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CAA-2.0 : ज्ञानेश कुमार तो बस बहाना,असली मकसद दंगे भड़काना, घुसपैठियों को बचाना

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मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे को लेकर पूरे देश में विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं। कांग्रेस समेत तमाम विपक्षी दल संसद के आगामी सत्र में महाभियोग प्रस्ताव लाने और राष्ट्रपति से मुलाकात करने की तैयारी कर रहे हैं। लेकिन चुनाव आयोग के बार-बार स्पष्टीकरण के बावजूद कांग्रेस समेत तमाम विपक्षी दलों के समर्थक मुख्य चुनाव अयुक्त के इस्तीफे पर अड़े हुए हैं। सड़क से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक लड़ाई लड़ रहे हैं। मंगलवार 6 अक्टूबर को ‘वोट चोरी’के मुद्दे पर विपक्षी सांसदों ने चुनाव आयुक्तों से मिलने के लिए संसद से चुनाव आयोग तक मार्च किया। चुनाव आयोग मुख्यालय के बाहर उस समय तनाव चरम पर पहुंच गया जब कांग्रेस कार्यकर्ताओं और इंडी गठबंधन के समर्थकों ने निर्वाचन सदन में जबरन घुसने का प्रयास किया। इस दौरान प्रतिपक्ष के नेता राहुल गांधी बैरिकेड पर चढ़ गए।

राहुल, प्रियंका को हिरासत में लेने के बाद पुलिस ने छोड़ा 
दिल्ली पुलिस द्वारा चुनाव आयोग जाने से रोके जाने बाद राहुल गांधी और प्रियंका गांधी कांग्रेस के अन्य नेताओं के साथ दिल्ली स्थित आकाशवाणी भवन में धरने पर बैठ गए। इस दौरान दिल्ली पुलिस ने कांग्रेस नेताओं से धरना खत्म करने की अपील की। लेकिन राहुल गांधी मुख्य चुनाव आयुक्त से मिलने और उनके इस्तीफे के लिए अड़े रहे। पुलिस के बार-बार अनुरोध के बावजूद कांग्रेस के नेता धरना खत्म करने के लिए तैयार नहीं हुए, तो पुलिस ने उन्हें जबरन धरना खत्म कराने का फैसला किया। मंगलवार शाम करीब 8 बजे दिल्ली पुलिस ने राहुल गांधी, प्रियंका गांधी और कांग्रेस के अन्य सांसदों सहित करीब 260 प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिया और बसों में भरकर किंग्सवे कैंप पुलिस लाइन ले गई। रात क़रीब 10 बजे उन्हें रिहा कर दिया गया।  

ज्ञानेश कुमार और SIR के खिलाफ CAA-2.0
चुनाव आयोग के वोटर्स के नाम जोड़ने के विशेष अभियान चलाने और वोटर्स के नाम नहीं कटने की प्रतिबद्धता के बावजूद विपक्ष जिस तरह से सड़क से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ मोर्चा खोला है, उससे सवाल उठ रहे हैं कि आखिर विपक्ष इतना परेशान क्यों है? विपक्ष यह कैसे दावा कर सकता है कि मतदाता सूची से जो नाम हटाए जा रहे हैं, वो उनके समर्थक है? क्या संविधान के अनुसार देश में गैर-नागरिकों को मतदान का अधिकार है? एसआईआर में हिन्दू-मुसलमान का मुद्दा क्यों उठाया जा रहा है? इन तमाम सवालों के जवाब जमीन पर जारी प्रदर्शनों के तरीकों से मिलता है, जिसकी तुलना 2019-2020 के नागरिकता संशोधन कानून (CAA) के खिलाफ हुए आंदोलनों से की जा रही है।

