सार्वजनिक जीवन में नरेंद्र मोदी के 25 वर्षों का नेतृत्व राष्ट्र-निर्माण, दूरगामी नीतियों और असंभव को संभव बनाने की अनूठी गाथा है। आज जब समूचा विश्व इक्कीसवीं सदी के सबसे बड़े खतरे यानी ‘जल संकट’ और ‘जल युद्ध’ के मुहाने पर खड़ा है, तब भारत ने पीएम मोदी के विजन से एक आत्मनिर्भर, सामरिक और बहुआयामी जल-सुरक्षा मॉडल विकसित कर पूरी दुनिया को नई राह दिखाई है। गुजरात में चेकडैम और नर्मदा नहर के अनोखे प्रयोगों से अंकुरित हुआ यह संकल्प आज 15.9 करोड़ से अधिक ग्रामीण घरों तक नल से जल, 68,000 अमृत सरोवरों, एकीकृत जल शक्ति मंत्रालय, सामरिक सीमावर्ती जलापूर्ति, आधुनिक अंतरिक्ष रिमोट सेंसिंग और कड़े कानूनी नियमन का सशक्त महाअभियान बन चुका है। प्राचीन जल विरासत के सम्मान और आधुनिक विज्ञान के इस अभूतपूर्व समन्वय ने भारत को वर्तमान ही नहीं, बल्कि आने वाले युगों के लिए भी पूरी तरह जल-सुरक्षित बना दिया है।
भावी ‘जल युद्ध’ से सुरक्षा कवच: एकीकृत जल शक्ति मंत्रालय और राष्ट्रीय जल नीति
दशकों तक देश में जल प्रबंधन से जुड़े विभाग अलग-अलग मंत्रालयों में बिखरे हुए थे, जिससे नीतियों के क्रियान्वयन में गतिरोध आता था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2019 में सत्ता में लौटते ही दूरगामी निर्णय लेते हुए ‘जल शक्ति मंत्रालय’ का गठन किया। इस एकीकृत व्यवस्था ने जल संसाधन, पेयजल, स्वच्छता और नदी विकास को एक छत के नीचे लाकर समग्र जल प्रबंधन की दिशा में क्रांतिकारी बदलाव किया। बीते 10 वर्षों में जल संरक्षण को राष्ट्रीय जन-आंदोलन का स्वरूप देकर देश के भविष्य को सुरक्षित किया गया है। राष्ट्रीय जल नीति और आधुनिक जल प्रबंधन तकनीकों के समावेश से भारत ने जल संकट के जोखिमों को समय रहते भांपते हुए देश को एक मजबूत सुरक्षा कवच प्रदान किया है।
बीते 10 वर्षों को इसलिए जल-सुरक्षा और जल-संरक्षण के अभूतपूर्व दशक के रूप में याद किया जाएगा… pic.twitter.com/ButGxp4UaI
— Narendra Modi (@narendramodi) December 25, 2024
जल संप्रभुता और सुरक्षा: सिंधु जल संधि पर कड़ा रुख और शाहपुर कंडी बांध का निर्माण
राष्ट्रीय सुरक्षा और जल संप्रभुता के मामले में मोदी सरकार ने साहसिक नीतिगत बदलाव किए हैं। “रक्त और पानी एक साथ नहीं बह सकते” के दृढ़ संकल्प के साथ भारत ने दशकों से पाकिस्तान की ओर बह रहे अपने हक के रावी नदी के पानी को देशहित में रोकने का कार्य किया। साढ़े चार दशक से अधर में लटकी शाहपुर कंडी बांध परियोजना को गति देकर पूरा कराया गया, जिससे जम्मू-कश्मीर के कठुआ और सांबा सहित पंजाब के 32,000 हेक्टेयर से अधिक खेतों को सिंचाई का भरपूर पानी मिलना सुनिश्चित हुआ। उझ बहुउद्देश्यीय परियोजना जैसी पहलों से भारत ने साफ संदेश दिया है कि देश के जल संसाधनों पर पहला अधिकार भारत के नागरिकों का है।
जश्न मनाने में इतनी जल्दबाजी नहीं करनी चाहिए… जैसे पाकिस्तान ने की! 😂
पाकिस्तान ने सिंधु जल संधि (Indus Waters Treaty) को लेकर हेग की मध्यस्थता व्यवस्था का रुख किया। जब Court of Arbitration ने पाकिस्तान के पक्ष में फैसला सुनाया, तो वहाँ जश्न शुरू हो गया। पूरा पाकिस्तानी… pic.twitter.com/L5PPJ14yBz
— sumit kalra (@sumit1kalra) September 1, 2026
रक्षा प्रतिष्ठानों की रणनीतिक जल आत्मनिर्भरता: ‘नेट-जीरो वाटर’ मिलिट्री स्टेशंस का मॉडल
भावी सुरक्षा चुनौतियों और संभावित युद्धकालीन परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए मोदी सरकार ने देश के रणनीतिक सैन्य ठिकानों को जल की दृष्टि से पूर्णतः आत्मनिर्भर बनाने का बीड़ा उठाया है। भारतीय थलसेना, नौसेना और वायुसेना के प्रमुख छावनी क्षेत्रों (विशेषकर जैसलमेर, बाड़मेर, लेह और अंडमान-निकोबार) में ‘नेट-जीरो वाटर’ मॉडल लागू किया गया है। इन ठिकानों पर 100 प्रतिशत वर्षा जल संचयन, स्वचालित एसटीपी और शोधित जल के शत-प्रतिशत पुनर्चक्रण की व्यवस्था की गई है। इस रणनीतिक पहल से बाहरी जलापूर्ति ग्रिड पर सेना की निर्भरता समाप्त हुई है, जिससे किसी भी आपात स्थिति में रणनीतिक ठिकानों की सुरक्षा अभेद्य बनी रहती है।
डिजिटल जल युद्ध से बचाव: महत्वपूर्ण जल अवसंरचना और बांधों की अभेद्य साइबर सुरक्षा
इक्कीसवीं सदी में भावी जल युद्ध केवल सीमाओं या भौतिक नहरों तक सीमित नहीं है, बल्कि जल वितरण ग्रिड और बड़े बांधों पर साइबर हमलों का बड़ा खतरा मंडरा रहा है। मोदी सरकार ने दूरदर्शिता दिखाते हुए देश के प्रमुख बांधों के स्वचालित नियंत्रण तंत्र (स्काडा), केंद्रीय जल आयोग के सर्वरों और जल जीवन मिशन के डिजिटल नेटवर्क को ‘राष्ट्रीय महत्वपूर्ण सूचना अवसंरचना संरक्षण केंद्र’ (एनसीआईआईपीसी) और सर्ट-इन के सुरक्षा घेरे में शामिल किया है। जल नियंत्रण प्रणालियों की 24 घंटे साइबर निगरानी और एयर-गैप्ड फायरवॉल सुरक्षा सुनिश्चित कर यह पक्का किया गया है कि कोई भी विदेशी हैकर या शत्रु शक्ति बांधों के गेट या जलापूर्ति नेटवर्क को डिजिटल रूप से बाधित न कर सके।
हर घर जल: ग्रामीण जल संकट को सफलता की कहानी में बदलने वाला एक मिशन…
पीएम श्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में जल जीवन मिशन से हर घर जल का सपना साकार हो रहा है। इस योजना ने ग्रामीण भारत के करोड़ों लोगों के जीवन में नई क्रांति ला दी है।
जिन लोगों को पीने के पानी के लिए कई-कई… pic.twitter.com/Z7vk4KVsx0
— BJP (@BJP4India) July 20, 2025
सीमावर्ती दुर्गम क्षेत्रों में जल सुरक्षा: ‘वाइब्रेंट विलेज प्रोग्राम’ और लद्दाख में शून्य से नीचे तापमान का समाधान
देश के अंतिम सीमावर्ती गांवों को राष्ट्रीय प्राथमिकता बनाते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ‘वाइब्रेंट विलेज प्रोग्राम’ के तहत जल सुरक्षा को रणनीतिक मजबूती दी है। लद्दाख, स्पीति और अरुणाचल प्रदेश जैसे अत्यधिक ऊंचाई और शून्य से 30 डिग्री नीचे (-30°C) तापमान वाले क्षेत्रों में जहां पानी की पाइपलाइनें जम जाती थीं, वहां सौर ऊर्जा से संचालित अत्याधुनिक एचडीपीई इन्सुलेटेड पाइपलाइन और सर्कुलेशन तकनीक स्थापित की गई। वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) के पास स्थित दुर्गम बस्तियों में शून्य से नीचे के तापमान में भी घरों तक निर्बाध पेयजल पहुंचाया गया है। इससे सीमावर्ती गांवों से पलायन रुका है और देश की रणनीतिक सुरक्षा को जमीनी मजबूती मिली है।
हिमनद झील एवं ग्लेशियर सुरक्षा: हिमालयी क्षेत्रों में जीएलओएफ आपदाओं की रीयल-टाइम पूर्व चेतावनी
जलवायु परिवर्तन के कारण हिमालय के हिमनदों के तेजी से पिघलने और हिमनद झीलों के फटने से आने वाली प्रलयंकारी बाढ़ (जीएलओएफ) से बचाव के लिए मोदी सरकार ने व्यापक सुरक्षा तंत्र बनाया है। राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (एनडीएमए), इसरो और भारतीय सेना के संयुक्त अभियानों के माध्यम से सिक्किम, लद्दाख, हिमाचल और उत्तराखंड की संवेदनशील हिमनद झीलों पर स्वचालित मौसम केंद्र और जल-स्तर सेंसर लगाए गए हैं। झीलों से अतिरिक्त पानी की सुरक्षित निकासी (साइफनिंग) कर सदानीरा नदियों के मूल जलस्रोतों को सुरक्षित किया जा रहा है, जिससे नीचे के मैदानी इलाकों में पानी का प्रवाह संतुलित बना रहे और अचानक आने वाले जल प्रलय से जन-धन की रक्षा हो सके।
