सर्दियों की दस्तक के साथ ही पंजाब के खेतों से उठने वाला जहरीला धुआं एक बार फिर समूचे उत्तर भारत के लिए आफत बन गया है। पराली प्रबंधन पर आम आदमी पार्टी की भगवंत मान सरकार के दावों की कलई पूरी तरह खुल चुकी है। सुप्रीम कोर्ट की लगातार सख्त फटकार और वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग (सीएक्यूएम) की जमीनी निगरानी ने यह साबित कर दिया है कि पंजाब सरकार केवल कागजी विज्ञापनों और बैठकों तक सीमित है। सत्ता में आने से पहले अरविंद केजरीवाल ने दावा किया था कि एक साल में पराली का समाधान निकाल लेंगे, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि न तो किसानों तक समय पर मशीनें पहुंचीं और न ही वित्तीय सहायता। नतीजतन, सीमावर्ती जिलों से लेकर दिल्ली-एनसीआर तक की हवा में सांस लेना दूभर होता जा रहा है।
अदालती फटकार और मान सरकार की प्रशासनिक नाकामी
सुप्रीम कोर्ट ने पंजाब प्रशासन की लापरवाही पर बेहद कड़ा रुख अपनाया है। अदालत ने स्पष्ट रेखांकित किया है कि जमीनी स्तर पर पराली प्रबंधन के लिए आवश्यक मशीनरी का भारी अभाव बना हुआ है और छोटे किसानों को कोई ठोस वित्तीय प्रोत्साहन नहीं मिल सका। नियमों की धज्जियां उड़ाने वालों पर केवल दिखावे की कार्रवाई की जा रही है। पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय और सीएक्यूएम द्वारा अक्टूबर 2026 में विशेष ‘फ्लाइंग स्क्वाड’ तैनात कर जमीनी निगरानी बढ़ाने के निर्देश देने पड़े हैं, क्योंकि राज्य की अपनी प्रवर्तन एजेंसियां पूरी तरह निष्क्रिय साबित हुई हैं।
केजरीवाल जी ने कहा था, एक साल दे दो, पंजाब में पराली जलना बंद करवा दूंगा। साल बीतते गए। किसान मदद का इंतजार करते रहे और ‘आप’दा सरकार उन्हें पराली जलाने की मजबूरी से निकालने के बजाय उनके हाल पर छोड़कर बैठी रही।
तरनतारन में फिर पराली जलनी शुरू हो गई है।
केंद्र सरकार ने पैसा दिया, मशीनें दीं, सब्सिडी दी, फिर भी भगवंत मान जी और केजरीवाल जी की ‘आप’दा सरकार जमीन पर व्यवस्था तक नहीं कर सकी। संसाधन पूरे मिले, लेकिन नीयत, इच्छाशक्ति और जवाबदेही तीनों फेल हैं।
दिल्ली की जनता ने केजरीवाल जी को नकार दिया। क्या अब वो उस करारी हार की खीझ दिल्लीवालों पर निकाल रहे हैं?
हम दिल्ली की हवा सुधारने के लिए दिन-रात नए समाधान जमीन पर उतार रहे हैं। उधर पंजाब में पराली की आग ने ही ‘आप’दा सरकार की पोल खोल दी है। न तैयारी है, न समाधान। बस झूठे वादे और किसानों के साथ धोखा।
— Rekha Gupta (@gupta_rekha) October 6, 2026
मंडी संकट और बेबस किसानों पर दोहरी मार
पंजाब का किसान आज आम आदमी पार्टी की बदइंतजामी के कारण दोहरे संकट में फंसा हुआ है। एक तरफ मंडियों में धान की सुस्त खरीद और धीमी उठान प्रक्रिया के चलते किसान हफ्ते भर से अपनी उपज लेकर खुले आसमान के नीचे बैठने को मजबूर हैं। दूसरी ओर, गेहूं की अगली बुवाई का समय सिर पर होने के कारण किसान खेत खाली करने की जल्दी में हैं। मान सरकार न तो मंडियों की अव्यवस्था संभाल पा रही है और न ही खेतों से पराली निस्तारण के लिए बेलर और हैप्पी सीडर जैसी मशीनों का प्रबंध कर सकी है। अपनी नाकामियों को छुपाने के लिए मान सरकार सारा ठीकरा केंद्र और पड़ोसी राज्यों पर फोड़ने का पुराना पैंतरा आजमा रही है।
फाज़िल्का की अनाज मंडी में तीन फीट पानी और उसमें डूबी किसानों की फसल! यही है AAP सरकार के बदलाव के दावों की जमीनी हकीकत?
