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मान सरकार न नशे का कारोबार रोक पा रही और न ही एंटी ड्रग एक्टिविस्ट को बचा पा रही, जानिए 10 बड़ी वजह

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पंजाब में नशे का बढ़ता कारोबार और इसके खिलाफ आवाज उठाने वालों की हत्याएं भगवंत मान सरकार की कानून-व्यवस्था और नशा मुक्त पंजाब के वादे पर गंभीर सवाल खड़े कर रही हैं। जिस पंजाब को नशे की गिरफ्त से बाहर निकालने का वादा करके आम आदमी पार्टी सत्ता में आई थी, वहां आज नशे के खिलाफ लड़ाई लड़ने वाले एक्टिविस्ट्स की सुरक्षा भी चिंता का विषय बन गई है। एक तरफ नशे का जाल युवाओं के भविष्य को निगल रहा है, तो दूसरी तरफ इस कारोबार के खिलाफ आवाज उठाने वालों पर हमलों की घटनाएं सरकार की जवाबदेही पर सवाल खड़े करती हैं। आखिर पंजाब में नशे के सौदागरों पर प्रभावी कार्रवाई क्यों नहीं हो पा रही है? नशा विरोधी अभियान चलाने वालों को सुरक्षा देने में सरकार के सामने क्या चुनौती है? अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले ये सवाल और भी महत्वपूर्ण हो गए हैं। नशा मुक्त पंजाब का वादा केवल चुनावी घोषणा नहीं, बल्कि युवाओं और उनके परिवारों से जुड़ी उम्मीद थी। आगामी विधानसभा चुनाव में नशे का मुद्दा सरकार के लिए राजनीतिक चुनौती बन सकता है, लेकिन उससे भी बड़ी चुनौती उस सामाजिक संकट से निपटना है, जो पंजाब के युवाओं और उनके परिवारों के भविष्य को प्रभावित कर रहा है। केंद्र सरकार के सख्ती से कदम उठाते हुए राज्य में नशे की स्थिति और नशा विरोधियों पर हमलों को लेकर राज्य सरकार से जवाब मांगा है।बेखौफ तस्कर, असुरक्षित एक्टिविस्ट और सवालों में मान सरकार
पंजाब में नशे के खिलाफ जंग लड़ने का दावा करने वाली आम आदमी पार्टी सरकार के सामने अब दोहरी चुनौती है। नशा विरोधी एक्टिविस्ट्स की हत्याओं ने राज्य की कानून-व्यवस्था को लेकर आम जनमानस में चिंता बढ़ाई है। यह स्थिति ऐसे समय सामने आ रही है, जब पंजाब का युवा वर्ग नशे की समस्या से जूझ रहा है और परिवार अपने बच्चों के भविष्य को लेकर चिंतित हैं। पिछले विधानसभा चुनाव से पहले नशा मुक्त पंजाब का वादा आम आदमी पार्टी की राजनीति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है, लेकिन वादे और जमीनी हकीकत के बीच अंतर को लेकर उठते सवाल सरकार के लिए चुनौती बन गए हैं। आए दिन नशे और ड्रग्स के कारण हो रही मौतें चीख-चीखकर सरकार की नाकामी बता रही हैं। अब मान सरकार को अपने दावों से आगे बढ़कर यह साबित करना होगा कि नशे के कारोबार पर और इसके खिलाफ संघर्ष करने वालों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए जमीन पर ठोस कार्रवाई हो रही है।


