प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने वर्ष 2047 तक भारत को एक विकसित राष्ट्र बनाने के लक्ष्य के साथ ‘We Will Do It’ का नया और ऊर्जावान नारा दिया है, जो देश के 140 करोड़ नागरिकों की सामूहिक शक्ति और आत्मविश्वास को दर्शाता है। अब इस नारे का असर मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर पर दिखाई देने लगा है। मोदी सरकार ने विदेशों खासकर चीन पर निर्भरता खत्म करने के लिए मैन्युफैक्चरिंग बढ़ाने के लिए एक के बाद एक बड़े कदम उठा रही है। जहां बुधवार को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अध्यक्षता में हुई केंद्रीय मंत्रिमंडल की बैठक में बड़े फैसले लिए गए, वहीं इससे पहले मोदी सरकार ने करीब 120 ऐसे प्रोडक्ट्स की पहचान की है, जिन्हें देश में ही बनाने की तैयारी की जा रही है। इसका मकसद जरूरी औद्योगिक सामान के आयात पर निर्भरता घटाना, घरेलू कंपनियों को बढ़ावा देना और सप्लाई चेन को मजबूत बनाना है।
🔸 #Cabinet approves #KheloIndia Sports Goods Manufacturing Scheme for building a globally competitive sports manufacturing ecosystem.
🔸 The scheme has a total financial outlay of ₹1,856.67 crore for the period 2026 to 2033–34.
🔸 The scheme has two parts: incentives that support manufacturing and interventions that build the wider ecosystem.
-Union Minister @AshwiniVaishnaw
#CabinetDecisions
— PIB India (@PIB_India) October 28, 2026
आयात पर निर्भरता खत्म करने की दिशा में ऐतिहासिक कदम
28 अक्टूबर,2026 को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अध्यक्षता में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने 10,000 करोड़ रुपये के कुल खर्च वाली कंटेनर विनिर्माण प्रोत्साहन योजना (Container Manufacturing Promotion Scheme – CMPS) को मंजूरी दी। यह योजना देश में शिपिंग कंटेनरों के घरेलू उत्पादन को बढ़ाने, वैश्विक लॉजिस्टिक्स व्यवधानों से निपटने और आयात पर भारी निर्भरता को खत्म करने की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम है। भारत वर्तमान में अपनी जरूरतों के लिए हर साल लगभग 20 लाख खाली कंटेनरों का आयात करता है, जिससे यह कदम भारत की समुद्री आपूर्ति श्रृंखला को आत्मनिर्भर बनाएगा।
केंद्रीय मंत्रिमंडल ने वित्त वर्ष 2039-40 तक के लिए 10,000 करोड़ रुपये के बजट के साथ ‘कंटेनर विनिर्माण संवर्धन योजना’ (सीएमपीएस) को मंजूरी दे दी है।
➣ इस योजना का उद्देश्य भारत में विश्व-स्तरीय प्रतिस्पर्धी कंटेनर निर्माण इकोसिस्टम तैयार करना, आयात पर निर्भरता कम करना और आपूर्ति शृंखला को और भी अधिक मजबूत बनाना है।
➣ इस योजना का मकसद नई निर्माण इकाइयों को समर्थन देना और मौजूदा कंटेनर निर्माण इकाइयों का विस्तार करना है।
विवरणः https://t.co/QPmqNRAyFm
#CabinetDecisions
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— पीआईबी हिंदी (@PIBHindi) October 28, 2026
कंटेनर विनिर्माण प्रोत्साहन योजना से होने वाले बड़े लाभ
केंद्रीय बजट 2026-27 में घोषित यह योजना वित्तीय वर्ष 2039-40 तक यानी अगले 13 वर्षों के लिए लागू की गई है। सरकार का अनुमान है कि इस प्रोत्साहन से भारत की वार्षिक कंटेनर निर्माण क्षमता लगभग दस गुना बढ़कर 7.5 लाख TEU (Twenty-foot Equivalent Unit) तक पहुंच जाएगी। वर्तमान में वैश्विक कंटेनर बाजार और विशेष रूप से चीनी विनिर्माण पर भारत की जो निर्भरता है, उसमें भारी कमी आएगी। इससे वैश्विक माल ढुलाई दरों के उतार-चढ़ाव और आपूर्ति श्रृंखला के व्यवधानों से भारतीय व्यापार सुरक्षित रहेगा। कंटेनर निर्माण से संबंधित सहायक उद्योगों जैसे कि विशेषीकृत स्टील, कॉर्नर कास्टिंग, लकड़ी के फ्रेम, और औद्योगिक पेंट्स के घरेलू बाजार को जबरदस्त गति मिलेगी।सरकार के अनुसार इस योजना से सीधे तौर पर 3,000 प्रत्यक्ष नौकरियां और लॉजिस्टिक्स व विनिर्माण क्षेत्र में 50,000 से अधिक अप्रत्यक्ष रोजगार के अवसर पैदा होंगे।