आकांक्षी जिलों में जल सुरक्षा: 112 पिछड़े और जल-तनावग्रस्त क्षेत्रों का सर्वांगीण कायाकल्प
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा शुरू किए गए ‘आकांक्षी जिला कार्यक्रम’ ने देश के 112 सबसे पिछड़े और गंभीर जल-तनाव से जूझ रहे जिलों में क्रांतिकारी बदलाव लाया है। नीति आयोग द्वारा तय संकेतकों में जल संचयन, जल संरक्षण और नल से जल आपूर्ति को सर्वोच्च प्राथमिकता दी गई। दूरदराज के जनजातीय और सूखाग्रस्त क्षेत्रों में विशेष निगरानी के जरिए हजारों चेकडैम, तालाब और कुओं का निर्माण कराया गया। जो जिले कभी सूखे और जल संकट के कारण विकास की दौड़ में सबसे पीछे थे, वे आज बेहतर जल प्रबंधन के दम पर कृषि उत्पादकता और जनजीवन की गुणवत्ता में नए कीर्तिमान स्थापित कर रहे हैं।
बूंद-बूंद से बनता है समर्थ भारत!💧
जब 140 करोड़ देशवासी पानी सहेजने का संकल्प लेते हैं, तो इतिहास रचा जाता है।
‘जल संचय जन भागीदारी’ के अंतर्गत अब तक 1.58 करोड़ से अधिक भूजल पुनर्भरण संरचनाओं का निर्माण किया जा चुका है।#JalSanchayJanBhagidari #JalShaktiAbhiyan #CatchTheRain… pic.twitter.com/15p02lLNDX
— आकाशवाणी समाचार (@AIRNewsHindi) September 20, 2026
जनजातीय व पहाड़ी क्षेत्रों में ‘स्प्रिंगशेड प्रबंधन’: सूखते प्राकृतिक झरनों का वैज्ञानिक पुनर्जीवन
पूर्वोत्तर के पर्वतीय राज्यों, हिमालयी क्षेत्रों और मध्य भारत के पठारी जनजातीय अंचलों में ग्रामीण आबादी की 80 प्रतिशत से अधिक जलापूर्ति प्राकृतिक पहाड़ी झरनों (धरों और चश्मों) पर निर्भर करती है। जलवायु परिवर्तन और भू-क्षरण के कारण सूख रहे इन जल स्रोतों को बचाने के लिए मोदी सरकार ने नीति आयोग और जल शक्ति मंत्रालय के समन्वय से राष्ट्रीय ‘स्प्रिंगशेड प्रबंधन कार्यक्रम’ शुरू किया। आधुनिक हाइड्रोलॉजिकल मैपिंग और आइसोटोप तकनीकों के जरिए हजारों प्राकृतिक झरनों के रीचार्ज क्षेत्रों की पहचान कर वहां कंटूर ट्रेंच और वानिकी कार्य किए गए हैं। इस वैज्ञानिक प्रयास ने दूरदराज के जनजातीय समुदायों के पारंपरिक पेयजल स्रोतों को सदाबहार और सुरक्षित बना दिया है।
झीलें न सिर्फ जल देती हैं, बल्कि जीवन, संस्कृति और जैव विविधता को भी संजोती हैं.
मिशन #AmritSaroVar और #JalShakti अभियान से झीलों का पुनर्जीवन हो रहा है. यह पर्यावरण संरक्षण के साथ हमारी सांस्कृतिक विरासत और भावी पीढ़ियों के लिए जल सुरक्षा का ठोस कदम है.#WorldLakeDay2025 pic.twitter.com/KJhtAmxZE6
— SansadTV (@sansad_tv) August 27, 2025
जल क्रांति: 68,000+ अमृत सरोवर, मिशन जल शक्ति और झीलों का पुनरुद्धार
झीलें न केवल जल देती हैं, बल्कि जीवन, संस्कृति और जैव विविधता को भी संजोती हैं। मिशन अमृत सरोवर और जल शक्ति अभियान से देशभर की झीलों और पारंपरिक जलस्रोतों का अभूतपूर्व पुनर्जीवन हो रहा है। यह पर्यावरण संरक्षण के साथ हमारी सांस्कृतिक विरासत और भावी पीढ़ियों के लिए जल सुरक्षा का सबसे ठोस कदम साबित हुआ है। आजादी के अमृत महोत्सव के तहत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आह्वान पर देश भर में 68,000 से अधिक अमृत सरोवरों का निर्माण और जीर्णोद्धार सफलतापूर्वक पूरा किया जा चुका है।
#Watch | प्रधानमंत्री @narendramodi की PRAGATI पहल ने भारत में जल सुरक्षा को नई दिशा दी
50,000 की बजाय 68,000 अमृत सरोवर बनाकर भूजल स्तर सुधारा और ग्रामीणों के लिए स्थायी सिंचाई समाधान प्रदान किया।
इसमें वृक्षारोपण और रोजगार सृजन भी शामिल, जिससे पर्यावरण और स्थानीय… pic.twitter.com/lymxK15vM5— डीडी न्यूज़ (@DDNewsHindi) January 4, 2026
‘कैच द रेन’ महाअभियान: बारिश की हर बूंद से भूजल पुनर्भरण और शैक्षणिक संस्थानों में संचयन
बारिश की हर बूंद, कल की जल सुरक्षा का आधार है। पीएम मोदी के ‘Catch the Rain’ विजन को आगे बढ़ाते हुए दिल्ली में 75 CM-SHRI स्कूलों में रेनवाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम लगाए जा रहे हैं, जिससे प्रत्येक स्कूल प्रतिवर्ष लगभग 2 लाख लीटर भूजल रीचार्ज करेगा। यह पहल 75 स्कूलों से शुरू होकर आगे 800 स्कूलों तक पहुंचाई जा रही है। ‘कैच द रेन – व्हेयर इट फॉल्स, व्हेन इट फॉल्स’ अभियान ने वर्षा जल संचयन को राष्ट्रीय जन-आंदोलन का रूप दे दिया है, जिससे देश के शहरी व ग्रामीण अंचलों में भूजल स्तर को स्थायी मजबूती मिल रही है।
बारिश की हर बूंद, कल की जल सुरक्षा। 💧
पीएम मोदी के ‘Catch the Rain’ विजन को आगे बढ़ाते हुए दिल्ली की भाजपा सरकार 75 CM-SHRI स्कूलों में Rainwater Harvesting System लगा रही है। इससे हर स्कूल हर साल करीब 2 लाख लीटर भूजल रिचार्ज करेगा। यह पहल 75 स्कूलों से शुरू हुई है, जिसे आगे… pic.twitter.com/NBsksnfA5K
— BJP (@BJP4India) July 15, 2026
‘जल जीवन मिशन’: 15.9 करोड़ ग्रामीण परिवारों तक नल से जल का ऐतिहासिक विस्तार
2019 में लाल किले की प्राचीर से घोषित ‘जल जीवन मिशन’ ने भारत के ग्रामीण जनजीवन की तस्वीर बदल दी है। वर्ष 2019 तक जहां केवल 3.23 करोड़ ग्रामीण घरों में नल से जल की सुविधा उपलब्ध थी, वहीं यह आंकड़ा बढ़कर 15.9 करोड़ से अधिक ग्रामीण परिवारों तक पहुंच चुका है। देश के 81 प्रतिशत से अधिक ग्रामीण घरों में शुद्ध पेयजल की आपूर्ति सुनिश्चित की जा चुकी है। पानी लाने के लिए रोजाना मीलों पैदल चलने वाली माताओं-बहनों को इस योजना ने शारीरिक कष्टों से मुक्ति दिलाकर उनके सम्मान, स्वास्थ्य और समय की रक्षा की है।
7 दशक बीत गए, लेकिन हर घर तक नल से जल नहीं पहुंच पाया था। 🚰
फिर बदली रफ्तार, बदला संकल्प… और सिर्फ 12 वर्षों में 16 करोड़ घरों तक नल से जल पहुंचा। जब सेवा संकल्प बन जाए, तो बदलाव जन-जन तक पहुंचता है।
इस बदलाव की यात्रा से जुड़िए। 17 सितंबर से शुरू हो रहे #SevaSankalpAbhiyan… pic.twitter.com/156Rx2zmht
— BJP (@BJP4India) September 14, 2026
‘जल जीवन मिशन 2.0’ और ‘सुजलम भारत’: भरोसेमंद सेवा आपूर्ति का डिजिटल पब्लिक इन्फ्रास्ट्रक्चर
बुनियादी ढांचे के निर्माण से आगे बढ़ते हुए मोदी सरकार ने ‘जल जीवन मिशन 2.0’ का आगाज किया है, जिसका मुख्य केंद्र जल आपूर्ति अवसंरचना को एक स्थायी और भरोसेमंद लोक सेवा आपूर्ति प्रणाली में बदलना है। इस संस्थागत सुधार के लिए ‘सुजलम भारत’ डिजिटल पब्लिक इन्फ्रास्ट्रक्चर इकोसिस्टम लागू किया गया है। यह डिजिटल तंत्र डेटा और तकनीक के जरिए जलस्रोतों की निरंतरता, आपूर्ति प्रदर्शन की रीयल-टाइम निगरानी और नागरिक-केंद्रित गवर्नेंस को मजबूती प्रदान कर रहा है। इसके माध्यम से ग्राम पंचायतों और ग्राम जल एवं स्वच्छता समितियों को स्थानीय स्तर पर कुशल जल उपयोगिताओं (माइक्रो यूटिलिटीज) के रूप में सशक्त किया जा रहा है।
As the 9th India International Water Week begins today, I have shared my thoughts in Hindustan Times on the need for collective action towards climate-resilient water management.