मानसा-गुररदासपुर में एंटी-ड्रग एक्टिविस्ट्स की सरेआम हत्याएं
पंजाब में पिछले कुछ समय में नशा विरोधी कार्यकर्ताओं (एंटी-ड्रग एक्टिविस्ट्स) की सरेआम हत्याओं ने राज्य की कानून-व्यवस्था को पूरी तरह कटघरे में खड़ा कर दिया है। मानसा में परविंदर सिंह झोटा की सरेआम गोली मारकर हत्या और उसके तुरंत बाद गुरदासपुर में विक्रमजीत सिंह पर धारदार हथियारों से जानलेवा हमला, यह साबित करता है कि राज्य में नशा तस्करों के हौसले किस कदर बुलंद हैं। उनमें पुलिस-प्रशासन को लेकर जरा भी खौफ नहीं है। जब नशा बेचने वालों को बेनकाब करने वाले नागरिक ही सुरक्षित नहीं हैं, तो आम जनता की सुरक्षा की उम्मीद कैसे की जा सकती है? यह स्थिति केवल कानून-व्यवस्था की विफलता नहीं, बल्कि लोकतंत्र के उस चौथे स्तंभ और जागरूक नागरिकों पर सीधा हमला है जो समाज को खोखला होने से बचाना चाहते हैं।

 नशा मुक्त पंजाब का वादा, ‘चिट्टे’ की दलदल में धंस रहे युवा
आम आदमी पार्टी (आप) ने पंजाब में सरकार बनाने से पहले तीन महीने के भीतर नशा खत्म करने का पुरजोर वादा किया था। हालांकि, हकीकत यह है कि आज ‘नशा मुक्त पंजाब’ का नारा केवल कागजी दावों और राजनीतिक बयानों तक सिमट कर रह गया है। मुख्यमंत्री भगवंत मान, जिनके पास गृह मंत्रालय भी है, नशा तस्करों और गैंगस्टरों के गठजोड़ पर नकेल कसने में पूरी तरह नाकाम साबित हो रहे हैं। पुलिस प्रशासन की ढीली कार्यप्रणाली और राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी के कारण पंजाब का युवा आज भी ‘चिट्टे’ की दलदल में धंस रहा है। जब एक्टिविस्ट पुलिस के बजाय खुद तस्करों को पकड़ने के लिए मजबूर हो रहे हैं, तो यह सीधे तौर पर प्रशासनिक तंत्र की नाकामी को दर्शाता है।नशा तस्करों के बढ़ते हौंसले और पुलिस का की खौफ नहीं
पंजाब में नशा विरोधी कार्यकर्ताओं पर लगातार हो रहे हमले यह दिखाते हैं कि तस्करों के मन से कानून का खौफ पूरी तरह खत्म हो चुका है। जब कोई नागरिक जागरूक होकर नशे के खिलाफ आवाज उठाता है या सोशल मीडिया पर ड्रग माफिया को बेनकाब करता है, तो उसे सुरक्षा देने के बजाय तंत्र अकेला छोड़ देता है। नतीजतन, माफिया सरेआम दिन-दिहाड़े गोलियां चलाकर या हथियारों से हमला करके उनकी आवाज को हमेशा के लिए खामोश कर देता है। यह स्थिति राज्य में ‘माफिया राज’ की वापसी का संकेत देती है। पंजाब में नशे के कारोबार के पैर पसारने का एक बड़ा कारण पुलिस के निचले और मध्यम स्तर के अधिकारियों, कुछ नेताओं और ड्रग तस्करों के बीच का नापाक गठजोड़ है। कई मामलों में यह देखा गया है कि जब स्थानीय लोग पुलिस को तस्करों की जानकारी देते हैं, तो कार्रवाई होने के बजाय तस्करों को पहले ही भनक लग जाती है।

नशे के बड़े सौदागरों को राजनीतिक संरक्षण से कार्रवाई नहीं
पुलिस-नेता-माफिया की इस नापाक साठगांठ के कारण जमीनी स्तर पर नशे के सौदागरों के खिलाफ कोई भी ठोस कार्रवाई नहीं हो रही है। सरकार का नशा विरोधी अभियान महज एक दिखावा बनकर रह गया है। दरअसल, हकीकत यह है कि सरकार के पास नशे की समस्या से निपटने के लिए किसी दीर्घकालिक या व्यावहारिक नीति का अभाव साफ नजर आता है। सरकार केवल बड़ी रैलियों, शपथ ग्रहण कार्यक्रमों और विज्ञापनों के जरिए नशे के खिलाफ जंग का ढिंढोरा पीट रही है। जब तक ड्रग्स की सप्लाई चेन के शीर्ष पर बैठे ‘ बड़े मगरमच्छों’ को राजनीतिक संरक्षण से बाहर निकालकर जेल की सलाखों के पीछे नहीं भेजा जाता, तब तक केवल छोटे-मोटे पेडलर्स को पकड़ने से यह समस्या खत्म नहीं होने वाली है।

