Home नरेन्द्र मोदी विशेष जन सेवा के 25 साल: बिग कैट्स से सबसे बड़ी सफारी तक,...

जन सेवा के 25 साल: बिग कैट्स से सबसे बड़ी सफारी तक, मोदी के वाइल्डलाइफ विजन का मुरीद हुआ विश्व

SHARE

वर्ष 2001 में गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी ने गिर के वनों से संरक्षण का जो लोक-केंद्रित मॉडल गढ़ा था, 2014 के बाद केंद्र में वही विजन एक राष्ट्रव्यापी और वैश्विक नीति का रूप ले चुका है। बीते ढाई दशकों में भारत ने न केवल विलुप्त प्राय जीवों को नया जीवनदान दिया है, बल्कि तीव्र आर्थिक प्रगति और पर्यावरण संतुलन के सह-अस्तित्व की अनूठी मिसाल भी पेश की है। गिर में शेरों के संरक्षण से लेकर 70 साल बाद कूनो में चीतों की ऐतिहासिक वापसी, रामसर साइट्स का अप्रत्याशित विस्तार और दुनिया के 75 प्रतिशत बाघों को सुरक्षित आश्रय देना इसी दूरगामी सोच का परिणाम है। 2001 से पूर्व जहां वन्यजीव अवैध शिकार और नीतिगत उपेक्षा का शिकार थे, वहीं 2014 से पूर्व विकास परियोजनाओं को जंगलों का दुश्मन मानकर नीतियां तय की जाती थीं। मोदी सरकार ने इस सोच को पूरी तरह बदलते हुए 21वीं सदी की आधुनिक तकनीक, सैटेलाइट सर्विलांस, ‘गजराज’ जैसी एआई प्रणालियों और स्थानीय समुदायों को सीधे संरक्षण से जोड़कर सशक्त बनाया है। आज जब भारत 4 ट्रिलियन डॉलर की वैश्विक आर्थिक शक्ति बन चुका है, तब देश का कुल वन आवरण 24.6 प्रतिशत से अधिक के स्तर पर पहुंचना और नई दिल्ली से 90 से अधिक देशों के ‘इंटरनेशनल बिग कैट अलायंस’ (IBCA) का नेतृत्व करना यह सिद्ध करता है कि भारत अब पर्यावरण कूटनीति में विश्व का एजेंडा तय कर रहा है। ‘प्रकृति भी, प्रगति भी’ का यह 25 वर्षों का अखंड संकल्प विश्व के सामने सतत विकास का स्वर्णिम भारतीय मॉडल बनकर उभरा है।

गिर मॉडल की सफलता: 327 से बढ़कर 891 हुई एशियाई शेरों की संख्या
वर्ष 2001 से पहले गुजरात के गिर में एशियाई शेरों का अस्तित्व अवैध शिकार, खुले कुओं में गिरने से होने वाली मौतों और संकीर्ण पर्यावास के कारण अत्यंत संकटग्रस्त था। वर्ष 2001 की गणना में शेरों की संख्या मात्र 327 दर्ज की गई थी। नरेंद्र मोदी ने मुख्यमंत्री बनते ही इस संकट से निपटने के लिए पारंपरिक वन प्रशासन की सीमाओं को तोड़कर स्थानीय मालधारी और आदिवासी समुदायों को संरक्षण का सजग प्रहरी बनाया। देश में पहली बार ‘महिला वन रक्षक’ बल की तैनाती की गई, हजारों खुले कुओं को ढका गया और आधुनिक जीपीएस व रेडियो कॉलर ट्रैकिंग का सूत्रपात हुआ। 25 वर्षों के इस अनवरत संरक्षण प्रयास का परिणाम है कि संसद में पर्यावरण मंत्रालय द्वारा साझा किए गए आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, एशियाई शेरों की संख्या 2001 के 327 और 2020 के 674 से छलांग लगाकर 891 के सर्वकालिक उच्च स्तर पर पहुंच चुकी है, जबकि उनका पर्यावास क्षेत्र 22,000 वर्ग किलोमीटर से अधिक में फैल चुका है।