Under the visionary leadership of Hon’ble Prime Minister Shri Narendra Modi ji, India has placed Jan… pic.twitter.com/F77mGW117q
— C R Paatil (@CRPaatil) September 22, 2026
‘जल सेवा आकलन’: ग्राम पंचायतों द्वारा पेयजल सेवा की डिजिटल निगरानी और जनभागीदारी
जल आपूर्ति की निरंतर गुणवत्ता बनाए रखने के लिए सरकार ने ‘जल सेवा आकलन’ नामक क्रांतिकारी ढांचा जमीन पर उतारा है। यह ग्राम पंचायत के नेतृत्व में चलने वाला डिजिटल पेयजल सेवा मूल्यांकन तंत्र है। इसके तहत ‘हर घर जल’ प्रमाणित गांवों में पानी की नियमितता, पर्याप्त मात्रा, शुद्ध गुणवत्ता और स्रोतों की स्थिरता का प्रत्यक्ष आकलन स्वयं ग्राम पंचायतें और स्थानीय ग्रामीण जनभागीदारी के जरिए कर रहे हैं। बुनियादी ढांचा तैयार करने के बाद अब सेवा वितरण की दीर्घकालिक स्थिरता सुनिश्चित करने की दिशा में यह कदम निर्णायक साबित हो रहा है।
जल गुणवत्ता संकट का समाधान: 27,000 से अधिक आर्सेनिक व फ्लोराइड प्रभावित बस्तियों को सुरक्षित जल
दशकों से देश के कई राज्य भूजल में घुले आर्सेनिक, फ्लोराइड और भारी धातुओं के जहर से जूझ रहे थे, जिसके कारण ग्रामीण आबादी फ्लोरोसिस, कैंसर और हड्डियों की गंभीर विकृतियों का शिकार हो रही थी। मोदी सरकार ने जल जीवन मिशन के अंतर्गत प्राथमिकता के आधार पर जल गुणवत्ता प्रभावित बस्तियों पर ध्यान केंद्रित किया। देशभर की 27,000 से अधिक चिन्हित आर्सेनिक और फ्लोराइड प्रभावित बस्तियों में कम्युनिटी वाटर प्यूरिफिकेशन प्लांट्स और दूरस्थ सतही जल स्रोतों से पाइपलाइन बिछाकर शुद्ध जल पहुंचाया गया है। इस निर्णायक हस्तक्षेप ने देश के सबसे वंचित और बीमार बस्तियों को गंभीर स्वास्थ्य संकटों से स्थायी मुक्ति दिलाई है।

स्कूलों और आंगनबाड़ियों में 100% नल जल: 18 लाख से अधिक संस्थानों में भावी पीढ़ी की स्वास्थ्य सुरक्षा
बच्चों के बेहतर स्वास्थ्य और उज्ज्वल भविष्य के लिए मोदी सरकार ने जल जीवन मिशन के तहत विशेष 100 दिवसीय सघन अभियान शुरू किया। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, देश भर के 9.3 लाख से अधिक प्राथमिक व माध्यमिक विद्यालयों और 9.5 लाख से अधिक आंगनबाड़ी केंद्रों में नल से शुद्ध और सुरक्षित पेयजल पहुंचा दिया गया है। इससे बच्चों में डायरिया, हैजा और फ्लोरोसिस जैसी घातक जलजनित बीमारियों में भारी गिरावट आई है। स्कूलों में सुरक्षित जल और स्वच्छता सुनिश्चित होने से विशेष रूप से बालिकाओं की उपस्थिति और शिक्षा में निरंतरता को बड़ा संबल मिला है।
जल प्रबंधन में मातृशक्ति का नेतृत्व: 24.80 लाख प्रशिक्षित महिलाएं और फील्ड टेस्ट किट से निगरानी
जल सुरक्षा को केवल बुनियादी ढांचे तक सीमित न रखकर मोदी सरकार ने इसे महिला सशक्तिकरण का माध्यम बनाया है। जल जीवन मिशन के तहत ग्राम स्तर पर गठित ‘पानी समितियों’ में 50 प्रतिशत महिलाओं की भागीदारी अनिवार्य की गई है। देशभर की 24 लाख 80 हजार महिलाओं को अपने घरों में आने वाले पानी की गुणवत्ता जांचने का विशेष प्रशिक्षण दिया गया है और राज्य सरकारों द्वारा उन्हें फील्ड टेस्टिंग किट उपलब्ध कराई गई हैं। ये ‘जल सहेलियां’ गांवों में रासायनिक और जीवाणु संक्रमण की जांच कर ग्रामीण स्वास्थ्य और स्वच्छ जल की पहली रक्षा पंक्ति बनकर उभरी हैं।
24 लाख 80 हज़ार महिलाओं को अपने घर में आनेवाले पानी की गुणवत्ता चेक करने की ट्रेनिंग दी गई है और किट भी राज्य सरकार द्वारा उपलब्ध करवाई गई है । #RajyaSabha#JalShakti pic.twitter.com/s5Ek5NA9by
— C R Paatil (@CRPaatil) March 30, 2026
नदियों की अविरल धारा: ‘नमामि गंगे’ मॉडल और केन-बेतवा लिंक परियोजना
सदियों से उपेक्षित पड़ी नदियों के संरक्षण को मोदी सरकार ने राष्ट्रीय प्राथमिकता बनाया। ‘नमामि गंगे’ परियोजना ने गंगा और उसकी सहायक नदियों को प्रदूषण मुक्त करने, सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांट लगाने और जैव विविधता को पुनर्स्थापित करने में उल्लेखनीय सफलता पाई है। इसे संयुक्त राष्ट्र द्वारा दुनिया की शीर्ष 10 पुनर्स्थापन पहलों में सराहा गया है। वहीं दूसरी ओर, पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के नदी जोड़ो विजन को साकार करते हुए ‘केन-बेतवा लिंक परियोजना’ को जमीन पर उतारा गया। इस परियोजना से 0.62 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में सिंचाई की सुविधा मिलेगी, लगभग 62 लाख लोगों को शुद्ध पेयजल उपलब्ध कराया जाएगा, 103 मेगावाट जलविद्युत और 27 मेगावाट सौर ऊर्जा का उत्पादन होगा, जिससे बुंदेलखंड में सिंचाई, पेयजल और बिजली की उपलब्धता में व्यापक सुधार सुनिश्चित हुआ है।
साबरमती से पावन गंगा तक: 25 वर्षों की नदी संरक्षण यात्रा! 🇮🇳🌊
पिछले 25 वर्षों में प्रधानमंत्री श्री @narendramodi के नेतृत्व में भारत की जीवनदायिनी नदियों के संरक्षण और पुनरुद्धार का व्यापक कार्य हुआ है। गुजरात में साबरमती के कायाकल्प से शुरू हुआ यह विजन, आज नमामि गंगे के रूप… pic.twitter.com/scVeUvL5hJ
— BJP (@BJP4India) September 23, 2026
अंतर्देशीय जलमार्ग और ‘जल ही मार्ग’ विजन: नदियों की वहन क्षमता और पर्यावरण-अनुकूल परिवहन
मोदी सरकार ने देश की प्रमुख नदियों को टिकाऊ परिवहन और जल प्रबंधन का माध्यम बनाते हुए 111 राष्ट्रीय जलमार्गों का विकास किया है। गंगा पर राष्ट्रीय जलमार्ग-1 (हल्दिया से प्रयागराज) और ब्रह्मपुत्र पर राष्ट्रीय जलमार्ग-2 का संचालन इसका प्रमाण है। इन जलमार्गों के लिए नदियों के तल से गाद निकालने और जल चैनलों के वैज्ञानिक सुधार से नदियों की जल-वहन क्षमता में अभूतपूर्व वृद्धि हुई है, जिससे मानसून में बाढ़ का प्रभाव कम हुआ है। साथ ही, भारी माल ढुलाई के लिए जलमार्गों का उपयोग करने से कार्बन उत्सर्जन और परिवहन से होने वाले जल प्रदूषण में भारी कमी आई है।
तीर्थाटन और सांस्कृतिक केंद्रों का ‘स्वच्छ सुजल’ मॉडल: महाकुंभ और चारधाम में आधुनिक जल प्रबंधन
