कर्नाटक में विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के तहत लगभग एक करोड़ बोगस, मृत और विस्थापित नामों की छंटाई के बाद राहुल गांधी और कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व पूरी तरह मौन साध चुका है। दिल्ली में बैठकर चुनाव आयोग और संवैधानिक संस्थाओं पर ‘वोट चोरी’ का झूठा विलाप करने वाले राहुल गांधी अपनी ही पार्टी की सरकार वाले राज्य कर्नाटक जाने से कतरा रहे हैं। वास्तव में, 1 नवंबर को दिल्ली में प्रस्तावित महारैली कर्नाटक के इसी प्रशासनिक सच से देश का ध्यान भटकाने का सुनियोजित राजनीतिक स्टंट है। इस तथ्यहीन नैरेटिव को गढ़ने और हवा देने में सबसे बड़ा हाथ ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ और उसकी पक्षपाती रिपोर्टिंग का रहा है। जमीनी हकीकत यह है कि कर्नाटक की कांग्रेस सरकार की अपनी प्रशासनिक मशीनरी ने ही इस शुद्धिकरण को पूरा किया है, जिसे अब अपनी राजनीतिक सुविधा के अनुसार दबाने का प्रयास किया जा रहा है।
1 नवंबर की दिल्ली महारैली का कर्नाटक कनेक्शन: बेंगलुरु छोड़कर दिल्ली में जमावड़ा क्यों?
अगर कांग्रेस सच में मतदाताओं के अधिकारों की रक्षा के लिए 10 लाख लोगों का मार्च कर रही है, तो यह आयोजन बेंगलुरु के फ्रीडम पार्क में या कर्नाटक विधानसभा के घेराव के लिए क्यों नहीं हो रहा, जहां देश में दूसरे नंबर पर सर्वाधिक 1 करोड़ नाम हटाए गए? दिल्ली में भीड़ जुटाकर केंद्र सरकार और चुनाव आयोग पर आरोप लगाना आसान है, लेकिन बेंगलुरु में ऐसा करने पर जनता सीधे मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार से जवाब मांगने लगेगी। कांग्रेस अपनी ही सरकार द्वारा चिन्हित किए गए बोगस मतदाताओं के सच का सामना करने से घबरा रही है। यही कारण है कि स्थानीय जवाबदेही से बचने के लिए बेंगलुरु में चुप्पी साधकर दिल्ली की सड़कों पर विरोध का प्रहसन रचा जा रहा है।
राहुल गांधी के कर्नाटक न जाने के पीछे का असहज सच: अपने ही बनाए चक्रव्यूह में फंसी कांग्रेस
राहुल गांधी देश भर में घूमकर मतदाता सूची पुनरीक्षण के खिलाफ बयानबाजी कर रहे हैं, लेकिन कर्नाटक का नाम लेने से लगातार बचते हैं। इसका कारण स्पष्ट है। यदि राहुल गांधी बेंगलुरु जाकर इस प्रक्रिया का विरोध करते हैं, तो उन्हें सबसे पहले अपनी ही पार्टी के मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार से पूछना पड़ेगा कि उनकी सरकार ने 1 करोड़ नाम सूची से बाहर क्यों किए। कर्नाटक जाकर बोलना सीधे अपनी ही राज्य सरकार की कार्यप्रणाली को कठघरे में खड़ा करना होगा। इस असहज स्थिति से बचने के लिए कांग्रेस नेतृत्व कर्नाटक के इन आंकड़ों पर पर्दा डालकर भ्रामक माहौल बनाने की कोशिश कर रहा है।
EVM हट गई, बैलेट पेपर आ गया, लेकिन कांग्रेस की किस्मत नहीं बदली…नतीजा फिर ZERO!
देशभर में 28 MLC चुनाव बैलेट पेपर से हुए, लेकिन कांग्रेस को कहीं भी सफलता नहीं मिली। यहाँ तक कि अपने ही शासन वाले कर्नाटक में भी पार्टी का खाता नहीं खुला। अब राहुल गांधी जी बताइए, इस हार का ठीकरा किस पर फोड़ेंगे? EVM पर या बैलेट पेपर पर?