दिल्ली में अपनी नाकामी के लिए चर्चित रही AAP अब पंजाब में भी जनता की उम्मीदों पर खरी उतरती नहीं दिख रही। मुख्यमंत्री भगवंत मान और अरविंद केजरीवाल को समझना होगा कि सरकार चलाना केवल प्रचार करना नहीं, बल्कि संकट में जनता के साथ खड़ा होना है।
अन्नदाता की मेहनत बर्बाद हो रही है, अब जवाबदेही कौन लेगा? पंजाब के किसान और जनता हिसाब जरूर मांगेंगे!@ArvindKejriwal @BhagwantMann
— सुभाष जैन (@subh_09910468) October 16, 2026
प्रतिबंध के बावजूद जलते खेत और बढ़ता वायु संकट
पंजाब में पराली जलाने पर पूर्ण प्रतिबंध के बावजूद धान की कटाई शुरू होते ही खेतों में आग लगाने की घटनाएं धड़ल्ले से सामने आने लगी हैं। राज्य प्रशासन के दावों और सेटेलाइट मॉनिटरिंग की तमाम कोशिशों के बाद भी जमीनी स्तर पर व्यवस्था न होने के कारण किसान पराली जलाने को मजबूर हैं, जिससे एक बार फिर समूचे उत्तर भारत में वायु प्रदूषण का खतरा गहराने लगा है। सरकारी आदेश केवल कागजों तक सीमित हैं और जमीन पर निगरानी तंत्र पूरी तरह निष्प्रभावी साबित हुआ है।
पंजाब में पराली जलाने पर पूर्ण प्रतिबंध के बावजूद धान की कटाई शुरू होते ही खेतों में आग लगाने की घटनाएं सामने आने लगी हैं। राज्य प्रशासन और सैटेलाइट मॉनिटरिंग की तमाम कोशिशों के बाद भी जमीनी स्तर पर किसान पराली जलाने को मजबूर हैं, जिससे एक बार फिर उत्तर भारत में वायु प्रदूषण का खतरा गहराने लगा है।
#Punjab #StubbleBurning #ParaliBurning #PunjabFarmers #AirPollution #PollutionCrisis #PunjabNews #KhabarFast #KhabarFastDigital— KHABAR FAST (@Khabarfast) October 14, 2026
आंकड़ों में बढ़ता संकट और उपग्रह निगरानी से बचने का खेल
धान की कटाई तेज होते ही पंजाब में आगजनी के मामलों में विस्फोटक उछाल आया है। राज्य में 24 घंटे के भीतर पराली जलाने की 123 नई घटनाएं दर्ज की गईं, जिसके साथ ही इस सीजन में कुल मामलों की संख्या तेजी से बढ़कर 343 पर पहुंच गई है। वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग (सीएक्यूएम) और इसरो प्रोटोकॉल के आंकड़ों के अनुसार, पंजाब में अब तक का आंकड़ा पिछले वर्ष की इसी अवधि (208 मामले) को पार कर चुका है। उपग्रह (नासा और इसरो) की नियमित निगरानी से बचने के लिए दोपहर 3 बजे के बाद पराली जलाने का ट्रेंड देखा गया है, जिसे पकड़ने के लिए केंद्रीय उड़नदस्तों ने 191 खेतों का निरीक्षण किया और 68 स्थानों पर सीधे तौर पर पराली जलती पाई गई। निगरानी बढ़ाने के बावजूद एक ही दिन में 123 मामलों का सामने आना दर्शाता है कि स्थानीय प्रशासन की लापरवाही के कारण जमीनी स्तर पर कोई डर नहीं बचा है।
पंजाब में पराली का संकट बढ़ा, एक दिन में 51 मामले; दिल्ली-NCR की हवा पर भी चिंता!