भारतीय सनातन आस्था और आधुनिक पर्यावरण संरक्षण के समन्वय का प्रमाण देश के प्रमुख तीर्थ स्थलों में देखने को मिला है। प्रयागराज महाकुंभ, काशी विश्वनाथ धाम और चारधाम यात्रा मार्गों पर करोड़ों श्रद्धालुओं के आगमन के बावजूद नदियों और जलस्रोतों को प्रदूषण मुक्त रखने की अभूतपूर्व व्यवस्था की गई। आधुनिक जियो-ट्यूब तकनीक, मॉड्यूलर एसटीपी, बायो-डाइजेस्टर शौचालय और शून्य सीवेज विसर्जन के कठोर मानकों को लागू कर पवित्र नदियों की निर्मलता और अविरलता को सुरक्षित रखा गया। इस मॉडल ने दिखाया कि आस्था और जल संरक्षण एक साथ कैसे आगे बढ़ सकते हैं।
अंतर-राज्यीय जल विवादों का समाधान: ‘डिपार्टमेंटल समिट ऑन वाटर’ और एकल न्यायाधिकरण सुधार
दशकों तक राज्यों के बीच नदियों के पानी को लेकर होने वाले विवाद अदालती प्रक्रियाओं और ट्रिब्यूनलों में उलझकर संभावित आंतरिक टकराव का कारण बनते रहे हैं। मोदी सरकार ने इस गतिरोध को समाप्त करने के लिए अंतर-राज्यीय नदी जल विवाद अधिनियम में सुधार करते हुए एकल स्थायी न्यायाधिकरण की व्यवस्था बनाई। हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पहल पर आयोजित ‘डिपार्टमेंटल समिट ऑन वाटर’ में देश के सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों ने एक मंच पर आकर जल क्षेत्र की चुनौतियों, अनुभवों और साझा समाधानों पर विमर्श किया। केंद्र की सक्रिय मध्यस्थता के चलते ही केन-बेतवा लिंक तथा पार्वती-कालीसिंध-चंबल लिंक परियोजना पर ऐतिहासिक अंतर-राज्यीय सहमति संभव हो सकी है।
‘अटल भूजल योजना’: 8,200 से अधिक ग्राम पंचायतों में सामुदायिक जल बजटिंग
भूजल के गंभीर संकट से निपटने के लिए मोदी सरकार ने विश्व बैंक की सहायता से 6,000 करोड़ रुपये की ‘अटल भूजल योजना’ लागू की। सात प्रमुख राज्यों (गुजरात, हरियाणा, कर्नाटक, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान और उत्तर प्रदेश) के अत्यधिक जल-तनावग्रस्त क्षेत्रों की 8,200 से अधिक ग्राम पंचायतों में सामुदायिक सहभागिता से जल प्रबंधन किया गया। देश में पहली बार ग्रामीण समुदायों ने स्वयं अपने गांव का ‘जल बजट’ तैयार करना शुरू किया, जिससे मांग आधारित जल उपयोग और फसल चक्र में परिवर्तन आया। इस अनूठी पहल ने भूजल स्तर में आ रही गिरावट की रफ्तार को थामने में अभूतपूर्व भूमिका निभाई है।
भूजल दोहन पर कड़ा नियमन: केंद्रीय भूजल प्राधिकरण (सीजीडब्ल्यूए) के नए दिशानिर्देश और डिजिटल मीटरिंग
दशकों से बेरोकटोक चल रहे अनियंत्रित भूजल दोहन पर मोदी सरकार ने कड़ा कानूनी शिकंजा कसा है। केंद्रीय भूजल प्राधिकरण के माध्यम से देश भर के उद्योगों, खनन इकाइयों और वाणिज्यिक प्रतिष्ठानों के लिए बिना डिजिटल अनापत्ति प्रमाण पत्र के भूजल निकालने पर पूर्ण पाबंदी लगाई गई है। जल दोहन वाले सभी बोरवेल्स पर सीलबंद डिजिटल वाटर फ्लो मीटर लगाना अनिवार्य किया गया है। इसके अलावा अति-दोहित क्षेत्रों में पानी निकालने पर भारी पर्यावरण क्षतिपूर्ति शुल्क लगाकर उद्योगों को अपशिष्ट जल के पुनर्चक्रण और वर्षा जल संचयन के लिए बाध्य किया गया है।
ग्रीन क्रेडिट प्रोग्राम और वाटर क्रेडिट बाजार: जल संरक्षण को बाजार आधारित आर्थिक संबल
पर्यावरण संरक्षण को केवल सरकारी नियमों या सब्सिडी तक सीमित न रखकर मोदी सरकार ने ‘ग्रीन क्रेडिट प्रोग्राम’ के तहत ‘वाटर क्रेडिट’ की अभिनव व्यवस्था शुरू की है। इसके तहत उद्योगों, नगरपालिकाओं, रियल एस्टेट कंपनियों और निजी संस्थाओं द्वारा वर्षा जल संचयन, जलभृत रीचार्ज और अपशिष्ट जल शोधन पर वाटर क्रेडिट अर्जित करने का प्रावधान किया गया है। इन क्रेडिट्स का व्यापार करने की अनुमति मिलने से जल संरक्षण एक आर्थिक रूप से लाभकारी मॉडल बन चुका है। यह नीतिगत बदलाव निजी पूंजी को भारी पैमाने पर जल संरक्षण परियोजनाओं में निवेश करने के लिए प्रेरित कर रहा है।
जल स्रोतों पर अतिक्रमण के खिलाफ कठोर कानूनी नियंत्रण: प्राकृतिक जलमार्गों की बहाली
देश के पारंपरिक जल स्रोतों, झीलों के जलग्रहण क्षेत्रों और बाढ़ के प्राकृतिक मैदानों पर दशकों से भू-माफियाओं और अनियंत्रित निर्माण का अवैध कब्जा रहा है, जिससे शहरी बाढ़ और जल संकट की स्थिति उत्पन्न हुई। मोदी सरकार ने राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) के सहयोग और राजस्व नियमों में सख्ती के जरिए जलस्रोतों के संरक्षण हेतु कड़े दंडात्मक प्रावधान लागू किए। राज्य सरकारों के साथ समन्वय कर वेटलैंड्स और जलभराव वाले क्षेत्रों से अवैध अतिक्रमण हटाने के लिए उपग्रह आधारित जियो-टैगिंग का उपयोग किया गया, जिससे प्राकृतिक जलमार्गों और सदियों पुराने तालाबों का अस्तित्व सुरक्षित हुआ है।
‘सुजलाम’ महाअभियान: ग्रामीण अंचलों में 10 लाख से अधिक सोक पिट्स और ग्रे-वाटर प्रबंधन
गांवों में घरेलू उपयोग के बाद बहने वाले गंदे पानी (ग्रे-वाटर) के वैज्ञानिक निपटान के लिए जल शक्ति मंत्रालय ने ‘सुजलाम’ 100-दिवसीय विशेष अभियान संचालित किया। इसके अंतर्गत देश भर की ग्राम पंचायतों में 10 लाख से अधिक व्यक्तिगत और सामुदायिक सोक पिट्स व लीच पिट्स का निर्माण कराया गया। इस पहल ने गांवों की गलियों और खुले रास्तों में गंदे पानी के जमावड़े को पूरी तरह समाप्त कर दिया। यह सारा पानी सोक पिट्स के जरिए फिल्टर होकर सीधे जमीन के भीतर उतरता है, जिससे गांवों के स्थानीय जलभृतों को स्थायी रूप से रीचार्ज करने में सफलता मिली है।
अपशिष्ट से जैव-ऊर्जा: एसटीपी कीचड़ से कंप्रेस्ड बायो-गैस (सीबीजी) और ‘गोबरधन’ मॉडल
जल शोधन प्रक्रिया को शून्य-अपशिष्ट बनाते हुए मोदी सरकार ने सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांट्स से निकलने वाले बायो-स्लज (कीचड़) और ग्रामीण जैविक कचरे को ऊर्जा में बदलने की नीति बनाई है। ‘गोबरधन’ योजना और सैटैट पहल के तहत बड़े शहरों के एसटीपी पर स्लज-टू-बायोगैस संयंत्र लगाए जा रहे हैं, जो पानी के शोधन के दौरान निकलने वाले ठोस कचरे से कंप्रेस्ड बायो-गैस और उच्च गुणवत्ता वाली जैविक खाद तैयार करते हैं। इससे नदियों में कीचड़ का विसर्जन पूरी तरह बंद हुआ है और जल शोधन संयंत्र ऊर्जा उत्पादन के आत्मनिर्भर केंद्र बन रहे हैं।
‘अर्थ गंगा’ मॉडल: नदियों के किनारों पर टिकाऊ आजीविका और शून्य बजट प्राकृतिक खेती