ज्ञानेश कुमार से कुछ लेना देना नहीं, ईवीएम हटाना है- वकील महमूद प्रचा
सीएए विरोधी आंदोलन में नागरिकता खत्म होने की अफवाह फैलाकर पूरे देश में हिंसक प्रदर्शन किया गया था। इस बार मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और एसआईआर के खिलाफ सीएए-2.0 शुरू किया गया है। इसका मकसद भी गैर-नागरिकों के वोट कटने और नागरिकता खत्म होने की बात कर लोगों को भड़काना है। साथ ही चुनाव आयोग पर दबाव बनाकर एसआईआर की प्रकिया को रोकना है। खुद सुप्रीम कोर्ट के वकील महमूद प्रचा ने कहा कि मेरा ज्ञानेश कुमार से कुछ लेना देना नहीं है। वो एक मामूली अपराधी हैं। हमें ईवीएम हटाना है। एसआईआर में हर बीएलओ, जिसने मतदाता सूची में नाम नहीं चढ़ाया है, वो जेल जाएगा। यानी महमूद प्रचा ने बीएलओ को डराने की कोशिश की है, ताकि अवैध घुसपैठियों और गैर-नागरिकों का नाम मतदाता सूची से नहीं काटा जा सके।

हिन्दू-मुस्लमान मत करो-अभिजीत दीपके
कॉकरोच जनता पार्टी के संस्थापक अभिजीत दीपके ने मुंबई के शिवाजी पार्क में मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की मांग और मतदाता सूचियों में कथित अनियमितताओं के खिलाफ हुए प्रदर्शन के दौरान बयान दिया कि देश में हिंदू-मुसलमान के नाम पर बांटने वाली राजनीति नहीं चलेगी। उन्होंने हिंदुओं और मुसलमानों से एकजुट रहने की अपील करते हुए कहा कि देश तभी आगे बढ़ेगा जब दोनों समुदाय मिलकर मुल्क को मजबूत बनाएंगे। उन्होंने तीखे शब्दों में कहा कि जो लोग धर्म के आधार पर राजनीति करना चाहते हैं, वो पाकिस्तान जाकर ऐसी राजनीति करें। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि पिछले 10-12 वर्षों से लोगों को हिंदू-मुस्लिम की राजनीति में उलझाकर रखा गया है, जिससे युवाओं को नौकरियां नहीं मिल रही हैं और जनता के वोटिंग अधिकार छीने जा रहे हैं।

मृत वोटर्स को प्रदर्शन में शामिल होने का न्योता
सीजेपी के राष्ट्रीय सह संयोजक आशुतोष रांका ने कहा, “10 अक्तूबर के प्रदर्शन के लिए आप तैयार है। देश के लोकतंत्र को बचाने के लिए सबसे क्रिटिकल लड़ाई शुरू हो चुकी है। देश तभी बचेगा जब लोकतंत्र बचेगा। देश में लोकतंत्र तभी बचेगा जब इस देश में स्वतंत्र निर्वाचन आयोग होगा। ज्ञानेश कुमार ने अकेले चुनाव आयोग की निष्पक्षता को खत्म किया है। दस तारीख को इस्तीफा दिलवाने के लिए जंतर मंतर पर पहुंचना होगा। खासकर उन मृत वोटर्स से अनुरोध है कि जिनको ये कहकर वोटर्स लिस्ट से हटा दिया कि ये लोग तो मर चुके हैं। ऐसे जितने भी मरे हुए लोग है, जो जंतर मंतर पर पहुंच सकते हैं, जरूर पहुंचे। प्ले कार्ड लेकर पहुंचना है, जिसपर लिखा हो- अभी हम जिंदा है।” आशुतोष रांका की इस अपील से सवाल उठता है कि जो लोग जंतर मंतर पहुंच सकते हैं, वो नाम जोड़ने के लिए दस्तावेज के साथ चुनाव आयोग क्यों नहीं पहुंच सकते ? दरअसल, इनका मकसद प्रदर्शन के माध्यम से दिल्ली सहित पूरे देश में अराजकता पैदा कर दंगे भड़काना है।

