कांग्रेस में परिवारवाद अब केवल नेतृत्व की परंपरा नहीं, बल्कि पार्टी की राजनीति पर उठने वाला सबसे बड़ा सवाल बन चुका है। नेहरू से इंदिरा गांधी, राजीव गांधी से सोनिया गांधी और फिर राहुल गांधी व प्रियंका गांधी से रेहान राजीव गांधी तक नेतृत्व की धुरी एक ही परिवार के इर्द-गिर्द घूमती रही है। दरअसल, कांग्रेस में किसी साधारण कार्यकर्ता की योग्यता, अनुभव और संघर्ष के मुकाबले गांधी परिवार का नाम अधिक प्रभावशाली साबित होता है। लोकतंत्र में नेतृत्व विरासत में नहीं, जनसमर्थन और कार्यक्षमता के आधार पर मिलना चाहिए, लेकिन कांग्रेस की सियासत इसके विपरीत है। कांग्रेस पर लंबे समय से यह आरोप लगता रहा है कि पार्टी का नेतृत्व और उसका राजनीतिक आकर्षण एक परिवार के इर्द-गिर्द केंद्रित रहा है। यह लोकतांत्रिक राजनीति में वंशानुगत प्रभाव का ऐसा उदाहरण है, जिसमें परिवार का नाम अपने आप में राजनीतिक पूंजी रहा है । अब प्रियंका गांधी के बेटे रेहान राजीव वाड्रा का नाम और उनकी तस्वीरों की प्रदर्शनी इसी बहस के केंद्र में आ गए हैं। सवाल यह नहीं कि किसी व्यक्ति को अपने नाना का नाम इस्तेमाल करने का अधिकार है या नहीं, सवाल यही है कि क्या कांग्रेस कभी परिवार की छाया से बाहर निकलकर अपने सामान्य कार्यकर्ताओं को सर्वोच्च नेतृत्व तक पहुंचने का वास्तविक अवसर दे पाएगी?
छात्र आंदोलनों और विरोध प्रदर्शनों को प्रोत्साहित करने की सोच
रेहान राजीव वाड्रा की दिल्ली में आयोजित फोटो प्रदर्शनी से 74 तस्वीरें हटाए जाने की घटना ने इस बहस को एक नया राजनीतिक मोड़ दिया है। तस्वीरों में हाल के महीनों के छात्र और युवा आंदोलनों तथा विरोध प्रदर्शनों के दृश्य शामिल थे। प्रदर्शनी प्रबंधन ने कुछ तस्वीरों को अपनी नीति के अनुरूप नहीं माना। क्योंकि इनसे दंगाई प्रवृत्ति और आंदोलन को प्रोत्साहन मिलता है। इसी घटनाक्रम के बीच राजस्थान भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष मदन राठौड़ ने रेहान के नाम में ‘राजीव’ के इस्तेमाल पर सवाल उठाए। देखते ही देखते मामला कला, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और प्रशासनिक निर्णय से आगे बढ़कर गांधी परिवार की विरासत, नाम की राजनीति और कांग्रेस में परिवारवाद की बहस से जुड़ गया। यह विवाद अपने आप में एक बड़ा राजनीतिक प्रश्न खड़ा करता है। क्या भारत की राजनीति में किसी परिवार का नाम केवल अतीत की स्मृति है, या वह भविष्य की संभावनाओं को प्रभावित करने वाली ताकत भी है?
रेहान के नाम में ‘राजीव’ जोड़ने पर भाजपा ने उठाए सवाल
राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि रेहान के नाम में ‘राजीव’ जोड़ने का उद्देश्य भविष्य में राजनीति में उतरकर गांधी परिवार की विरासत का लाभ लेना है। इसी तथ्य से परिवारवाद पर राजनीतिक बहस और तेज हो जाती है। किसी नाम का लंबे समय से इस्तेमाल होना एक तथ्य है; उस नाम का सार्वजनिक जीवन और राजनीति में क्या प्रतीकात्मक अर्थ निकलता है, यह अलग प्रश्न है। रेहान के मामले में ‘राजीव’ नाम ने इसलिए ध्यान खींचा है, क्योंकि भारतीय राजनीति में राजीव गांधी की विरासत आज भी कांग्रेस की पहचान का महत्त्वपूर्ण हिस्सा है। राजस्थान भाजपा के अध्यक्ष मदन राठौड़ ने इसी मुद्दे पर सवाल उठाते हुए कहा कि रेहान को ‘रेहान राजीव वाड्रा’ क्यों और कैसे कहा जा रहा है?