‘प्रोजेक्ट लायन’ का दूसरा घर: बर्दा अभयारण्य में शेरों के विकेंद्रीकृत संरक्षण की शुरुआत
गिर में शेरों की निरंतर बढ़ती संख्या और किसी संभावित महामारी (जैसे कैनाइन डिस्टेंपर वायरस) के खतरे से पूरी आबादी को सुरक्षित रखने के लिए मोदी सरकार ने ‘प्रोजेक्ट लायन’ के तहत ऐतिहासिक कदम उठाया है। गुजरात के पोरबंदर स्थित बर्दा वन्यजीव अभयारण्य को एशियाई शेरों के दूसरे प्राकृतिक पर्यावास के रूप में तेजी से विकसित किया जा रहा है। 2001 में गिर से शुरू हुआ संरक्षण मॉडल अब विकेंद्रीकृत सुरक्षा चक्र में बदल चुका है, जहां शेरों के लिए प्राकृतिक शिकार आधार, जल स्रोत और अत्याधुनिक सुरक्षा बाड़ तैयार की गई है। यह दूरगामी पहल सुनिश्चित करती है कि भारत के शेरों का भविष्य केवल एक वन क्षेत्र पर निर्भर न रहकर रणनीतिक रूप से सुरक्षित रहे।

1,411 से 3,925 पार पहुंचे बाघ: दुनिया के 75% जंगली बाघ अब अकेले भारत में
वर्ष 2014 से पूर्व देश का राष्ट्रीय पशु बाघ गंभीर संकट के दौर से गुजर रहा था। 2006 की राष्ट्रीय गणना में देश में केवल 1,411 बाघ बचे थे और सरिस्का तथा पन्ना जैसे प्रमुख अभयारण्यों से बाघ पूरी तरह गायब हो चुके थे, जिससे देश में इनके विलुप्त होने की आशंका गहराने लगी थी। 2014 में केंद्र में मोदी सरकार के आने के बाद राजनीतिक इच्छाशक्ति और अत्याधुनिक तकनीक के संगम से परिदृश्य बदल गया। देश में टाइगर रिजर्व्स की संख्या 58 तक पहुंच गई। ‘M-STrIPES’ मोबाइल ऐप आधारित पेट्रोलिंग, सैटेलाइट सर्विलांस और सख्त शिकार-रोधी नीतियों के चलते बाघों की संख्या 2014 के 2,226 से बढ़कर वर्तमान में 3,682 से 3,925 के अनुमानित स्तर को पार कर चुकी है। मध्य प्रदेश 785 बाघों के साथ शीर्ष ‘टाइगर स्टेट’ बना हुआ है, जबकि कर्नाटक 563 और उत्तराखंड 560 बाघों के साथ मजबूती से उभरे हैं। आज पूरी दुनिया के 75 प्रतिशत से अधिक जंगली बाघ अकेले भारत के जंगलों में सुरक्षित दहाड़ रहे हैं।

 70 साल बाद वापसी: 1952 में विलुप्त चीतों का कुनबा कूनो में 25 के पार
वर्ष 1952 में भारत से आधिकारिक रूप से विलुप्त घोषित हो चुके चीते की वापसी सात दशकों तक केवल फाइलों और चर्चाओं में ही अटकी रही। स्वतंत्र भारत के इतिहास में पहली बार 2022 में प्रधानमंत्री मोदी की दृढ़ इच्छाशक्ति से नामीबिया और दक्षिण अफ्रीका से चीतों को लाकर मध्य प्रदेश के कूनो नेशनल पार्क में सफलता से पुनर्स्थापित किया गया। आलोचकों की तमाम आशंकाओं को खारिज करते हुए चीतों ने न केवल भारतीय जलवायु में खुद को ढाला, बल्कि भारतीय धरती पर कई शावकों को जन्म भी दिया। भारतीय वातावरण में जन्मी नई पीढ़ी के साथ कूनो में चीतों का कुनबा बढ़कर अब 25 से अधिक हो चुका है। इसके साथ ही भारत दुनिया का एकमात्र ऐसा राष्ट्र बन गया है, जहां मार्जार वंश (Big Cats) की पांचों प्रमुख प्रजातियां—बाघ, शेर, तेंदुआ, हिम तेंदुआ और चीता—एक साथ फल-फूल रही हैं।