क्या मुस्लिम इस देश के लोग नहीं हैं?- विजेता दहिया
एसआईआर में उन लोगों के नाम कट रहे हैं, जो अनुपस्थित या स्थायी रूप से स्थानांतरित, मृत और दोहरे नाम वाले हैं। इसके साथ ही जो नागरिकता का प्रमाण नहीं दे पा रहे हैं, उनके नाम मतदाता सूची से हटाए जा रहे हैं। लेकिन इसे हिन्दू और मुस्लिम का मुद्दा बनाकर तुल दिया जा रहा है, ताकि मुसलमानों को भड़काया जा सके। कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के पूर्व प्रवक्ता विजेता दहिया ने मुस्लिमों को लेकर एसआईआर पर सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि “यह सब बिल्कुल फालतू की बातें बहुत हो चुकी हैं। हिंदू-मुस्लिम की राजनीति अब नहीं चलेगी। जनता जाग रही है। एक सरल सी बात है कि वोट चोरी नहीं होनी चाहिए। इसमें मुस्लिम क्या इस देश के लोग नहीं हैं? आखिर कब तक आप मुस्लिमों के खिलाफ इस तरह की बातें करते रहेंगे?”

मुस्लिम बाहुल्य इलाकों में घर-घर जाकर प्रदर्शन में शामिल होने का न्योता
कॉकरोच जनता पार्टी की 10 अक्टूबर 2026 को दिल्ली के जंतर-मंतर पर एक बड़े विरोध प्रदर्शन की तैयारी चल रही है, जिसके लिए मुस्लिम बाहुल्य इलाकों में घर-घर जाकर लोगों को शामिल होने का न्योता दिया जा रहा है। यह लामबंदी कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के नेता अभिजीत दिपके द्वारा घोषित ‘जंतर-मंतर 2.0’ आंदोलन का हिस्सा है, जिसमें मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे और एसआईआर प्रक्रिया को वापस लेने की मांग की जा रही है। दिल्ली के जामा मस्जिद और अन्य मुस्लिम बाहुल्य क्षेत्रों में प्रदर्शनकारियों को एकजुट करने के लिए ज़मीनी स्तर पर अभियान चलाया जा रहा है। सोशल मीडिया पर कुछ ऐसे दावे भी वायरल हुए हैं जिनमें अज्ञात आयोजकों द्वारा भीड़ जुटाने के लिए कथित तौर पर दो हजार रुपये और भोजन का प्रलोभन देने के आरोप लगाए गए हैं।

मॉनिटरिंग कमेटी ऑफ इंडियन मुस्लिम्स के बैनर तले प्रदर्शन
इससे पहले 29 सितंबर,2026 को दिल्ली के जंतर मंतर पर मॉनिटरिंग कमेटी ऑफ इंडियन मुस्लिम्स (MCIM) के बैनर तले प्रदर्शन का आयोजन किया गया था। इसमें जियाउर रहमान बर्क (सांसद, संभल), मौलाना मोहिबुल्लाह नदवी (सांसद, रामपुर),इमरान मसूद (सांसद, सहारनपुर), सैयद सादतुल्लाह हुसैनी (अध्यक्ष, जमात-ए-इस्लामी हिंद), मोहम्मद अदीब (आईएमसीआर), कुंवर दानिश अली (पूर्व सांसद), सलीम अंसारी (पूर्व सांसद, बीएसपी), मलिक मोहतसिम खान (उपाध्यक्ष, जेआईएच), मुफ्ती अताउर रहमान कासमी, मौलाना फजलुर रहीम मुजद्दीदी (महासचिव, ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड) शामिल हुए थे। इस प्रदर्शन का मुख्य उद्देश्य देश में धार्मिक स्थलों पर हो रहे कथित हमलों, एसआईआर और चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली में धांधली के विरोध में आवाज उठाना था। हालांकि प्रदर्शनकारियों को पुलिस ने बसों में भरकर हिरासत में ले लिया और बाद में दूर ले जाकर छोड़ दिया।

