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पंजाब कांग्रेस में बड़ी गुटबाजी: अभी से 4 नेताओं में सीएम फेस की लड़ाई

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पंजाब की राजनीति एक बार फिर ऐसे मोड़ पर खड़ी है, जहां दूसरे दलों से अधिक चुनौती कांग्रेस को अपने ही घर के भीतर से मिल रही है। विधानसभा चुनाव में अभी कुछ समय बाकी है, लेकिन मुख्यमंत्री पद के संभावित चेहरे को लेकर कांग्रेस के कई वरिष्ठ नेता में अभी से घमासान छिड़ा हुआ है। हालात इतने बदतर हो रहे हैं कि कांग्रेस आलाकमान को भितरघात को सुलझाने के लिए कमेटी तक बनानी पड़ी है। दरअसल, पूर्व मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी, कांग्रेस के प्रदेश प्रधान अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग, सांसद सुखजिंदर सिंह रंधावा और वरिष्ठ नेता प्रताप सिंह बाजवा खुद को अभी से ही मुख्यमंत्री पद के दावेदार के रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं। इसके चलते कांग्रेस चार धड़ों में बंटी हुई नजर आ रही है। यही स्थिति कांग्रेस नेतृत्व के लिए सबसे बड़ी चिंता का विषय बनी है। पार्टी हाईकमान ने गुटबाजी को नियंत्रित करने और नेताओं को एक मंच पर लाने के लिए तीन सदस्यीय समिति का गठन किया है, लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या केवल समितियां बनाकर राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं को नियंत्रित किया जा सकता है? पंजाब कांग्रेस का हाल देखकर यह प्रश्न और भी प्रासंगिक हो जाता है।चन्नी खुद को मानते हैं पंजाब का सबसे बड़ा दलित चेहरा
पंजाब कांग्रेस पर यह कहावत चरितार्थ हो रही है कि घर बसा नहीं और मंगते पहले आ गए…यानि ना तो अभी चुनाव एकदम पास हैं, ना ही कांग्रेस को विधानसभा में बहुमत मिलना तय है, लेकिन सीएम बनने के लिए कांग्रेस के नेता अभी से ताल ठोंक रहे हैं। सबसे पहले बात पूर्व मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी की। चन्नी पंजाब के पहले दलित मुख्यमंत्री रहे हैं और राज्य की लगभग एक-तिहाई दलित आबादी के बीच उनकी पहचान मानी जाती है। कांग्रेस नेतृत्व ने 2021 में उन्हें मुख्यमंत्री बनाकर सामाजिक संतुलन साधने का प्रयास किया था। हालांकि इसका परिणाम कांग्रेस के खिलाफ ही आया। आज भी चन्नी अपने कथित सामाजिक आधार और जनसंपर्क शैली के कारण स्वयं को मुख्यमंत्री पद का स्वाभाविक दावेदार मानते हैं। उनकी कोशिश है कि कांग्रेस दलित मतदाताओं को फिर से अपने साथ जोड़ सके।

रंधावा को परंपरागत सिख वोट बैंक पर पकड़ का भरोसा
दूसरी ओर सांसद सुखजिंदर सिंह रंधावा कांग्रेस के अनुभवी नेताओं में गिने जाते हैं। वे पंजाब सरकार में उपमुख्यमंत्री और गृह मंत्री जैसे महत्वपूर्ण पद संभाल चुके हैं। संगठन और प्रशासन दोनों पर उनकी पकड़ मानी जाती है। वे राजस्थान के भी प्रभारी रह चुके हैं। रंधावा लंबे समय से कांग्रेस के परंपरागत सिख वोट बैंक और ग्रामीण क्षेत्रों में असर रखते हैं। यही कारण है कि वे स्वयं को मुख्यमंत्री पद के लिए सबसे उपयुक्त विकल्प के रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं।