नमामि गंगे अभियान को केवल सफाई तक सीमित न रखकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसे आर्थिक और पारिस्थितिक दृष्टिकोण देते हुए ‘अर्थ गंगा’ की शुरुआत की। इसके तहत गंगा और उसकी सहायक नदियों के दोनों किनारों पर 5 किलोमीटर के व्यापक दायरे में रासायनिक खादों और कीटनाशकों के उपयोग पर रोक लगाकर प्राकृतिक खेती को मिशन मोड में बढ़ावा दिया गया। नदी तटों पर शून्य बजट प्राकृतिक खेती अपनाने से कृषि अपवाह के जरिए नदियों में जाने वाले रसायनों पर प्रभावी रोक लगी है, भूजल जहरीला होने से बचा है और स्थानीय किसानों के लिए ‘गंगा उत्पाद’ ब्रांड के माध्यम से टिकाऊ आजीविका और जल संरक्षण का एक सफल चक्र तैयार हुआ है।
श्री अन्न क्रांति: कम पानी की खपत वाली खेती से कृषि जल-पदचिह्न में भारी कटौती
भारत के कुल पानी का 80 प्रतिशत से अधिक हिस्सा कृषि में खर्च होता है, जिसमें धान और गन्ने जैसी फसलों की अनियंत्रित खेती ने भूजल का गंभीर दोहन किया है। इस चुनौती से निपटने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मोटे अनाजों (बाजरा, ज्वार, रागी) को ‘श्री अन्न’ के रूप में राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय आंदोलन बना दिया। जहां एक किलो धान उगाने में लगभग 3,000 से 5,000 लीटर पानी लगता है, वहीं श्री अन्न न्यूनतम पानी और सूखी जलवायु में भी तैयार हो जाते हैं। किसानों को दलहन, तिलहन और श्री अन्न की ओर मोड़ने की नीति ने देश के कृषि जल-पदचिह्न को घटाने में क्रांतिकारी भूमिका निभाई है।
‘जल संचय जनभागीदारी’ (जेएसजेबी) और सीएसआर सहभागिता: 24,000+ वर्षा जल संरचनाएं
सूरत, गुजरात से शुरू हुआ ‘जल संचय जनभागीदारी‘ अभियान जल संरक्षण के क्षेत्र में जन-आंदोलन और कॉरपोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व (सीएसआर) का उत्कृष्ट संगम बनकर उभरा है। “जल है तो कल है” के संकल्प के साथ जल बचाने की दिशा में समाज और सरकार की साझा जिम्मेदारी स्थापित की गई है। मोदी सरकार ने देश के प्रमुख उद्योग घरानों को सीएसआर फंड का बड़ा हिस्सा जल-तनावग्रस्त क्षेत्रों में लगाने के लिए प्रेरित किया। इसके फलस्वरूप सामाजिक संगठनों और उद्योगों ने मिलकर 24,000 से अधिक वर्षा जल संचयन संरचनाएं, बोरवेल रीचार्ज शाफ्ट और चेकडैम तैयार किए हैं। यह सहभागिता साबित करती है कि जल सुरक्षा केवल सरकारी बजट का दायित्व नहीं, बल्कि जन-जन का साझा राष्ट्रीय कर्तव्य है।
पारंपरिक जल धरोहरों का कायाकल्प: 24.24 लाख जल स्रोतों की पहली विस्तृत गणना और प्राचीन बावड़ियों का उद्धार
मोदी सरकार ने “विकास भी, विरासत भी” के मंत्र को जल संरक्षण में पूरी तरह चरितार्थ किया है। जल शक्ति मंत्रालय द्वारा देश के इतिहास में पहली बार ‘जल स्रोतों की अखिल भारतीय गणना‘ कराई गई, जिसमें देश भर के 24,24,540 पारंपरिक जल स्रोतों (तालाब, टैंक, बावड़ी और झीलें) का विस्तृत वैज्ञानिक डेटाबेस तैयार किया गया। पुरातन जल प्रबंधन को पुनर्जीवित करते हुए अमृत सरोवर मिशन, ‘अमृत 2.0’ और ‘जल संचय जनभागीदारी’ के अंतर्गत देश के कोने-कोने में उपेक्षित पड़ी हजारों प्राचीन बावड़ियों, कुओं, जोहड़ों और कुंडों से गाद हटाकर उन्हें नया जीवन दिया गया है, जिससे वर्षा जल संचयन की भारतीय परंपरा फिर से समृद्ध हुई है।

पारंपरिक जल ज्ञान का पुनरुद्धार: ‘धारा’ और भारत की पुरातन जल विद्या
भारत के पास जल संरक्षण का हजारों साल पुराना समृद्ध ज्ञान भंडार रहा है। मोदी सरकार ने ‘धारा’ (ड्राइविंग होलिस्टिक एक्शन फॉर अर्बन रिवर्स) और ‘विकास भी विरासत भी’ की भावना के तहत देश की प्राचीन जल संचयन पद्धतियों का वैज्ञानिक दस्तावेजीकरण किया है। धोलावीरा की अद्वितीय वर्षा जल संचयन प्रणाली, दक्षिण भारत की चोल कालीन ‘एरी’ व्यवस्था, राजस्थान के ‘टांका-जोहड़’ और गुजरात की ऐतिहासिक बावड़ियों के वास्तुशिल्प को आधुनिक सिविल इंजीनियरिंग और शहरी योजनाओं में शामिल किया गया है। यह प्राचीन भारतीय जल-संस्कारों को आधुनिक जल सुरक्षा का अनिवार्य अंग बनाने का अनूठा प्रयास है।
राष्ट्रीय जल पुरस्कार: राज्यों और पंचायतों में जल संरक्षण का ‘प्रतियोगी संघवाद’
जल संरक्षण के प्रति स्वस्थ प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा देने के लिए मोदी सरकार ने ‘राष्ट्रीय जल पुरस्कार’ की शुरुआत की। प्रतिवर्ष उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वाले राज्यों, जिलों, ग्राम पंचायतों, नगरीय निकायों, स्कूलों और गैर-सरकारी संगठनों को राष्ट्रपति और जल शक्ति मंत्री द्वारा सम्मानित किया जाता है। इस नीतिगत नवाचार ने प्रतियोगी और सहयोगात्मक संघवाद को जन्म दिया है, जिसके चलते राज्य और स्थानीय निकाय अपने जल स्रोतों के पुनरुद्धार, भूजल संभरण और आधुनिक जल प्रबंधन के लिए एक-दूसरे से आगे निकलने के प्रयास में सक्रिय रूप से जुटे हुए हैं।
बांध सुरक्षा अधिनियम 2021: 6,545 से अधिक बड़े बांधों की संरक्षा और डीआरआईपी से कायाकल्प
भारत बड़े बांधों की संख्या के मामले में अमेरिका और चीन के बाद दुनिया में तीसरे स्थान पर है। देश के जल भंडारण और लाखों नागरिकों की सुरक्षा के लिए मोदी सरकार ने चार दशकों से लंबित ‘बांध सुरक्षा अधिनियम 2021’ संसद से पारित कराया। इसके तहत राष्ट्रीय बांध सुरक्षा प्राधिकरण (एनडीएसए) का गठन कर देश के 6,545 से अधिक बड़े बांधों के लिए मानसून से पहले और बाद का अनिवार्य सुरक्षा ऑडिट लागू किया गया। इसके अतिरिक्त, 10,200 करोड़ रुपये से अधिक के बांध पुनर्वास और सुधार परियोजना (डीआरआईपी) के माध्यम से पुराने बांधों की संरचनात्मक सुदृढ़ता और आधुनिक हाइड्रोलॉजिकल निगरानी सुनिश्चित की जा रही है।
भारत में बांधों की स्थिति
भारत आज विश्व स्तर पर सबसे बड़े बांध श्रेणियों में से एक का प्रबंधन करता है।
यह 6628 निर्दिष्ट बांधों के साथ दुनिया में तीसरे स्थान पर है, जिनमें से 6,545 चालू हैं और 83 बांध निर्माणाधीन हैं।
इन बांधों की सकल जल भंडारण क्षमता लगभग 330 अरब क्यूबिक… pic.twitter.com/vcioCShQD9— Akashvani आकाशवाणी (@AkashvaniAIR) May 23, 2026
अंतरिक्ष तकनीक और एआई आधारित निगरानी: ‘इंडिया-WRIS’ और इसरो सैटेलाइट रिमोट सेंसिंग