#Cabinet approves the Container Manufacturing Scheme to promote domestic manufacturing. The scheme will be implemented over 13 years
With a total outlay of ₹10,000 crore, the scheme has four components: interest subvention assistance, testing and certification assistance, land leasing support, and operational expenditure assistance
– Union Minister @AshwiniVaishnaw
#CabinetDecisions
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भारत में उत्पादन के लिए 120 प्रोडक्ट्स की पहचान
केंद्र सरकार का उद्योग एवं आंतरिक व्यापार संवर्धन विभाग (DPIIT) मैन्युफैक्चरिंग की इस पूरी कवायद को आगे बढ़ा रहा है। जिन 120 प्रोडक्ट्स की पहचान की गई है, उसमें एसिटिक एसिड जैसे केमिकल, फार्मास्युटिकल प्रोडक्ट्स और इनपुट, मेडिकल टेक्नोलॉजी से जुड़ी वस्तुएं, मशीन टूल्स, कंस्ट्रक्शन इक्विमेंट्स, क्रेन, और एयरोस्पेस क्षेत्र में मेंटेनेंस, रिपेयर और ऑपरेशंस में यूज होने वाले प्रोडक्ट्स शामिल हैं। इस लिस्ट में कुछ कंज्यूमर गुड्स भी शामिल हैं जिनमें फुटवियर वैल्यू चेन से जुड़े प्रोडक्ट्स भी हैं। सरकार ने चीन से टनल बोरिंग मशीनों की आपूर्ति पर बैन लगा रखा है। इन मशीनों के लिए एक अलग योजना पर भी काम चल रहा है।
चीन पर आयात की निर्भरता घटाने और घरेलू विनिर्माण को नई गति देने की दिशा में भारत आगे बढ़ रहा है।
120 महत्वपूर्ण उत्पादों की पहचान, कंपनियों को प्रोत्साहन और स्वदेशी तकनीक के विकास पर जोर से देश की उत्पादन क्षमता मजबूत होगी और आत्मनिर्भर भारत का लक्ष्य आगे बढ़ेगा। https://t.co/G7zCfsxW6O— Giriraj Singh (@girirajsinghbjp) October 28, 2026
उत्पादन को गति देने के लिए त्रि-स्तरीय रणनीति तैयार
मोदी सरकार अन्य सरकारी एजेंसियों को भी जोड़ने की कोशिश कर रही है। इसके साथ ही भारत में इन उत्पादों के उत्पादन को गति देने और विदेशी प्रतिस्पर्धा का मुकाबला करने के लिए सरकार ने त्रि-स्तरीय रणनीति तैयार की है:
1. अल्पकालिक सुरक्षा
शुरुआती चरणों में घरेलू कंपनियों को विदेशी सप्लायर्स (विशेषकर चीन से डंप किए जाने वाले सस्ते सामान) की भारी प्रतिस्पर्धा से बचाने के लिए कुछ सुरक्षात्मक उपाय या टैरिफ समायोजन किए जा रहे हैं। इसका मुख्य उद्देश्य भारतीय उद्योगों को अपनी क्षमता बढ़ाने और वैकल्पिक सप्लाई चेन तैयार करने के लिए एक सुरक्षित शुरुआती समय देना है। ठीक वैसी ही रणनीति जैसी मोबाइल फोन मैन्युफैक्चरिंग के शुरुआती दौर में अपनाई गई थी।
2. लागत संबंधी अक्षमताओं को दूर करना
भारत में कई बार लॉजिस्टिक्स, बिजली या महंगे वित्त (Capital) के कारण प्रॉडक्ट्स की लागत बढ़ जाती है। इसे पाटने के लिए सरकार पूंजीगत प्रोत्साहन या चरणबद्ध वित्तीय सहायता प्रदान करने पर विचार कर रही है। यह सहायता कंपनियों के टर्नओवर या उत्पादन के चरणों से जुड़ी हो सकती है, ताकि वैश्विक बाजार में भारतीय सामान कीमत के मामले में भी टिक सकें।
3. अनुसंधान और विकास (R&D) में सहायता
कई ऐसे हाई-टेक उत्पाद हैं जिनकी तकनीक अभी भारत में पूरी तरह उपलब्ध नहीं है। ऐसे मामलों में सरकार R&D (Research and Development) के लिए विशेष अनुदान और संस्थागत सहायता दे रही है, ताकि देश में ही अत्याधुनिक तकनीक और डिजाइन तैयार किए जा सकें।
Government identifies 120 items for local production push
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— आकाश गुप्ता (@iGAakaash) October 28, 2026
इस रणनीति के पीछे मुख्य उद्देश्य
