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2024 में जीते तो सब ठीक, अब फर्जी वोट हटने पर विलाप क्यों? सपा और कांग्रेस का पाखंड बेनकाब

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लोकसभा चुनाव 2024 के परिणाम आते ही जिस चुनाव आयोग और ईवीएम की निष्पक्षता को स्वीकार किया जा रहा था, आज उसी व्यवस्था पर विपक्ष आगबबूला है। उत्तर प्रदेश और देश के विभिन्न राज्यों में चुनाव आयोग की ओर से मतदाता सूची की विशेष सफाई का काम शुरू होते ही इंडी गठबंधन की घबराहट साफ दिखाई देने लगी है। समाजवादी पार्टी और कांग्रेस ने एक बार फिर संवैधानिक संस्था पर सवाल खड़े करने का वही पुराना पैंतरा आजमाना शुरू कर दिया है। सवाल यह उठता है कि जब जनता के जनादेश से विपक्ष की सीटें बढ़ीं, तब व्यवस्था पूरी तरह पारदर्शी थी, तो फिर आज फर्जी नाम हटने पर यह कोहराम क्यों मचा है? दरअसल यह दर्द लोकतंत्र का नहीं, बल्कि दशकों से साधे गए फर्जी वोट बैंक के खिसकने का है।

केरल और कर्नाटक के नेताओं का कबूलनामा
केरल और कर्नाटक से आए कांग्रेस नेताओं के बयानों ने पार्टी के राष्ट्रीय नेतृत्व की पूरी रणनीति को बेनकाब कर दिया है। केरल में कांग्रेस के वरिष्ठ नेता रमेश चेन्निथला और वीडी सतीशन जैसे दिग्गज सार्वजनिक तौर पर यह स्वीकार कर चुके हैं कि विशेष गहन पुनरीक्षण प्रक्रिया की बदौलत ही राज्य में फर्जी और दोहरे वोट कटे, जिससे चुनाव निष्पक्ष हो सका। इसी तरह कर्नाटक में कांग्रेस सरकार के मंत्री सतीश जारकीहोली ने सार्वजनिक रूप से बयान दिया कि राज्य में प्रशासनिक जांच के बाद करीब 1 करोड़ फर्जी, मृत और शहर छोड़कर जा चुके मतदाताओं के नाम नियम के तहत हटाए गए हैं। अपने प्रभाव वाले राज्यों में जहां कांग्रेस नेताओं ने इस सफाई अभियान का खुलकर स्वागत किया, वहीं राष्ट्रीय स्तर पर उसी प्रक्रिया को लेकर पार्टी का रवैया पूरी तरह बदल गया।

सुविधा की राजनीति और दोहरे मापदंड का पर्दाफाश
सवाल उठता है कि जब केरल में फर्जी नामों का कटना चुनाव की शुचिता है और कर्नाटक में 1 करोड़ नाम हटना सही प्रशासनिक कदम, तो फिर उत्तर प्रदेश और बिहार में यही अभियान चलने पर इसे लोकतंत्र की हत्या क्यों कहा जाने लगता है? जहां कांग्रेस को अपनी जीत की उम्मीद दिखती है वहां चुनाव आयोग निष्पक्ष नजर आता है, लेकिन जहां भाजपा मजबूत स्थिति में है और बोगस वोटों का तंत्र टूटने लगता है, वहां आयोग पर संस्थागत कब्जे के आरोप मढ़ दिए जाते हैं। अपने ही मुख्यमंत्रियों और प्रदेश नेताओं के बयानों से घिरी कांग्रेस आज तक जनता को यह जवाब नहीं दे पाई है कि एक ही देश और एक ही कानून के तहत उनके लिए केरल और कर्नाटक का सच उत्तर प्रदेश में झूठ कैसे बन जाता है।