ज्ञानेश कुमार के खिलाफ प्रदर्शन में “फ्री उमर खालिद” के नारे
दिल्ली के जंतर-मंतर और मुंबई जैसे शहरों में मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ चुनावी प्रक्रिया और इस्तीफे की मांग को लेकर हुए प्रदर्शनों में कुछ प्रदर्शनकारियों ने “फ्री उमर खालिद” (उमर खालिद को रिहा करो) के नारे लगाए और उनके पोस्टर लहराए। इन प्रदर्शनों के बीच ही दिल्ली हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट द्वारा उमर खालिद और शरजील इमाम की जमानत याचिकाएं खारिज किए जाने का मामला भी चर्चा में रहा है। चुनाव आयोग के विरोध से जुड़े मंच पर उमर खालिद के मुद्दों और पोस्टरों के आने से सवाल उठ रहे हैं कि इस आंदोलन के पीछे वहीं ताकतें काम कर रही हैं, जो सीएए आंदोलन के दौरान भी सक्रिय थीं। गौरतलब है कि दिल्ली के शाहीन बाग में सीएए के खिलाफ प्रदर्शन कुल 101 दिन (15 दिसंबर 2019 से 24 मार्च 2020 तक) चला था। इस दौरान फरवरी 2020 में उत्तर-पूर्वी दिल्ली में दंगा हुआ था, जिसकी साजिश रचने और हिंसा भड़काने का मुख्य आरोप उमर खालिद पर है। फिलहाल उमर खालिद जेल में है।

दिल्ली में फिर दंगे भड़काने की बड़ी साजिश
दिल्ली पुलिस ने हरियाणा के यूट्यूब चैनल ‘न्यूज आईना’ के हैंडलर नदीम अहमद को गिरफ्तार किया है। पुलिस का कहना है कि आरोपी दसवीं फेल है और उसका मकसद पुलिस की छवि धूमिल करते हुए दिल्ली में दंगे भड़काना था। पुलिस की जांच में यह बात भी सामने आई कि उसने एआई की मदद से फर्जी वीडियो बनाए, ताकि दिल्ली के माहौल को खराब किया जा सके। दिल्ली पुलिस की तरफ से मंगलवार 6 अक्टूबर को मामले में प्रेस कॉन्फ्रेंस आयोजित की गई। पुलिस की तरफ से यह भी कहा गया कि उसने अपने चैनल में इस तरह के कई वीडियो पोस्ट किए हैं। उन सभी की जांच की जा रही है। आरोपी ने पुलिस कबूलनामे में कहा कि वीडियो बनाने के पीछे उसका उद्देश्य दिल्ली पुलिस की छवि धूमिल करना और अशांति फैलाना था, ताकि प्रदर्शनकारी उत्तेजित हो जाएं और दंगे भड़क जाएं। इसके बयान के आधार पर पुलिस ने सोर्स, फंडिंग और उसके साथियों का पता लगाया जा रहा है। यह भी चेक किया जा रहा है कि यह प्री प्लांड षड़यंत्र तो नहीं है?

मुंबई में एसआईआर के खिलाफ बांग्लादेशियों की रैली
सोशल मीडिया में एक वीडियो वायरल हो रहा है। इसमें देखा जा सकता है कि बांग्लादेश का झंडा लिए कुछ लोग रैली निकाल रहे हैं। इसमें वीडियो बना रहे एक व्यक्ति को कहते सुना जा सकता है, “मित्रों हम इस समय मुंबई के नालासोपारा और विराट के बीच में हैं। आज यहां क्या हो रहा है मुझे पता नहीं। आप इसे देख सकते हैं।” गौरतलब है कि सितंबर-अक्टूबर 2026 में चलाए गए विशेष अभियानों के तहत, पुलिस और सुरक्षा एजेंसियों ने नालासोपारा (पूर्व) और मुंबई के विभिन्न इलाकों में बांग्लादेशियों के खिलाफ कार्रवाई की है। हाल ही में नालासोपारा पूर्व से महिलाओं और बच्चों सहित 7 संदिग्ध बांग्लादेशी नागरिकों को अवैध रूप से रहने के आरोप में हिरासत में लिया गया है।