नेता प्रतिपक्ष प्रताप बाजवा खुद को संकटमोचक बता रहे
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता प्रताप सिंह बाजवा भी कम मजबूती से अपना दावा नहीं ठोंक रहे हैं। बाजवा वर्तमान में पंजाब विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष हैं और लंबे समय से कांग्रेस संगठन के महत्वपूर्ण चेहरों में शामिल रहे हैं। उनके पास संसदीय राजनीति और संगठनात्मक अनुभव दोनों हैं। पार्टी के भीतर उनका अपना समर्थक वर्ग है और वे स्वयं को कांग्रेस के संकटमोचक नेता के रूप में स्थापित करने की कोशिश कर रहे हैं। विपक्ष के नेता होने के नाते उन्हें लगातार मीडिया में स्थान भी मिलता है, जिससे उनकी दावेदारी और मजबूत दिखाई देती है।

प्रदेश अध्यक्ष अमरिंदर को अपनी आक्रामक शैली पर विश्वास
कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग वर्तमान में पार्टी को जमीनी स्तर पर मजबूत बनाते की कमान संभाल रहे हैं। पार्टी संगठन की कमान उनके हाथ में है और वे लगातार पार्टी को पुनर्जीवित करने का प्रयास कर रहे हैं। युवा नेतृत्व की छवि, आक्रामक राजनीतिक शैली और संगठन पर पकड़ उन्हें मुख्यमंत्री पद की संभावित दौड़ में बनाए हुए है। प्रदेश अध्यक्ष होने के कारण स्वाभाविक रूप से उनका राजनीतिक कद भी बढ़ा है।

जिम्मेदारियां बड़ी, लेकिन महत्वाकांक्षाएं उससे भी बड़ी
इन चारों नेताओं की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि सभी के पास संगठनात्मक या प्रशासनिक अनुभव है। चन्नी पूर्व मुख्यमंत्री हैं, रंधावा पूर्व उपमुख्यमंत्री रह चुके हैं, बाजवा विधानसभा में विपक्ष का नेतृत्व कर रहे हैं और राजा वड़िंग प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष हैं। यानी पार्टी के लगभग सभी प्रमुख पद इन नेताओं के पास हैं। लेकिन समस्या तब पैदा होती है जब संगठन को मजबूत करने के बजाय नेतृत्व की प्रतिस्पर्धा अधिक दिखाई देने लगती है। कांग्रेस के लिए सबसे बड़ी चुनौती यह है कि जनता को एकजुट विकल्प नहीं दिख रहा है। यदि हर नेता स्वयं को मुख्यमंत्री पद का चेहरा बताने लगे तो कार्यकर्ताओं के बीच भी भ्रम पैदा होता है। परिणामस्वरूप संगठनात्मक ऊर्जा चुनावी तैयारी में लगने के बजाय आंतरिक खींचतान में खर्च होने लगती है।क्या पंजाब कांग्रेस पिछले चुनाव का सबक भूल रही है?
पंजाब कांग्रेस के लिए सबसे बड़ा चेतावनी संकेत 2022 का विधानसभा चुनाव है। 2017 में कांग्रेस ने 77 सीटें जीतकर सरकार बनाई थी। लेकिन अगले ही चुनाव में पार्टी मात्र 18 सीटों पर सिमट गई। यह गिरावट केवल सत्ता विरोधी लहर का परिणाम नहीं थी, बल्कि इसके पीछे कांग्रेस की भीषण गुटबाजी भी जिम्मेदार थी। कैप्टन अमरिंदर सिंह और नवजोत सिंह सिद्धू के बीच चला लंबा संघर्ष पूरे कार्यकाल में सुर्खियों में रहा। मुख्यमंत्री और प्रदेश अध्यक्ष के बीच टकराव ने सरकार की छवि को नुकसान पहुंचाया। नेतृत्व परिवर्तन, सार्वजनिक बयानबाजी और आपसी आरोप-प्रत्यारोप ने कांग्रेस को जनता की नजर में अस्थिर पार्टी बना दिया। परिणामस्वरूप आम आदमी पार्टी ने इस असंतोष का लाभ उठाया और कांग्रेस का जनाधार तेजी से खिसक गया।गुटबाजी को नियंत्रित करने के लिए समिति बनानी पड़ी
पंजाब कांग्रेस के लिए हालात पिछले चुनाव से पहले जैसे ही नजर आ रहे हैं। पिछले चुनाव में दो-तीन नेताओं में टक्कर थी, तो इस बार चार-चार नेता आमने-सामने हैं। ये सभी नेता मुख्यमंत्री पद की दौड़ में दिखाई दे रहे हैं, तब स्वाभाविक रूप से 2022 की यादें ताजा हो रही हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि पंजाब में स्थिति नहीं संभाली तो पिछला इतिहास दोहराया जा सकता है। गुटबाजी को नियंत्रित करने के लिए कांग्रेस नेतृत्व ने तीन सदस्यीय समिति बनानी पड़ी है। इसके साथ ही 66 नेताओं को दिल्ली बुलाकर बातचीत शुरू की है। इससे नेताओं को अपनी बात रखने का अवसर मिलेगा और संगठनात्मक शिकायतों का समाधान खोजा जा सकेगा।