फर्जी वोट बैंक खत्म होने का खौफ
चुनाव आयोग जब भी मतदाता सूची का विशेष पुनरीक्षण कराता है, तो उसका सीधा मकसद एक व्यक्ति, एक वोट के लोकतांत्रिक नियम को जमीन पर उतारना होता है। इस प्रक्रिया में उन नामों की पहचान की जाती है जो या तो दुनिया में नहीं रहे, शहर छोड़कर चले गए या फिर जिनके नाम कई बूथों पर दर्ज हैं। अखिलेश यादव और राहुल गांधी की बेचैनी इसलिए बढ़ गई है क्योंकि बूथ स्तर पर दशकों से तैयार किया गया बोगस वोटिंग का नेटवर्क अब टूटने की कगार पर है। उत्तर प्रदेश के 1.62 लाख से अधिक मतदान केंद्रों पर जब एक ही पते पर दर्जनों संदिग्ध प्रविष्टियों और फॉर्म 7 का खेल तकनीकी जांच के दायरे में आया, तो विपक्ष को अपनी सियासी जमीन खिसकती नजर आने लगी।

मैपिंग में हास्यास्पद विसंगतियां: पिता बेटे से केवल 5 साल बड़ा
मतदाता सूची के डिजिटल सत्यापन और मैपिंग के दौरान ऐसे चौंकाने वाले तथ्य सामने आए हैं जिन्होंने विपक्ष के फर्जीवाड़े की कलई खोल दी है। जांच में कई जगहों पर पिता और बेटे की आयु में महज 5 वर्ष का अंतर मिला, तो कहीं एक ही परिवार में अस्वाभाविक रूप से दर्जनों मतदाता दर्ज पाए गए। जब चुनाव आयोग ने इन हास्यास्पद प्रविष्टियों पर संबंधित पक्षों को नोटिस भेजे, तो कोई भी अपना पक्ष रखने सामने नहीं आया। यह साबित करता है कि यह कोई सामान्य लिपिकीय त्रुटि नहीं थी, बल्कि चुनावी नतीजों को प्रभावित करने के लिए सुनियोजित तरीके से तैयार किया गया फर्जी डेटा था जिस पर अब तकनीक का हथौड़ा चला है।

भूतिया मतदान पर ताला: मृतकों के नाम पर वोट डालने का खेल खत्म
दशकों से कई राज्यों में चुनाव जीतने का सबसे बड़ा जरिया यह रहा था कि जो मतदाता वर्षों पहले दुनिया छोड़ चुके हैं, उनके नाम कभी सूची से हटने ही नहीं दिए जाते थे। मतदान के दिन इन्हीं मृतकों के नाम पर फर्जी पर्चियां बनाकर बूथों पर बोगस वोट डलवाए जाते थे। विशेष गहन पुनरीक्षण के दौरान लगभग 2.6 करोड़ से अधिक मृत मतदाताओं के नाम हटाए जाने से इस पूरे गुप्त तंत्र की रीढ़ टूट गई है। विपक्ष की सबसे बड़ी छटपटाहट इसी बात की है कि अब चुनाव के दिन मृतकों के नाम पर बटन दबाने वाली बोगस वोटिंग पूरी तरह बंद हो चुकी है।

ईआरओ-नेट और आधुनिक तकनीक: इंसान नहीं, सॉफ्टवेयर पकड़ रहा है फर्जीवाड़ा
चुनाव प्रक्रिया में मनमानी के आरोपों की हवा चुनाव आयोग के आधुनिक तकनीकी ढांचे ने निकाल दी है। ईआरओ-नेट प्लेटफॉर्म और डिजिटल डी-डुप्लिकेशन सॉफ्टवेयर के जरिए देश भर के करोड़ों मतदाताओं का डेटा क्रॉस-वेरिफाई होता है। अगर किसी व्यक्ति की फोटो, नाम या पहचान दो अलग-अलग विधानसभाओं या राज्यों में दर्ज मिलती है, तो सिस्टम खुद उसे संदिग्ध चिन्हित कर देता है। यह जांच किसी राजनीतिक दल के इशारे पर नहीं, बल्कि तकनीकी एल्गोरिदम से निष्पक्ष रूप से होती है। विपक्ष को असल दिक्कत इस बात से है कि इस आधुनिक डिजिटल तकनीक ने दशकों से चले आ रहे फर्जी पहचान पत्रों और बोगस मतदान के खेल पर पूरी तरह ताला लगा दिया है।