SIR खिलाफ प्रदर्शन में ‘फ्री फिलिस्तीन’ के पोस्टर
मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ अक्टूबर 2026 में हो रहे विरोध प्रदर्शनों के दौरान ‘फ्री फिलिस्तीन’ के पोस्टर भी दिखाई दिए। मुख्य रूप से यह विरोध प्रदर्शन चुनाव आयोग की वोटर लिस्ट से जुड़ी ‘स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन’ (SIR) प्रक्रिया और मतदाता सूचियों में कथित अनियमितताओं के खिलाफ विपक्षी दलों, छात्र संगठनों (जैसे AISA, SFI) और नागरिक समाज द्वारा किया जा रहा है। ज्ञानेश कुमार के खिलाफ हो रहे इसी विरोध प्रदर्शन के दौरान कुछ प्रदर्शनकारियों और सोशल मीडिया पर प्रसारित वीडियो में ‘फ्री फिलिस्तीन’ के पोस्टर और नारे भी देखने को मिले हैं। इससे पता चलता है कि एसआईआर के विरोध के पीछे वो ताकते हैं, जो मुस्लिम वोट बैंक को बचाने के लिए उनकी भावनाएं भड़काने की कोशिश कर रही हैं।

आइए जानते हैं कि कांग्रेस और तमाम विपक्षी दलों के निशाने पर मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार क्यों हैं ?

क्यों विपक्ष के निशाने पर हैं सीईसी ज्ञानेश कुमार ?
भारत में मतदाता सूचियों का पुनरीक्षण (Intensive Revision) पहले भी होता रहा है, लेकिन मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार द्वारा लागू की गई एसआईआर की प्रक्रिया और उसके तहत उठाए गए सख्त कदम ही विपक्ष की मुख्य नाराजगी और चिंता की वजह हैं। मुख्य चुनाव आयुक्त बनने के बाद ज्ञानेश कुमार ने मतदाता सूचियों को पूरी तरह “शुद्ध” करने को लेकर एसआईआर अभियान की शुरुआत की। इसकी शुरुआत सबसे पहले बिहार से की गई और बाद में इसे अन्य राज्यों में भी तेजी से बढ़ाया गया। लेकिन ज्ञानेश कुमार के कार्यकाल में इसे जिस आक्रामक और कड़े तरीके से लागू किया गया, उसने राजनीतिक भूचाल ला दिया है। विपक्षी दलों को अपना मुस्लिम वोट बैंक खतरे में नजर आ रहा है। इसलिए विपक्षी गठबंधन (INDIA Bloc), कॉकरोच जनता पार्टी और वामपंथी छात्र संगठनों का मकसद मुख्य चुनाव आय़ुक्त का इस्तीफा नहीं है, बल्कि पूरे देश में चल रही स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) की प्रक्रिया को रोकना है, ताकि वोट चोरी और लोकतंत्र को बचाने के नाम पर घुसपैठियों को बचाया जा सके।

बंगाल में SIR से घुसपैठियों में मची थी भगदड़
जब मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के निर्देश पर बिहार के बाद पश्चिम बंगाल में एसआईआर प्रक्रिया को गति दी गई, तो बूथ लेवल अधिकारियों (BLOs) और प्रशासन ने घर-घर जाकर दस्तावेजों का बेहद कड़ाई से सत्यापन शुरू किया। इस प्रक्रिया के तहत उन लोगों की पहचान पर गाज गिरने लगी जो अवैध रूप से सीमा पार कर भारत (विशेषकर बंगाल के रास्ते) में घुसे थे और स्थानीय स्तर पर फर्जी दस्तावेजों के सहारे अपने मतदाता पहचान पत्र (Voter ID) या आधार कार्ड बनवा चुके थे। एसआईआर की घोषणा और आयोग के सख्त रुख के बाद उत्तर 24 परगना, नदिया, मुर्शिदाबाद और मालदा जैसे भारत-बांग्लादेश सीमा से लगे जिलों में अवैध रूप से रह रहे लोगों के बीच भारी दहशत फैल गई। कानूनी कार्रवाई, हिरासत या वापस भेजे जाने (डिपोर्सेशन) के डर से सैकड़ों की संख्या में ऐसे घुसपैठिए और रोहिंग्या अवैध रास्तों से वापस बांग्लादेश या नेपाल की तरफ भागने के लिए सीमावर्ती चेकपोस्टों (जैसे हकीमपुर चेकपोस्ट) और रास्तों पर इकट्ठा होने लगे।