— BJP Delhi (@BJP4Delhi) October 28, 2026
राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे का गृह राज्य: अपने ही आंगन में 1 करोड़ नाम छंटने पर चुप्पी क्यों?
यह विरोधाभास तब और गहरा हो जाता है जब ध्यान कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे पर जाता है। कर्नाटक स्वयं खड़गे का गृह राज्य है, जहां से वे दशकों तक विधायक, मंत्री और सांसद रहे हैं। जब पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष उसी राज्य से आता हो और शासन भी उन्हीं की पार्टी का हो, तब 1 करोड़ नामों की छंटाई पर खड़गे का अपने गृह राज्य में एक भी प्रेस कॉन्फ्रेंस न करना कई सवाल खड़े करता है। पार्टी का शीर्ष नेतृत्व जानता है कि जमीन पर किसी वैध नागरिक का अधिकार नहीं छीना गया, बल्कि मृत और फर्जी प्रविष्टियों की छंटाई हुई है। इसी वजह से वे अपने गृह क्षेत्र में इस मुद्दे को उठाने से बच रहे हैं।
कर्नाटक हाईकोर्ट में हलफनामा दाखिल करने का डर: कानूनी चुनौती से क्यों भाग रही है कांग्रेस?
कांग्रेस पार्टी चुनाव आयोग पर सवाल उठाने के लिए दिल्ली में मीडिया ब्रीफिंग करती है और सुप्रीम कोर्ट में याचिकाओं के जरिए सुर्खियां बटोरने का प्रयास करती है, लेकिन कर्नाटक हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाने से बचती है। इसका बड़ा कारण यह है कि यदि कांग्रेस 1 करोड़ नामों की छंटाई को लेकर राज्य के उच्च न्यायालय जाती है, तो अदालत राज्य सरकार के मुख्य सचिव और संबंधित जिलाधिकारियों से आधिकारिक हलफनामा मांगेगी। उस कानूनी हलफनामे में मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार के प्रशासन को औपचारिक रूप से स्वीकार करना पड़ेगा कि ये 1 करोड़ नाम राज्य कर्मचारियों द्वारा घर-घर सत्यापन के बाद ही मृत, विस्थापित और अपात्र पाए गए थे। इस कानूनी बेनकाबी से बचने के लिए कांग्रेस अदालत जाने के बजाय सड़क पर प्रदर्शन का रास्ता चुन रही है।
राहुल गांधी की ‘पिक एंड चूज’ प्रेस कॉन्फ्रेंस: चुनिंदा सीटों का हौवा, पूरे राज्य के आंकड़े पर चुप्पी
राहुल गांधी दिल्ली में प्रेस कॉन्फ्रेंस कर कर्नाटक की किसी एक-दो विधानसभा सीटों, जैसे आलंद या बेलगावी के कुछ हजार कथित नामों का उल्लेख कर सनसनी फैलाने का प्रयास करते हैं। सवाल उठता है कि जो नेता चंद हजार प्रविष्टियों पर राष्ट्रीय स्तर पर विवाद खड़ा करते हैं, वे पूरे कर्नाटक में हटाए गए 1 करोड़ (18 प्रतिशत) नामों के आधिकारिक आंकड़े पर बात क्यों नहीं करते? कुछ हजार नामों को चुनकर भ्रम फैलाना और 1 करोड़ के समग्र सत्यापन पर खामोश रहना चयनात्मक राजनीति का उदाहरण है। राहुल गांधी जानते हैं कि यदि वे पूरे 1 करोड़ के आंकड़े की बात करेंगे, तो उस पर कर्नाटक के मुख्य निर्वाचन अधिकारी और राज्य प्रशासन के ही आधिकारिक हस्ताक्षर सामने आएंगे।
फॉर्म-7 के थोक आवेदन का शिगूफा: क्या डीके शिवकुमार का प्रशासन गड़बड़ी में शामिल था?
