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मेरिट बनाम टूलकिट: आईआईटी बॉम्बे को निशाना बनाकर भारत विरोधी ताकतों की बड़ी साजिश

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आईआईटी बॉम्बे में 18 सितंबर को बीटेक द्वितीय वर्ष के छात्र साहिल वाकोडे द्वारा परीक्षा में फोन और चैटजीपीटी से नकल पकड़े जाने के बाद हॉस्टल में आत्महत्या की दुर्भाग्यपूर्ण घटना सामने आई। इस पूरे मामले को लेकर जिस प्रकार से परिसर में विवाद खड़ा किया जा रहा है, वह एक सुनियोजित विदेशी टूलकिट का हिस्सा प्रतीत होता है। इसका मूल उद्देश्य भारतीय समाज को जातियों में बांटकर कमजोर करना और आईआईटी बॉम्बे जैसे प्रतिष्ठित संस्थान की साख को धूल-धूसरित करना है। भारत के बढ़ते वैश्विक प्रभाव को कमजोर करने की मंशा पाले जॉर्ज सोरोस और डीप स्टेट के जब सारे पैंतरे विफल होते जा रहे हैं, तब उसने आईआईटी बॉम्बे को निशाना बनाया है। इस इकोसिस्टम को भली-भांति पता है कि देश के सबसे प्रतिष्ठित संस्थान से उठी बात राष्ट्रव्यापी विमर्श बनेगी, जिससे जातियों में विभाजन का उनका एजेंडा आगे बढ़ सके। हालांकि, संस्थान का स्पष्ट कहना है कि छात्र के विरुद्ध कोई दंडात्मक कार्रवाई नहीं की गई थी बल्कि उसे तुरंत काउंसलिंग उपलब्ध कराई गई थी, किंतु इस त्रासदी की आड़ में पूरे संस्थान की मर्यादा पर प्रहार शुरू कर दिया गया है।

परीक्षा में चैटजीपीटी से नकल और उसके बाद की दुखद घटना
आईआईटी बॉम्बे के आधिकारिक बयान के अनुसार, परीक्षा कक्ष में मोबाइल फोन के जरिए प्रश्नपत्र को चैटजीपीटी पर अपलोड कर उत्तर तलाशने की घटना सामने आई थी। संस्थान ने साफ किया कि कदाचार पकड़े जाने के बाद छात्र पर कोई त्वरित दंडात्मक कार्रवाई नहीं की गई थी, बल्कि कोर्स इंस्ट्रक्टर और विभागाध्यक्ष द्वारा उसे काउंसलिंग देकर आश्वस्त किया गया था कि इससे उसका अकादमिक करियर प्रभावित नहीं होगा। इसके बावजूद छात्र ने हॉस्टल में जाकर आत्महत्या जैसा दुखद कदम उठा लिया। इस घटना के तुरंत बाद 400 से अधिक छात्रों के विरोध प्रदर्शन को देखते हुए संस्थान को जारी मिड-सेमेस्टर परीक्षाएं स्थगित करनी पड़ीं।

IIT ब्रांड की साख और एलुमनी नेटवर्क पर खतरा
पूरी दुनिया में आईआईटी का नाम भारतीय मेरिट, कठोर परिश्रम और निष्पक्ष गुणवत्ता का पर्याय रहा है। आईआईटी बॉम्बे को देश के सर्वश्रेष्ठ संस्थानों में गिना जाता है और इसके एलुमनी (पूर्व छात्र) वैश्विक स्तर पर शीर्ष तकनीकी कंपनियों का नेतृत्व कर रहे हैं। यदि परीक्षाओं में डिजिटल कदाचार पर रोक लगाने जैसे बुनियादी कर्तव्य पर ही सवाल खड़े किए जाएंगे और संस्थान को विवादों का केंद्र बना दिया जाएगा, तो विश्व भर में आईआईटी के नाम पर बना अटूट विश्वास खंडित होगा। इस प्रकार के विवादों से आईआईटी बॉम्बे के वर्तमान छात्रों के साथ-साथ प्रतिष्ठित एलुमनी की साख भी अकारण संदेह के दायरे में आ जाएगी।

निदेशक के घेराव में गैर-तकनीकी विंग की भूमिका पर सवाल
घटना के बाद उपजे असंतोष के दौरान छात्रों के एक समूह द्वारा संस्थान के निदेशक का घेराव करने और परिसर में जातिवाद के आरोप मढ़ने का वीडियो सामने आने पर तीखी बहस शुरू हो गई। सोशल मीडिया और बौद्धिक विमर्श में यह गंभीर सवाल उठाया जा रहा है कि क्या यह विरोध प्रदर्शन विशुद्ध इंजीनियरिंग के छात्रों द्वारा किया जा रहा है या हाल के वर्षों में शुरू किए गए ह्यूमैनिटीज विभाग के सक्रिय तत्व इसके पीछे हैं। तकनीकी शिक्षा के इस शीर्ष केंद्र में इस तरह की राजनीति को संस्थान की मूल प्रकृति के क्षरण के तौर पर देखा जा रहा है।