एएसडीडी नियम का सच: 3 बार घर जाने और भौतिक सत्यापन के बाद ही कार्रवाई
विपक्ष का यह दावा पूरी तरह सफेद झूठ है कि लोगों के नाम बिना बताए एक झटके में काट दिए गए। चुनाव आयोग की सख्त नियमावली के तहत बीएलओ सत्यापन फॉर्म लेकर संबंधित पते पर कम से कम 3 बार भौतिक रूप से जाता है। जब तीन बार के दौरों में मतदाता अपने पते पर अनुपस्थित मिलता है या स्थायी रूप से पलायन कर चुका पाया जाता है, तभी उसे एएसडीडी यानी अनुपस्थित, स्थानांतरित, दोहरा और मृत की श्रेणी में चिन्हित किया जाता है। इतने कड़े और पारदर्शी जमीनी सत्यापन के बाद तैयार हुई सूची पर सवाल उठाना सिर्फ उन जमीनी कर्मचारियों की निष्ठा का अपमान है जो घर-घर जाकर यह काम करते हैं।

राष्ट्रीय सुरक्षा से खिलवाड़: अवैध घुसपैठियों के वोट बैंक पर सीधी चोट
मतदाता सूची का शुद्धिकरण केवल प्रशासनिक कवायद नहीं, बल्कि देश की संप्रभुता और आंतरिक सुरक्षा से जुड़ा अत्यंत संवेदनशील मामला है। सीमावर्ती इलाकों और बड़े महानगरों में फर्जी दस्तावेजों के सहारे रोहिंग्या और अवैध घुसपैठियों के नाम मतदाता सूची में दर्ज कराने के संगठित गिरोह लंबे समय से सक्रिय रहे हैं। गहन पुनरीक्षण के जरिए जब ऐसे गैर-नागरिकों और संदिग्ध नामों की पहचान कर उन्हें बाहर किया जा रहा है, तो विपक्ष इसे लोकतंत्र पर हमला बताकर विलाप करने लगता है। सवाल यह है कि भारत के नीति-निर्माण और सरकार चुनने का अधिकार सिर्फ भारत के वैध नागरिकों का होना चाहिए या तुष्टीकरण की राजनीति के तहत बसाए गए अवैध घुसपैठियों का?

2004 से 2014 के यूपीए सिंडिकेट पर डिजिटल स्ट्राइक
यह घबराहट केवल आज के चुनावी नियमों को लेकर नहीं है, बल्कि उस 10 साल के यूपीए दौर के फर्जीवाड़े को बचाने की है जिसमें राजनीतिक रसूख के दम पर फर्जी पहचान पत्र बांटे गए थे। 2004 से 2014 के बीच बिना किसी डिजिटल सत्यापन के स्थानीय स्तर पर बोगस वोटरों की भारी भरकम फौज खड़ी कर दी गई थी। आज जब आधुनिक सॉफ्टवेयर, आधार लिंकेज की प्रक्रिया और जीपीएस मैपिंग उस 10 साल पुराने सिंडिकेट की एक-एक परत खोल रहे हैं, तो कांग्रेस को अपनी जमीन खिसकती साफ नजर आ रही है।

नए और युवा मतदाताओं के अधिकार पर डाका डाल रहा था फर्जी वोट बैंक
विशेष पुनरीक्षण का सबसे बड़ा लाभ देश की युवा पीढ़ी को मिल रहा है। जब तक मतदाता सूचियों में करोड़ों मृत और लापता लोगों के नाम जमे रहेंगे, तब तक नए 18 वर्ष के युवाओं का नाम दर्ज होना और बूथ स्तर पर प्रबंधन दुरुस्त होना कठिन रहता है। चुनाव आयोग की यह मुहिम सिर्फ नाम हटाने की नहीं, बल्कि पारदर्शी तरीके से हर साल लाखों पहली बार वोट डालने वाले युवाओं को जोड़ने की भी है। विपक्ष जिस बोगस सूची को बचाने के लिए विलाप कर रहा है, वह असल में देश के नवयुवाओं के लोकतांत्रिक हक पर कुंडली मारकर बैठने की पुरानी साजिश है।