हाल के वैश्विक घटनाक्रमों (जैसे पश्चिम एशिया के संकट, कोविड महामारी या भू-राजनीतिक तनाव) के दौरान यह साबित हो गया कि क्रिटिकल सप्लाई चेन पर किसी एक देश की निर्भरता खतरनाक हो सकती है। चीन के साथ बढ़ते व्यापार घाटे को पाटने और घरेलू उद्योगों को मजबूत करने के लिए यह कदम बेहद अहम है। इन 120 उत्पादों के देश में बनने से एमएसएमई (MSME) सेक्टर को मजबूती मिलेगी, देश के भीतर एक मजबूत वेंडर नेटवर्क तैयार होगा।
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— Usha Rani (@BBhagya28) October 28, 2026
आइए जानते हैं कि घरेलू मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा देने से देश को क्या क्या फायदे हो सकते हैं…
चीन जैसे देशों पर निर्भरता घटेगी
भारत जिन उत्पादों के लिए दूसरे देशों पर निर्भर है, उनका घरेलू उत्पादन बढ़ने से विदेशी सप्लाई में रुकावट आने पर भी उद्योगों को कच्चे माल और जरूरी पुर्जों की उपलब्धता बनाए रखने में मदद मिल सकती है। इससे सप्लाई चेन से जुड़े जोखिम घटेंगे। वर्तमान में भारत इलेक्ट्रॉनिक कंपोनेंट्स, कैपिटल गुड्स, बैटरी, और इंडस्ट्रियल मशीनरी जैसी कई चीजों के लिए चीन पर निर्भर है। जब ये उत्पाद और इनके इंटरमीडिएट प्रोडक्ट्स (कच्चा माल व पुर्जे) भारत में ही बनने लगेंगे, तो चीन से इनका आयात स्वतः कम हो जाएगा। वैश्विक कंपनियां अपनी निर्भरता किसी एक देश पर नहीं रखना चाहतीं। भारत में मैन्युफैक्चरिंग बेस मजबूत होने से वैश्विक स्तर की कंपनियां चीन के विकल्प के तौर पर भारत का रुख करेंगी।
विदेशी मुद्रा की बचत होगी
जिन उत्पादों का आयात कम होगा, उनके लिए देश से बाहर होने वाला भुगतान भी घटेगा। इससे विदेशी मुद्रा की बचत होगी। जिन उत्पादों और कच्चे माल को हम विदेशों से खरीदते हैं, जब उनका उत्पादन देश के भीतर ही होने लगता है, तो विदेश भेजने वाली राशि बच जाती है। वैश्विक संकटों (जैसे युद्ध या व्यापारिक तनाव) के समय विदेशों से आपूर्ति बाधित होने पर आयात महंगा हो जाता है और डॉलर की मांग बढ़ती है। स्वदेशी मैन्युफैक्चरिंग होने से बाहरी झटकों का असर कम होता है और रुपये पर पड़ने वाला दबाव घटता है।
रोजगार के नए अवसर बनेंगे
फैक्ट्रियों की संख्या बढ़ने और उत्पादन क्षमता का विस्तार होने से मैन्युफैक्चरिंग, पैकेजिंग, लॉजिस्टिक्स, वेयरहाउसिंग जैसे क्षेत्रों में रोजगार के अवसर बढ़ सकते हैं। छोटे और मझोले उद्योगों को भी बड़ी कंपनियों की सप्लाई चेन से जुड़ने का मौका मिलेगा। जब नई फैक्ट्रियां लगती हैं और मशीनें आती हैं, तो वहां मशीनों को चलाने, असेंबली, क्वालिटी कंट्रोल, पैकेजिंग और मैनेजमेंट के लिए लाखों लोगों की जरूरत होती है। भारत में मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में काम करने वालों की संख्या अब 2.7 करोड़ से अधिक हो गई है। प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव (PLI) योजना और ‘मेक इन इंडिया’ जैसी पहलों से विभिन्न उद्योगों में निवेश बढ़ा है, जिससे हाल के वर्षों में लाखों नए रोजगार पैदा हुए हैं।
कारोबार की प्रतिस्पर्धी क्षमता में सुधार
कैपिटल इंसेंटिव और तकनीकी सहायता से कंपनियों के लिए नई मशीनरी, आधुनिक तकनीक और उत्पादन क्षमता में निवेश करना आसान हो सकता है। बड़े पैमाने पर उत्पादन होने से प्रति यूनिट लागत घटने की संभावना भी रहती है। इससे भारतीय कंपनियां घरेलू बाजार के साथ अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी प्रतिस्पर्धा कर सकती हैं। जब देश में बड़े पैमाने पर उत्पादन (Mass Production) होता है, तो कंपनियों के लिए प्रति यूनिट फिक्स्ड कॉस्ट (प्रति इकाई लागत) कम हो जाती है, जिससे वे बाजार में कम कीमतों पर उत्पाद बेच सकती हैं। घरेलू स्तर पर पुर्जे या उत्पाद तैयार होने से शिपिंग का समय और माल ढुलाई (Freight) का भारी-भरकम खर्च बच जाता है।
