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जंतर-मंतर पर रीलबाजों का फर्जी ‘पत्रकार’ सिंडिकेट बेनकाब: उकसावे के बीच सुरक्षा बलों का संयम

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देश की राजधानी दिल्ली का ऐतिहासिक जंतर-मंतर इन दिनों लोकतांत्रिक असहमति या वास्तविक जनमुद्दों की जगह एक सुनियोजित तमाशे का अखाड़ा बन चुका है। केंद्र की मोदी सरकार के विकासोन्मुखी कार्यों और सुदृढ़ कानून-व्यवस्था से हताश विपक्षी व वामपंथी तंत्र अब सस्ती लोकप्रियता हासिल करने के लिए हर हथकंडा अपना रहा है। सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि कल तक सोशल मीडिया पर रील्स बनाने वाले सतही कंटेंट क्रिएटर्स आज रातोंरात ‘पत्रकार’ बनकर ऑन-ड्यूटी पुलिस पर धौंस जमा रहे हैं। सुरक्षा बलों को बदनाम करने और झूठा नैरेटिव गढ़ने के लिए ये तत्व मर्यादा की सारी सीमाएं लांघ चुके हैं। प्रदर्शनकारी के भेष में पहुंचे कार्यकर्ता और माइक थामे तथाकथित डिजिटल इन्फ्लुएंसर्स ऑन-ड्यूटी तैनात जवानों, विशेषकर महिला पुलिसकर्मियों को लगातार उकसाने और वर्दी की साख पर हमला करने का दुस्साहस कर रहे हैं। इसके बावजूद, केंद्रीय गृह मंत्रालय के अधीन दिल्ली पुलिस और केंद्रीय बलों ने जिस असाधारण संयम, अटूट अनुशासन और कर्तव्यनिष्ठा का परिचय दिया है, उसने लोकतंत्र की आड़ में अराजकता फैलाने वालों के पूरे षड्यंत्र को बेनकाब कर दिया है।

फर्जी पहचान का संगठित धंधा: जंतर-मंतर पर ‘पत्रकार स्कैम’
प्रदर्शन स्थल पर पहुंचे कई वामपंथी कार्यकर्ता चंद रुपयों के साधारण उपकरण लेकर खुद को स्वतंत्र मीडिया घोषित कर रहे हैं। इनका मकसद पत्रकारिता नहीं, बल्कि प्रेस के नाम की आड़ लेकर सुरक्षा घेरा तोड़ना और ऑन-ड्यूटी जवानों पर गैर-कानूनी दबाव बनाना है।

एक महीने में आंदोलनकारी से ‘पत्रकार’: क्रैश कोर्स का भंडाफोड़
सोशल मीडिया पर वायरल खुलासों से सामने आया है कि जो चेहरे कुछ ही हफ्तों पहले राजनीतिक प्रदर्शनों में सामान्य बाइट दे रहे थे, वे अचानक हाथ में माइक थामकर रिपोर्टर बन बैठे। यह प्रायोजित तंत्र केवल इसलिए खड़ा किया गया ताकि कानूनी कार्रवाई से बचा जा सके।

कैमरा ऑन, उकसावा शुरू: सुरक्षा बलों का मनोबल गिराने की सुनियोजित साजिश
तथाकथित कंटेंट क्रिएटर्स का एक तय पैटर्न उजागर हुआ है—वीडियो हमेशा चिल्लाहट और हंगामे से शुरू किया जाता है। दर्जनों कैमरों की मौजूदगी के बावजूद पुलिस का कोई दुर्व्यवहार दर्ज नहीं होता, बल्कि ऑन-ड्यूटी जवानों को मानसिक रूप से परेशान करने का प्रयास साफ दिखाई देता है।

पर्सनल स्पेस का उल्लंघन: ऑन-ड्यूटी जवानों को काम से रोकने की हरकत
सुरक्षा बलों की सहनशीलता की परीक्षा लेने के लिए उपद्रवी तत्व शारीरिक दूरी के नियमों का उल्लंघन करते हुए जवानों के बेहद करीब पहुंच जाते हैं, ताकि कानून-व्यवस्था बनाए रखने की सामान्य ड्यूटी में जानबूझकर व्यवधान डाला जा सके।

महिला पुलिस को उकसाया, षडयंत्र नाकाम 
जंतर-मंतर पर तैनात दिल्ली पुलिस की एक महिला अधिकारी के सामने रील-निर्माता लगातार चिल्लाते रहे, लेकिन अधिकारी ने जरा भी विचलित हुए बिना कर्तव्यनिष्ठा का परिचय दिया। इस संयम ने पुलिस को हिंसक साबित करने के पूरे षड्यंत्र को नाकाम कर दिया।