फॉर्म 7 का असली सच: फर्जी नाम काटने का संवैधानिक प्रावधान
विपक्ष जनता में यह झूठा भ्रम फैलाने में जुटा है कि फॉर्म 7 का अनुचित प्रयोग करके खास वर्गों और समुदायों के वोट जानबूझकर काटे जा रहे हैं। जमीनी हकीकत यह है कि चुनाव आयोग के नियमों में फॉर्म 7 कोई गुप्त हथियार नहीं, बल्कि किसी मृतक, स्थायी रूप से स्थानांतरित या दोहरे वोटर पर विधिपूर्वक आपत्ति दर्ज कराने का वैधानिक नियम है। यह अधिकार देश के सभी राजनीतिक दलों और आम नागरिकों के पास समान रूप से उपलब्ध रहता है। जब विपक्ष के लोग तय समयसीमा में अपने दावे और आपत्तियां दर्ज कराने में नाकाम रहे, तो अब अपनी प्रशासनिक नाकामी को छिपाने के लिए संवैधानिक फॉर्म पर ही झूठे आरोप मढ़े जा रहे हैं।

कानूनी उपचार खुला होने के बावजूद संसद और सड़क पर ड्रामा क्यों?
विपक्ष का यह दावा पूरी तरह भ्रामक है कि नाम कटने के बाद नागरिक के पास कोई रास्ता नहीं बचता। जन प्रतिनिधित्व कानून के तहत किसी भी वास्तविक मतदाता का नाम छूट जाने पर फॉर्म 6 भरकर दोबारा नाम जुड़वाने का पूर्ण अधिकार हमेशा सुरक्षित रहता है। इसके अलावा जिला निर्वाचन अधिकारी और राज्य के मुख्य निर्वाचन अधिकारी के समक्ष अपील की स्पष्ट त्रिस्तरीय कानूनी व्यवस्था मौजूद है। जब कानून ने समाधान की पूरी प्रक्रिया दे रखी है, तब अदालत और वैधानिक मंचों पर जाने के बजाय संसद और सड़क पर कोहराम मचाना यह साबित करता है कि विपक्ष का मकसद नागरिकों की मदद करना नहीं, बल्कि संवैधानिक संस्थाओं की साख गिराना है।

सुप्रीम कोर्ट और चुनाव आयोग का हलफनामा: एकमत फैसले
विपक्ष लगातार यह दुष्प्रचार कर रहा है कि मतदाता सूची के विशेष पुनरीक्षण का फैसला एकतरफा और किसी दबाव में लिया गया है। चुनाव आयोग ने देश की शीर्ष अदालत में हलफनामा दायर कर साफ कर दिया है कि यह प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी है और आयोग के तीनों सदस्यों की पूर्ण सहमति से कानून के दायरे में शुरू की गई है। जब सर्वोच्च अदालत के समक्ष विपक्षी दल किसी भी अवैध नाम कटने का एक भी पुख्ता प्रमाण पेश नहीं कर सके, तो उन्होंने अदालत के बाहर आकर केवल बयानबाजी और मीडिया ट्रायल का रास्ता चुन लिया।

बीएलओ का जमीनी सच: वोटर लिस्ट में नहीं लिखा होता पार्टी का नाम
जमीन पर मतदाता सूची तैयार करने वाले 10 लाख से अधिक बूथ लेवल अधिकारियों (बीएलओ) के अनुभवों ने भी विपक्ष के दावों की हवा निकाल दी है। चुनाव प्रक्रिया से जुड़े बीएलओ का साफ कहना है कि मतदाता सूची में किसी भी नागरिक के नाम के आगे यह नहीं लिखा होता कि वह कांग्रेस का समर्थक है या भाजपा का। चुनावी नामावली में राजनीतिक दल के आधार पर कोई वर्गीकरण होता ही नहीं है। इसके साथ ही प्रत्येक दल को बूथ लेवल एजेंट (बीएलए) नियुक्त करने का अधिकार है, लेकिन सपा और कांग्रेस अपने बीएलए तक सक्रिय नहीं रख पाए और अब अपनी संगठनात्मक नाकामी का ठीकरा कर्मचारियों पर फोड़ रहे हैं।