प्रोजेक्ट चीता फेज-2: गांधी सागर और बन्नी ग्रासलैंड से घास पारिस्थितिकी का पुनरुद्धार
कूनो नेशनल पार्क में मिली ऐतिहासिक सफलता के बाद मोदी सरकार ने प्रोजेक्ट चीता के दूसरे चरण को अभूतपूर्व गति दी है। चीतों के पर्यावास विस्तार के लिए मध्य प्रदेश के गांधी सागर अभयारण्य को अत्याधुनिक सुरक्षा बाड़ों के साथ तैयार किया गया, जिससे चीतों को प्राकृतिक प्रसार के लिए विस्तृत क्षेत्र मिल सके। इसके साथ ही गुजरात के कच्छ स्थित ऐतिहासिक ‘बन्नी ग्रासलैंड’ में चीता संरक्षण एवं प्रजनन केंद्र को औपचारिक स्वीकृति दी गई। यह कदम प्रमाणित करता है कि चीता परियोजना मात्र कुछ जीवों को बसाने तक सीमित नहीं थी, बल्कि यह देश के विशाल घास के मैदानों (Grassland Ecosystem) को पुनर्जीवित कर वहां की पूरी खाद्य श्रृंखला को सशक्त बनाने का एक दूरगामी राष्ट्रीय मिशन है।

10,000 एकड़ में दुनिया की सबसे बड़ी जंगल सफारी: अरावली का ऐतिहासिक कायाकल्प
एनसीआर क्षेत्र में पर्यावरणीय संतुलन को सुदृढ़ करने और अरावली पर्वतमाला को खनन व अतिक्रमण से सुरक्षित रखने के लिए केंद्र व हरियाणा सरकार के सहयोग से एक ऐतिहासिक परियोजना को धरातल पर उतारा गया है। हरियाणा के गुरुग्राम और नूंह जिलों में 10,000 एकड़ क्षेत्र में दुनिया का सबसे बड़ा सफारी पार्क (Aravalli Safari Park) विकसित किया जा रहा है। यह परियोजना न केवल वैश्विक स्तर पर भारत के इको-टूरिज्म का सबसे बड़ा केंद्र बनकर उभरेगी, बल्कि अरावली के संवेदनशील वन क्षेत्र को स्थायी जैव-विविधता गलियारे में बदलकर दिल्ली-एनसीआर के पर्यावरण के लिए एक विशाल हरित ढाल का कार्य करेगी।

3,000+ एक सींग वाले गैंडे और 150 एआई हाथी गलियारे: शिकार पर लगा पूर्ण विराम
2014 से पहले पूर्वोत्तर, विशेषकर असम के काजीरंगा में एक सींग वाले गैंडों का अंधाधुंध शिकार राष्ट्रीय चिंता का विषय था और प्रतिवर्ष दर्जनों गैंडे तस्करों की गोलियों का शिकार होते थे। 2014 के बाद केंद्र और असम सरकार के कड़े साझा अभियानों, आधुनिक हथियारों से लैस वन बलों और जीरो टॉलरेंस नीति के चलते अवैध शिकार पर लगभग पूर्ण विराम लग गया। परिणामस्वरूप, अकेले काजीरंगा में गैंडों की संख्या 2,600 से अधिक और समूचे देश में 3,000 के सुरक्षित आंकड़े को पार कर गई है। इसी प्रकार देश के लगभग 30,000 एशियाई हाथियों की सुरक्षा के लिए 150 से अधिक हाथी गलियारों की वैज्ञानिक मैपिंग की गई। रेल दुर्घटनाओं में होने वाली मौतों को रोकने के लिए रेलवे ट्रैक्स पर ‘गजराज प्रणाली’ जैसी एआई आधारित ऑप्टिकल फाइबर तकनीक लागू की गई, जिसने दशकों पुरानी हाथी दुर्घटनाओं की समस्या पर प्रभावी रोक लगाई है।

प्रोजेक्ट RE-HAB का नवाचार: मधुमक्खी बाड़ से मानव-हाथी संघर्ष में भारी कमी
रेलवे ट्रैक्स से आगे बढ़कर ग्रामीण आबादी और खेतों में हाथियों के टकराव को रोकने के लिए मोदी सरकार ने विशुद्ध भारतीय और पर्यावरण-अनुकूल समाधान को जमीन पर उतारा। खादी एवं ग्रामोद्योग आयोग (KVIC) के माध्यम से ‘प्रोजेक्ट RE-HAB’ (Reducing Elephant-Human Attacks using Bees) लागू किया गया। इसके तहत जंगलों और गांवों की सीमाओं पर मधुमक्खियों के बक्से स्थापित किए गए। हाथी मधुमक्खियों के भिनभिनाने और उनके डंक से प्राकृतिक रूप से दूर भागते हैं, जिससे बिना किसी हिंसा या बिजली के तारों के हाथियों को खेतों में घुसने से रोका गया। इस नवाचार ने न केवल फसलों के नुकसान और इंसानी जान-माल की हानि को न्यूनतम किया, बल्कि स्थानीय किसानों को शहद उत्पादन के जरिए अतिरिक्त आय का साधन भी दिया।