निदेशक का इस्तीफा और 18 सूत्री मांग पत्र का दबाव
संस्थान के भीतर उपद्रवी तत्वों द्वारा किस कदर दबाव बनाया गया, इसका प्रमाण तब मिला जब छात्रों के एक समूह ने निदेशक प्रो. शिरीष केदारे का घेराव कर उन पर 18 सूत्री मांग पत्र स्वीकार करने और हस्ताक्षर का दबाव बनाया। इस अप्रत्याशित दबाव के बीच प्रो. केदारे ने स्पष्ट किया कि वे 21 सितंबर को बोर्ड को अपना इस्तीफा सौंपने को तैयार हैं ताकि छात्र पढ़ाई छोड़कर राजनीतिक प्रदर्शनों में न उलझें। उन्होंने दो-टूक कहा कि परीक्षा में चीटिंग रोकना शिक्षकों की बुनियादी जिम्मेदारी थी, लेकिन यदि कर्तव्य निभाने पर ही पद छोड़ने की मांग की जाएगी, तो वे पीछे नहीं हटेंगे। यह घटनाक्रम दिखाता है कि तुष्टिकरण की राजनीति किस तरह देश की सबसे मूल्यवान अकादमिक धरोहरों को नुकसान पहुंचा रही है।

नकल रोकने पर कार्रवाई का विरोध और दोहरे मापदंड
यह कितनी बड़ी विडंबना है कि एक तरफ पेपर लीक रोकने में कथित विफलता का हवाला देकर केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान से इस्तीफे की मांग की जाती है, वहीं दूसरी तरफ जब आईआईटी बॉम्बे के निदेशक और शिक्षक परीक्षाओं में नकल रोकने के लिए सख्त नीति लागू करते हैं, तो उन्हीं पर इस्तीफे का दबाव बनाया जाता है। नकल विरोध के नाम पर बने मंच आज नकल पर होने वाली प्रशासनिक कार्रवाई के विरोध में खड़े दिखाई दे रहे हैं। यदि फोन और चैटजीपीटी से खुलेआम नकल करने वाले छात्र पर कार्रवाई को करियर प्रभावित होने के नाम पर गलत ठहराया जाएगा, तो शिक्षण व्यवस्था में न्यूनतम अनुशासन की रक्षा कैसे संभव होगी। नकल पर जीरो टॉलरेंस ही किसी भी उच्च शिक्षण संस्थान की प्राथमिक शर्त है।

करीबी दोस्त ने कहा- जातिगत भेदभाव नहीं हुआ
एक ओर जहां दुर्भाग्यपूर्ण घटना के बाद साहिल के परिजनों ने संस्थागत उत्पीड़न और जातिगत भेदभाव के आरोप लगाते हुए पुलिस में शिकायत दर्ज कराई, वहीं दूसरी ओर छात्र के करीबी सहपाठी यतीश कुमार ने इन बातों को पूरी तरह नकार दिया। दोस्त ने कहा कि उसने परिसर में कभी भी जातिगत भेदभाव का अनुभव नहीं किया और साहिल परीक्षा से कुछ समय पहले तक पूरी तरह सामान्य और खुशमिजाज था। यतीश के अनुसार परीक्षा के दिन साहिल नकल करते पकड़ा गया था जिसके बाद प्रोफेसर उसे बाहर ले गए थे। इस प्रकार के आंतरिक साक्ष्य स्पष्ट करते हैं कि तनाव का कारण अकादमिक कदाचार की व्यक्तिगत घबराहट थी, जिसे बाद में राजनीतिक रंग देकर जातिगत उत्पीड़न का रूप दिया जा रहा है।

तीसरे वर्ष के छात्र उत्कर्ष ने कहा- प्रो. डूला पर केस बेबुनियाद
संस्थान के तीसरे वर्ष के छात्र उत्कर्ष ने इस पूरे विवाद पर स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा कि नकल करना अनुचित है और किसी छात्र को खोना बेहद दुखद है, किंतु प्रो. सूर्यनारायण डूला पर दर्ज कराया गया मुकदमा पूरी तरह आधारहीन है। उत्कर्ष ने रेखांकित किया कि आईआईटी बॉम्बे में जातिगत भेदभाव जैसी कोई बात नहीं है और न ही उन्होंने या उनके मित्रों ने कभी ऐसा अनुभव किया। उनका कहना था कि शुरुआत में छात्र भ्रमवश विरोध में शामिल हुए थे, लेकिन जैसे ही यह बात समझ आई कि इसके पीछे कैंपस राजनीति सक्रिय है, छात्रों ने संतुलित रुख अपना लिया। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि कर्तव्य निभा रहे शिक्षक पर SC/ST एक्ट लगाना संवैधानिक प्रावधान का खुला दुरुपयोग है।

