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आधुनिक सैन्य शक्ति से आत्मनिर्भरता तक: रक्षा क्षेत्र में भारत की नई उड़ान

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राष्ट्रीय सुरक्षा के बदलते परिदृश्य में किसी देश की सैन्य ताकत केवल उसके सैनिकों, हथियारों और सैन्य बजट से नहीं मापी जाती, बल्कि यह भी देखा जाता है कि वह आधुनिक हथियारों और रक्षा तकनीकों के लिए कितना आत्मनिर्भर है। युद्ध या फिर अंतरराष्ट्रीय तनाव के दौरान दूसरे देशों से हथियार, कलपुर्जे और जरूरी तकनीक मिलने में बाधा आ जाए, तो उसका सीधा असर सैन्य तैयारियों पर पड़ सकता है। ऐसे में रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता भारत जैसे बड़े और सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण देश के लिए अनिवार्य आवश्यकता है।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र सरकार ने ‘आत्मनिर्भर भारत’ और ‘मेक इन इंडिया’ के माध्यम से रक्षा उत्पादन को बढ़ावा देने, घरेलू उद्योग को मजबूत करने और स्वदेशी अनुसंधान को प्रोत्साहित करने पर जोर दिया है। बीते वर्षों में रक्षा उत्पादन, निर्यात और इनोवेशन के क्षेत्र में हुई प्रगति इसी दिशा में उठाए गए कदमों को सामने लाती है। 

अब सरकार का ध्यान केवल देश में रक्षा उपकरण बनाने तक सीमित नहीं है, बल्कि अत्याधुनिक तकनीकों का स्वदेशी विकास, मजबूत सप्लाई चेन  और वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी रक्षा उत्पाद तैयार करने पर भी है। मोदी सरकार ने डिफेंस सेक्टर में आत्मनिर्भरता के अगले चरण की रूपरेखा सामने रखी है।

रक्षा उत्पादन में वृद्धि, आत्मनिर्भरता की दिशा में महत्वपूर्ण कदम

मोदी सरकार की रक्षा नीति का एक प्रमुख उद्देश्य भारत की रक्षा जरूरतों को पूरा करने के लिए घरेलू उत्पादन क्षमता का विस्तार करना है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, वित्त वर्ष 2014-15 में देश का रक्षा उत्पादन 46,429 करोड़ रुपये था, जो वित्त वर्ष 2025-26 में बढ़कर रिकॉर्ड 1.78 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया। इसी अवधि में डिफेंस सेक्टर में मैन्युफैक्चरिंग का विस्तार हुआ और घरेलू उद्योग के लिए नए अवसर बने।

यह वृद्धि केवल उत्पादन के आंकड़ों तक सीमित नहीं है। इसका महत्व इसलिए भी है कि रक्षा उपकरणों का देश में निर्माण होने से स्थानीय कंपनियों, इंजीनियरों, तकनीशियनों और छोटे उद्योगों को काम मिलता है। साथ ही, उपकरणों के रखरखाव, मरम्मत और कलपुर्जों की उपलब्धता के लिए घरेलू क्षमता विकसित करने में मदद मिलती है।

मोदी सरकार का जोर उत्पादन में वृद्धि के साथ ही हाईटेक डिफेंस प्लेटफार्म विशेषकर इलेक्ट्रॉनिक्स, इंजन, सेंसर, कच्चे माल और अन्य महत्वपूर्ण तकनीकों के लिए बाहरी निर्भरता कम करना है। इसके साथ ही आज उत्पादन की मात्रा के साथ स्वदेशी कंपोनेंट्स की हिस्सेदारी बढ़ाई जा रही है।

रक्षा निर्यात में बढ़ोतरी से वैश्विक पहचान

भारत की रक्षा आत्मनिर्भरता का एक महत्वपूर्ण पहलू रक्षा उत्पादों का निर्यात भी है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, वित्त वर्ष 2013-14 में रक्षा निर्यात 686 करोड़ रुपये था, जो वित्त वर्ष 2025-26 में बढ़कर रिकॉर्ड 38,424 करोड़ रुपये तक पहुंच गया।

रक्षा निर्यात बढ़ने से यह संकेत मिलता है कि भारतीय रक्षा उद्योग घरेलू जरूरतों को पूरा करने के साथ अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी अपनी उपस्थिति बढ़ा रहा है। भारतीय रक्षा उत्पाद 80 से अधिक देशों तक पहुंचना इस बात को सामने लाता है। 