आम आदमी पार्टी की सरकार की अपने वादे को पूरा न करने की नाकामी के पीछे यह 10 अहम कारण हैं। आइए, इन पर एक नजर डालते हैं…

1. राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी और खोखले वादे: पंजाब में आम आदमी पार्टी की सरकार ने चुनाव से पहले ड्रग्स को पूरी तरह खत्म करने की समय-सीमा तय की थी, लेकिन सत्ता में आने के बाद इस गंभीर मुद्दे को राजनीतिक लाभ-हानि के तराजू में तौलना शुरू कर दिया गया, जिससे तस्करों के खिलाफ कड़े कदम नहीं उठाए जा रहे हैं।
2. पुलिस प्रशासन और तस्करों का गठजोड़: जमीनी स्तर पर काम करने वाले पुलिसकर्मियों और ड्रग माफिया के बीच का नेटवर्क बेहद मजबूत है। स्थानीय इनपुट लीक होने के कारण तस्कर हमेशा पुलिस की छापेमारी से एक कदम आगे रहते हैं। सरकार पर नशे के बड़े कारोबारियों के खिलाफ कार्रवाई न करने के भी खुलेआम आरोप लगते रहे हैं।
3. सिंडिकेट के ‘बड़े मगरमच्छों’ पर कार्रवाई न होना: पंजाब सरकार और पुलिस अक्सर केवल छोटे नशा बेचने वालों (पेडलर्स) को गिरफ्तार करके अपनी पीठ थपथपा लेती है। अंतरराष्ट्रीय और अंतर-राज्यीय सीमाओं से ड्रग्स की बड़ी खेप मंगवाने वाले मुख्य सरगना और सिंडिकेट के आका आज भी कानून की पहुंच से दूर हैं।

4. गैंगस्टर-तस्कर गठजोड़ (Narco-Terrorism): बेहद हैरानी की बात तो यह है कि पंजाब में जेलों के भीतर से और विदेशों में बैठे गैंगस्टरों द्वारा भी ड्रग नेटवर्क को संचालित किया जा रहा है। जेलें राज्य सरकार के अंडर में हैं, लेकिन ड्रग तस्करों पर अंकुश नहीं है। यहां तक कि नशा तस्करी से होने वाली कमाई का इस्तेमाल हथियारों की खरीद और गैंगस्टरों को फंडिंग करने के लिए हो रहा है, जिसे रोकने में राज्य का खुफिया तंत्र नाकाम रहा है।
5. ड्रोन और सीमा पार से तस्करी की नई चुनौतियां: पाकिस्तान सीमा से सटे होने के कारण पंजाब में ड्रोन के जरिए हेरोइन और हथियारों की सप्लाई में भारी बढ़ोतरी हुई है। कुछ माह पहले ही गंगानगर से राजस्थान पुलिस ने ऐसे तस्कर को पकडा, जो पाक की सप्लाई को पंजाब में करने जा रहा था। लेकिन सीमा सुरक्षा बल (BSF) के साथ मिलकर पंजाब पुलिस आधुनिक तकनीकी चुनौती और नई तस्करी तकनीकों का मुकाबला करने के लिए पुख्ता रणनीति नहीं बना पाई है।
6. युवाओं के लिए रोजगार और पुनर्वास नीति का अभाव: युवाओं के लिए खोखला ढोल पीटने वाले अरविंद केजरीवाल की मान सरकार पंजाब में युवाओं को रोजगार देने में विफल रही है। राज्य में बेरोजगारी की उच्च दर युवाओं को अवसाद और नशे की ओर धकेल रही है। इसके अलावा, जो युवा नशे की लत से बाहर निकलना चाहते हैं, उनके लिए राज्य में सरकारी नशामुक्ति और पुनर्वास केंद्रों की स्थिति बेहद दयनीय है, जहां दवाओं की कालाबाजारी और बुनियादी सुविधाओं की बेहद कमी है।