महिला पुलिसकर्मियों से अभद्रता: विरोध के नाम पर मर्यादा तार-तार
जंतर-मंतर पर प्रदर्शनकारियों द्वारा महिला पुलिसकर्मियों के साथ की गई बदसलूकी ने साबित कर दिया है कि यह विरोध शांतिपूर्ण नहीं, बल्कि सुनियोजित अराजकता है। महिला सुरक्षाकर्मियों से धक्का-मुक्की किसी भी सूरत में लोकतांत्रिक अधिकार नहीं हो सकती।

वर्दी के प्रतीकों पर हमला: नेम-बैज नोचने का आपराधिक कृत्य
प्रदर्शन के दौरान मर्यादा की सारी सीमाएं तब टूट गईं जब पुरुष प्रदर्शनकारियों द्वारा ऑन-ड्यूटी महिला पुलिसकर्मियों के नेम-बैज तक खींचे गए। यह सीधे तौर पर लोकसेवकों पर हमला और सुरक्षा बलों का व्यक्तिगत अपमान करने का कुत्सित प्रयास है।


पुरुष पुलिसकर्मियों की घेराबंदी और दबाव बनाने की रणनीति
शांतिपूर्ण आंदोलन का दावा करने वाली भीड़ द्वारा पुरुष पुलिसकर्मियों को चारों तरफ से घेरकर अनुचित दबाव बनाने और असहज करने के दृश्य भी सामने आए हैं, जो कानून-व्यवस्था को सीधी चुनौती देने की सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है।

जिम्मेदार कर्तव्य पथ बनाम अराजक भीड़: दो संस्कृतियों का अंतर
एक तरफ संविधान, नियम और समाज की जवाबदेही का भार अकेले अपने कंधों पर उठाने वाली महिला सुरक्षाकर्मी हैं, वहीं दूसरी तरफ विदेशी व राजनीतिक फंडिंग पर पलने वाले वे चेहरे हैं जिनके पास कोई दिशा नहीं, बल्कि वे केवल भीड़ का हिस्सा बनकर अराजकता फैलाने में जुटे है। 

बिना किसी प्रमाण के ऑनलाइन दुष्प्रचार की पोल खुली
बिना किसी वास्तविक साक्ष्य के केवल सनसनी फैलाने के उद्देश्य से मनगढ़ंत आरोप सोशल मीडिया पर उछाले जा रहे हैं, जबकि जमीनी हकीकत यह है कि सुरक्षा बल पूरी पारदर्शिता और कानूनी सीमाओं में रहकर स्थिति संभालते हैं।

तथ्यों की कमी और भ्रामक आरोपों का खोखलापन
बिना किसी विजुअल साक्ष्य के पुलिस पर लांछन लगाना और वीडियो के जरिए सनसनी फैलाना इन प्रदर्शनकारियों की मुख्य रणनीति बन चुकी है, जबकि सच्चाई यह है कि पुलिस बल पूरी पारदर्शिता के साथ कानूनी सीमाओं में रहकर स्थिति संभालता है।

संवाद का अभाव और केवल शोर मचाने की होड़
जंतर-मंतर पर वास्तविक जनहित के मुद्दों पर तार्किक संवाद पूरी तरह समाप्त हो चुका है। अब वहां केवल नारों का शोर, कैमरों के सामने तेज आवाज में बोलना और प्रशासन को उकसाने की कोशिशें ही बची हैं।

आरएएफ जवानों को खुली धमकी: लोकतंत्र के नाम पर भड़काऊ व्यवहार
प्रदर्शन के नाम पर विशेष सुरक्षा बलों को सीधे तौर पर ललकारने के मामले भी सामने आए हैं। आरएएफ के जवानों को खुलेआम धमकियां देकर और उकसाकर कानून-व्यवस्था बिगाड़ने का प्रयास किया गया, जिससे यह साफ होता है कि यह सामान्य युवा प्रदर्शन नहीं बल्कि कानून को खुली चुनौती है।

हास्यास्पद मनगढ़ंत आरोप और नशीले तत्वों की मौजूदगी पर सवाल
कैमरे के सामने खड़े होकर सुरक्षा बलों पर अनर्गल व अस्वाभाविक किस्म के आरोप लगाने का खेल भी उजागर हुआ है। संदिग्ध स्थिति में घूम रहे तत्वों द्वारा खुद को पीड़ित बताकर पुलिस पर बेतुके लांछन लगाना सीधे तौर पर प्रायोजित ड्रामे का हिस्सा प्रतीत होता है।