फैकल्टी फोरम अध्यक्ष ने कहा- SC/ST सेल में कभी कोई शिकायत नहीं आई
आईआईटी बॉम्बे फैकल्टी फोरम के अध्यक्ष प्रो. राजकुमार पंत ने प्रो. सूर्यनारायण डूला पर लगे आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए महत्वपूर्ण खुलासा किया। उप-निदेशक प्रो. रवींद्र गुड़ी से मिली जानकारी का हवाला देते हुए उन्होंने बताया कि संस्थान के SC/ST सेल की ओर से जारी नोटिस में यह साफ है कि पिछले तीन-चार महीनों के दौरान दिवंगत छात्र ने सेल से कोई संपर्क तक नहीं किया था, औपचारिक शिकायत तो बहुत दूर की बात है। प्रो. पंत ने स्पष्ट किया कि प्रो. डूला पहले डीन ऑफ स्टूडेंट अफेयर्स रह चुके हैं और छात्रों की मदद के लिए जाने जाते हैं। उन्होंने कहा कि शिक्षक के रूप में नियमों का पालन कराना उनका दायित्व था, क्योंकि नकल करने वालों पर कार्रवाई न करना उन बहुसंख्यक छात्रों के साथ अन्याय होगा जो ईमानदारी से परीक्षा देते हैं।

ईमानदार शिक्षक पर SC/ST एक्ट की एफआईआर और प्रो. डूला का इस्तीफा
संस्थान में एक दशक से अधिक समय से अध्यापन और अनुसंधान कर रहे इलेक्ट्रिकल पावर सिस्टम व रिन्यूएबल एनर्जी के विशेषज्ञ प्रो. सूर्यनारायण डूला पर इस मामले में SC/ST एक्ट के तहत एफआईआर दर्ज करा दी गई। शिक्षण और उत्कृष्ट शोध के लिए कई प्रतिष्ठित राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त कर चुके एक समर्पित शिक्षक को इस प्रकार कानूनी घेरे में लाकर इस्तीफे के लिए विवश करना संस्थान के अकादमिक मनोबल को तोड़ने जैसा है। यह घटनाक्रम दर्शाता है कि जब अनुशासन लागू करने वाले प्राध्यापकों का ही चरित्र हनन होने लगेगा, तो कोई भी शिक्षक परीक्षा की निष्पक्षता सुनिश्चित करने का साहस नहीं जुटा पाएगा।

छात्र प्रतिनिधियों का आधिकारिक रुख- बाहरी राजनीति और एजेंडे से रहें दूर
आईआईटी बॉम्बे के अधिकृत छात्र प्रतिनिधियों ने साझा बयान जारी कर स्पष्ट किया कि वे किसी भी प्रकार के अकादमिक कदाचार या नकल का समर्थन नहीं करते। उन्होंने कहा कि छात्रों का विरोध नकल को सही ठहराने के लिए नहीं, बल्कि संस्थान की आंतरिक व्यवस्था में सुधार के लिए था। बयान में यह भी स्पष्ट किया गया कि छात्र समुदाय प्रो. डूला को दोषी नहीं मानता और उनके साथ खड़ा है; उन्हें केवल डीन (फैकल्टी अफेयर्स) के प्रशासनिक दायित्व से अलग रखने की मांग इसलिए की गई थी ताकि जांच निष्पक्ष रह सके। सबसे अहम बात यह कि छात्र प्रतिनिधियों ने दो-टूक कहा कि इस दुखद घटना का इस्तेमाल किसी भी बाहरी राजनीतिक संगठन या नैरेटिव को स्थापित करने के लिए नहीं होना चाहिए और यह पूरा मामला संस्थान के आंतरिक दायरे तक ही सीमित रहना चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों और SC/ST एक्ट के दुरुपयोग का सवाल
न्यायालय ने समय-समय पर अपने निर्णयों में स्पष्ट किया है कि SC/ST कानून का प्रयोग किसी लोक सेवक अथवा कर्तव्यनिष्ठ शिक्षक के विरुद्ध बदले की भावना या अनुचित दबाव बनाने के लिए नहीं होना चाहिए। परीक्षा हॉल में मोबाइल और चैटजीपीटी के जरिए हो रही नकल को रोकना शिक्षक का प्राथमिक वैधानिक दायित्व था। इस निष्पक्ष कार्रवाई को जातिगत उत्पीड़न का रंग देकर सीधे एफआईआर दर्ज करवा देना न्यायिक दिशा-निर्देशों और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के पूर्णतः विपरीत है।