13 करोड़ वोट कटने का हौव्वा और उसका सच्चा आंकड़ा
विपक्ष द्वारा देश भर में 13 करोड़ वोट काटे जाने का जो सनसनीखेज भ्रम फैलाया जा रहा है, उसके असल आंकड़े सामने आते ही सारा झूठ बेनकाब हो जाता है। इस सूची की वास्तविक जांच बताती है कि इसमें लगभग 2.6 करोड़ नाम उन लोगों के थे जिनकी मृत्यु हो चुकी है, 6.3 करोड़ लोग स्थायी रूप से अपना पुराना पता छोड़कर दूसरी जगह जा चुके हैं, 1 करोड़ मामले ऐसे थे जहां एक ही व्यक्ति के दोहरे नाम दर्ज थे और करीब 3 करोड़ लोग सत्यापन के दौरान अपने बताए गए पते पर पाए ही नहीं गए। मृत और फर्जी प्रविष्टियों को हटाकर सूची को दुरुस्त करना एक स्वाभाविक और आवश्यक प्रशासनिक प्रक्रिया है, लेकिन विपक्ष इसी जरूरी सफाई को राजनीतिक रंग देकर देश को गुमराह करने में जुटा है।

कांग्रेस के कार्यकाल में हुए 10 SIR पर चुप्पी
इतिहास गवाह है कि मतदाता सूची का विशेष गहन पुनरीक्षण कोई नई व्यवस्था नहीं है। कांग्रेस के दौर में चुनाव आयोग ने 10 से ज्यादा बार गहन पुनरीक्षण अभियान चलाकर करोड़ों गलत, दोहरे और स्थानांतरित मतदाताओं के नाम हटाए थे। उस समय इसी प्रक्रिया को चुनावी सुधार और शुचिता का सबसे बड़ा प्रमाण बताया जाता था। आज जब मोदी सरकार के दौर में चुनाव आयोग पूरी तरह डिजिटल और पारदर्शी तरीके से वही काम कर रहा है, तो कांग्रेस को इसमें धांधली दिखाई देने लगी है। कर्नाटक जैसे राज्यों में जब उनकी अपनी सरकार के तहत नाम छांटे जाते हैं तब चुप्पी साध ली जाती है, लेकिन उत्तर प्रदेश या राष्ट्रीय स्तर पर यही काम होते ही इसे लोकतंत्र पर हमला बता दिया जाता है।

संसद में खुली बहस की चुनौती से भागा विपक्ष
विपक्ष केवल सड़कों और सोशल मीडिया पर ही भ्रामक बयानबाजी कर सकता है, लेकिन जब संवैधानिक मंचों पर तथ्य रखने की बात आती है तो वह पीछे हट जाता है। संसद के पटल पर सरकार द्वारा मतदाता सूची और पुनरीक्षण प्रक्रिया पर बिंदुवार खुली बहस की स्पष्ट चुनौती दी गई थी। विपक्ष के पास अगर जरा भी सच्चाई या आंकड़े होते तो वह सदन में चर्चा करता, लेकिन उन्होंने चर्चा में भाग लेने के बजाय वॉकआउट और नारेबाजी का रास्ता चुना। सदन से भागने का यह रवैया साफ दिखाता है कि विपक्ष के पास मीडिया में सनसनी फैलाने के अलावा कोई तथ्यात्मक आधार नहीं है।

आरोप भी खुद का और सबूत भी दूसरों से मांगने का विचित्र तर्क
राहुल गांधी की राजनीति का तरीका भी बेहद अजीब मोड़ पर आ खड़ा हुआ है, जहां पहले सरकार और चुनाव आयोग पर वोट चोरी का झूठा आरोप मढ़ा जाता है और फिर जिस पर आरोप लगाया गया, उसी से कहा जाता है कि वह अपनी बेगुनाही का सबूत दे। देश की कानून व्यवस्था और सामान्य समझ का नियम है कि जो आरोप लगाता है, सबूत पेश करने की जिम्मेदारी भी उसी की होती है। केवल जनता में भ्रम और आक्रोश फैलाने के इरादे से सनसनीखेज बयान दे देना और जब जवाबदेही की बारी आए तो खुद को पीड़ित बताकर पल्ला झाड़ लेना, यह गैरजिम्मेदाराना रवैये की पराकाष्ठा है।