वर्दी के पीछे का इंसान: कर्तव्य पर डटे रक्षक का अनदेखा त्याग
सुबह तड़के चार बजे परिवार को सोता छोड़कर देश की रक्षा के लिए निकलने वाला पुलिसकर्मी भी एक इंसान है, जिसकी अपनी सुरक्षा और मर्यादा है। बिना किसी शिकायत के हर दिन जनता की रक्षा के लिए जान जोखिम में डालने वाले जवानों को समाज के कुछ अराजक तत्वों द्वारा खलनायक के रूप में पेश करना अक्षम्य है।

कर्तव्यनिष्ठ एसीपी के चरित्र हनन की साजिश और फर्जी पत्रकारिता का नेटवर्क
एसीपी विवेक भगत पर अनर्गल लांछन लगाने के मामले ने पत्रकारिता के चोले में छिपे एक संगठित राजनीतिक तंत्र को उजागर किया है। कानूनी जांच से बचने और पुलिस अधिकारियों पर दबाव बनाने के लिए संवेदनशील कानूनों का दुरुपयोग करना जांच एजेंसियों की निष्पक्षता पर हमला है।

सुरक्षा बलों पर गालियों की बौछार और निहत्थे जवानों की सहनशीलता
ऑन-ड्यूटी तैनात जवानों को अपमानजनक शब्दों से संबोधित किया जाना और उन्हें उकसाने की हर सीमा पार करना इस आंदोलन का शर्मनाक पहलू बन चुका है। निहत्थे खड़े होकर गालियां और धक्के सहने के बावजूद पुलिसकर्मियों ने लोकतांत्रिक मर्यादा की रक्षा की है।

सुरक्षा बल पर चाकू से जानलेवा हमला: हिंसक उपद्रव का पर्दाफाश
जंतर-मंतर पर तब स्थिति अत्यंत गंभीर हो गई जब एक प्रदर्शनकारी ने सीआईएसएफ अधिकारी पर चाकू से वार करने की कोशिश की। त्वरित कार्रवाई करते हुए सुरक्षा बलों ने हमलावर को हिरासत में लिया, जिससे यह साबित हो गया कि प्रदर्शन की आड़ में जानलेवा हिंसा की तैयारी थी।

सांप्रदायिक नैरेटिव गढ़ने की कोशिश और अर्बन नक्सल प्रोपेगैंडा
संसद मार्ग थाने के आसपास बैरिकेड्स पर चढ़कर मनगढ़ंत आरोप लगाने और पुलिस पर धार्मिक आधार पर प्रताड़ना के झूठे किस्से गढ़ने का प्रयास किया गया। पुलिस को बदनाम करके देश में अशांति फैलाने के इस प्रोपेगैंडा का पर्दाफाश सोशल मीडिया पर उपलब्ध वास्तविक वीडियो से हो चुका है।

चुनावी हार से हताश विपक्ष और ‘वोट चोरी’ का बेबुनियाद प्रलाप
मोदी सरकार की पारदर्शी नीतियों और चुनावी जनादेश से खारिज हो चुका वर्ग अब जंतर-मंतर पर ‘वोट चोरी’ का पुराना राग अलाप रहा है। संवैधानिक संस्थाओं पर झूठे आरोप मढ़कर देश में अस्थिरता का भ्रम पैदा करने की यह कोशिश भी जनता नकार चुकी है।

कानून का राज और मोदी सरकार की जीरो टॉलरेंस नीति
मोदी सरकार के स्पष्ट दिशा-निर्देश हैं कि शांतिपूर्ण अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सम्मान हर हाल में रहेगा, किंतु प्रेस या प्रदर्शन की आड़ में अराजकता फैलाने, हथियार चलाने और वर्दी का अपमान करने की छूट किसी को नहीं दी जा सकती। दिल्ली पुलिस और केंद्रीय सुरक्षा बलों ने अपने बेजोड़ संयम से उपद्रवियों के हर जाल को विफल कर दिया है। सरकारी नियमों तथा भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) के तहत ऑन-ड्यूटी लोकसेवकों पर हमला करने, महिला पुलिसकर्मियों से अभद्रता करने और फर्जी पहचान बनाकर उपद्रव करने वालों पर साक्ष्यों के आधार पर सख्त कानूनी कार्रवाई सुनिश्चित की जा रही है। भारत की कानून-व्यवस्था किसी भी प्रायोजित प्रोपेगैंडा के आगे झुकने वाली नहीं है।

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