समिति संगठनात्मक अनुशासन लागू करने का साहस दिखाएगी?
राजनीति की जानकार मानते हैं कि केवल समिति, बैठकें और रिपोर्ट तैयार कर देना पर्याप्त नहीं होगा। असली प्रश्न यह है कि क्या समिति निष्पक्ष ढंग से सभी पक्षों को सुनेगी? क्या वह संगठनात्मक अनुशासन लागू करने का साहस दिखाएगी? और सबसे महत्वपूर्ण, क्या समिति मुख्यमंत्री पद की महत्वाकांक्षा रखने वाले नेताओं को सामूहिक नेतृत्व के लिए तैयार कर पाएगी? यदि समिति केवल औपचारिक कवायद बनकर रह गई तो इसका कोई विशेष लाभ नहीं होगा। पंजाब कांग्रेस की समस्या व्यक्तियों के बीच मतभेद से अधिक नेतृत्व की प्रतिस्पर्धा है। इसका समाधान राजनीतिक इच्छाशक्ति से ही संभव है।राहुल गांधी और हाईकमान की एक बार फिर कड़ी परीक्षा
पंजाब कांग्रेस की स्थिति कांग्रेस नेतृत्व, विशेषकर राहुल गांधी के लिए भी बड़ी परीक्षा है। पार्टी लंबे समय से राज्यों में मजबूत क्षेत्रीय नेतृत्व और केंद्रीय नेतृत्व के बीच संतुलन बनाने की चुनौती से जूझ रही है। राजस्थान, छत्तीसगढ़, हरियाणा और पंजाब जैसे राज्यों में गुटबाजी ने कांग्रेस को कई बार नुकसान पहुंचाया है। पंजाब में स्पष्ट रणनीति न होने से विपक्ष को कांग्रेस पर हमला करने के लगातार अवसर मिल रहे हैं। जनता यह जानना चाहती है कि कांग्रेस चुनाव किस नेतृत्व में लड़ेगी और उसके पास शासन का स्पष्ट रोडमैप क्या है। यदि पार्टी केवल आंतरिक संघर्षों में उलझी रही तो मतदाता किसी अन्य विकल्प की ओर रुख कर सकते हैं।

