्रचार भी किया। यानी जिस कांग्रेस को वह वर्षों तक भ्रष्टाचार और राजनीतिक मिलीभगत का प्रतीक बताते रहे, वही 2024 में भाजपा के खिलाफ उनकी राजनीतिक सहयोगी बन गई।
नौटंकी नंबर -13
2023: कांग्रेस पर भाजपा से ‘डील’ का आरोप
दिल्ली के अधिकारों से जुड़े केंद्र के अध्यादेश के विवाद के दौरान आम आदमी पार्टी और कांग्रेस के संबंधों में तनाव बढ़ गया। केजरीवाल और उनकी पार्टी ने कांग्रेस पर भाजपा के साथ ‘डील’ करने का आरोप लगाया और स्पष्ट रुख अपनाने का दबाव बनाया। यह वह दौर था जब INDIA गठबंधन बनने से पहले विपक्षी एकता के भीतर ही कांग्रेस और AAP के बीच अविश्वास दिखाई दे रहा था।
नौटंकी नंबर -12
2023: मानहानि मामले पर केजरी का राहुल को समर्थन
दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने अपने रुख में बदलाव दिखाते हुए मानहानि के एक मामले में दो साल की जेल की सजा पाए कांग्रेस नेता राहुल गांधी का खुले तौर पर समर्थन किया। सीएम ने आरोप लगाया कि गैर-भाजपा नेताओं और पार्टियों को मुकदमा चलाकर “खत्म” करने की साजिश रची जा रही है। कांग्रेस और आम आदमी पार्टी ने अतीत में विभिन्न मुद्दों पर एक-दूसरे का पक्ष लेने से परहेज किया है। हालांकि, आम आदमी पार्टी द्वारा राहुल गांधी को दिया गया समर्थन ऐसे समय में आया है जब केजरीवाल अगले साल होने वाले लोकसभा चुनावों से पहले “समान विचारधारा वाली” पार्टियों का गठबंधन बनाने की कोशिश कर रहे हैं। गौरतलब है कि गुजरात के सूरत की एक अदालत द्वारा राहुल गांधी को उनके 2019 के “मोदी उपनाम” वाले बयान के लिए मानहानि का दोषी ठहराए जाने के बाद, आम आदमी पार्टी ने कांग्रेस के प्रति अपने रुख में नरमी के संकेत दिए हैं।
नौटंकी नंबर -11
2022: राहुल की नेतृत्व क्षमता पर केजरी का राजनीतिक हमला
राहुल गांधी द्वारा केजरीवाल को आतंकवाद से जोड़कर हमला किए जाने के बाद केजरीवाल ने पलटवार किया। उन्होंने राहुल गांधी पर निशाना साधते हुए कहा कि जब कांग्रेस उन्हें आतंकवादी कहती है तो कांग्रेस स्वयं लोगों को ‘terrorise’ कर रही है। इसी वर्ष केजरीवाल ने राहुल गांधी पर तंज कसते हुए कहा था कि कांग्रेस को कमजोर करने के लिए उन्हें उनकी जरूरत नहीं है- “Isn’t Rahul Gandhi enough?” यह राहुल गांधी की नेतृत्व क्षमता पर उनका सीधा राजनीतिक हमला था। राहुल गांधी ने जब भ्रष्टाचार और प्रदूषण पर केजरीवाल को घेरा तो इस बयान के कुछ देर बाद ही केजरीवाल ने एक्स पर लिखा, “आज राहुल गांधी जी दिल्ली आए। उन्होंने मुझे गालियां दीं। पर मैं उनके बयानों पर कोई टिप्पणी नहीं करूंगा। उनकी लड़ाई कांग्रेस बचाने की है, मेरी लड़ाई देश बचाने की है।”

नौटंकी नंबर -10
2021: कांग्रेस को बताया भाजपा की ‘B-Team’