“पंजाब में धान की कटाई के साथ पराली जलाने के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं! 13 अक्टूबर को राज्य में पराली जलाने की 51 नई घटनाएं दर्ज की गईं, जिसके बाद इस सीजन में कुल आंकड़ा 174 पहुंच गया। सबसे ज्यादा प्रभावित जिलों में तरनतारन और अमृतसर शामिल हैं। तरनतारन में 21 और अमृतसर में 16 मामले सामने आए। वहीं, केंद्र सरकार ने अब दोपहर 3 बजे के बाद भी खेतों की निगरानी बढ़ाने के निर्देश दिए हैं, ताकि पराली जलाने की घटनाएं पकड़ में आ सकें। सवाल है—क्या इस बार पराली का धुआं दिल्ली-NCR की हवा को फिर बिगाड़ेगा?”
#ParaliBurning #AirPollution #DelhiNCR #Amritsar #Lokgroundtalksmediaa
🌐 Find us on:
IG: https://t.co/FpAhFl5CKc
YT: https://t.co/JDgZMRnQD2
FB: https://t.co/jJwTvLu5Mb
X: https://t.co/OFQEeUpv7W
Th: https://t.co/nAJjMCC1ho— lokgroundtalksmediaa (@lokgroundtalks) October 15, 2026
हरियाणा मॉडल बनाम पंजाब: नीति और नीयत का फर्क
एक ही भौगोलिक क्षेत्र और जलवायु परिस्थितियों के बावजूद पड़ोसी राज्य हरियाणा में भारतीय जनता पार्टी की सरकार ने पराली पर प्रभावी नियंत्रण हासिल करके दिखाया है। हरियाणा सरकार किसानों को पराली न जलाने पर ₹1,000 प्रति एकड़ की सीधी नकद प्रोत्साहन राशि (डीबीटी) दे रही है, बेलर मशीनों की क्लस्टर स्तर पर उपलब्धता सुनिश्चित कर रही है और बायोमास व 2जी इथेनॉल प्लांट्स के जरिए पराली की खरीद करवा रही है। इसके विपरीत, पंजाब की मान सरकार किसानों को नकद सहायता देने का अपना पुराना चुनावी वादा भूल चुकी है और किसानों को उनके हाल पर बेसहारा छोड़ दिया है।
केजरीवाल का यू-टर्न: चुनाव से पहले पंजाब को कोसते थे, अब जिम्मेदारी से भागे
दिल्ली के मुख्यमंत्री रहते हुए अरविंद केजरीवाल हर वर्ष अक्टूबर-नवंबर में प्रेस कॉन्फ्रेंस कर दिल्ली के प्रदूषण का पूरा ठीकरा पंजाब के सिर फोड़ते थे। वे उपग्रह के चित्र दिखाकर दावा करते थे कि दिल्ली का दम पंजाब की पराली से घुट रहा है और तत्कालीन सरकारों को अक्षम बताते हुए घोषणा करते थे कि यदि पंजाब में उनकी सरकार बनी तो वे एक वर्ष के भीतर पराली जलाना पूरी तरह बंद करवा देंगे। लेकिन जैसे ही पंजाब में आम आदमी पार्टी की सरकार बनी, केजरीवाल के सुर रातों-रात बदल गए और वे इसे राज्यों की नहीं बल्कि केंद्र की सामूहिक जिम्मेदारी बताकर पल्ला झाड़ने लगे। चुनावी लाभ के लिए जनता को गुमराह करने और सत्ता मिलते ही अपनी जवाबदेही से भागने का यह सबसे बड़ा प्रमाण है।
पंजाब में AAP की सरकार बनने के पहले दिल्ली प्रदूषण के लिये पंजाब की पराली जिम्मेदार थी, तब केजरीवाल को पराली से सोना, कोयला, बिजली सब बनाने आता था।
अब सरकार बन गई तो पराली की घटनाएं क्यों?