भारतीय कंपनियों की तकनीकी क्षमता बढ़ेगी
R&D सपोर्ट मिलने से कंपनियां नई तकनीक विकसित करने, उत्पादों की गुणवत्ता सुधारने और आयातित तकनीक के विकल्प तैयार करने पर निवेश कर सकती हैं। इससे लंबे समय में देश की तकनीकी आत्मनिर्भरता बढ़ सकती है। भारतीय कंपनियाँ विदेशी तकनीक और पुर्जों पर निर्भर रहने के बजाय उनके स्वदेशी और सस्ते विकल्प तैयार करने की दिशा में काम कर रही हैं। उत्पादों की गुणवत्ता में सुधार: वैश्विक बाजार की प्रतिस्पर्धा में टिकने के लिए कंपनियाँ बेहतर डिजाइन, सटीकता (precision engineering) और उच्च गुणवत्ता वाले उत्पादों का निर्माण कर रही हैं। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), इंटरनेट ऑफ थिंग्स (IoT), रोबोटिक्स और ऑटोमेशन जैसी आधुनिक तकनीकों का प्रयोग फैक्ट्रियों में बढ़ रहा है, जिससे कंपनियों की बौद्धिक क्षमता और कार्यक्षमता में इजाफा हो रहा है।
बैटरी और सोलर जैसे रणनीतिक सेक्टर मजबूत होंगे
बैटरी और सोलर मैन्युफैक्चरिंग में मजबूत घरेलू सप्लाई चेन बनने से ऊर्जा क्षेत्र में आयात पर निर्भरता कम करने में मदद मिल सकती है। साथ ही, इलेक्ट्रिक वाहनों, ऊर्जा भंडारण और नवीकरणीय ऊर्जा परियोजनाओं के लिए जरूरी उपकरणों की घरेलू उपलब्धता बढ़ सकती है। केंद्रीय बजट 2026 में लिथियम-आयन सेल निर्माण, बैटरी ऊर्जा भंडारण प्रणालियों (BESS) पर मूल सीमा शुल्क में छूट और उत्पादन-लिंक्ड प्रोत्साहन (PLI) योजना के विस्तार से घरेलू विनिर्माण को गति मिली है।
Government identifies 120 items for local production push
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— Usha Rani (@BBhagya28) October 28, 2026
आइए जानते हैं, जहां भारत दूसरे देशों पर निर्भरता खत्म कर रहा है, वहीं भारत पर पाकिस्तान की निर्भरता कैसे बढ़ रही है…
भारत से पाकिस्तान के आयात में 69% की भारी बढ़ोतरी
इस बीच एक रिपोर्ट सामने आई है, जिसमें पाकिस्तान द्वारा की जा रही चोरी का खुलासा हुआ है। पाकिस्तान के केंद्रीय बैंक के आंकड़ों के मुताबिक वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही में पाकिस्तान द्वारा भारत से किए जाने वाले आयात में 69 प्रतिशत की भारी बढ़ोतरी दर्ज की गई है। इस अवधि में पाकिस्तान ने भारत से करीब 5,876 करोड़ रुपये ($61.74 मिलियन) का सामान मंगवाया है।
पाकिस्तान ने पिछले साल की इसी अवधि में 3,478 करोड़ रुपये का भारतीय सामान खरीदा था। खास बात यह है कि इस दौरान पाकिस्तान से भारत में एक रुपए का भी सामान नहीं आया यानी भारत का आयात पूरी तरह शून्य रहा। 2025 में पहलगाम में हुए आतंकी हमले के बाद भारत और पाकिस्तान के बीच डायरेक्ट ट्रेड यानी सीधा व्यापार पूरी तरह बंद है।
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पाकिस्तान के आयात में तीसरे देश की भूमिका
इस खुलासे के बाद सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि जब दोनों देशों के बीच व्यापारिक रिश्ते ठप हैं, तो आखिर भारतीय सामान पाकिस्तान कैसे पहुंच रहा है? विशेषज्ञों और थिंक टैंक ‘ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव’ (GTRI) के अनुसार पाकिस्तान में भारतीय प्रोडक्ट्स खासकर दवाइयां, फार्मास्युटिकल कच्चा माल, केमिकल्स, प्लास्टिक और कृषि उपकरण की भारी मांग है। इस मांग को पूरा करने के लिए ‘ग्रे-जोन स्ट्रेटेजी’ का इस्तेमाल किया जा रहा है। यानी तीसरे देश की भूमिका अहम होती है। भारत से निकलने वाला सामान सीधे पाकिस्तान जाने के बजाय दुबई, सिंगापुर या श्रीलंका जैसे देशों के बंदरगाहों पर भेजा जाता है।
India Pakistan Trade: सीधा व्यापार बंद, फिर भी भारत से पाक का आयात 69% बढ़ा! कैसे?