दिल्ली की राजनीति में केजरीवाल ने कांग्रेस को भाजपा की ‘B-Team’ तक कह दिया। उनका आरोप था कि कांग्रेस कमजोर हो चुकी है और उसकी राजनीति अंततः भाजपा को फायदा पहुंचाती है। दूसरी ओर कांग्रेस नेता संदीप दीक्षित ने आम आदमी पार्टी को BJP की ‘B’ टीम बता दिया। संदीप दीक्षित ने कांग्रेस पर पुराने आरोपों को लेकर अरविंद केजरीवाल की जमकर आलोचना की।
नौटंकी नंबर -9
2019: मोदी की वापसी के लिए राहुल को जिम्मेदार ठहराया
AAP-कांग्रेस गठबंधन की बातचीत विफल होने के बाद केजरीवाल ने बेहद तीखा बयान दिया। उन्होंने कहा कि अगर केंद्र की सत्ता में पीएम नरेंद्र मोदी और अमित शाह दोबारा आते हैं तो इसके लिए राहुल गांधी पूरी तरह जिम्मेदार होंगे। उनका आरोप था कि कांग्रेस विपक्षी वोटों को विभाजित करके भाजपा की मदद कर रही है।
नौटंकी नंबर -8
2018: घोटालेबाज कांग्रेस को सत्ता से बेदखल किया
दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने “राफेल घोटाले” को लेकर केंद्र सरकार पर हमला बोला। पूर्व केंद्रीय मंत्री यशवंत सिन्हा और भाजपा के असंतुष्ट सांसद शत्रुघ्न सिन्हा ने भी नरेंद्र मोदी सरकार की आलोचना में उनका साथ दिया। आप के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल ने आरोप लगाया कि भाजपा और कांग्रेस दोनों पार्टियां “घोटालेबाज” हैं। केजरीवाल ने कहा कि लगभग पांच साल पहले लोगों ने भ्रष्टाचार में लिप्त कांग्रेस को सत्ता से बेदखल कर दिया था।
नौटंकी नंबर -7
2017: कांग्रेस और अकालियों ने मिलकर लूटा पंजाब, माफी मांगी
पंजाब चुनाव के दौरान केजरीवाल ने आरोप लगाया कि कांग्रेस और अकाली दल ने मिलकर पंजाब को वर्षों तक ‘लूटा’ है। राहुल गांधी पर भी आरोप लगाया कि उन्होंने बिक्रम सिंह मजीठिया के कथित ड्रग कारोबार का मुद्दा पर्याप्त रूप से नहीं उठाया। इन आरोपों के बाद बिक्रम सिंह मजीठिया ने अरविंद केजरीवाल पर मानहानि का मुकदमा दर्ज कराया था। मार्च 2018 में अरविंद केजरीवाल ने मजीठिया पर लगाए गए ड्रग्स तस्करी के आरोपों को निराधार मानते हुए उनसे लिखित में अदालत में माफी मांग ली थी, जिसके बाद यह मामला बंद हुआ।
नौटंकी नंबर -6
2016: राहुल को मोदी के खिलाफ सबूत लाने की चुनौती
नोटबंदी के बाद राहुल गांधी द्वारा नरेंद्र मोदी पर व्यक्तिगत भ्रष्टाचार के आरोप लगाए जाने पर केजरीवाल ने राहुल गांधी को चुनौती दी कि अगर उनके पास प्रधानमंत्री के खिलाफ सबूत हैं तो उन्हें संसद के बाहर सार्वजनिक करें। उन्होंने राहुल की राजनीतिक क्षमता पर सवाल उठाते हुए कहा कि उनमें मोदी को बेनकाब करने का साहस नहीं है।
नौटंकी नंबर -5
2014: केजरीवाल ने राहुल को ‘भ्रष्ट नेताओं’ की सूची में रखा