26 से बढ़कर 101 हुई संख्या: ‘अमृत धरोहर’ से रामसर साइट्स बनीं आजीविका का संबल
पारिस्थितिकी तंत्र और जलीय जीवन के संरक्षण में वर्ष 2014 से पूर्व भारत की स्थिति बेहद सीमित थी। स्वतंत्रता के छह दशकों में 2014 तक देश में मात्र 26 रामसर स्थल (अंतरराष्ट्रीय महत्व की आर्द्रभूमियां) अधिसूचित थे। मोदी सरकार ने इसे राष्ट्रीय मिशन बनाते हुए बीते वर्षों में इसका ऐतिहासिक विस्तार किया और यह संख्या 101 से अधिक पहुंच चुकी है, जिससे भारत दक्षिण एशिया का सिरमौर बन गया है। इसके साथ ही सरकार ने ‘अमृत धरोहर’ (Amrit Dharohar) योजना शुरू की, जिसका उद्देश्य आर्द्रभूमियों को केवल कागजी संरक्षण न देकर वहां स्थानीय समुदायों, बर्ड-गाइड्स और प्रकृति-मित्रों को प्रशिक्षित कर पर्यटन व सतत आजीविका का केंद्र बनाना है।

हिमालय में 718 हिम तेंदुए और देश में 13,874 तेंदुए: डॉल्फिन संरक्षण को भी मिला नया बल
वर्ष 2014 से पहले देश के दुर्गम हिमालयी क्षेत्रों और नदी तंत्रों में वन्यजीवों की वैज्ञानिक गणना का कोई पुख्ता राष्ट्रीय ढांचा मौजूद नहीं था। मोदी सरकार ने इस दिशा में ऐतिहासिक पहल करते हुए पहली बार ‘स्नो लेपर्ड असेसमेंट इन इंडिया’ (SPAI) संपन्न कराया, जिसके आधिकारिक निष्कर्षों के अनुसार भारत में 718 हिम तेंदुओं की सटीक उपस्थिति दर्ज की गई, जिनमें अकेले लद्दाख में 477, उत्तराखंड में 124 और हिमाचल प्रदेश में 51 हिम तेंदुए सुरक्षित पाए गए। इसके साथ ही तेंदुओं की राष्ट्रीय आबादी भी 13,874 तक पहुंच गई है, जिसमें मध्य प्रदेश 3,907 तेंदुओं के साथ अग्रणी है। वहीं जलीय जैव-विविधता के लिए प्रारंभ किए गए ‘प्रोजेक्ट डॉल्फिन’ के जरिए गंगा और समुद्री डॉल्फिन के संरक्षण को आधुनिक तकनीक और समुदाय आधारित सुरक्षा चक्र प्रदान किया गया।

दुनिया के 90% घड़ियालों का घर बना भारत: मीठे पानी के कछुओं को मिला जीवनदान
नदी पारिस्थितिकी के स्वास्थ्य के सबसे बड़े प्रतीक माने जाने वाले घड़ियाल और ताजे पानी के दुर्लभ कछुओं के संरक्षण में भारत ने वैश्विक मानक स्थापित किए हैं। चंबल, गंडक और घाघरा जैसी प्रमुख नदियों में कैप्टिव ब्रीडिंग और वैज्ञानिक पुनर्स्थापना के चलते आज दुनिया के 90 प्रतिशत से अधिक घड़ियाल अकेले भारत में फल-फूल रहे हैं। इसके साथ ही लुप्तप्राय बाटागुर कछुओं (Batagur Turtles) के संरक्षण के लिए विशेष प्रजनन केंद्र स्थापित किए गए। यह सफलता दर्शाती है कि स्थलीय वनों के साथ-साथ भारत अपने विशाल नदी तंत्रों की जलीय खाद्य श्रृंखला को पुनर्जीवित करने में पूरी गंभीरता से जुटा है।