7. सिंथेटिक ड्रग्स और मेडिकल नशों पर लचर नियंत्रण: पारंपरिक हेरोइन (चिट्टा) के अलावा पंजाब में मेडिकल स्टोरों के जरिए प्रतिबंधित नशीली दवाओं और सिंथेटिक ड्रग्स की बिक्री धड़ल्ले से हो रही है। पंजाब की मान सरकार, स्वास्थ्य विभाग और ड्रग कंट्रोलर की सुस्ती के कारण ऐसे मेडिकल स्टोरों पर जानते-बूझते हुए भी नकेल नहीं कसी जा सकी है।
8. कानून-व्यवस्था का चरमराना और गवाहों की असुरक्षा: राज्य की ढीली न्याय प्रक्रिया के कारण ड्रग्स के मामलों में सजा की दर (Conviction Rate) बेहद कम है। गवाहों और एंटी-ड्रग एक्टिविस्ट्स को सुरक्षा न मिलने के कारण लोग अदालतों में माफिया के खिलाफ खड़े होने से लोग डरते हैं। इसे ड्रग्स माफिया के हौंसले और बुलंद होते हैं।
9. राज्य के खुफिया तंत्र की नाकामी: पंजाब पुलिस की खुफिया शाखा (State Intelligence) तस्करों के रूट, उनके वित्तीय लेन-देन, हवाला नेटवर्क और नए हॉटस्पॉट्स की पहचान करने में लगातार विफल साबित हो रही है। सक्रिय इनपुट के अभाव में पुलिस की कार्रवाई केवल घटना होने के बाद की प्रतिक्रिया बनकर रह गई है। पंजाब पुलिस ड्रग्स तस्करों को कंट्रोल करने के मामले में सांप के भागने के बाद लाठी पीटने की कहावत को चरितार्थ कर रही है।
10. सख्त कानूनों का सही क्रियान्वयन न होना: पंजाब में नशीले पदार्थों की तस्करी के खिलाफ बने कड़े कानूनों का दुरुपयोग छोटे उपभोक्ताओं को फंसाने में तो होता है, लेकिन ऊपर तक की पहुंच का फायदा उठाकर बड़े तस्कर आसानी से जमानत पर बाहर आ जाते हैं। उनके लिए कानून की गलियां तलाशने का काम कुछ राजनेता भी करते हैं। बड़े तस्कर जमानत पर बाहर आकर दोबारा अपने अवैध कारोबार में लिप्त हो जाते हैं।नशे की बदतर हालात पर केंद्र ने पंजाब से मांगा जवाब
भाजपा ने इस मुद्दे को राष्ट्रीय सुरक्षा और ‘नार्को-टेररिज्म’ से जोड़ते हुए केंद्र सरकार के स्तर पर सख्त कदम उठाने के संकेत दिए हैं। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने इन हत्याओं पर गहरी चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि पंजाब इस समय ड्रग्स, गैंगस्टरों और संगठित अपराध के गंभीर खतरे से जूझ रहा है। उन्होंने स्पष्ट किया कि केंद्रीय गृह मंत्रालय ने सख्ती से कदम उठाते हुए राज्य में नशे की स्थिति और नशा विरोधियों पर हमलों को लेकर राज्य सरकार से जवाब मांगा है। मानसा और गुररदासपुर में एंटी-ड्रग एक्टिविस्ट्स की सरेआम हत्याओं के अलावा संगरूर में गुलजार सिंह की आत्महत्या के मामलों में राज्य सरकार से जवाबदेही तय करने के लिए कहा है।

 