सबूत देने का दावा हवा हवाई: जनता के सामने राहुल गांधी खाली हाथ
महीनों तक देश भर में घूमकर युवाओं और नई पीढ़ी को चुनाव चोरी के कथित सबूत दिखाने का दावा करने वाले राहुल गांधी अब खुद बैकफुट पर नजर आ रहे हैं। कभी अदालतों में जाने और राष्ट्रपति के पास पुख्ता प्रमाण लेकर पहुंचने की धमकियां दी जा रही थीं, लेकिन जब तथ्यों को सामने रखने का समय आया तो पूरी कहानी पलट गई। अब स्थिति यह है कि जिनके पास सभी सवालों के जवाब होने का दावा था, वे खुद जनता से कह रहे हैं कि उनके पास कुछ नहीं है और लोग ही उन्हें सबूत लाकर दें। महीने भर तक जनता से रसीद और दस्तावेज दिखाने का वादा करके अंत में खाली हाथ खड़े हो जाना विपक्ष की खोखली राजनीति को पूरी तरह उजागर कर देता है।

74 चुनावों का ट्रैक रिकॉर्ड और लोकतंत्र के जनादेश का अपमान
हर चुनावी हार के बाद बिना किसी ठोस सबूत के वोट चोरी का राग अलापना अब देश की लोकतांत्रिक समझ का मजाक उड़ाने जैसा हो गया है। लोकतंत्र का सीधा मतलब यह है कि जनता के जनादेश को हर हाल में स्वीकार किया जाए, चाहे परिणाम अपने पक्ष में हों या विरोध में। पिछले 74 चुनावों के आंकड़े खुद गवाही देते हैं कि भाजपा और एनडीए ने 39 चुनाव जीते हैं तो 35 चुनावों में उसे हार का सामना भी करना पड़ा है। वहीं 2014 से अब तक कांग्रेस को 56 से अधिक विधानसभा चुनावों में हार का मुंह देखना पड़ा है। यह संतुलन साबित करता है कि चुनावी प्रक्रिया पूरी तरह निष्पक्ष और जनता की मर्जी पर निर्भर है। बिना किसी प्रमाण के बार-बार चुनावी व्यवस्था पर अविश्वास जताना असल में भारतीय लोकतंत्र और मतदाताओं के विवेक का अनादर है।

करदाताओं के पैसों की बर्बादी पर रोक और मजबूत सुरक्षा प्रबंधन
बोगस वोटरों की मौजूदगी केवल लोकतंत्र के साथ धोखा नहीं, बल्कि देश के टैक्सपेयर्स के पैसों की खुली लूट भी थी। जब किसी बूथ पर कागजों में 1200 वोटर और जमीन पर सिर्फ 500 होते हैं, तो वहां गैर-जरूरी तौर पर अतिरिक्त सुरक्षा बल, अर्धसैनिक टुकड़ियां, अधिक ईवीएम और प्रशासनिक अमला तैनात करना पड़ता है। मतदाता सूची के शुद्धिकरण से न केवल देश के करोड़ों रुपये की बचत हो रही है, बल्कि संवेदनशील मतदान केंद्रों पर सुरक्षा बलों की तैनाती भी अधिक सटीक और पुख्ता हो सकी है।

72 प्रतिशत जनता का समर्थन और निष्पक्ष चुनाव की मांग
देश भर में किए गए जनमत सर्वेक्षणों में यह साफ हो चुका है कि 72 प्रतिशत से अधिक नागरिक मतदाता सूची के इस विशेष शुद्धिकरण अभियान का पुरजोर समर्थन कर रहे हैं। आम जनता का मानना है कि भारत के चुनाव में केवल भारत के वैध और जीवित नागरिकों का ही नाम होना चाहिए। लोग बोगस वोटिंग और अवैध घुसपैठियों के फर्जी नामों को सूची से बाहर करने के पक्ष में मजबूती से खड़े हैं। विपक्ष जिस फर्जी वोट बैंक को बचाने की कोशिश कर रहा है, जनता उसे चुनावी शुचिता के खिलाफ मानकर पूरी तरह नकार चुकी है।