कांग्रेस के रणनीतिकार अक्सर यह नैरेटिव गढ़ते हैं कि असामाजिक तत्वों ने फॉर्म-7 (नाम हटाने का आवेदन) थोक में भरकर वैध नागरिकों के नाम कटवा दिए। चुनाव आयोग के कड़े नियमों के अनुसार, किसी भी फॉर्म-7 पर बिना बूथ लेवल अधिकारी द्वारा भौतिक सत्यापन किए और संबंधित नागरिक को औपचारिक सुनवाई का नोटिस दिए बिना नाम नहीं काटा जा सकता। कर्नाटक में यह सारा सत्यापन और सुनवाई कार्य डीके शिवकुमार सरकार के अधीन काम करने वाले राजस्व अधिकारियों और राज्य कर्मचारियों ने किया। यदि कांग्रेस का यह आरोप सही है कि फर्जी फॉर्म-7 से नाम काटे गए, तो क्या वे सीधे यह कह रहे हैं कि उनकी अपनी सरकार के कर्मचारी नियमों की अनदेखी कर रहे थे?
कर्नाटक में राज्य प्रशासन की देखरेख में पूरा हुआ SIR: तब मुख्यमंत्री ने आपत्ति क्यों नहीं की?
कर्नाटक में विशेष गहन पुनरीक्षण की पूरी प्रक्रिया किसी बाहरी एजेंसी ने नहीं, बल्कि मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार के अधीन काम करने वाले राज्य प्रशासन, जिलाधिकारियों और स्थानीय बूथ लेवल अधिकारियों (BLO) द्वारा ही संपन्न कराई गई। घर-घर जाकर किए गए भौतिक सत्यापन के दौरान राज्य सरकार या कांग्रेस संगठन ने कोई औपचारिक आपत्ति दर्ज नहीं कराई। इसके विपरीत, कई सार्वजनिक अवसरों पर स्वयं मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार ने मतदाता सूची को पारदर्शी और त्रुटिहीन बनाने के लिए इस अभियान को आवश्यक बताया था। जब पूरी प्रक्रिया राज्य सरकार के आधिकारिक तंत्र के तहत पूरी हुई, तो बाद में वही प्रक्रिया दिल्ली में बैठकर लोकतंत्र पर हमला कैसे बन गई?
कर्नाटक में SIR हो चुकी है-
कांग्रेस की राज्य सरकार की पूरी मशीनरी, BLOs के द्वारा ये संपन्न करवायी गई , जिसमे किसी ने कोई आपत्ति नहीं की बल्कि कई मौक़ो पर CM DK शिवकुमार ने इसे जरूरी बताया।
SIR के नतीजे देखिए – कर्नाटक में देश में दूसरे नंबर पर वोट कटी है – 18% यानी लगभग 1 करोड़, बंगाल से भी अधिक।
तो क्या कांग्रेस ने लोगो की वोट काट डाली?? आखिर क्यों राहुल गांधी कर्नाटक में जाकर SIR के ख़िलाफ़ मुहिम चलाकर वहाँ नहीं जा रहे?
ये दोगलापंथी देश देख रहा है।
— Baliyan (@Baliyan_x) October 28, 2026
देश में दूसरे स्थान पर कर्नाटक: 18 प्रतिशत यानी एक करोड़ नाम हटने पर दोहरा मापदंड
विशेष गहन पुनरीक्षण के आधिकारिक परिणाम कांग्रेस की राजनीतिक दोहरी नीति को उजागर करते हैं। इस राष्ट्रव्यापी अभियान में पश्चिम बंगाल से भी आगे निकलते हुए कर्नाटक देश का दूसरा ऐसा राज्य बना, जहां सबसे अधिक बोगस प्रविष्टियां हटाई गईं। राज्य की कुल मतदाता सूची में से लगभग 18 प्रतिशत यानी करीब 1 करोड़ ऐसे नाम हटाए गए जो दिवंगत हो चुके थे, स्थायी रूप से पलायन कर चुके थे या एक से अधिक स्थानों पर दर्ज थे। यदि कांग्रेस के दावों को सच मान लिया जाए कि इस प्रक्रिया से दुर्भावनापूर्ण तरीके से नाम काटे गए, तो क्या राहुल गांधी यह स्वीकार करेंगे कि उनकी अपनी पार्टी की सरकार ने राज्य के 1 करोड़ नागरिकों के नाम हटा दिए?