चैटजीपीटी और जनरेटिव एआई से कदाचार पर जीरो टॉलरेंस
आईआईटी जैसे देश के शीर्ष इंजीनियरिंग संस्थान में यह सामान्य नकल का प्रकरण नहीं, बल्कि परीक्षा कक्ष में स्मार्टफोन और जनरेटिव एआई (चैटजीपीटी) के जरिए डिजिटल चोरी का गंभीर मामला है। तकनीकी नवाचार के केंद्र में यदि उन्नत तकनीकी साधनों के जरिए होने वाले कदाचार पर कड़ा रुख नहीं अपनाया जाएगा, तो इंजीनियरिंग की विश्वसनीयता और नैतिक आधार ही नष्ट हो जाएंगे। डिजिटल युग में अकादमिक कदाचार पर जीरो टॉलरेंस की नीति लागू करना संस्थान की साख के लिए अनिवार्य है।

आईआईटी फैकल्टी में गहरा असंतोष और देशव्यापी असर
आईआईटी बॉम्बे की इस घटना के बाद देशभर के आईआईटी परिसरों में कार्यरत प्राध्यापकों और शिक्षक संगठनों में गहरी असुरक्षा और चिंता की स्थिति बन गई है। यदि परीक्षा में नकल पकड़ने और नियमों का पालन कराने पर शिक्षकों को आपराधिक मामलों और सार्वजनिक अपमान का सामना करना पड़ेगा, तो भविष्य में कोई भी शिक्षक कड़े मूल्यांकन या कदाचार रोकने का जोखिम उठाने से कतराएगा। इसका सीधा और घातक प्रभाव देश की समूची उच्च शिक्षा व्यवस्था पर पड़ेगा।

संस्थान की आंतरिक जांच प्रक्रिया को बाइपास करने की कोशिश
आईआईटी के नियमों के अनुसार किसी भी अकादमिक कदाचार की निष्पक्ष जांच आंतरिक समिति (अकादमिक कदाचार समिति) द्वारा की जाती है। संस्थान ने स्पष्ट किया था कि छात्र पर कोई त्वरित या मनमाना दंडात्मक प्रतिबंध नहीं लगाया गया था, बल्कि उसे मानसिक संबल देने के लिए तत्काल काउंसलिंग की सुविधा दी गई थी। जांच के निष्कर्ष और वैधानिक प्रक्रिया पूरी होने से पहले ही शिक्षकों को दोषी ठहराकर सड़क पर फैसले कराने की मानसिकता संस्थागत तंत्र को पंगु बनाने का प्रयास है।

कड़े एफसीआरए नियमों के बाद परिसरों में छद्म नेटवर्क की सक्रियता
केंद्र सरकार द्वारा विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम (एफसीआरए) के कड़े प्रावधान लागू करने के बाद कई संदिग्ध विदेशी वित्तपोषित एनजीओ के प्रत्यक्ष मार्ग अवरुद्ध हो चुके हैं। यही कारण है कि इस अंतरराष्ट्रीय इकोसिस्टम ने अपनी रणनीति बदलते हुए संवेदनशील शैक्षणिक परिसरों, छात्र आत्महत्याओं और सामाजिक संवेदनशीलताओं को भुनाना शुरू किया है। इसका उद्देश्य सीधे तौर पर प्रमुख राष्ट्रीय संस्थानों में आंतरिक कलह और अस्थिरता का वातावरण तैयार करना है।

मानसिक संबल के लिए ‘मनोदर्पण’ जैसी व्यवस्था, फिर भी अराजकता का सहारा
केंद्र सरकार ने उच्च शिक्षण संस्थानों में विद्यार्थियों के मानसिक स्वास्थ्य और तनाव निवारण के लिए ‘मनोदर्पण’ पोर्टल, चौबीसों घंटे परामर्श हेल्पलाइन और संस्थागत काउंसलिंग जैसी मजबूत व्यवस्थाएं बनाई हैं। इसके अतिरिक्त छात्र कल्याण को प्राथमिकता देते हुए कई सुधारात्मक कदम उठाए गए हैं। इस सकारात्मक तंत्र का लाभ उठाने और तनावग्रस्त छात्रों की मदद करने के बजाय वामपंथी समूह आत्महत्या की दुर्भाग्यपूर्ण घटनाओं को हथियार बनाकर परिसरों में अशांति और अराजकता फैलाने में जुट जाते हैं।