‘मिष्टी’ योजना से तटीय सुरक्षा: 9 राज्यों में मैंग्रोव वनों का अभूतपूर्व कायाकल्प
समुद्री पारिस्थितिकी और तटीय चक्रवातों से देश की रक्षा के लिए मोदी सरकार ने एक समर्पित दृष्टिकोण अपनाते हुए ‘मिष्टी’ (MISHTI – Mangrove Initiative for Shoreline Habitats & Tangible Incomes) योजना का सूत्रपात किया। गुजरात के कच्छ से लेकर पश्चिम बंगाल के सुंदरबन तक देश के 9 तटीय राज्यों और 4 केंद्र शासित प्रदेशों में सघन मैंग्रोव पौधारोपण किया गया। भारतीय वन सर्वेक्षण (ISFR) के आंकड़ों के अनुसार, देश के कुल मैंग्रोव आवरण में निरंतर शुद्ध वृद्धि दर्ज की गई है। यह पहल न केवल तटीय आबादी को प्राकृतिक आपदाओं से अभेद्य सुरक्षा कवच प्रदान कर रही है, बल्कि दुर्लभ समुद्री जीवों और मछलियों के प्रजनन स्थलों को बचाकर स्थानीय मछुआरों की आजीविका को भी सुदृढ़ बना रही है।

संकटग्रस्त पक्षियों का सुरक्षा कवच: जीआईबी ब्रीडिंग सेंटर और जटायु संरक्षण मिशन
संरक्षण के विजन को विशालकाय स्तनधारियों से आगे ले जाते हुए सरकार ने विलुप्ति के कगार पर पहुंचे पक्षियों के लिए आपातकालीन कदम उठाए। राजस्थान और गुजरात के थार मरुस्थल में अत्यंत संकटग्रस्त ‘ग्रेट इंडियन बस्टर्ड’ (गोडावण) को बचाने के लिए अत्याधुनिक कैप्टिव ब्रीडिंग और कृत्रिम गर्भाधान केंद्र स्थापित किए गए, जिससे इनकी नई पीढ़ी का जन्म संभव हुआ। इसके अतिरिक्त हाई-टेंशन बिजली लाइनों से टकराकर होने वाली मौतों को रोकने के लिए व्यापक स्तर पर ‘बर्ड डायवर्टर’ लगाए गए। वहीं पारिस्थितिकी के प्राकृतिक सफाईकर्मी माने जाने वाले गिद्धों की रक्षा के लिए हानिकारक पशु-दवाओं पर कड़े प्रतिबंध लगाए गए और देश भर में ‘जटायु संरक्षण एवं प्रजनन केंद्रों’ का नेटवर्क स्थापित कर गिद्धों की घटती संख्या को स्थिरता प्रदान की गई।

90+ देशों का नेतृत्व: नई दिल्ली से संचालित ‘इंटरनेशनल बिग कैट अलायंस’ (IBCA)
दशकों तक वन्यजीव संरक्षण पर पश्चिमी देशों के सम्मेलनों और दिशा-निर्देशों पर निर्भर रहने वाला भारत अब इस क्षेत्र में वैश्विक एजेंडा तय कर रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की दूरगामी पहल पर नई दिल्ली में मुख्यालय के साथ ‘इंटरनेशनल बिग कैट अलायंस’ (IBCA) का गठन किया गया है। इसमें 90 से अधिक रेंज देशों को एकजुट कर बाघ, शेर, तेंदुआ, हिम तेंदुआ, चीता, जगुआर और प्यूमा के संरक्षण के लिए भारत वित्तीय सहायता और तकनीकी विशेषज्ञता का नेतृत्व कर रहा है। कभी संकटग्रस्त वन्यजीवों के लिए अंतरराष्ट्रीय मदद की बाट जोहने वाला देश आज पूरी दुनिया को संरक्षण का रोडमैप सिखा रहा है।

24×7 डिजिटल सर्विलांस: सैटेलाइट और ई-आई तकनीक से वन अपराधों पर शून्य टॉलरेंस
2014 से पूर्व जंगलों की सुरक्षा मुख्य रूप से सीमित संसाधनों, लाठी और पुरानी बंदूकों वाले वन कर्मियों के भरोसे थी, जिससे शिकारी और लकड़ी तस्कर आसानी से बच निकलते थे। मोदी सरकार ने वन सुरक्षा तंत्र को 21वीं सदी की अत्याधुनिक तकनीक से लैस किया। आज जंगलों की निगरानी के लिए नाइट विजन थर्मल ड्रोन, ई-आई (e-Eye) इलेक्ट्रॉनिक सर्विलांस टावर और भारतीय वन सर्वेक्षण (FSI) के सैटेलाइट रियल-टाइम अलर्ट सिस्टम का उपयोग हो रहा है। जंगल में आग लगने या अवैध कटाई की सूचना मिनटों में फील्ड अधिकारियों तक पहुंचती है, जिससे वन अपराधों पर त्वरित और प्रभावी कार्रवाई सुनिश्चित हुई है।