2014 के लोकसभा चुनाव से पहले केजरीवाल ने कथित भ्रष्ट नेताओं की सूची जारी की, जिसमें राहुल गांधी का नाम भी शामिल था। उन्होंने कांग्रेस और भाजपा दोनों पर भ्रष्टाचार और वंशवादी राजनीति के आरोप लगाए। इसी दौर में उन्होंने राहुल गांधी की चुनावी ब्रांडिंग और प्रचार पर होने वाले खर्च को लेकर भी सवाल उठाए। इसी वर्ष केजरीवाल सरकार ने KG Basin गैस कीमत विवाद में तत्कालीन केंद्रीय मंत्रियों वीरप्पा मोइली और मुरली देवड़ा तथा रिलायंस इंडस्ट्रीज के खिलाफ FIR की दिशा में कदम उठाया।

नौटंकी नंबर -4
2013: शीला सरकार की बिजली कंपनियों से सांठगांठ
दिल्ली में शीला दीक्षित सरकार के खिलाफ भी केजरीवाल ने बिजली दरों और बिजली वितरण कंपनियों के बीच कथित मिलीभगत का मुद्दा उठाया और कांग्रेस सरकार पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाए। अन्ना आंदोलन से निकलकर सक्रिय राजनीति में आने के दौर में केजरीवाल ने कांग्रेस के कई केंद्रीय मंत्रियों पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाते हुए उनके खिलाफ FIR दर्ज करने और जांच की मांग की। इस सूची में शरद पवार, पी. चिदंबरम, कपिल सिब्बल, कमलनाथ, पवन बंसल और सुशील कुमार शिंदे जैसे नाम शामिल थे।
नौटंकी नंबर -3
2012: कोयला घोटाले में मनमोहन सरकार पर सबसे बड़ा हमला
2012 में केजरीवाल का मनमोहन सिंह सरकार के खिलाफ हमला अपने चरम पर पहुंचा। कोयला ब्लॉक आवंटन विवाद को लेकर उन्होंने कांग्रेस पर देश को लूटने का आरोप लगाया और कथित ₹1.86 लाख करोड़ के नुकसान का मुद्दा उठाया। उन्होंने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के आवास के घेराव का भी आह्वान किया।

नौटंकी नंबर -2
2012 – रॉबर्ट वाड्रा और DLF कनेक्शन का आरोप
चंद रोज पहले अपनी राजनीतिक पार्टी बनाने बनाने वाले अरविंद केजरीवाल और प्रशांत भूषण ने सोनिया गांधी के दामाद राबर्ट वाड्रा पर सैकड़ों करोड़ रुपए की रिश्वत लेने के आरोप लगाए। केजरीवाल ने सोनिया गांधी के दामाद रॉबर्ट वाड्रा पर DLF से 65 करोड़ रुपये के ब्याज-मुक्त ऋण और संपत्ति लेनदेन में अनुचित लाभ का आरोप लगाया। उन्होंने वाड्रा और तत्कालीन कांग्रेस सरकारों के बीच कथित राजनीतिक-व्यावसायिक संबंधों पर सवाल उठाए। वाड्रा-DLF विवाद को आगे बढ़ाते हुए केजरीवाल ने तत्कालीन हरियाणा सरकार पर भी आरोप लगाए और यहां तक कहा कि राज्य सरकार DLF के ‘एजेंट’ की तरह काम कर रही है।

नौटंकी नंबर -1
2010 – कॉमनवेल्थ गेम्स घोटाले को लेकर कांग्रेस पर हमला
अरविंद केजरीवाल ने कॉमनवेल्थ गेम्स में घोटाले को लेकर कांग्रेस पर हमला बोला। गेम्स से जुड़ी कथित भ्रष्टाचार और वित्तीय अनियमितताओं को लेकर केजरीवाल ने विस्तृत शिकायत पुलिस के सामने रखी और स्वतंत्र जांच की मांग की। उन्होंने कहा कि आयोजन से जुड़े भ्रष्टाचार पर तत्कालीन सरकार की जवाबदेही होनी चाहिए। बाद में केजरीवाल की सिफारिश पर कॉमनवेल्थ खेलों के दौरान हुए कथित घोटालों के मामले में दिल्ली सरकारी की भ्रष्टाचार निरोधक शाखा (एसीबी) ने एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की।