निर्यात का विस्तार घरेलू विनिर्माण कंपनियों के लिए बड़े बाजार उपलब्ध कराता है। इससे उत्पादन क्षमता का बेहतर उपयोग, रोजगार सृजन और तकनीकी सुधार के लिए निवेश की संभावनाएं बढ़ती हैं। अंतरराष्ट्रीय बाजार में टिके रहने के लिए उत्पादों की क्वालिटी, समय पर आपूर्ति, प्रतिस्पर्धी कीमत और भरोसेमंद सेवा भी उतनी ही महत्वपूर्ण हैं।

सरकार ने 2029 तक तीन लाख करोड़ रुपये के रक्षा उत्पादन और 50,000 करोड़ रुपये के रक्षा निर्यात का लक्ष्य रखा है। इन लक्ष्यों को हासिल करने के लिए घरेलू उद्योग को वैश्विक मानकों के अनुरूप बनाना और निर्यात प्रक्रिया को अधिक सुगम करना महत्वपूर्ण होगा।

नीतिगत सुधारों से घरेलू उद्योग को प्रोत्साहन

रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता के लिए केवल बजट बढ़ाना पर्याप्त नहीं होता। इसके लिए खरीद प्रक्रिया, लाइसेंस व्यवस्था, निवेश और निजी क्षेत्र की भागीदारी से जुड़े नियमों में सुधार भी जरूरी हैं। मोदी सरकार ने रक्षा अधिग्रहण प्रक्रिया (डीएपी) 2020 और अन्य नीतिगत पहलों के माध्यम से घरेलू खरीद और स्वदेशी विनिर्माण को प्रोत्साहित करने की दिशा में कदम उठाए हैं।

ऐसे रक्षा उपकरणों और कलपुर्जों की पहचान की गई है, जिन्हें देश में निर्मित करने पर जोर दिया जा रहा है। इससे भारतीय कंपनियों को उत्पादन की योजना बनाने और रक्षा आपूर्ति शृंखला में अपनी भूमिका बढ़ाने का अवसर मिलता है।

रक्षा क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के नियमों को भी उदार बनाया गया है। इसका उद्देश्य निवेश, तकनीकी सहयोग और विनिर्माण क्षमता को आकर्षित करना है। हालांकि, विदेशी निवेश का वास्तविक लाभ तभी व्यापक होगा, जब उससे देश में तकनीकी दक्षता, स्थानीय आपूर्ति शृंखला और दीर्घकालीन विनिर्माण क्षमता विकसित हो।

इन सुधारों को और बेहतर तरीके से लागू करने के लिए सार्वजनिक क्षेत्र की रक्षा कंपनियों, निजी उद्योगों और सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों के बीच बेहतर समन्वय पर भी जोर दिया जा रहा है। 

अनुसंधान एवं विकास: भविष्य की सैन्य ताकत की बुनियाद

आधुनिक युद्ध में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, क्वांटम तकनीक, मानवरहित प्रणालियां, उन्नत सेंसर, साइबर क्षमताएं और सटीक मारक प्रणालियां तेजी से महत्वपूर्ण हो रही हैं। इन क्षेत्रों में आत्मनिर्भरता के लिए अनुसंधान एवं विकास में निरंतर निवेश आवश्यक है।

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने ‘आत्मनिर्भरता 2.0’ के तहत अनुसंधान एवं विकास को मजबूत बनाने पर विशेष जोर दिया। उनका संदेश स्पष्ट है कि भारत को केवल उपलब्ध तकनीकों के आधार पर हथियार बनाने तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि उसे ऐसी नई तकनीकें विकसित करनी होंगी जो भविष्य की सैन्य जरूरतों को पूरा कर सकें।

रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन यानि डीआरडीओ इस दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। इसके साथ उद्योग जगत, विश्वविद्यालयों और शोध संस्थानों की साझेदारी को मजबूती देने पर भी फोकस किया गया है। इससे प्रयोगशालाओं में विकसित तकनीकों को प्रोटोटाइप, परीक्षण और अंततः सैन्य उपयोग के योग्य उत्पादों में बदला जा सकता है।