हर गुट समर्थकों को टिकट दिलाने के लिए दबाव बनाएगा
आने वाले विधानसभा चुनाव में गुटबाजी का असर केवल सीटों तक सीमित नहीं रहेगा। इससे कार्यकर्ताओं का मनोबल प्रभावित होगा, संसाधनों का बंटवारा असंतुलित होगा और स्थानीय स्तर पर बगावत की संभावनाएं बढ़ेंगी। टिकट वितरण के समय यह संकट और गहरा सकता है। यदि प्रत्येक गुट अपने समर्थकों को टिकट दिलाने के लिए दबाव बनाएगा तो असंतोष बढ़ना तय है। राजनीतिक इतिहास बताता है कि चुनाव केवल लोकप्रिय नेताओं से नहीं, बल्कि मजबूत संगठन से जीते जाते हैं। कांग्रेस के पास पंजाब में अभी भी अनुभवी नेता है, लेकिन यदि यह शक्ति आपसी संघर्ष में खर्च होती रही तो उसका लाभ विरोधी दलों को मिलेगा।

सत्ता की लड़ाई शुरु होने से पहले ही कांग्रेसियों में परस्पर लड़ाई 
पंजाब कांग्रेस आज एक ऐसे चौराहे पर खड़ी है जहां उसे तय करना है कि वह 2022 की गलतियों से सीखना चाहती है या उन्हें दोहराना चाहती है। चरणजीत सिंह चन्नी, सुखजिंदर सिंह रंधावा, प्रताप सिंह बाजवा और अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग सभी अनुभवी और प्रभावशाली नेता हैं। उनकी महत्वाकांक्षा स्वाभाविक है, लेकिन पार्टी हित व्यक्तिगत दावेदारी से ऊपर होना चाहिए। तीन सदस्यीय समिति तभी सफल मानी जाएगी जब वह नेताओं को एक मंच पर लाकर सामूहिक नेतृत्व की भावना विकसित करे। अन्यथा 77 सीटों से 18 सीटों तक का सफर केवल अतीत की कहानी नहीं रहेगा, बल्कि कांग्रेस के भविष्य की भी चेतावनी बन सकता है। पंजाब की जनता एक मजबूत और एकजुट विपक्ष चाहती है, लेकिन यदि कांग्रेस अपने ही अंतर्विरोधों में उलझी रही तो सत्ता की लड़ाई शुरू होने से पहले ही वह राजनीतिक रूप से कमजोर पड़ सकती है।

ऑब्जर्वर ने पार्टी विधायकों व पूर्व विधायकों से फीडबैक लिया
पार्टी के अंदर चल रही गुटबाजी को खत्म करने के लिए कांग्रेस हाईकमान ने कमेटी बनाई है। पार्टी के तीन ऑब्जर्वर आज (17 जून) को लगातार दूसरे दिन भी पार्टी के विधायकों व पूर्व विधायकों से फीडबैक ले रहे हैं। यह प्रक्रिया कल तक चलेगी। इसके बाद ऑब्जर्वर्स की तरफ से अपनी रिपोर्ट हाईकमान को सौंप दी जाएगी। माना जा रहा है कि इसी रिपोर्ट के आधार पर कांग्रेस 2027 में होने वाले चुनाव से पहले नेताओं को जिम्मेदारियां सौंपेगी। इस दौरान ऑब्जर्वर्स कोशिश कर रहे हैं कि हर नेता को अपना पक्ष रखने का मौका दिया जाए। कांग्रेस के ऑब्जर्वर्स ने इंदिरा भवन में सांसदों, पंजाब प्रदेश कांग्रेस कमेटी के पूर्व अध्यक्षों और पूर्व मंत्रियों समेत वरिष्ठ नेताओं से वन-टू-वन बातचीत कर उनकी राय जानी जा रही । मौजूदा विधायकों, पूर्व विधायकों और जिला कांग्रेस अध्यक्षों से कल और परसों मुलाकात की जाएगी। ऑब्जर्वर्स से मिलने वाले नेताओं में कांग्रेस विधायक दल के नेता प्रताप सिंह बाजवा, पूर्व मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी, सांसद सुखजिंदर सिंह रंधावा, डॉ. अमर सिंह, गुरजीत सिंह औजला, डॉ. धर्मवीर गांधी और पूर्व पीपीसीसी प्रमुख शमशेर सिंह दूलो शामिल रहे।

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