क्या अब सब भूल गये?? https://t.co/8dPVwxki72— Sudhir Mishra 🇮🇳 (@Sudhir_mish) November 2, 2022
आंकड़ों में पंजाब का धुआं: हरियाणा से कई गुना अधिक मामले
सरकारी और सेटेलाइट आंकड़े इस बात की पुष्टि करते हैं कि उत्तर भारत की जहरीली हवा का सबसे बड़ा केंद्र पंजाब के अनियंत्रित खेत हैं। देश के सात राज्यों में दर्ज कुल 1,073 मामलों में से अकेले पंजाब में आगजनी की घटनाएं 343 तक पहुंच चुकी हैं। जहां पड़ोसी राज्य हरियाणा में सख्त निगरानी और वित्तीय प्रोत्साहन के चलते मामले न्यूनतम स्तर पर हैं, वहीं पंजाब में केवल एक दिन में 123 नए मामले दर्ज होना प्रशासनिक विफलता का जीता-जागता सबूत है। केंद्रीय टीमों के दौरे और 94 नोडल अधिकारियों को कारण बताओ नोटिस जारी होने के बावजूद राज्य के 18 जिलों में पराली धड़ल्ले से जलाई जा रही है। केजरीवाल सरकार जो पहले इन्हीं आंकड़ों को लहराकर पिछली सरकारों को कोसती थी, आज उसी पंजाब में सत्ता संभालते ही जमीनी आंकड़ों पर पर्दा डालने और अपनी विफलता को छिपाने में जुटी है।
बायो-डीकंपोजर का झूठा प्रचार: करोड़ों विज्ञापनों में उड़ाए, जमीन पर शून्य
दिल्ली की सत्ता में रहते हुए आम आदमी पार्टी ने ‘पूसा बायो-डीकंपोजर’ को पराली का अंतिम और जादुई समाधान बताकर खूब वाहवाही लूटी थी। वास्तविकता यह रही कि डीकंपोजर के वास्तविक घोल और छिड़काव पर केवल कुछ लाख रुपये खर्च किए गए, जबकि इसके प्रचार-प्रसार और विज्ञापनों पर जनता के 40 से 50 करोड़ रुपये पानी की तरह बहा दिए गए। जब पंजाब में आम आदमी पार्टी की पूर्ण बहुमत की सरकार बनी, तो इस जादुई फॉर्मूले को पंजाब के करोड़ों एकड़ खेतों में लागू क्यों नहीं किया गया? विज्ञापनों का यह भ्रमजाल अब पूरी तरह टूट चुका है और साबित हो गया है कि यह केवल चुनावी स्टंट था।
केंद्र का भरपूर फंड दबाया, 40 प्रतिशत मशीनें कबाड़ में तब्दील
केंद्र की मोदी सरकार ने फसल अवशेष प्रबंधन (सीआरएम) योजना के तहत पंजाब को अब तक 2,000 करोड़ रुपये से अधिक की भारी धनराशि आवंटित की है। इसके बावजूद, मान सरकार उपयोगिता प्रमाण पत्र (यूसी) समय पर जमा नहीं कर रही है, जिससे प्रशासनिक सुस्ती उजागर होती है। केंद्रीय कृषि मंत्रालय के ताजा सर्वेक्षण में यह चौंकाने वाला खुलासा हुआ है कि पंजाब में उपलब्ध कुल सीआरएम मशीनों में से लगभग 40 प्रतिशत मशीनें रखरखाव के अभाव में गैर-कार्यशील या कबाड़ पड़ी हैं। नई मशीनों की खरीद के विज्ञापनों में व्यस्त मान सरकार ने पुरानी मशीनों की मरम्मत और कस्टम हायरिंग सेंटर्स की सक्रियता पर रत्ती भर भी ध्यान नहीं दिया।
औद्योगिक सप्लाई चेन फेल: बायोमास और इथेनॉल प्लांट्स खाली
पराली को प्रदूषण के बजाय किसानों की आय का जरिया बनाने की दिशा में मान सरकार पूरी तरह विफल रही है। थर्मल पावर प्लांट्स में पराली आधारित पैलेट्स के अनिवार्य सह-दहन (को-फायरिंग) और 2जी बायो-इथेनॉल व कंप्रेस्ड बायो-गैस (सीबीजी) प्लांट्स तक पराली पहुंचाने के लिए सरकार कोई सुदृढ़ सप्लाई चेन नहीं बना सकी। पड़ोसी राज्यों ने पराली को एक मूल्यवान उत्पाद बना दिया, जबकि पंजाब में प्रशासनिक इच्छाशक्ति के अभाव में करोड़ों टन पराली खेतों में ही फंसी रह गई।