सीबीआई जांच के साथ भाजपा ने मुख्यमंत्री की इस्तीफा मांगा
भाजपा राष्ट्रीय महासचिव व राज्यसभा सांसद तरुण चुघ ने बटाला में दूसरे एक्टिविस्ट विक्रमजीत सिंह की हत्या के तुरंत बाद प्रेस कॉन्फ्रेंस करते हुए कहा कि मान सरकार मूकदर्शक बनी हुई है। उन्होंने मांग की कि इस पूरे नेक्सस की जांच CBI और NIA (राष्ट्रीय जांच एजेंसी) को सौंपी जानी चाहिए क्योंकि यह सिंडिकेट बहुत गहरा है। इसमें कई सफेदपोशों की गर्दनें फंस सकती हैं। पंजाब भाजपा इकाई ने मुख्यमंत्री भगवंत मान के इस्तीफे की मांग को लेकर प्रदर्शन भी किए हैं। पार्टी का आरोप है कि पंजाब में ड्रग्स के खिलाफ आवाज उठाने की सजा अब सीधे ‘मौत’ के रूप में मिल रही है, जिसके लिए सीधे तौर पर राज्य सरकार के मंत्री और प्रशासन जिम्मेदार हैं।

पंजाब की कानून-व्यवस्था का पूर्ण पतन – खुखबीर सिंह बादल
मानसा में परविंदर सिंह झोटा और बटाला में विक्रमजीत सिंह की सरेआम हत्याओं के बाद पंजाब के विपक्षी दलों विशेषकर भारतीय जनता पार्टी और शिरोमणि अकाली दल ने भगवंत मान सरकार और आम आदमी पार्टी (AAP) को चौतरफा घेरा है। विपक्षी नेताओं ने इन हत्याओं को प्रशासनिक नाकामी बताते हुए मुख्यमंत्री के इस्तीफे और केंद्रीय जांच एजेंसियों से जांच कराने की मांग की है। अकाली दल ने इसे पंजाब की कानून-व्यवस्था का पूर्ण पतन करार देते हुए भगवंत मान सरकार पर ड्रग तस्करों को संरक्षण देने का आरोप लगाया है। पूर्व उपमुख्यमंत्री सुखबीर सिंह बादल ने सीएम भगवंत मान पर तीखा हमला बोलते हुए उन्हें इस स्थिति के लिए सीधे तौर पर जिम्मेदार ठहराया और तुरंत इस्तीफे की मांग की। उन्होंने पीड़ित परिवार के प्रति एकजुटता व्यक्त की और मामले की CBI जांच कराने की मांग रखी।

जिसके खिलाफ चार केस उसे दोबारा आर्म्स लाइसेंस कैसे मिला
इसके अलावा बठिंडा से सांसद हरसिमरत कौर बादल ने परविंदर सिंह झोटा के परिवार से मुलाकात की और आरोप लगाया कि मान सरकार नशा खत्म करने के वादे से पलट चुकी है। ड्रग माफिया इस कदर बेखौफ है कि वह दिन-दिहाड़े नशा विरोधियों को मार रहा है, जबकि आम घरों तक नशा पहुंच चुका है। अकाली नेता बिक्रम सिंह मजीठिया ने मुख्य आरोपी के आर्म्स लाइसेंस पर गंभीर सवाल खड़े किए। उन्होंने कहा कि जिस आरोपी के खिलाफ पहले चार केस दर्ज थे और जिसका लाइसेंस रद्द हो चुका था, उसे दोबारा लाइसेंस कैसे मिला? यह सिस्टम और पुलिस की मिलीभगत को साफ-साफ दर्शाता है। अकाली दल के मुख्य प्रवक्ता अर्शदीप सिंह क्लेर ने कहा कि भगवंत मान मंचों से दावे करते थे कि उन्हें पता है नशा कहां बनता है, लेकिन साढ़े चार साल बाद स्थिति यह है कि राज्य में गायक, खिलाड़ी, व्यापारी और अब नशा विरोधी कार्यकर्ता सरेआम कत्ल किए जा रहे हैं।

 

 

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