मोदी सरकार ने जल सुरक्षा को अंतरिक्ष विज्ञान और आधुनिक कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) से सशक्त बनाया है। इसरो के सुदूर संवेदी उपग्रहों और ‘इंडिया वाटर रिसोर्स इंफॉर्मेशन सिस्टम’ पोर्टल के जरिए देश के प्रत्येक जल निकाय, नदी बेसिन, बर्फ पिघलने और जलाशयों के जलस्तर की रीयल-टाइम डिजिटल निगरानी की जा रही है। एआई एल्गोरिदम की मदद से वर्षा के पैटर्न और जलभृतों के पुनर्भरण का सटीक विश्लेषण किया जा रहा है। अंतरिक्ष विज्ञान का यह समावेशी उपयोग देश के योजनाकारों को भविष्य के जल संकट की अग्रिम चेतावनी देकर सटीक नीतियां बनाने में सक्षम बना रहा है।
आपदा प्रबंधन और नेशनल हाइड्रोलॉजी प्रोजेक्ट: रीयल-टाइम डेटा और पूर्व बाढ़ चेतावनी प्रणाली
जलवायु परिवर्तन के कारण अचानक आने वाली बाढ़ और सूखे के खतरों से निपटने के लिए मोदी सरकार ने नेशनल हाइड्रोलॉजी प्रोजेक्ट के जरिए पूरे देश में एक अत्याधुनिक जल-सूचना तंत्र स्थापित किया है। देश भर की प्रमुख नदी घाटियों और बांधों में हजारों ऑटोमैटिक वेदर स्टेशन और टेलीमेट्री सेंसर लगाए गए हैं, जो केंद्रीय जल आयोग को रीयल-टाइम हाइड्रोलॉजिकल डेटा प्रदान करते हैं। इस वैज्ञानिक प्रणाली की मदद से रीयल-टाइम आधार पर बाढ़ की पूर्व चेतावनी जारी की जा रही है, जिससे जान-माल की हानि रोकी जा रही है और जलाशयों में पानी का भंडारण वैज्ञानिक संतुलन के साथ किया जा रहा है।
‘स्वच्छ भारत मिशन’ और भूजल सुरक्षा: 12 करोड़ से अधिक ग्रामीण शौचालयों से जलस्रोतों का बचाव
खुले में शौच और अनुपचारित ग्रामीण अपशिष्ट दशकों से भारत के सतही और भूमिगत जल को भारी मात्रा में प्रदूषित कर रहे थे। स्वच्छ भारत मिशन (ग्रामीण) के तहत देश भर में 12 करोड़ से अधिक शौचालयों का निर्माण कराया गया है, जबकि इसके दूसरे चरण के तहत गांवों में ठोस और तरल अपशिष्ट प्रबंधन और ओडीएफ प्लस मॉडल लागू किया गया है। इस नीतिगत प्रयास ने गांवों के कुओं, नलकूपों और तालाबों में जीवाणु तथा कॉलीफॉर्म संक्रमण को रोककर देश के प्राथमिक पेयजल भंडारों को स्थायी रूप से सुरक्षित बनाया है।
मनरेगा का जल-केंद्रित रूपांतरण: 65% बजट जल संरक्षण और स्थायी परिसंपत्ति निर्माण में
महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) को मोदी सरकार ने केवल मजदूरी वितरण के साधन से बदलकर देश की स्थायी जल संपदा सृजन का प्रमुख औजार बना दिया है। प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन और जल सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता देते हुए मनरेगा का 65 प्रतिशत बजट विशेष रूप से जल संरक्षण और भूजल संचयन से जुड़ी स्थायी परिसंपत्तियों के निर्माण पर खर्च किया जा रहा है। इसके अंतर्गत देश भर के ग्रामीण अंचलों में लाखों चेकडैम, फार्म पौंड, कंटूर ट्रेंच, मेड़बंदी और जल सोखने वाले गड्ढों का निर्माण किया गया है, जिसने ग्रामीण भारत में भूजल पुनर्भरण को विशाल आधार दिया है।
मनरेगा के अंतर्गत ओवर एक्सप्लॉयटेड और क्रिटिकल जिलों में 65% बजट जल संरक्षण 💧 के कार्यो के लिए खर्च किया जाएगा ।#ViksitBharat_G_RAM_G#WaterSecureBharat pic.twitter.com/9TCAvKRQEE
— National Water Mission (@nwmgoi) December 18, 2025
तटीय जल सुरक्षा और समुद्री जल विलवणीकरण: डिसेलिनेशन तकनीक से ताजे पानी का संरक्षण
तटीय राज्यों में मीठे पानी की बढ़ती कमी और भूजल में समुद्री खारेपन के प्रवेश को रोकने के लिए मोदी सरकार ने समुद्री जल विलवणीकरण को बढ़ावा दिया है। गुजरात (मांडवी, दहेज) और तमिलनाडु के तटीय क्षेत्रों में अत्याधुनिक डिसेलिनेशन प्लांट्स स्थापित किए गए हैं। समुद्री पानी को साफ कर भारी उद्योगों, रिफाइनरियों और नगरपालिकाओं को आपूर्ति की जा रही है। इस अभिनव व्यवस्था से तटीय उद्योगों की स्थानीय नदियों और भूजल पर निर्भरता लगभग समाप्त हो गई है, जिससे आंतरिक मीठा जल केवल नागरिकों के पीने और किसानों की फसलों के लिए सुरक्षित बचा रहता है।
राष्ट्रीय अवसंरचना में जल संचयन: रेलवे और राष्ट्रीय राजमार्गों का रेनवाटर मॉडल
मोदी सरकार ने देश के विशाल आधुनिक इन्फ्रास्ट्रक्चर नेटवर्क को जल संचयन का जरिया बनाया है। भारतीय रेलवे ने अपने 2,000 से अधिक प्रमुख स्टेशनों, वर्कशॉप्स और कॉलोनियों में अत्याधुनिक वाटर रीसायकल और रेनवाटर हार्वेस्टिंग प्लांट्स लगाए हैं, जिससे ट्रेनों की धुलाई में केवल रीसाइकल पानी का उपयोग हो रहा है। वहीं दूसरी ओर, भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (एनएचएआई) द्वारा दिल्ली-मुंबई एक्सप्रेसवे सहित सभी नए एक्सप्रेसवे के दोनों किनारों पर हर 500 मीटर की दूरी पर वर्षा जल संचयन सोकपिट्स और रीचार्ज कुओं का निर्माण अनिवार्य किया गया है। यह नेटवर्क अरबों लीटर वर्षा जल को सीधे भूजल में उतार रहा है।
‘पर ड्रॉप मोर क्रॉप’: 90 लाख हेक्टेयर से अधिक भूमि पर सूक्ष्म सिंचाई और जल संचयन
देश के कुल जल उपयोग का लगभग 80 प्रतिशत हिस्सा कृषि क्षेत्र में लगता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पारंपरिक बाढ़ सिंचाई पद्धति की जगह वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाते हुए ‘पर ड्रॉप मोर क्रॉप’ का मंत्र दिया। प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना के तहत ड्रिप और स्प्रिंकलर जैसी सूक्ष्म सिंचाई तकनीकों को बड़े पैमाने पर सब्सिडी देकर 120 लाख हेक्टेयर से अधिक कृषि भूमि को सूक्ष्म सिंचाई के दायरे में लाया गया है। इससे न केवल अरबों क्यूबिक मीटर भूजल की बचत हुई, बल्कि किसानों की लागत घटी और फसल उत्पादकता में 20 से 30 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई।
हर बूंद का बेहतर उपयोग, खेती को समृद्धि की दिशा में आगे बढ़ाने का एक महत्वपूर्ण कदम है।
प्रधानमंत्री राष्ट्रीय कृषि विकास योजना (PM-RKVY) के Per Drop More Crop (PDMC) घटक के माध्यम से सूक्ष्म सिंचाई को बढ़ावा दिया जा रहा है। इससे पानी के बेहतर उपयोग के साथ उर्वरक, श्रम और अन्य… pic.twitter.com/7PpnEJNitO
— Agriculture INDIA (@AgriGoI) September 19, 2026
‘पीएम कुसुम योजना’: 10 लाख से अधिक सोलर पंप और संतुलित भूजल प्रबंधन