समान अवसर और छात्रवृत्ति प्रणाली पर चोट की कोशिश
देश के शीर्ष शिक्षण संस्थानों में वंचित, पिछड़े और सामान्य पृष्ठभूमि के मेधावी विद्यार्थियों के लिए केंद्र सरकार की ओर से ट्यूशन फीस माफी, विशेष छात्रवृत्तियां और वित्तीय सहायता योजनाएं निर्बाध रूप से उपलब्ध हैं। शासन का मूल उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि किसी भी मेधावी छात्र का भविष्य आर्थिक तंगी के कारण न रुके। जब तंत्र पहले से ही हर कदम पर छात्रों के सहयोग के लिए तत्पर है, तब परीक्षा में कदाचार या अनुशासनहीनता को सामाजिक न्याय का आवरण पहनाना पूरी तरह निराधार और अनुचित है।

पढ़ने वाले बहुसंख्यक छात्रों के भविष्य को बंधक बनाने की चाल
आईआईटी जैसे संस्थानों में 95 प्रतिशत से अधिक छात्र केवल अपनी पढ़ाई, लैब प्रोजेक्ट्स, कोडिंग और नवाचार में जुटे रहते हैं। लेकिन मुट्ठी भर राजनीतिक रूप से प्रेरित और वामपंथी छात्र संगठन पूरे परिसर को बंधक बनाकर अराजकता फैलाते हैं। इस उपद्रव का सबसे बड़ा नुकसान उन शांत और अध्ययनशील छात्रों को उठाना पड़ता है, जिनका शैक्षणिक समय, प्रोजेक्ट्स और मानसिक शांति इस अवांछित राजनीति की भेंट चढ़ जाते हैं।

ग्लोबल टेक कंपनियों के प्लेसमेंट पर नकारात्मक असर का खतरा
गूगल, माइक्रोसॉफ्ट और एनवीडिया जैसी विश्व की अग्रणी टेक कंपनियां आईआईटी से छात्रों को इसलिए चुनती हैं क्योंकि यहां का अकादमिक अनुशासन और तकनीकी क्षमता बेजोड़ है। यदि परिसरों में कदाचार को राजनीतिक संरक्षण मिलने और प्रशासनिक व्यवस्था पंगु होने की छवि बनेगी, तो बहुराष्ट्रीय कंपनियां भविष्य में कैंपस प्लेसमेंट को लेकर संकोच करेंगी। इसका सीधा नुकसान संस्थान के होनहार विद्यार्थियों के करियर पर पड़ेगा।

मेरिट से कोई समझौता नहीं होगा
आईआईटी जैसे संस्थान भारत के तकनीकी सामर्थ्य और बौद्धिक पहचान के आधार स्तंभ रहे हैं। यदि संस्थान के भीतर अकादमिक तनाव का बहाना बनाकर मूल्यांकन प्रक्रिया को लचीला बनाया जाएगा या परीक्षाओं में कदाचार को नजरअंदाज किया जाने लगेगा, तो विश्व स्तर पर भारतीय इंजीनियरों की साख पर गहरा आघात पहुंचेगा। वैश्विक पटल पर भारत की पहचान तभी कायम रह सकती है जब प्रवेश से लेकर उपाधि तक का पैमाना केवल और केवल कठोर परिश्रम, अनुशासन और विशुद्ध मेरिट हो। किसी भी प्रकार की शिथिलता अकादमिक पतन का मार्ग प्रशस्त करेगी।

सहानुभूति की आड़ में अनुशासन बिगाड़ने की साजिश
कैंपस में जब भी शैक्षणिक अनुशासन, निष्पक्षता और नियमों का कड़ाई से पालन कराया जाता है, तब कुछ खास समूह तुरंत मानसिक दबाव की आड़ लेकर अराजकता फैलाने का प्रयास करने लगते हैं। परीक्षा में अनुचित साधनों के प्रयोग पर नियमानुसार कार्रवाई होने पर शिक्षकों और संस्थान प्रमुख को ही कटघरे में खड़ा कर देना शैक्षणिक मर्यादा को तार-तार करना है। यह रणनीति संस्थानों के आंतरिक अनुशासन को ध्वस्त कर अराजक माहौल को बढ़ावा देने की सोची-समझी योजना का हिस्सा है।

अभिभावकों का अनुचित दबाव और छात्रों की सीमा
वास्तविक चुनौती यह है कि अनुचित अपेक्षाओं और कोचिंग संस्कृति के दबाव में आकर विद्यार्थियों को ऐसी दिशा में धकेलने से बचना चाहिए जिसके प्रति उनका स्वाभाविक रुझान नहीं है। अपनी अकादमिक कमियों को स्वीकार करने के बजाय व्यवस्था, शिक्षकों और जांच तंत्र के प्रति अमर्यादित व्यवहार करना एक ऐसी प्रवृत्ति है, जो कर्तव्य के बिना विशेषाधिकार की मांग करती है। तकनीकी परिसरों में जिम्मेदारी, आत्म-मूल्यांकन और मर्यादा का भाव होना अनिवार्य है।