100% वन भूमि की जियो-टैगिंग: ई-ग्रीन वॉच से वनीकरण में आई पूर्ण पारदर्शिता
2014 से पहले फाइलों में पौधे लग जाने और जमीन पर जंगल गायब होने की पुरानी शिकायतों को समाप्त करने के लिए मोदी सरकार ने अंतरिक्ष तकनीक का सहारा लिया। इसरो (ISRO) और भुवन (Bhuvan) पोर्टल के समन्वय से देश भर की वन सीमाओं का डिजिटल कैडस्ट्रल नक्शा तैयार किया गया। साथ ही ‘e-Green Watch’ पोर्टल के माध्यम से वनीकरण और पौधरोपण के प्रत्येक कार्य की जियो-टैगिंग अनिवार्य कर दी गई। अब जनता और प्रशासन उपग्रह चित्रों के माध्यम से देख सकते हैं कि किस क्षेत्र में कितना पौधारोपण हुआ है, जिससे अनियमितताओं पर पूर्ण विराम लगा है।

नेशनल जेनेटिक रिपॉजिटरी: डीएनए फिंगरप्रिंटिंग से तस्करों पर वैज्ञानिक शिकंजा
वन्यजीव अपराधों की जांच में भारत ने वैश्विक स्तर की वैज्ञानिक क्षमता हासिल की है। भारतीय वन्यजीव संस्थान (WII) के सहयोग से देश में बिग कैट्स और हाथियों का विस्तृत ‘डीएनए प्रोफाइलिंग डेटाबेस’ तैयार किया गया है। अब जब्त किए गए किसी भी खाल, हड्डी या दांत के सूक्ष्म अंश का डीएनए मिलान कर यह तुरंत पता लगाया जा सकता है कि वह किस जंगल और किस जीव का था। इस राष्ट्रीय जेनेटिक रिपॉजिटरी ने अदालतों में शिकारियों और अंतरराष्ट्रीय वन्यजीव तस्करों के विरुद्ध पुख्ता वैज्ञानिक साक्ष्य प्रस्तुत कर दोषसिद्धि दर को बढ़ाने में युगांतरकारी भूमिका निभाई है।

आक्रामक विदेशी प्रजातियों का उन्मूलन: लेंटाना हटाकर चरागाहों की बहाली
जंगलों के भीतर स्थानीय वनस्पतियों और शाकाहारी जीवों के चारे को नष्ट करने वाली विदेशी आक्रामक प्रजातियों (Invasive Species) के विरुद्ध पहली बार देशव्यापी योजनाबद्ध अभियान चलाया गया। जंगलों के बड़े भूभाग को निगलने वाले ‘लेंटाना कैमारा’ (Lantana Camara) और विलायती बबूल को उखाड़कर वहां देशी घास और स्थानीय पेड़ लगाए गए। इस जमीनी प्रयास से हिरण, चीतल और सांभर जैसे शाकाहारी जीवों के लिए प्राकृतिक चारे की बहाली हुई, जिसने मांसाहारी वन्यजीवों के लिए खाद्य श्रृंखला को मजबूत किया और जीवों के जंगलों से बाहर आबादी की ओर आने की घटनाओं में कमी लाई।

2.75 लाख पंचायतों में बीएमसी गठन: पारंपरिक वनौषधियों और जैव-विविधता का संरक्षण
वन्यजीवों के साथ-साथ भारत की समृद्ध पारंपरिक संपदा और दुर्लभ वनौषधियों की बायो-पायरेसी रोकने के लिए मोदी सरकार ने विकेंद्रीकृत स्तर पर काम किया। देश भर की 2.75 लाख से अधिक ग्राम पंचायतों में ‘जैव विविधता प्रबंधन समितियां’ (BMC) गठित की गईं और स्थानीय ‘पीपुल्स बायोडायवर्सिटी रजिस्टर’ (PBR) तैयार किए गए। यह कदम सुनिश्चित करता है कि स्थानीय जंगलों की औषधीय वनस्पतियों और पारंपरिक ज्ञान पर पहला अधिकार स्थानीय आदिवासियों और ग्रामीणों का रहे तथा किसी भी व्यावसायिक दोहन पर उन्हें न्यायसंगत लाभांश प्राप्त हो सके।