पिता, दादा या गांव का नाम लगाने की ही रही है परंपरा
उन्होंने कहा कि किसी व्यक्ति के नाम के आगे पिता या दादा का नाम या कई राज्यों में गांव का नाम लगाने की पुरानी परंपरा है। लेकिन नाना का नाम तो कहीं सुना नहीं जाता। फिर रेहान के नाम के साथ ‘राजीव’ क्यों जोड़ा जा रहा है और क्या इसके पीछे राजनीतिक हित साधने की मंशा है। राठौड़ ने यह भी सवाल उठाया कि जब उनके पिता रॉबर्ट वाड्रा हैं, तो नाम के संदर्भ में पिता की जगह नाना के नाम को इतनी प्रमुखता क्यों मिल रही है। इससे स्पष्ट है कि यह अपनी राजनीतिक विरासत को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने की कोशिश है। रेहान के साथ राजीव लगाकर उनकी निजी मंशा या भविष्य की राजनीतिक योजना अपने आप प्रमाणित हो जाती है। इसलिए इस बयान ने एक बार फिर उस बहस को तेज कर दिया है, जिसमें कांग्रेस की परिवार-केंद्रित राजनीति पर सवालिया निशान लगते हैं।
परिवारवाद: कांग्रेस पर पुराना आरोप, नई पीढ़ी पर निगाह
कांग्रेस की राजनीति में गांधी परिवार की केंद्रीय भूमिका से इनकार नहीं किया जा सकता। नेहरू-गांधी परिवार के समर्थक इसे संगठन को एकजुट रखने वाली पहचान बताते हैं, जबकि विरोधी इसे नेतृत्व के अवसरों को सीमित करने वाली पारिवारिक व्यवस्था मानते हैं। राहुल गांधी और प्रियंका गांधी की सक्रिय राजनीति के बाद अब प्रियंका के बच्चों के नाम सार्वजनिक चर्चा में आने लगे हैं। क्योंकि राहुल गांधी ने अभी तक घोषित रूप में शादी नहीं की है। रेहान पहले प्रियंका के नामांकन और राहुल गांधी की यात्रा में भी शामिल हुए थे। लेकिन किसी राजनीतिक परिवार में जन्म लेना अपने आप में राजनीति में प्रवेश करने का प्रमाण नहीं है। रेहान वाड्रा को अभी मुख्यतः कलाकार और फोटोग्राफर के रूप में जाना जाता है। परिवारवाद की राजनीति करने वालों के लिए यह प्रश्न प्रासंगिक है कि क्या किसी परिवार का नाम ही सार्वजनिक जीवन में असाधारण पहचान दिलाने का अवसर है।
नीति के अनुरूप नहीं थीं रेहान की 105 में से 74 तस्वीरें
रेहान ने सिर्फ नाम में ही राजीव नहीं जोड़ा है, बल्कि वे अपनी प्रदर्शनी के माध्यम से भी राजनीति की अपनी सोच को उजागर करने में लगे हैं। दरअसल, हाल ही में उनकी प्रदर्शनी ‘नो आइडिया इज फाइनल’ दिल्ली के बीकानेर हाउस में आयोजित की गई थी। रिपोर्टों के अनुसार, इसमें कुल 105 तस्वीरें प्रदर्शित की जानी थीं, जिनमें वन्यजीवन, अमूर्त कला और छात्रों से जुड़ी तस्वीरें शामिल थीं। लेकिन प्रदर्शनी के आयोजकों को पता चला कि 105 तस्वीरों में हाल ही में हुए छात्रों के आंदोलन की भड़काऊ तस्वीरें भी शामिल हैं। इसलिए प्रदर्शनी शुरू होने से कुछ घंटे पहले उन्हें 74 तस्वीरें हटाने या बदलने के लिए कहा गया। बीकानेर हाउस प्रबंधन का पक्ष था कि कुछ तस्वीरें उसकी नीति के अनुरूप नहीं थीं और इसलिए उन्हें हटाने का अनुरोध किया गया।
रेहान के समर्थन में प्रियंका गांधी और अशोक गहलोत आगे आए