आईआईटी की साख बचाने के लिए भाजपा का संकल्प
भारतीय जनता पार्टी का इस पूरे मामले में स्पष्ट और दृढ़ मत है कि देश के तकनीकी संस्थानों की स्वायत्तता, मेरिट और गौरव से रत्ती भर भी समझौता स्वीकार नहीं किया जाएगा। भाजपा नेताओं ने साफ किया है कि केंद्र की नीतियों का लक्ष्य इन संस्थानों को दुनिया के अग्रणी पायदान पर ले जाना है, जिसे तुष्टिकरण और अराजकता की राजनीति से किसी भी कीमत पर कमजोर नहीं होने दिया जाएगा। पार्टी का मानना है कि मेरिट का सम्मान और शिक्षकों की गरिमा सर्वोपरि है और किसी भी राजनीतिक एजेंडे के तहत शिक्षा के स्तर को गिराने के प्रयासों का कड़ा प्रतिकार किया जाएगा।

इंजीनियरिंग छोड़कर राजनीति चमकाने वाले चेहरे
आईआईटी बॉम्बे में छात्र आत्महत्या की दुर्भाग्यपूर्ण घटना के बाद शुरू हुए विरोध प्रदर्शनों के घटनाक्रम में यह तथ्य सामने आया कि आंदोलनों की अगुवाई इंजीनियरिंग के छात्रों ने नहीं, बल्कि ह्यूमैनिटीज विभाग से जुड़े वामपंथी छात्र संगठनों के कार्यकर्ताओं ने की थी। इनमें हुमा नमाल (एसएफआई/द कलेक्टिव से जुड़ी मार्क्सवादी, जो ह्यूमैनिटीज में पीएचडी कर रही हैं) और अमरकांत ठाकुर (दर्शनशास्त्र में पीएचडी शोधार्थी, जिनके बयानों पर पूर्व में भी विवाद रहा है) जैसे चेहरे शामिल रहे हैं।

आईआईटी में वामपंथी विभागों की घुसपैठ का इतिहास
प्रारंभिक दशकों में तकनीकी संस्थानों के भीतर ह्यूमैनिटीज केवल एक सीमित और वैकल्पिक विषय के रूप में थी। संप्रग सरकार के समय 2006 में गठित राष्ट्रीय ज्ञान आयोग (एनकेसी) की सिफारिशों के बाद 2008 के दौर में स्थापित नए आईआईटी—जैसे हैदराबाद, गांधीनगर, पटना, जोधपुर, रोपड़ और भुवनेश्वर—में इन विभागों का तेजी से विस्तार किया गया। इसके परिणामस्वरूप तकनीकी परिसरों में ऐसे विभागों की उपस्थिति बढ़ी, जिससे विशुद्ध तकनीकी प्राथमिकताओं के बजाय कैंपस में राजनीतिक गतिविधियों को स्थान मिलने लगा।

इंजीनियरिंग में गैर-तकनीकी पाठ्यक्रम
राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के अध्याय 11 (विशेषकर बिंदु 11.4) में बहु-विषयक दृष्टिकोण की रूपरेखा प्रस्तुत करते हुए इंजीनियरिंग पाठ्यक्रमों में भी आर्ट्स और ह्यूमैनिटीज को अनिवार्य रूप से समाहित करने की बात कही गई। इसके तहत 2030 तक सभी संस्थानों को बहु-विषयक बनाने का लक्ष्य रखा गया। इस संरचनात्मक बदलाव का इस्तेमाल कुछ बाहरी समूहों ने तकनीकी संस्थानों के भीतर अपने वैचारिक एजेंडे को स्थापित करने के अवसर के रूप में किया।

नीति के मसौदे में एनजीओ सिंडिकेट का खेल
नीति निर्माण की प्रक्रिया में 2017 में डॉ. के. कस्तूरीरंगन की अध्यक्षता में 9 सदस्यीय मसौदा समिति बनाई गई थी। इसमें अजीम प्रेमजी फाउंडेशन के सीईओ अनुराग बेहार को बहु-विषयक ढांचे के लिए शामिल किया गया था, जो 2015 से पहले से ही लिबरल आर्ट्स को सभी संकायों में अनिवार्य करने के मुखर समर्थक रहे थे। सितंबर 2019 में जॉर्जटाउन यूनिवर्सिटी द्वारा आयोजित विशेष परिचर्चा में भी उन्होंने भारतीय उच्च शिक्षण संस्थानों में लिबरल एजुकेशन के विस्तार पर विचार रखे थे।