फ्रंटलाइन वन कर्मियों का कायाकल्प: आधुनिक हथियार, गश्ती वाहन और सुरक्षा कवच
गुजरात में 2001 में पहली बार महिला वन रक्षकों की भर्ती से शुरू हुआ सुधार अब अखिल भारतीय स्तर पर फ्रंटलाइन स्टाफ के सशक्तिकरण में बदल चुका है। वर्षों तक लाठी और पुरानी बंदूकों के भरोसे तस्करों से मुकाबला करने वाले वन रक्षकों (Forest Guards) को मोदी सरकार ने आधुनिक हथियार, जीपीएस युक्त गश्ती वाहन, उच्च गुणवत्ता वाले वर्दी किट और विशेष फील्ड भत्ते प्रदान किए। इसके साथ ही ड्यूटी के दौरान जोखिम के लिए विशेष बीमा सुरक्षा कवच लागू किया गया, जिससे वनों की अग्रिम पंक्ति में तैनात कर्मियों का मनोबल ऐतिहासिक रूप से बढ़ा है।

सख्त विधायी सुधार: CITES मानकों के तहत गैर-जमानती धाराएं और भारी जुर्माना
संरक्षण के प्रयासों को कानूनी रूप से मजबूत करने के लिए मोदी सरकार ने दशकों पुराने वन्यजीव संरक्षण अधिनियम में संशोधन कर इसे वैश्विक CITES संधि के कठोर मानकों के अनुरूप बनाया। 2014 से पूर्व के लचर नियमों की जगह अब लुप्तप्राय जीवों के शिकार, अंगों की तस्करी और अवैध व्यापार पर गैर-जमानती धाराओं, कई गुना बढ़े जुर्माने और कठोर कारावास का प्रावधान किया गया है। कानून की जटिल अनुसूचियों को व्यावहारिक बनाकर वैज्ञानिक संरक्षण को सुगम किया गया, जिसने तस्करों और अंतरराष्ट्रीय वन्यजीव माफिया के पूरे नेटवर्क की कमर तोड़ दी है।

50,000 करोड़ का कैम्पा फंड अनलॉक: वनीकरण के लिए राज्यों को मिली ऐतिहासिक धनराशि
वर्ष 2014 से पहले विकास परियोजनाओं के बदले नए जंगल लगाने के लिए एकत्र होने वाला प्रतिपूरक वनीकरण कोष (CAMPA) लगभग 40,000 से 50,000 करोड़ रुपये के रूप में केंद्र-राज्य विवादों और प्रशासनिक सुस्ती के कारण बैंकों में निष्प्रयोज्य पड़ा था। मोदी सरकार ने ऐतिहासिक इच्छाशक्ति दिखाते हुए संसद से प्रतिपूरक वनीकरण कोष अधिनियम पारित कराया और दशकों से अटके इस भारी-भरकम फंड को सीधे राज्यों के वन विभागों को हस्तांतरित किया। इस कदम ने देश भर में बड़े पैमाने पर नए वृक्षारोपण, वन्यजीव पर्यावास सुधार और वन अधोसंरचना को सुदृढ़ करने के लिए वित्तीय संसाधनों की कमी को हमेशा के लिए समाप्त कर दिया।

कंक्रीट के बीच 400+ ‘नगर वन’: शहरी नागरिकों को मिले नए हरित फेफड़े
पर्यावरण और वनों की अवधारणा को केवल दूरस्थ बीहड़ों तक सीमित रखने के बजाय मोदी सरकार ने इसे सीधे आम जनजीवन से जोड़ दिया है। अनियंत्रित शहरीकरण से उत्पन्न प्रदूषण और कंक्रीट के जंगलों के दुष्प्रभाव को समाप्त करने के लिए देश भर में 400 से अधिक ‘नगर वन’ और ‘नगर वाटिका’ विकसित करने का महा-अभियान सफलतापूर्वक चलाया जा रहा है। अनुपयोगी और अतिक्रमित शहरी भूखंडों को सघन जैव-विविधता पार्कों में तब्दील किया गया है, जो न केवल शहरों को शुद्ध ऑक्सीजन प्रदान कर रहे हैं, बल्कि स्थानीय पक्षियों और तितलियों के लिए सुरक्षित आश्रय स्थल बनकर शहरी पर्यावरण संतुलन को नई दिशा दे रहे हैं।