कृषि क्षेत्र में ऊर्जा और जल के संतुलन को साधने के लिए मोदी सरकार ने ‘पीएम कुसुम’ योजना को जमीन पर उतारा। इस योजना के तहत देश भर में 10 लाख से अधिक स्टैंडअलोन सोलर कृषि पंप स्थापित किए गए हैं और हजारों कृषि फीडरों का सौरीकरण किया गया है। दिन के समय सौर ऊर्जा से निर्बाध बिजली मिलने के कारण किसानों को रात के समय पानी लगाने की विवशता से मुक्ति मिली है। साथ ही, सौर ऊर्जा की उपलब्धता के अनुसार पानी के उपयोग को सीमित करने से अंधाधुंध भूजल दोहन पर प्रभावी लगाम लगी है और थर्मल पावर से जुड़ी जल खपत में कमी आई है।
पीएम-कुसुम योजना: खेती को ऊर्जा, किसानों को नई ताकत
🔸प्रधानमंत्री किसान ऊर्जा सुरक्षा एवं उत्थान महाभियान (PM-KUSUM) के साथ, खेती में सौर ऊर्जा का दायरा लगातार बढ़ रहा है
🔸सूरज की रोशनी अब खेतों की ताकत बन रही है।
🔸यह योजना जहां किसानों को भरोसेमंद ऊर्जा दे रही है तो वहीं… pic.twitter.com/yPHrdW0StF
— पीआईबी हिंदी (@PIBHindi) April 17, 2026
गुजरात का जल मॉडल: सौनी योजना और चेकडैम का सफल प्रयोग
नरेंद्र मोदी के जल प्रबंधन विजन की जड़ें गुजरात में उनके मुख्यमंत्री काल से जुड़ी हैं। कभी पानी के भीषण संकट और सूखे से जूझने वाले गुजरात में उन्होंने जनभागीदारी से लाखों चेकडैम और बोरीबंध बनवाए। इसके बाद ‘सुजलाम सुफलाम’ और महत्वाकांक्षी ‘सौनी योजना’ के माध्यम से नर्मदा के अतिरिक्त पानी को पाइपलाइनों के विशाल नेटवर्क द्वारा सौराष्ट्र और कच्छ के सैकड़ों बांधों तक पहुंचाया गया। इस अभूतपूर्व प्रयोग ने सूखे से त्रस्त बंजर जमीन को लहलहाते खेतों में बदल दिया और यही सफल गुजरात मॉडल आज राष्ट्रीय स्तर पर जल सुरक्षा की रीढ़ बना हुआ है।
कैनाल टॉप सोलर क्रांति: नहरों पर सौर संयंत्रों से वाष्पीकरण पर रोक और भूमि की बचत
गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी ने दुनिया का पहला ‘कैनाल टॉप सोलर प्रोजेक्ट’ नर्मदा नहर पर शुरू करके वैश्विक जल-ऊर्जा नवाचार की नींव रखी थी। आज इस मॉडल को देश के कई राज्यों में अपनाया जा चुका है। सिंचाई नहरों के ऊपर सोलर पैनल लगाने से बिना एक इंच भूमि का अधिग्रहण किए स्वच्छ बिजली उत्पन्न होती है। सबसे बड़ा लाभ यह है कि तीखी धूप में बहने वाले पानी पर छाया रहने से प्रतिवर्ष करोड़ों लीटर पानी वाष्पीकरण से सूखने से बच जाता है। वहीं नीचे बहते शीतल जल के प्रभाव से सोलर पैनल्स की दक्षता में भी 2 से 3 प्रतिशत की वृद्धि होती है।
फ्लोटिंग सोलर क्रांति: जल वाष्पीकरण पर रोक और हरित बिजली का दोहरा संगम
जलाशयों में पानी की सुरक्षा और स्वच्छ ऊर्जा के उत्पादन को एक साथ साधते हुए मोदी सरकार ने देश के प्रमुख बांधों पर फ्लोटिंग सोलर (तैरते सौर संयंत्र) परियोजनाओं का जाल बिछाया है। मध्य प्रदेश के ओंकारेश्वर बांध (600 मेगावाट क्षमता), तेलंगाना के रामागुंडम और केरल के कायाकुलम जलाशयों पर स्थापित इन तैरते संयंत्रों ने कमाल दिखाया है। विशाल जल सतह को सोलर पैनल्स से ढकने के कारण भीषण गर्मियों में पानी के वाष्पीकरण में 60 से 70 प्रतिशत तक की कमी आई है, जिससे अरबों लीटर बहुमूल्य जल सूखने से बच रहा है। साथ ही, बिना किसी भूमि अधिग्रहण के भारी मात्रा में हरित ऊर्जा उत्पन्न हो रही है।
कैचमेंट एरिया संरक्षण: ‘एक पेड़ मां के नाम’ अभियान और 100 करोड़ से अधिक पौधों का रोपण
नदियों और जल स्रोतों के प्रवाह को बनाए रखने के लिए उनके जलग्रहण क्षेत्रों में हरित आवरण होना अनिवार्य है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा 5 जून 2024 को शुरू किए गए ‘एक पेड़ मां के नाम’ जन-आंदोलन ने पर्यावरण और जल संरक्षण को जन-संवेदना से जोड़ दिया। वर्ष 2026 तक देश भर में 100 करोड़ से अधिक पौधे रोपने का कीर्तिमान स्थापित किया गया है। नदियों के तटों और पहाड़ों पर लगाए गए ये वृक्ष मृदा अपरदन को रोककर वर्षा जल को भूमि के भीतर समाहित कर प्राकृतिक जलभृतों को तेजी से रीचार्ज कर रहे हैं।
शहरी जल सुरक्षा और अमृत 2.0: 4,800 से अधिक शहरों को ‘वाटर सिक्योर’ बनाने का लक्ष्य
भविष्य में जल संकट का सबसे बड़ा दबाव तेजी से बढ़ते शहरों पर आने वाला है। इसे पहले ही भांपते हुए मोदी सरकार ने 2.87 लाख करोड़ रुपये के परिव्यय के साथ ‘अमृत 2.0’ मिशन लागू किया। इस योजना का मुख्य उद्देश्य देश के 4,800 से अधिक सांविधिक नगरों में शत-प्रतिशत घरों तक नल कनेक्शन पहुंचाना, सीवरेज कवरेज बढ़ाना और शहरी जलस्रोतों का कायाकल्प करना है। वाटर सिक्योर सिटीज की अवधारणा पर काम करते हुए शहरों में पुरानी झीलों और बावड़ियों को पुनर्जीवित किया जा रहा है, ताकि आने वाले समय में शहरी आबादी को किसी भी प्रकार के जल आपातकाल से बचाया जा सके।
‘भारत-टैप’ पहल और ग्रीन बिल्डिंग नॉर्म्स: आधुनिक उपकरणों से 40% तक जल बचत
शहरी क्षेत्रों में पानी की बर्बादी रोकने के लिए आवास और शहरी कार्य मंत्रालय ने ‘भारत-टैप’ पहल शुरू की है। इसके तहत कम प्रवाह वाले आधुनिक सैनिटरी फिक्सचर्स (नलों, फ्लश और शॉवर्स) के लिए भारतीय मानक ब्यूरो के सहयोग से स्टार-रेटिंग प्रणाली लागू की गई। जिस तरह बिजली बचाने के लिए 5-स्टार उपकरण होते हैं, उसी तरह प्रमाणित जल-कुशल उपकरणों के उपयोग से घरेलू स्तर पर पानी की खपत में 30 से 40 प्रतिशत तक की सीधी बचत हो रही है। नए आवासीय परिसरों में रेनवाटर हार्वेस्टिंग और ड्यूल प्लंबिंग सिस्टम को अनिवार्य कर शहरी जल पदचिह्न को काफी घटाया गया है।
जल पुनर्चक्रण और चक्रीय अर्थव्यवस्था: उद्योगों में शोधित अपशिष्ट जल का अनिवार्य उपयोग
भावी जल संकट से निपटने के लिए ताजे जलस्रोतों पर दबाव कम करना अनिवार्य है। मोदी सरकार ने चक्रीय जल अर्थव्यवस्था को राष्ट्रीय नीति का हिस्सा बनाया। इसके तहत शहरों से निकलने वाले सीवेज को आधुनिक एसटीपी के जरिए शोधित किया जा रहा है। सरकार ने थर्मल पावर प्लांट्स और औद्योगिक इकाइयों के लिए संयंत्र के 50 किलोमीटर के दायरे में स्थित एसटीपी से निकलने वाले शोधित अपशिष्ट जल का उपयोग अनिवार्य कर दिया है। ताजे और भूजल को औद्योगिक खपत से बचाकर केवल पीने और खेती के लिए सुरक्षित किया जा रहा है।
ग्रीन हाइड्रोजन मिशन और जल संतुलन: ताजे पानी पर शून्य दबाव की नीति