जॉर्ज सोरोस का नेटवर्क और भारतीय संस्थानों में सेंध
वैश्विक स्तर पर जॉर्ज सोरोस समर्थित नेटवर्क, बिल गेट्स और ओमिद्यार से जुड़े गैर-सरकारी संगठनों की सक्रियता भारत के नीतिगत और अकादमिक तंत्र में देखी गई है। वर्ष 2016 में सोरोस समर्थित ‘आईएनईटी’ के भारत आगमन के समय अनुराग बेहार उसके भारतीय सहयोगी के रूप में जुड़े थे। जहां शिक्षा नीति का बिंदु 11.8 धर्म, शांति और प्रेम जैसे भारतीय मूल्यों को पाठ्यक्रम का आधार बनाने की बात करता है, वहीं वामपंथी तंत्र ने इसकी आड़ में मार्क्सवादी विमर्श को तकनीकी संस्थानों के भीतर रोपने की कोशिश की।

अराजकता से बढ़ेगा ब्रेन ड्रेन, रुकेगी देश की तरक्की
जब देश के शीर्ष तकनीकी परिसरों में गुणवत्ता, परिश्रम और मेरिट के स्थान पर अराजकता और अनुचित समझौतों को बढ़ावा दिया जाता है, तो वास्तविक प्रतिभा कुंठित होकर विदेश की ओर रुख करने लगती है। भारत को विकसित राष्ट्र बनाने के लिए आवश्यक है कि देश का श्रेष्ठ मस्तिष्क देश के ही निर्माण में लगे। मेरिट का उचित मूल्यांकन और सम्मान सुनिश्चित करके ही युवाओं में राष्ट्र के प्रति निष्ठा और समर्पण का भाव सुदृढ़ किया जा सकता है।

राजनीति से गिरेगी ग्लोबल रैंकिंग, रुकेगा पेटेंट का काम
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उच्च शिक्षण संस्थानों की प्रतिष्ठा उनके पेटेंट, नवाचार और अनुसंधान के बल पर आंकी जाती है। यदि आईआईटी जैसे संस्थानों की ऊर्जा सेमीकंडक्टर, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और उन्नत तकनीकी शोध के बजाय निराधार वैचारिक संघर्षों में व्यय होगी, तो भारत की वैश्विक रैंकिंग प्रभावित होगी। देश के तकनीकी संस्थानों को विश्व के शीर्ष 50 विश्वविद्यालयों में स्थापित करने के लिए शोध और नवाचार के माहौल को निर्बाध रखना अनिवार्य है।

टैक्सपेयर्स का पैसा पढ़ाई के लिए है, उपद्रव के लिए नहीं
आईआईटी के प्रत्येक छात्र की शिक्षा और तकनीकी सुविधाओं के विकास पर देश के सामान्य नागरिकों की गाढ़ी कमाई से आने वाला कर खर्च होता है। यह सार्वजनिक संसाधन देश को तकनीकी रूप से आत्मनिर्भर और सामर्थ्यवान बनाने के लिए आवंटित किए जाते हैं। इन संसाधनों का उपयोग केवल उत्कृष्ट वैज्ञानिक शोध, तकनीक और राष्ट्र निर्माण में होना चाहिए, न कि कैंपस को राजनीतिक विभाजन और अनुशासनहीनता का मंच बनाने के लिए।

एमआईटी जैसे विदेशी संस्थानों में भी नकल पर जीरो टॉलरेंस
विश्व के अग्रणी तकनीकी संस्थानों जैसे एमआईटी और कैल्टेक की प्रतिष्ठा उनके कठोर अकादमिक अनुशासन और कदाचार पर पूर्णतः जीरो टॉलरेंस की नीति पर टिकी है। वहां किसी भी प्रकार के दबाव या सहानुभूति के नाम पर परीक्षा की निष्पक्षता से समझौता नहीं किया जाता। यदि भारतीय संस्थानों को भी दुनिया का नेतृत्व करना है, तो यहां भी नियमों का पालन और निष्पक्ष मूल्यांकन बिना किसी दबाव के सुनिश्चित होना चाहिए।

मार्क्सवादी एजेंडे की जगह भारतीय ज्ञान परंपरा जरूरी
भारत की ज्ञान परंपरा सदैव से विज्ञान, तर्क और नैतिक मूल्यों के समन्वय पर आधारित रही है। आर्यभट्ट, वराहमिहिर और चरक जैसी महान विभूतियों ने विज्ञान और राष्ट्रबोध को एकाकार किया था। पश्चिम से आयातित विघटनकारी मार्क्सवादी विमर्श के विपरीत भारतीय दृष्टि व्यक्ति को समाज और राष्ट्र के प्रति उत्तरदायी बनाती है। पाठ्यक्रमों में इस मूल भारतीय दृष्टिकोण को समाहित करना समय की मांग है।