13 करोड़ नाम हटाए जाने से परेशान है विपक्ष
पश्चिम बंगाल में एसआईआर प्रक्रिया के तहत मतदाता सूची से 91 लाख नाम हटाए गए थे। लेकिन देश के 20 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में हो रहे एसआईआर से बड़े पैमाने पर नाम हटाए गए हैं। मीडिया रिपोर्ट्स और विपक्षी दलों के अनुसार, एसआईआर प्रक्रिया के शुरुआती चरणों और ड्रॉफ्ट सूचियों में करीब 13 करोड़ नाम हटाए गए हैं। रिपोर्टों के मुताबिक, हटाए गए नामों में से लगभग 71% नाम अनुपस्थित या स्थायी रूप से स्थानांतरित श्रेणी के थे, 21% मृत और 7.5% दोहरे नाम थे। महाराष्ट्र में सबसे ज्यादा दो करोड़ लोगों के नाम वोटर लिस्ट से बाहर हुए हैं। विपक्ष का दावा है कि इन नामों को अनुचित तरीके से हटाकर सत्ताधारी दल बीजेपी को चुनावी फायदा पहुंचाने का प्रयास किया जा रहा है।

चुनाव आयोग का नाम जोड़ने के लिए विशेष अभियान चलाने का निर्देश
हालांकि चुनाव आयोग ने 29 सितंबर को एसआईआर पूरा कर चुके 20 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में विशेष अभियान चलाने का निर्देश दिया था। इस विशेष अभियान के तहत एसआईआर के दौरान छूटे लोगों और 18 साल की उम्र पूरी कर चुके नए मतदाताओं के नाम मतदाता सूची में जोड़ा जा रहा है। इसके अलावा आयोग ने ECINet की समीक्षा के लिए एक कमेटी बनाने का फैसला किया है। इसके साथ ही चुनाव आयोग SIR से पहले और बाद की मतदाता सूचियों की तुलना कराएगा, ताकि गलती से हटे पात्र मतदाताओं की पहचान हो सके। बीएलओ घर-घर जाकर ऐसे लोगों की जांच करेंगे। डुप्लीकेट या मृत नहीं पाए जाने पर फॉर्म 6 के जरिए नाम दोबारा जोड़ा जाएगा। चुनाव आयोग ने कहा है कि पात्र मतदाता का नाम सूची से बाहर नहीं रहना चाहिए और उसका वोट देने का अधिकार सुरक्षित रहना चाहिए।

नाम जुड़वाना नहीं, घुसपैठियों को संरक्षण देना मकसद
चुनाव आयोग के विशेष अभियान के तहत विपक्षी दल फॉर्म भरकर नाम जुड़वाने की कोशिश नहीं कर रहे हैं। वे इस पूरी प्रक्रिया को ही ‘अवैध और सुनियोजित मताधिकार हनन’ करार देकर इसके खिलाफ माहौल बना रहे हैं। विपक्षी दलों और प्रदर्शनकारियों की मुख्य मांग है कि इस पूरी एसआईआर प्रक्रिया को तत्काल प्रभाव से रद्द किया जाए और चुनाव आयोग को पुरानी मतदाता सूची के आधार पर ही आगे बढ़ना चाहिए। भारत के संविधान और चुनाव कानूनों के अनुसार, किसी भी परिस्थिति में किसी गैर-नागरिक (विदेशी नागरिक) का नाम भारत की मतदाता सूची में शामिल नहीं किया जा सकता है। भारत के कानून (लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 और चुनाव नियमों) के तहत केवल वे ही व्यक्ति मतदाता बन सकते हैं जो भारत के नागरिक हैं, जिनकी आयु 18 वर्ष या उससे अधिक है, और जो संबंधित क्षेत्र के सामान्य निवासी हैं। चुनाव आयोग और सुप्रीम कोर्ट, दोनों का यह स्पष्ट रुख रहा है कि मतदाता सूची में नाम होने के लिए नागरिकता एक अनिवार्य और गैर-समझौते वाली शर्त है। ऐसे में विपक्ष द्वारा एसआईआर प्रक्रिया को तत्काल प्रभाव से रद्द करने की मांग घुसपैठियों को संरक्षण प्रदान करना है।

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