डीजल और परिचालन लागत की मार से थमी मशीनें
कागजों पर मशीनें बांटने का ढिंढोरा पीटने वाली मान सरकार यह भूल गई कि सुपर सीडर और भारी बेलर चलाने के लिए 55 से 65 हॉर्सपावर के बड़े ट्रैक्टर और भारी मात्रा में डीजल की जरूरत होती है। पंजाब के 70 प्रतिशत से अधिक छोटे और सीमांत किसानों के पास इतने भारी ट्रैक्टर नहीं हैं। निजी ऑपरेटर प्रति एकड़ भारी किराया और डीजल खर्च मांगते हैं। सरकार द्वारा परिचालन लागत या डीजल पर कोई राहत राशि न दिए जाने के कारण साधनविहीन किसान इन आधुनिक मशीनों का लाभ उठाने से वंचित रह गए।
Total Punjab Bandh today; all opposition political parties, farmers’ unions, student bodies and trade unions have supported the call ! https://t.co/cpNKUNkEsY
— Ramandeep Singh Mann (@ramanmann1974) October 15, 2026
फसल विविधीकरण की नीति शून्य, पानी और जमीन पर संकट
केंद्र सरकार दलहन, तिलहन और मक्का की खेती को बढ़ावा देकर पानी बचाने और पराली की समस्या को जड़ से खत्म करने के लिए प्रोत्साहन योजनाएं चला रही है। इसके उलट मान सरकार पंजाब में फसल विविधीकरण (क्रॉप डायवर्सिफिकेशन) का कोई व्यावहारिक रोडमैप लागू नहीं कर सकी। धान-गेहूं के दुष्चक्र से बाहर निकलने के लिए न तो किसानों को वैकल्पिक फसलों पर सुनिश्चित खरीद की गारंटी दी गई और न ही कोई विशेष राज्य बोनस दिया गया। नतीजा यह है कि पंजाब का भूजल स्तर रसातल में जा रहा है और पराली की समस्या जस की तस बनी हुई है।
लापरवाह अफसरों पर सीएक्यूएम का हंटर, मुख्य सचिव तलब
जमीन पर सरकारी अमले की घोर उदासीनता का आलम यह है कि केंद्रीय उड़नदस्तों (फ्लाइंग स्क्वाड्स) के औचक निरीक्षण में कई जिलों के नोडल अधिकारी और पटवारी ड्यूटी से नदारद पाए गए। स्थानीय प्रशासन की इस घोर निष्क्रियता पर कड़ा संज्ञान लेते हुए वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग को पंजाब के मुख्य सचिव और पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) को सीधे तलब करना पड़ा। आयोग ने स्पष्ट चेतावनी दी कि पराली रोकने में ढिलाई बरतने वाले फील्ड अफसरों पर तुरंत सख्त अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाए, जिसने यह साफ कर दिया कि पंजाब सरकार का प्रशासनिक तंत्र पूरी तरह पंगु हो चुका है।
पंजाब की अपनी धरती का विनाश और किसानों पर दोगुने जुर्माने की मार
पराली जलाने से पंजाब की उपजाऊ मिट्टी के मित्र कीट, सूक्ष्म पोषक तत्व और जैविक कार्बन जलकर राख हो रहे हैं, जिससे जमीन बंजर होने की कगार पर पहुंच रही है। अपनी इस नाकामी को छिपाने के लिए मान सरकार अब छोटे और सीमांत किसानों पर मुकदमे दर्ज करवा रही है और उनके नाम ‘रेड एंट्री’ डाल रही है। दूसरी तरफ, अदालती आदेशों के तहत पराली जलाने पर पर्यावरण क्षतिपूर्ति की दरों को दोगुना कर 2 एकड़ तक ₹5,000, 2 से 5 एकड़ तक ₹10,000 और 5 एकड़ से अधिक पर ₹30,000 तक कर दिया गया है। व्यवस्था देने के बजाय किसानों की जेब पर यह भारी आर्थिक चोट मान सरकार की किसान विरोधी नीतियों का सीधा परिणाम है।