मेंटल हेल्थ के नाम पर राजनीति करना बंद हो
अकादमिक दबाव और विद्यार्थियों का मानसिक स्वास्थ्य एक संवेदनशील विषय है, जिसका समाधान पेशेवर काउंसलिंग, खेलकूद, सकारात्मक परिवेश और योग के माध्यम से ही संभव है। परंतु कुछ समूह वास्तविक समाधान खोजने के बजाय छात्रों की इस संवेदनशीलता को अपनी राजनीति के लिए ढाल बनाते हैं। मानसिक तनाव के नाम पर अनुशासनहीनता और कदाचार को सही ठहराना वस्तुतः समस्या का समाधान नहीं, बल्कि व्यवस्था को पंगु बनाने का षड्यंत्र है।

सोशल मीडिया पर सुनियोजित टूलकिट का हमला
कैंपस में किसी भी सामान्य प्रशासनिक कदम के उठते ही सोशल मीडिया पर समन्वित तरीके से हैशटैग चलाना, संस्था प्रमुखों का चरित्र हनन करना और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारतीय तकनीकी शिक्षा को बदनाम करना एक सुपरिचित रणनीति बन चुका है। यह तात्कालिक प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि एक व्यवस्थित टूलकिट का हिस्सा होता है, जिसका उद्देश्य वैश्विक मंचों पर भारत के तकनीकी सामर्थ्य और मेरिट की विश्वसनीयता को चोट पहुंचाना है।

आईआईटी में अस्थिरता से देश की रक्षा सुरक्षा पर असर
आईआईटी केवल डिग्री प्रदान करने वाले संस्थान नहीं हैं, बल्कि वे देश की सामरिक सुरक्षा, रक्षा अनुसंधान और उन्नत विनिर्माण के केंद्र हैं। इसरो और डीआरडीओ जैसे महत्वपूर्ण संगठनों के साथ मिलकर ये संस्थान राष्ट्र की सुरक्षा को सुदृढ़ करते हैं। यदि इन तकनीकी परिसरों को वैचारिक अस्थिरता और हंगामे में झोंक दिया जाएगा, तो इससे देश के स्वदेशी नवाचार, रक्षा तकनीक और मेक इन इंडिया अभियान की गति प्रभावित होगी।

कमजोर और मेहनती छात्रों के हक पर डाका
साधारण और ग्रामीण पृष्ठभूमि से आने वाले छात्र वर्षों के अथक परिश्रम और मेरिट के दम पर आईआईटी जैसे संस्थानों में स्थान बनाते हैं। जब कदाचार और नियमों में ढिलाई को सहानुभूति के नाम पर संरक्षण दिया जाता है, तो सबसे बड़ा आघात उन ईमानदार और पहली पीढ़ी के मेहनती विद्यार्थियों पर पड़ता है जिनके पास अपनी योग्यता के अतिरिक्त कोई अन्य सहारा नहीं होता। मेरिट की अनदेखी सामाजिक न्याय के मूल सिद्धांत का हनन है।

दबाव में शिक्षक काम नहीं कर पाएंगे
अकादमिक संस्थानों के कुलपतियों और निदेशकों को बिना किसी राजनीतिक या वैचारिक दबाव के अनुशासन लागू करने की पूरी स्वतंत्रता मिलनी चाहिए। यदि नियमों का पालन कराने पर संस्था प्रमुखों को दबाव में लेकर इस्तीफे के लिए विवश किया जाएगा, तो इससे पूरे अकादमिक प्रशासन का मनोबल टूटेगा। भयमुक्त और सशक्त प्रशासनिक व्यवस्था ही शिक्षा की गुणवत्ता और वैश्विक साख को सुरक्षित रख सकती है।

भारतीय मूल्यों को लागू करने से ही बचेगी उत्कृष्टता
आईआईटी जैसे संस्थान भारत की प्रगति, सुरक्षा और आत्मनिर्भरता की रीढ़ हैं। आज समय की मांग है कि तकनीकी परिसरों को वामपंथी प्रयोगों और दिशाहीन राजनीति से पूरी तरह मुक्त रखा जाए। पाठ्यक्रमों से औपनिवेशिक व मार्क्सवादी विचारों को हटाकर विशुद्ध भारतीय चिंतन, निष्ठा और अनुशासन को स्थापित करना होगा। शैक्षणिक संस्थानों में मेरिट, कर्तव्य और कठोर अनुशासन की पुनर्स्थापना से ही भारत के तकनीकी संस्थान दुनिया में अपने सर्वोच्च सम्मान को बनाए रख सकेंगे।

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