आईडेक्स से स्टार्टअप और एमएसएमई को अवसर

रक्षा क्षेत्र में इनोवेशन को बढ़ावा देने के लिए सरकार की आईडेक्स पहल महत्वपूर्ण मंच के रूप में उभरी है। इसका उद्देश्य स्टार्टअप, उद्यमियों और छोटे उद्योगों को रक्षा बलों की वास्तविक जरूरतों के अनुरूप तकनीकी समाधान विकसित करने का अवसर देना है।

स्वावलंबन कार्यक्रम में सामने आए आंकड़ों के अनुसार, भारतीय नौसेना की ओर से प्रस्तुत 229 आईडेक्स चुनौतियों के जवाब में 4,000 से अधिक प्रस्ताव मिले। इन प्रस्तावों से रक्षा क्षेत्र में इनोवेशन के प्रति उद्यमियों और तकनीकी प्रतिभाओं की रुचि का पता चलता है।

नौसैनिक प्रणालियों, सेंसर, संचार और अन्य महत्वपूर्ण क्षेत्रों में स्टार्टअप एवं  एमएसएमई द्वारा विकसित किए जा रहे समाधान इस बात का उदाहरण हैं कि डिफेंस इनोवेशन अब केवल बड़ी सरकारी प्रयोगशालाओं या सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों तक सीमित नहीं है।

नौसेना का ‘स्वावलंबन’: नवाचार से सैन्य उपयोग तक

भारतीय नौसेना का ‘स्वावलंबन’ कार्यक्रम रक्षा क्षेत्र में स्वदेशी तकनीक विकसित करने और उसे परिचालन जरूरतों से जोड़ने का एक महत्वपूर्ण उदाहरण है। वर्ष 2022 में शुरू हुई इस पहल के माध्यम से नौसेना की समस्याओं के समाधान खोजने के लिए उद्योग और स्टार्टअप को मंच उपलब्ध कराया गया।

नौसेना प्रमुख के अनुसार, वर्ष 2022 से नौसेना से संबंधित आईडेक्स चुनौतियों की संख्या 20 से बढ़कर 229 हो गई है। साथ ही, 3,500 करोड़ रुपये से अधिक मूल्य के 41 मामलों को आवश्यकता की स्वीकृति मिली और 1,900 करोड़ रुपये से अधिक मूल्य के 25 अनुबंधों पर हस्ताक्षर किए गए।

इन आंकड़ों का महत्व इस बात में है कि इनोवेशन को केवल विचार या प्रदर्शनी तक सीमित रखने के बजाय खरीद और सैन्य उपयोग की दिशा में आगे बढ़ाया जा रहा है। नौसेना की परिचालन जरूरतों से जुड़े समाधान विकसित करने पर जोर देने से तकनीक और वास्तविक उपयोगकर्ता के बीच दूरी कम हो सकती है।

समुद्री प्लेटफॉर्म, उन्नत संचार, निगरानी, ड्रोन-रोधी प्रणालियां और AI  आधारित समाधान भविष्य के नौसैनिक अभियानों में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। इनके विकास में घरेलू उद्योग की भागीदारी भारत की सामरिक क्षमता को मजबूत करने में सहायक होगी।

आपूर्ति शृंखला की मजबूती भी राष्ट्रीय सुरक्षा का हिस्सा

रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता का अर्थ केवल अंतिम हथियार या प्लेटफॉर्म देश में तैयार करना नहीं है। उसके लिए जरूरी कच्चा माल, इलेक्ट्रॉनिक चिप, विशेष धातु, सेंसर, इंजन, सॉफ्टवेयर और कलपुर्जों की उपलब्धता भी सुनिश्चित करनी पड़ती है। अंतरराष्ट्रीय संकट, युद्ध या व्यापारिक प्रतिबंधों की स्थिति में जरूरी सामग्री की आपूर्ति प्रभावित हो सकती है। ऐसे में घरेलू उत्पादन क्षमता, वैकल्पिक आपूर्तिकर्ता और आवश्यक भंडार का पहले से आकलन करना महत्वपूर्ण है।