बफर जोन में आजीविका क्रांति: हजारों वनवासियों और आदिवासियों को मिला प्रत्यक्ष रोजगार
वर्षों तक वन्यजीव संरक्षण नीतियों को वनवासियों और स्थानीय समुदायों के विस्थापन व आजीविका संकट के रूप में देखा जाता था। मोदी सरकार ने इस धारणा को आमूलचूल बदलते हुए स्थानीय लोगों को संरक्षण का सीधा आर्थिक हितधारक बना दिया। टाइगर रिजर्व्स और राष्ट्रीय उद्यानों के बफर जोन में इको-टूरिज्म, होमस्टे नीति और स्थानीय हस्तशिल्प को बड़े पैमाने पर बढ़ावा दिया गया। आज कान्हा, बांधवगढ़, रणथंभौर और जिम कॉर्बेट जैसे क्षेत्रों में स्थानीय आदिवासी और ग्रामीण युवा गाइड, ड्राइवर और हॉस्पिटैलिटी संचालक के रूप में सम्मानजनक आजीविका अर्जित कर रहे हैं, जिससे वनों की रक्षा अब उनकी अपनी सामाजिक व आर्थिक प्राथमिकता बन चुकी है।

एनएच-44 से एक्सप्रेसवे तक: एशिया के सबसे बड़े वाइल्डलाइफ अंडरपास का निर्माण
आलोचकों के इस लंबे समय से चले आ रहे तर्क को मोदी सरकार ने ठोस उदाहरणों से ध्वस्त किया है कि तीव्र औद्योगिक और इंफ्रास्ट्रक्चर विकास जंगलों का विनाश करता है। आधुनिक भारत में बुनियादी ढांचा परियोजनाओं को वन्यजीवों के पर्यावास से सामंजस्य बिठाकर तैयार किया जा रहा है। मध्य प्रदेश में पेंच नेशनल पार्क से गुजरने वाले राष्ट्रीय राजमार्ग-44 पर एशिया के सबसे बड़े वन्यजीव अंडरपास और दिल्ली-मुंबई एक्सप्रेसवे पर बनाए गए देश के पहले एनिमल ओवरपास व साइलेंट कॉरिडोर इस बात के प्रत्यक्ष प्रमाण हैं कि विकास की रफ्तार से समझौता किए बिना वन्यजीवों के प्राकृतिक संचरण गलियारों को सुरक्षित रखा जा सकता है।

24.6% से अधिक वन आच्छादन: दुनिया के शीर्ष 10 वन-समृद्ध देशों में स्थापित हुआ भारत
विपक्ष और आलोचकों द्वारा लगाए जाने वाले इस आरोप का आधिकारिक आंकड़े पूरी तरह खंडन करते हैं कि देश में औद्योगिकीकरण के कारण जंगल नष्ट हो रहे हैं। भारतीय वन सर्वेक्षण (ISFR) के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, भारत का कुल वन और वृक्षावरण (Forest & Tree Cover) निरंतर वृद्धि दर्ज करते हुए देश के कुल भौगोलिक क्षेत्रफल के 24.6% से अधिक के स्तर पर पहुंच चुका है। संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन (FAO) के वैश्विक वन संसाधन आकलन में भी भारत को वन क्षेत्र में शुद्ध वार्षिक वृद्धि दर्ज करने वाले दुनिया के शीर्ष 10 देशों में प्रमुख स्थान दिया गया है। यह वैश्विक मान्यता प्रमाणित करती है कि भारत ने अपनी अर्थव्यवस्था का आकार बढ़ाने के साथ-साथ अपनी प्राकृतिक संपदा को भी पूरी निष्ठा से समृद्ध किया है।

‘प्रकृति भी, प्रगति भी’ का स्वर्णिम कालखंड
2001 में गुजरात के गिर से आरंभ हुआ संरक्षण का यह भागीरथ प्रयास आज एक सशक्त राष्ट्रीय संस्कृति बन चुका है। अंतरराष्ट्रीय आर्थिक मंचों और प्रतिष्ठित वैश्विक पत्रिकाओं (जैसे द इकोनॉमिस्ट) के विश्लेषण भी इस सत्य को प्रमाणित करते हैं कि भारत ने तीव्र आर्थिक विस्तार के साथ-साथ अपने कुल वन आवरण और वन्यजीवों की आबादी दोनों में निरंतर वृद्धि दर्ज की है। 2001 से अब तक के 25 वर्षों की यह विकास यात्रा यह सिद्ध करती है कि अडिग राजनीतिक इच्छाशक्ति, जनभागीदारी और अत्याधुनिक तकनीक के संगम से आर्थिक समृद्धि और जैव-विविधता का स्वर्णिम संतुलन पूरी प्रामाणिकता के साथ साधा जा सकता है।

 

Leave a Reply