सत्ता के लिए वोट चोरी का फर्जी नैरेटिव नहीं चलेगा: जनता का जवाब
विपक्ष जिस वोट चोरी के नारे को हथियार बनाकर जनता के बीच सहानुभूति बटोरने की कोशिश कर रहा है, देश के 96 करोड़ से अधिक पंजीकृत मतदाता अब उसे सिरे से खारिज कर रहे हैं। देश का आम नागरिक बहुत सजग और परिपक्व है, वह भलीभांति समझता है कि चुनावी हार से बचने और केवल सत्ता हासिल करने की हताशा में यह फर्जी नैरेटिव गढ़ा जा रहा है। आधारहीन आरोपों और कोरे बयानों के पीछे सच को ज्यादा दिन तक नहीं छिपाया जा सकता। लोग साफ देख रहे हैं कि जब भी चुनाव परिणाम मनमाफिक नहीं आते, संवैधानिक संस्थाओं पर ठीकरा फोड़कर जनता के स्पष्ट फैसले का अपमान करना इंडी गठबंधन की आदत बन चुका है।

संविधान को दरकिनार कर समानांतर महाभियोग का असंवैधानिक ड्रामा
संसद और अदालत में मुंह की खाने के बाद विपक्ष अब संवैधानिक मर्यादाओं को तार-तार करने पर उतर आया है। देश के मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ संसद की बजाय निजी मंचों पर तथाकथित महाभियोग पारित करने की नौटंकी इसका सबसे बड़ा प्रमाण है। बाबासाहेब आंबेडकर के बनाए संविधान में संवैधानिक पदों की गरिमा और सुरक्षा के कड़े प्रावधान हैं। जब विपक्ष के पास कोई कानूनी आधार और तथ्य नहीं बचा, तो वे देश की सर्वोच्च चुनावी संस्था को डराने और चुनाव प्रक्रिया को बदनाम करने के लिए असंवैधानिक तमाशों का सहारा ले रहे हैं।

संस्थाओं को कमजोर करने की अंतरराष्ट्रीय साजिश
हार की आशंका से घिरे विपक्षी दल अब देश की गरिमा और लोकतांत्रिक विश्वसनीयता पर सीधे प्रहार करने से भी नहीं चूक रहे हैं। कभी विदेशी मंचों पर जाकर भारत के चुनावी ढांचे को कटघरे में खड़ा करना, तो कभी विदेशी मीडिया में नैरेटिव गढ़ने वाली लॉबी के बयानों को ढाल बनाना, यह कांग्रेस और उसके सहयोगियों की तय रणनीति बन चुकी है। जब भी देश के भीतर कानूनी और संवैधानिक प्रक्रियाएं अपना काम करती हैं, तभी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की चुनावी साख को धूमिल करने का अभियान तेज कर दिया जाता है। चुनाव आयोग के अधिकारियों के इस्तीफे मांगना और देश की सर्वोच्च अदालत की व्यवस्थाओं पर भी सवाल उठाना इसी अंतरराष्ट्रीय दबाव की राजनीति का हिस्सा लगता है।

सच की जीत और दोहरे चरित्र का अंत
कुल मिलाकर पूरा घटनाक्रम यह साबित करता है कि विपक्ष का यह विरोध चुनाव सुधारों या लोकतंत्र की चिंता को लेकर नहीं, बल्कि अपनी राजनीतिक जमीन बचाने की छटपटाहट भर है। जब मृत, स्थानांतरित और डुप्लीकेट मतदाताओं के नाम कटते हैं तो नुकसान केवल उस राजनीति का होता है जो फर्जी वोट बैंक के सहारे टिकी थी। केरल और कर्नाटक में अपनी सुविधानुसार व्यवस्था का स्वागत करना और उत्तर प्रदेश में उसी पर विलाप करना यह स्पष्ट कर देता है कि कांग्रेस और सपा के पास न तो कोई ठोस तर्क है और न ही कोई सबूत। देश की जागरूक जनता अब बोगस नैरेटिव और वास्तविक तथ्यों के अंतर को समझ चुकी है, और इतिहास गवाह है कि जनता के विवेक को नकारने वालों को लोकतंत्र में बार-बार सबक ही मिलता है।

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