ग्रामीण दमकल तंत्र पूरी तरह ठप, जान-माल पर आफत
खेतों में आग लगने की घटनाओं के बीच पंजाब का ग्रामीण आपातकालीन ढांचा चरमरा चुका है। जब पराली की आग तेज हवाओं के कारण आसपास के खड़े खेतों, बागों और ग्रामीण रिहायशी बस्तियों तक पहुंचती है, तो समय पर दमकल गाड़ियां नहीं पहुंच पातीं। उपमंडल और ब्लॉक स्तर पर फायर ब्रिगेड स्टेशनों तथा जरूरी उपकरणों की भारी कमी है। मान सरकार की लचर तैयारियों के कारण किसानों की तैयार संपत्तियों और ग्रामीणों की सुरक्षा दांव पर लगी हुई है।
विपक्ष बनाम सत्ता: ‘आप’ के पाखंड का पर्दाफाश
जब दिल्ली में आम आदमी पार्टी की सरकार थी और पंजाब में अन्य दलों का शासन था, तब अरविंद केजरीवाल प्रेस कॉन्फ्रेंस कर दिल्ली के हर प्रदूषण कण के लिए पंजाब को दोषी ठहराते थे और उपग्रह की तस्वीरें लहराते थे। आज जब पंजाब में पूर्ण बहुमत की ‘आप’ सरकार है, तो वही नेता पूरी तरह खामोश हैं और इसे उत्तर भारत का सामूहिक संकट बताकर अपनी जिम्मेदारी से मुंह मोड़ रहे हैं। सत्ता बदलते ही जनता के स्वास्थ्य और अपनी जवाबदेही पर यू-टर्न लेना आम आदमी पार्टी के राजनीतिक अवसरवाद का सबसे बड़ा प्रमाण है।
Trends are coming in from punjab ….. https://t.co/KyXWIW2JdI
— Megh Updates 🚨™ (@MeghUpdates) October 19, 2026
गंभीर जनस्वास्थ्य संकट और 2027 में जनता का हिसाब
पंजाब से उठ रहे इस अनियंत्रित धुएं ने समूचे उत्तर भारत को भीषण स्वास्थ्य आपातकाल में धकेल दिया है। वायु गुणवत्ता सूचकांक (एक्यूआई) खतरनाक स्तर पर पहुंचने से बच्चों, बुजुर्गों और अस्थमा के मरीजों के फेफड़े छलनी हो रहे हैं, अस्पतालों में सांस के मरीजों की संख्या में भारी उछाल आया है। स्कूलों में बंदी और निर्माण कार्यों पर रोक से सामान्य जनजीवन व अर्थव्यवस्था ठप हो रही है। भारतीय जनता पार्टी के अनुसार, जो दल प्रदूषण मुक्ति का दावा करता था, वह सत्ता में आते ही उत्तर भारत को गैस चैंबर बनाने का सबसे बड़ा गुनहगार बन चुका है। सीमावर्ती राज्य की जनता और पर्यावरण के साथ खिलवाड़ करने वाली इस अकर्मण्य सरकार को पंजाब की जनता 2027 के चुनाव में सबक सिखाएगी।
वादों की राजनीति छोड़ जवाबदेही तय करे मान सरकार
पंजाब में पराली का संकट कोई प्राकृतिक आपदा नहीं, बल्कि भगवंत मान सरकार की प्रशासनिक विफलता, नीतिगत दिवालियापन और फंड प्रबंधन की घोर लापरवाही का सीधा नतीजा है। जब तक किसानों को मंडियों में खरीद की गारंटी, खेतों में चालू मशीनरी, डीजल पर राहत और पराली की खरीद का औद्योगिक ढांचा नहीं मिलेगा, तब तक धुएं का यह तांडव बंद नहीं होगा। विज्ञापनों और आरोप-प्रत्यारोप से प्रदूषण का समाधान नहीं हो सकता। यदि मान सरकार ने समय रहते अपनी आंखें नहीं खोलीं और जमीन पर ठोस काम नहीं किया, तो पंजाब के अन्नदाता और पूरे उत्तर भारत की जनता इस लापरवाही का करारा जवाब लोकतांत्रिक तरीके से देगी।