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भारतीय सामान पाकिस्तान कैसे पहुंच रहा है?
• ट्रांजिट हब भेजना: सबसे पहले भारतीय माल को कानूनी रूप से संयुक्त अरब अमीरात (UAE) या सिंगापुर जैसे देशों में भेजा जाता है।
• बॉन्डेड वेयरहाउस का खेल: इन देशों के इन-ट्रांजिट हब्स और बॉन्डेड वेयरहाउस में सामान को सुरक्षित रखा जाता है।
• लेबल और दस्तावेज बदलना: वेयरहाउस के भीतर ही माल के पैकेजिंग लेबल और शिपिंग दस्तावेजों में बदलाव किया जाता है। वहां से ‘मेड इन इंडिया’ का टैग हटाकर उस पर यूएई या संबंधित देश का नया ‘कंट्री ऑफ ओरिजिन’ दर्ज कर दिया जाता है।
• पाकिस्तान को फाइनल डिलीवरी: कागजों पर नए देश का नाम दर्ज होते ही यह माल कानूनी रूप से पाकिस्तान निर्यात कर दिया जाता है, जिससे प्रतिबंधों की बंदिशें बेअसर हो जाती हैं।
🚨 Reports: 🇵🇰 Pakistan’s recorded imports from 🇮🇳 India rose 68.9% to $61.74 million in July–September 2026, while India’s imports from Pakistan remain prohibited under its May 2025 order.
The route behind Pakistan’s recorded imports remains unclear, with third-country channels suggested as a possibility.
— Beats in Brief 🗞️ (@beatsinbrief) October 27, 2026
दवाइयों के लिए भारत पर निर्भर पाकिस्तान
NDTV वर्ल्ड समिट में अपने संबोधन के दौरान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने बताया कि दवाओं के कच्चे माल के लिए आयात पर निर्भरता कम करने की दिशा में भारत लगातार आगे बढ़ रहा है। वहीं अरब न्यूज की एक रिपोर्ट के मुताबिक, जुलाई से सितंबर 2025 के बीच पाकिस्तान ने भारत से 3.66 करोड़ डॉलर का सामान आयात किया। यह अवधि ऑपरेशन सिंदूर के कुछ हफ्तों बाद की है। रिपोर्ट में पाकिस्तान के केंद्रीय बैंक के आंकड़ों का हवाला दिया गया है। रिपोर्ट के अनुसार, इस दौरान भारत से पाकिस्तान भेजे गए सामान में लगभग पूरा हिस्सा दवाइयां बनाने में इस्तेमाल होने वाले कच्चे माल का था।

सालाना $10 अरब पहुंचेगा पाक का अनऑफिशियल ट्रेड
थिंक टैंक ‘ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव’ (GTRI) के संस्थापक अजय श्रीवास्तव के अनुसार, तीसरे देशों के रास्ते भारत और पाकिस्तान के बीच होने वाला अनऑफिशियल एक्सपोर्ट सालाना $10 बिलियन (लगभग ₹83,000 करोड़) से ज्यादा हो सकता है। सीधे व्यापार पर पाबंदी होने के कारण पाकिस्तानी उपभोक्ताओं को यही भारतीय सामान री-लेबलिंग और अतिरिक्त भाड़े की वजह से काफी ऊंची कीमतों पर खरीदना पड़ रहा है।