पीड़ित मतदाता नहीं, केवल बयानों पर राजनीति
चुनाव आयोग के नियमों के तहत एसआईआर में चिन्हित नाम ड्राफ्ट सूची का हिस्सा होते हैं। अंतिम प्रकाशन से पूर्व हर नागरिक और राजनीतिक दल के पास संबंधित फॉर्म भरकर विधिक आपत्ति दर्ज कराने और पात्र नाम बहाल कराने का पूर्ण अवसर होता है। यदि कर्नाटक में पात्र नागरिकों के नाम काटे गए, तो सत्ता में बैठी राज्य सरकार और उनका संगठन आयोग के समक्ष विधिक दावे पेश क्यों नहीं कर रहा? वैधानिक प्रक्रिया का उपयोग न करते हुए केवल मीडिया में बयान देना यह दर्शाता है कि कांग्रेस के पास कोई वास्तविक पीड़ित मतदाता नहीं है, बल्कि केवल वे नाम थे जिनकी अपात्रता प्रमाणित हो चुकी है।
2022 के ‘चिलुमे’ विवाद का दोहरा चरित्र: तब बोगस वोटरों पर सवाल, आज सफाई पर आपत्ति क्यों?
कर्नाटक का राजनीतिक रिकॉर्ड बताता है कि वर्ष 2022-23 में विधानसभा चुनावों से पूर्व कांग्रेस ने ही बेंगलुरु में ‘चिलुमे ट्रस्ट’ के जरिए निजी एजेंसियों द्वारा अवैध मतदाता जोड़ने का आरोप लगाया था। उस समय पार्टी ने चुनाव आयोग से तुरंत फर्जी और अवैध प्रविष्टियां छांटने की मांग की थी। अब जब चुनाव आयोग ने आधिकारिक सरकारी तंत्र और भौतिक सत्यापन के जरिए उसी डेटाबेस की सफाई कर दी, तो कांग्रेस विरोध दर्ज करा रही है। यह रुख साफ करता है कि निष्पक्ष जांच होने पर केवल राजनीतिक लाभ-हानि देखकर रुख बदला जा रहा है।
बेंगलुरु की महानगरीय गतिशीलता का सच: आईटी हब के विस्थापन को गलत रूप देना
कर्नाटक, विशेष रूप से बेंगलुरु, देश का प्रमुख आईटी और स्टार्ट-अप केंद्र है, जहां देश भर से बड़ी संख्या में पेशेवर आते हैं, कुछ समय रहते हैं और फिर अन्य शहरों या विदेश चले जाते हैं। राज्य में 18 प्रतिशत नाम हटने का एक बड़ा प्रशासनिक कारण यही महानगरीय विस्थापन (Urban Mobility) है, जहां लोग पते बदल चुके थे लेकिन उनके नाम पुरानी कागजी सूचियों में दर्ज थे। चुनाव आयोग ने घर-घर जाकर इसी अनुपस्थित डेटा को हटाया है। सामान्य प्रशासनिक शुद्धिकरण और शहरी जनसांख्यिकी के इस यथार्थ को गलत संदर्भ में प्रस्तुत करना प्रशासनिक वास्तविकताओं की अनदेखी है।
🚨 Election Commission affidavit in Supreme Court has destroyed the fake Indian Express report based on fabrications & overreach.
THIS is what Indians need to understand
The protest was planned way in advance, the report was created later. Likely by an agency and handed to IE.
Report is so weak their media strategy was already planned, to make the “author” Ritika Chopra the hero so people will just assume the report must be awesome.