कुछ रेयर अर्थ मिनरल्स और खास तकनीकों की घरेलू उपलब्धता सीमित होने के कारण बाहरी निर्भरता तुरंत समाप्त करना आसान नहीं है। इसलिए प्राथमिकता वाले क्षेत्रों की पहचान करके चरणबद्ध समय-सीमा निर्धारित करनी होगी। जहां घरेलू विकल्प विकसित करना संभव है, वहां अनुसंधान और निवेश बढ़ाना होगा, वहीं जिन क्षेत्रों में तत्काल आत्मनिर्भरता कठिन है, वहां आपूर्ति के विविध स्रोत विकसित करने होंगे।

‘आत्मनिर्भरता 2.0’: क्वालिटी और टेक्नोलॉजी में महारत की चुनौती

रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता के पहले चरण ने उत्पादन, निर्यात और घरेलू उद्योग की भागीदारी बढ़ाने की दिशा में आधार तैयार किया है। अब ‘आत्मनिर्भरता 2.0’ का जोर अधिक उन्नत टेक्नोलॉजी, बेहतर गुणवत्ता, किफायती उत्पादन और वैश्विक प्रतिस्पर्धा पर है।

इस चरण में जोर क्वांटम तकनीक, युद्ध में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का इस्तेमाल, स्वायत्त प्रणालियां और हाइपरसोनिक तकनीक जैसे क्षेत्रों में क्षमता विकसित करने पर है। इनका विकास केवल रक्षा मंत्रालय या डीआरडीओ के प्रयासों से नहीं हो सकता; इसके लिए उद्योग, विश्वविद्यालय, स्टार्टअप और तीनों सेनाओं के बीच व्यापक सहयोग आवश्यक है।

साथ ही, ऐसी तकनीकों पर भी ध्यान देना होगा जिनका इस्तेमाल सैन्य और असैन्य दोनों क्षेत्रों में हो सके। इससे अनुसंधान में किए गए निवेश का व्यापक आर्थिक लाभ मिलेगा और घरेलू तकनीकी इकोसिस्टम को मजबूती मिलेगी।

आगे की राह: उपलब्धियों को स्थायी क्षमता में बदलना होगा

मोदी सरकार के नेतृत्व में रक्षा उत्पादन और निर्यात में हुई वृद्धि, स्वदेशीकरण की नीतियां, आईडेक्स जैसे इनोवेशन के मंच और नौसेना का स्वावलंबन कार्यक्रम रक्षा आत्मनिर्भरता के प्रयासों के महत्वपूर्ण हिस्से हैं। इन पहलों ने घरेलू उद्योग और देश की प्रतिभाओं के लिए नए अवसर तैयार किए जा रहे हैं।

लेकिन इस यात्रा की सफलता का अंतिम पैमाना केवल उत्पादन या निर्यात के आंकड़े नहीं होंगे। यह देखना भी जरूरी है कि देश कितनी महत्वपूर्ण टेक्नोलॉजी का स्वयं विकास कर पाता है, संकट के समय जरूरी कलपुर्जों की आपूर्ति कितनी भरोसेमंद रहती है और स्वदेशी प्लेटफार्म गुणवत्ता और  परिचालन क्षमता के मामले में कैसी साबित होती हैं।

आत्मनिर्भर रक्षा व्यवस्था से विकसित भारत की ओर

रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता भारत की सुरक्षा, आर्थिक क्षमता और वैश्विक भूमिका से जुड़ा दीर्घकालीन लक्ष्य है। घरेलू उत्पादन और निर्यात में वृद्धि ने इस दिशा में महत्वपूर्ण आधार तैयार किया है, जबकि ‘आत्मनिर्भरता 2.0’ अत्याधुनिक तकनीक, मजबूत सप्लाई चेन और अनुसंधान आधारित विकास की जरूरत को सामने लाता है। आने वाले वर्षों में भारत की चुनौती इन पहलों को स्थायी तकनीकी क्षमता में बदलने की होगी। यदि रक्षा बल, उद्योग, स्टार्टअप और शिक्षण संस्थान मिलकर इनोवेशन से लेकर सैन्य उपयोग तक की प्रक्रिया को मजबूत करते हैं, तो भारत अपनी रक्षा जरूरतों को अधिक प्रभावी ढंग से पूरा कर सकता है। इसके साथ ही दुनिया के डिफेंस सेक्टर में बड़ी भूमिका निभा सकता है। यही आत्मनिर्भर रक्षा व्यवस्था विकसित भारत के लक्ष्य को मजबूती देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम होगी।

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