तस्वीरें हटाए जाने के बाद प्रियंका गांधी वाड्रा ने अपने बेटे का समर्थन किया और इस कार्रवाई को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से जोड़ते हुए आपत्ति जताई। उनका अजब तर्क था कि वन्यजीवन, अमूर्त कला के नाम पर प्रदर्शनी में आंदोलनकारियों की तस्वीरें भी अभिव्यक्ति की आजादी को रोकने वाली हैं। राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने भी इस मामले में भाजपा सरकार की आलोचना की। उन्होंने कहा कि बीकानेर हाउस राजस्थान सरकार की संपत्ति है और वहां एक युवा कलाकार की अभिव्यक्ति को बाधित किया जाना गलत है। भाजपा पक्ष की आपत्ति और कांग्रेस के प्रतिवाद के बीच असली कसौटी यह होनी चाहिए कि लोकतंत्र में सत्ता की आलोचना का अधिकार है, लेकिन प्रशासनिक फैसलों का मूल्यांकन भी तथ्यों और लागू नियमों के आधार पर होना चाहिए।
कांग्रेस की सियासत में विरासत के समक्ष योग्यता की कसौटी नहीं
राजनीति में नाम का प्रभाव एक वास्तविकता है। किसी प्रतिष्ठित राजनीतिक परिवार का सदस्य सार्वजनिक जीवन में कदम रखता है, तो उसे मीडिया का ध्यान, पहचान और लोगों तक पहुंचने का अवसर अपेक्षाकृत आसानी से मिल सकता है। लेकिन पहचान और जनसमर्थन एक ही चीज नहीं हैं। लोकतंत्र में अंततः जनता किसी व्यक्ति को उसके काम, विचार, क्षमता और व्यवहार के आधार पर स्वीकार या अस्वीकार करती है। गांधी परिवार के संदर्भ में यही सवाल बार-बार उठता है कि क्या राजनीतिक विरासत के कारण नेतृत्व के अवसर परिवार के भीतर केंद्रित होते हैं। यह आलोचना कांग्रेस के संगठनात्मक ढांचे और नेतृत्व चयन पर बहस का विषय हो सकती है। ऐसे में रेहान वाड्रा का अपने नाम में ‘राजीव’ का इस्तेमाल करना राजनीतिक लाभ और पहचान बनाने की पहली सीढ़ी कही जा सकती है।
गांधी परिवार की राजनीतिक विरासत के वारिस रेहान बनेंगे?
रेहान राजीव वाड्रा की प्रदर्शनी और उनके नाम को लेकर उठे सवाल कांग्रेस के लिए असहज हो सकते हैं, क्योंकि परिवारवाद का आरोप पार्टी की राजनीति के साथ लंबे समय से जुड़ा हुआ है। कांग्रेस को यह बताना होगा कि उसके भीतर नेतृत्व का विकास कितनी व्यापकता से होता है और क्या साधारण कार्यकर्ता भी सर्वोच्च जिम्मेदारियों तक पहुंचने के वास्तविक अवसर मिल पाते हैं। फिलहाल तो 99 चुनाव हारने के बाद भी कांग्रेस का राहुल गांधी के पीछे लगे रहना दर्शाता है कि लोकतांत्रिक राजनीति में भी कांग्रेस की वंशवाद की सियासत ही फल-फूल रही है। अब इसे रेहान राजीव वाड्रा के जरिए अगली पीढ़ी तक ले जाने की कोशिश हो रही है। ऐसे में राजनीतिक हलकों में यह सवाल भी उठने लगा है कि क्या रेहान राजीव वाड्रा आने वाले समय में गांधी परिवार की राजनीतिक विरासत के वारिस रेहान बनेंगे?
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“Who is Raihan Vadra, Picasso? Nehru, Indira, Rajiv, Sonia, Rahul—and now Raihan’s launch!
If your children enter politics, they must be mentally prepared for scrutiny. You represent millions, and aspire to represent 1.5 billion.
Let children enter the organisation and earn their place through merit. But putting cello tape on a chair to ensure only your son or daughter sits there is PARIVARWAD!
This is monarchy, NOT democracy!” https://t.co/4M2BLpUWoZ
— Megh Updates 🚨™ (@MeghUpdates) October 25, 2026