Regime change means taking away our right to choose our govt. Basically back to slavery of a foreign power.
Do read the main points and do share so people know… 🙏
— Eminent Intellectual (@total_woke_) October 27, 2026
गैर-बीजेपी शासित राज्यों के आंकड़ों पर चुप्पी
यह आरोप आधारहीन है कि केंद्र सरकार दुर्भावना से अपने राजनीतिक विरोधियों के नाम हटवा रही है। यदि इस आरोप में सच्चाई होती, तो देश में दूसरे नंबर पर सबसे ज्यादा 18 प्रतिशत नाम कर्नाटक जैसे कांग्रेस शासित राज्य में क्यों हटते? यह तथ्य प्रमाणित करता है कि एसआईआर किसी राजनीतिक दल के निर्देश पर नहीं, बल्कि देश भर में समान प्रशासनिक मानकों पर आधारित है। विपक्ष केवल चुनिंदा राज्यों पर ध्यान केंद्रित करता है, जबकि अपने शासित राज्यों के आंकड़ों पर चर्चा करने से बचता है।
बूथ लेवल एजेंटों (BLA) की निष्क्रियता: जमीनी स्तर पर विफलता छिपाने की कोशिश
चुनाव आयोग के नियमों के तहत प्रत्येक मान्यता प्राप्त राजनीतिक दल को हर मतदान केंद्र पर अपने बूथ लेवल एजेंट (BLA) नियुक्त करने का अधिकार है, जो सत्यापन के दौरान दावों और आपत्तियों की जांच कर सकें। कर्नाटक में कांग्रेस संगठन के बीएलए जमीनी स्तर पर सत्यापन में भाग लेने या फॉर्म भरकर औपचारिक आपत्ति दर्ज कराने में सक्रिय नहीं रहे। जब पार्टी का जमीनी ढांचा निर्धारित प्रक्रिया का पालन करने में विफल रहा, तो अब उस संगठनात्मक कमी का ठीकरा चुनाव आयोग पर फोड़ा जा रहा है।
स्थानीय निकाय और पंचायत चुनावों में दोहरा लाभ लेने की व्यवस्था पर रोक
कर्नाटक में 1 करोड़ अपात्र नामों के निरस्त होने से स्थानीय निकाय चुनावों में चलने वाली दोहरी प्रविष्टियों पर रोक लगी है। ग्राम पंचायतों, तालुक पंचायतों और शहरी निकायों में मृत या स्थानांतरित व्यक्तियों के नाम पर बोगस मतदान कराने की शिकायतें लंबे समय से आती रही हैं। एक ही व्यक्ति के कई वार्डों में नाम होने से स्थानीय चुनावों में इसका अनुचित लाभ लिया जाता था। तकनीकी शुद्धिकरण ने स्थानीय स्तर पर चलने वाले इस तंत्र को समाप्त कर दिया है, जिससे यह पूरी बेचैनी पैदा हुई है।
‘द इंडियन एक्सप्रेस’ की रिपोर्ट: कमजोर तथ्यों के आधार पर दबाव बनाने का प्रयास
‘वोट चोरी’ का नैरेटिव ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ द्वारा कमजोर शोध और अपुष्ट दावों के आधार पर तैयार की गई रिपोर्ट से शुरू हुआ। इस रिपोर्ट को ठीक उसी दिन प्रकाशित किया गया जब सर्वोच्च न्यायालय में चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति से जुड़े मामले पर सुनवाई होनी थी। इसका स्पष्ट उद्देश्य न्यायिक प्रक्रिया पर मनोवैज्ञानिक दबाव बनाना और संवैधानिक संस्था की साख पर प्रश्न खड़ा करना था। बुनियादी प्रमाणों के अभाव के बावजूद इस रिपोर्ट को केवल एक विशेष नैरेटिव बनाने के उद्देश्य से आगे बढ़ाया गया।
‘रिवर्स एड-होमिनेम’ का तरीका: रिपोर्ट की कमियों को छिपाने के लिए लेखक का प्रचार