भारत को स्वच्छ ऊर्जा और हरित हाइड्रोजन का वैश्विक हब बनाने के लिए शुरू किए गए ‘राष्ट्रीय ग्रीन हाइड्रोजन मिशन’ में मोदी सरकार ने दूरदर्शी जल नीति लागू की है। इलेक्ट्रोलाइजर के जरिए हाइड्रोजन उत्पादन में भारी मात्रा में पानी की आवश्यकता होती है। इसे देखते हुए नीतिगत रूप से यह अनिवार्य किया गया है कि ग्रीन हाइड्रोजन उत्पादन में केवल शोधित अपशिष्ट जल या समुद्री पानी के विलवणीकरण का ही उपयोग होगा। इस अग्रगामी निर्णय ने यह सुनिश्चित किया है कि भविष्य के स्वच्छ ऊर्जा उद्योग का देश के पीने के पानी और खेती के जल संसाधनों पर कोई प्रतिकूल प्रभाव न पड़े।
जल सुरक्षा में स्टार्टअप्स और नवाचार: ‘वाटर इनोवेशन’ इकोसिस्टम और जेडएलडी मानक
जल प्रबंधन को सरकारी विभागों की पारंपरिक कार्यशैली से बाहर निकालते हुए मोदी सरकार ने जल क्षेत्र को आधुनिक स्टार्टअप्स और निजी क्षेत्र के नवाचारों से जोड़ा है। ‘अमृत 2.0’ के तहत ‘वाटर स्टार्टअप्स’ को फंडिंग और तकनीकी सहायता दी गई है, जो एआई और सेंसर के जरिए भूमिगत पाइपलाइनों में रिसाव पकड़ने, भूजल निगरानी और कम लागत वाले शोधन संयंत्र बनाने पर काम कर रहे हैं। इसके साथ ही रासायनिक, कपड़ा और भारी उद्योगों के लिए ‘जीरो लिक्विड डिस्चार्ज’ (जेडएलडी) मानकों को अनिवार्य किया गया है, जिससे उद्योगों से निकलने वाले पानी की एक भी बूंद बर्बाद न हो और उसे शत-प्रतिशत रीसायकल किया जा सके।
भावी पीढ़ी में जल संस्कार: ‘जल प्रहरी’, वाटर क्लब और शैक्षणिक पाठ्यक्रम का हिस्सा
जल संरक्षण को आने वाली पीढ़ी के स्वभाव का हिस्सा बनाने के लिए मोदी सरकार ने इसे शैक्षणिक नीतियों से जोड़ा है। ‘जल शक्ति अभियान’ के तहत देश भर के लाखों विद्यालयों और उच्च शिक्षण संस्थानों में ‘जल प्रहरी’ और ‘वाटर क्लब’ बनाए गए हैं। राष्ट्रीय शिक्षा नीति के अंतर्गत सीबीएसई और राज्य शिक्षा बोर्डों के पाठ्यक्रमों में जल साक्षरता, वर्षा जल संचयन और जल ऑडिट को व्यावहारिक प्रोजेक्ट के रूप में शामिल किया गया है। युवा शक्ति को जल-जागरूक बनाकर देश ने भावी जल युद्धों के खिलाफ सबसे मजबूत सामाजिक और सांस्कृतिक ढाल तैयार कर ली है।
जल प्रहरी 2025 सुजलाम भारत की दिशा में एक पहल….#JalPrahari #JalShakti#SujalamBharat pic.twitter.com/0G37Auf1SK
— C R Paatil (@CRPaatil) December 11, 2025
हरित ऊर्जा महाशक्ति: 260+ GW गैर-जीवाश्म क्षमता और ‘पीएम सूर्य घर मुफ्त बिजली योजना’
जल सुरक्षा और पर्यावरण संरक्षण एक-दूसरे के पूरक हैं। मोदी सरकार के सशक्त प्रयासों से वर्ष 2026 में भारत की गैर-जीवाश्म ईंधन आधारित स्थापित विद्युत क्षमता 260 गीगावाट के पार पहुंच चुकी है, जो कुल स्थापित क्षमता के 50 प्रतिशत से अधिक के मील के पत्थर को पार कर गई है। सौर और पवन ऊर्जा के क्षेत्र में भारत वैश्विक नेतृत्वकर्ता बनकर उभरा है। इसी कड़ी में ‘पीएम सूर्य घर मुफ्त बिजली योजना’ ने आम नागरिकों को ऊर्जा उत्पादक बना दिया है। छतों पर सोलर पैनल लगाकर 1 करोड़ परिवारों को 300 यूनिट तक मुफ्त बिजली देने का यह संकल्प कार्बन उत्सर्जन घटाने और पारंपरिक ऊर्जा संयंत्रों पर पानी की निर्भरता कम करने में गेम-चेंजर साबित हो रहा है।
पर्यावरण के लिए जीवनशैली: ‘मिशन LiFE’ और 101 रामसर वेटलैंड्स का वैश्विक नेटवर्क
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दुनिया को ‘मिशन LiFE’ का मंत्र देकर पर्यावरण संरक्षण को हर नागरिक की व्यक्तिगत जिम्मेदारी से जोड़ा। इसके साथ ही प्राकृतिक जल स्रोतों और आर्द्रभूमियों के संरक्षण के प्रति सरकार की प्रतिबद्धता का परिणाम है कि वर्ष 2026 में भारत में अंतरराष्ट्रीय महत्व के रामसर स्थलों की संख्या बढ़कर 101 हो चुकी है। यह दक्षिण एशिया में सबसे बड़ा नेटवर्क है। ये वेटलैंड्स बाढ़ नियंत्रण, भूजल संभरण और जैव विविधता के संरक्षण में प्राकृतिक स्पंज की तरह काम कर रहे हैं।
आधुनिक तकनीक और डिजिटल जल प्रबंधन: IoT सेंसर और NAQUIM से 3D मैपिंग
मोदी सरकार ने पारंपरिक जल संचयन को इक्कीसवीं सदी की उन्नत तकनीक से जोड़कर एक पारदर्शी और सटीक प्रणाली बनाई है। जल जीवन मिशन के तहत हजारों गांवों में इंटरनेट ऑफ थिंग्स आधारित स्मार्ट सेंसर लगाए गए हैं, जो पानी के दबाव, आपूर्ति की अवधि और उसकी गुणवत्ता की 24 घंटे डिजिटल निगरानी करते हैं। इसके अलावा राष्ट्रीय जलभृत मैपिंग कार्यक्रम (नाक्विम) और जीआईएस तकनीक के माध्यम से देश के 25 लाख वर्ग किलोमीटर से अधिक क्षेत्र के भूजल भंडारों का 3D वैज्ञानिक नक्शा तैयार किया गया है। तकनीक के इस सटीक उपयोग से पानी की बर्बादी और लीकेज को रोकने में मदद मिल रही है।
वैश्विक जल कूटनीति: 9वां भारत अंतरराष्ट्रीय जल सप्ताह और दुनिया का नेतृत्व
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारत के जल संरक्षण मॉडल को वैश्विक पटल पर मजबूती से स्थापित किया है। नई दिल्ली में 22-26 सितंबर 2026 को आयोजित 9वें भारत अंतरराष्ट्रीय जल सप्ताह में विश्व समुदाय का स्वागत करते हुए भारत ने ‘क्लाइमेट रेजिलिएंट वाटर मैनेजमेंट’ के अपने सफल अनुभव साझा किए हैं। नदी बेसिन प्रबंधन, अपशिष्ट जल के पुनर्चक्रण, जल उपयोग दक्षता और जनभागीदारी आधारित गवर्नेंस के भारतीय मॉडल को विकासशील और विकसित देशों के लिए व्यावहारिक समाधान माना गया है। अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन की तर्ज पर भारत वैश्विक जल सुरक्षा में एक निर्णायक मार्गदर्शक बनकर उभरा है।
25 साल का समर्पण, जल-सुरक्षित और आत्मनिर्भर भारत का आधार
सार्वजनिक जीवन में नरेंद्र मोदी के 25 वर्षों का सफर बताता है कि जब मजबूत राजनीतिक इच्छाशक्ति, सांस्कृतिक विरासत, रक्षा रणनीति, साइबर सुरक्षा, पर्वतीय व जनजातीय संतुलन, आकांक्षी दृष्टि और अत्याधुनिक अंतरिक्ष विज्ञान का समन्वय होता है, तो असंभव लक्ष्य भी संभव हो जाते हैं। स्थानीय कुओं-बावड़ियों के पुनरुद्धार से लेकर अंतरराष्ट्रीय संधियों पर कड़े रुख तक, लद्दाख की कड़ाके की ठंड में पाइपलाइन से जल पहुंचाने से लेकर छावनियों को नेट-जीरो वाटर बनाने तक, 68,000 अमृत सरोवरों से लेकर 15.9 करोड़ ग्रामीण परिवारों तक नल से जल पहुंचाने और 101 रामसर स्थलों के संरक्षण तक, भारत ने जल-सुरक्षा का ऐसा अभेद्य ढांचा तैयार किया है जो दुनिया के लिए प्रेरणा बन चुका है। यह मॉडल केवल पानी की व्यवस्था नहीं है, बल्कि यह आत्मनिर्भर, सामरिक रूप से सशक्त और भावी संकटों से पूरी तरह सुरक्षित भारत की सबसे मजबूत गारंटी है।