रिपोर्ट में ठोस साक्ष्यों की कमी को देखते हुए मीडिया तंत्र ने मूल तथ्यों पर चर्चा करने के बजाय रिपोर्टर रितिका चोपड़ा का महिमामंडन शुरू कर दिया। इसे ‘रिवर्स एड-होमिनेम’ कहा जाता है, जहां सामग्री कमजोर होने पर लेखक की छवि को आगे कर दिया जाता है ताकि पाठक तथ्यों की गहराई पर सवाल न उठाएं। इस प्रचार के जरिए एक कमजोर और असत्यापित दावे को विश्वसनीयता का आवरण पहनाने की कोशिश की गई।
प्रायोजित सामग्री और अंतरराष्ट्रीय नैरेटिव का तालमेल
यह घटनाक्रम केवल एक अखबार की रिपोर्ट तक सीमित नहीं है। पहले देश के भीतर चुनिंदा माध्यमों के जरिए आधी-अधूरी रिपोर्ट्स प्रकाशित की जाती हैं, फिर उसी सामग्री को आधार बनाकर विदेशी मंचों और कुछ समूहों द्वारा भारत की निष्पक्ष चुनाव प्रणाली पर सवाल उठाए जाते हैं। इसका उद्देश्य देश की संवैधानिक संस्थाओं पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उंगली उठवाना है। कर्नाटक के प्रशासनिक यथार्थ और ठोस आंकड़ों ने इस पूरे नैरेटिव को खारिज कर दिया है।
सर्वोच्च न्यायालय में खारिज हुआ पक्षपाती नैरेटिव
अदालत पर दबाव बनाने और चुनाव आयोग को घेरने के उद्देश्य से तैयार किया गया यह ताना-बाना सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष टिक नहीं सका। शीर्ष अदालत ने निर्वाचन आयोग की संवैधानिक कार्यप्रणाली और उसकी विधिक प्रक्रियाओं पर भरोसा जताते हुए बिना ठोस आधार के तैयार की गई याचिकाओं और मीडिया रिपोर्टों के तर्कों को खारिज कर दिया। अदालत के रुख के बाद यह भ्रामक नैरेटिव पूरी तरह बेनकाब हो गया।
Entire Vote Chori drama was created by Indian Express with flimsy research & fake claims, published on the day SC was taking up a case about ECI appointments. To put pressure on courts.
The substance in the report was so weak, the conclusions so motivated & far fetched, it should not have got published. But dhanda pressure…
So to hide the lack of substance, from day 1 they started talking about Ritika Chopra, presented her as a hero. Reverse ad-hominem. Glorify an author so their work will appear good.
That fraud came crashing down today at Supreme Court…
Shame on Indian Express!
— Eminent Intellectual (@total_woke_) October 26, 2026
पारदर्शी मतदाता सूची से चुनावी शुचिता की पुनर्स्थापना
कर्नाटक के आंकड़े यह साबित करते हैं कि विशेष गहन पुनरीक्षण किसी दल या वर्ग के खिलाफ नहीं, बल्कि चुनावी प्रक्रिया में पारदर्शिता लाने के लिए उठाया गया निष्पक्ष प्रशासनिक कदम है। जब कांग्रेस शासित राज्य में भी उसी नियम से 1 करोड़ अपात्र नामों की पहचान होती है, तो यह स्पष्ट है कि चुनाव आयोग बिना किसी राजनीतिक भेदभाव के काम कर रहा है। बोगस पहचान पत्रों, मृत नागरिकों और दोहरी प्रविष्टियों के दम पर चुनावी लाभ लेने की जो व्यवस्था बनी हुई थी, वह आधुनिक तकनीकी जांच और भौतिक सत्यापन से समाप्त हो रही है। इस प्रक्रिया पर उठ रहे सवाल केवल अपने चुनावी समीकरण बिगड़ने की हताशा का परिणाम हैं।









