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दिमागी नक्सल से सावधान!, हथियारबंद नक्सलियों से भी ज्यादा खतरनाक, देश में हिंसा और अराजकता फैलाना मकसद

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प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 15 अगस्त, 2026 को 80वें स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर लालकिले के प्राचीर से ‘दिमागी नक्सल’ शब्द का इस्तेमाल कर देश विरोधी ताकतों पर सर्जिकल स्ट्राइक किया। इससे दिमागी नक्सलियों के खेमे में खलबली मची हुई है। प्रधानमंत्री मोदी ने अपने संबोधन में कहा, “जंगलों में हमें हथियारी नक्सलों का खात्मा करने में, उस संकट से देश को मुक्त कराने में सफलता मिली है। लेकिन हथियारी नक्सल तो गए, ‘दिमागी नक्सल’ मौके की तलाश में है। हिंसा और अराजकता के वो रास्ते खोज रहे हैं। समाज को गलत राह पर घसीटने के लिए भांति-भांति के दाव कर रहे हैं। इन ‘दिमागी नक्सलियों’ को पहचानना होगा। इन ‘दिमागी नक्सलियों’ को आइसोलेट करना होगा। राष्ट्र को विकसित राष्ट्र बनाने की मुख्यधारा की ओर देश की युवा पीढ़ी को जोड़ना होगा।”

क्या है दिमागी नक्सल ?
सबसे पहले जानते हैं कि आखिर ‘दिमागी नक्सल’ क्या है ? प्रधानमंत्री मोदी ने इस शब्द का क्यों इस्तेमाल किया? दरअसल, हथियारबंद नक्सलियों की तरह ये ‘दिमागी नक्सल’ जंगलों या बीहड़ों में नहीं रहते। ये हथियार नहीं रखते और गोलियां नहीं चलाते। ये सिर्फ अपनी बुद्धि का इस्तेमाल करते हैं।
ये लोग लोकतांत्रिक संस्थाओं, न्यायपालिका, सुरक्षा बलों और संविधान के प्रति लोगों में अविश्वास पैदा करते हैं। ये लोग माओवादियों का समर्थन करते हैं और संविधान को नहीं मानते। अलगाववादियों के साथ खड़े होते हैं, अनुच्छेद 370 का समर्थन करते हैं और  पूर्वोत्तर को बाकी भारत से जोड़ने वाले “चिकन नेक” (संकरे रास्ते) को अलग करना चाहते हैं। युवाओं में घुसपैठ कर बौद्धिक हेरफेर से उन्हें हिंसक गतिविधियों की ओर मोड़ने की कोशिश करते हैं। उन्हें आर्थिक और कानूनी मदद देते हैं। समाचार पत्र और टीवी जैसे संचार माध्यमों के जरिए  व्यवस्था का विरोध करने वालों का नैतिक और बौद्धिक समर्थन देते हैं। ये एक खास एजेंडे के तहत तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर पेश करते हैं। 

कौन है दिमागी नक्सल ?
ये शहरों में प्रोफेसर, टीचर, एनजीओ हेड, इंटेलेक्चुअल, कवि, लेखक, पत्रकार, यूट्यूबर, सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर और डिजिटल क्रिएटर्स के रूप में दिखते हैं। ये लेख लिखते हैं, कॉन्फ्रेंस और सेमिनार आयोजित करते हैं और सोशल मीडिया में इन्फ्लुएंसर बनकर वीडियो, रील्स या पोस्ट करते हैं, जिनके माध्यम से आम लोगों, खासकर युवाओं के दिमाग में अपनी खास और हिंसक विचारधारा ठूंसते हैं। अपने फॉलोअर्स का इस्तेमाल हथियार के रूप में करते हैं। दिमागी नक्सल शहरी बुद्धिजीवियों की एक ऐसी दुर्लभ प्रजाति हैं, जिसका दिमाग पूरी तरह से क्रांतिकारी सिद्धांतों से भरा होता है, जबकि उनका शरीर वातानुकूलित (AC) कैफे में सुरक्षित बैठा रहता है। इसलिए ये उन नक्सलियों से कहीं ज्यादा खतरनाक हैं जो जंगलों में रहते थे।

दिमागी नक्सल कैसे काम करते हैं?

  • ये लोग सीधे हथियार नहीं उठाते, बल्कि कानूनी, बौद्धिक और सामाजिक मंचों का उपयोग करके सरकार विरोधी भावनाएं भड़काते हैं।
  • विश्वविद्यालयों, मीडिया और सांस्कृतिक मंचों का उपयोग करके माओवादी-नक्सली विचारधारा का महिमामंडन करते हैं। उनके पक्ष में लिखते और बोलते हैं।
  • अभिव्यक्ति की आजादी, लोकतांत्रिक विरोध, असहमति और आलोचना के हक की आड़ में अपना एजेंडा चलाते हैं। विरोध होने पर आवाज दबाने का आरोप लगाकर विक्टिम कार्ड खेलते हैं।
  • पुलिस और प्रशासनिक कार्रवाइयों को गलत ठहरा कर और ‘मानवाधिकार हनन’ बताकर सुरक्षा बलों की छवि धूमिल करते हैं।  
  • हिंसा के आरोप में पकड़े गए या जेल में बंद अपराधियों औऱ नक्सलियों के लिए वकीलों का प्रबंध करते हैं और उन्हें राजनीतिक या सामाजिक पीड़ित के रूप में पेश करते हैं।
  • अराजकता का माहौल बनाए रखने के लिए गैर-सरकारी संगठनों (NGOs) या तथाकथित चैरिटेबल ट्रस्टों के जरिए गुप्त रूप से देश और विदेश से फंड जुटाते हैं।  
  • ये लोग सोशल मीडिया, लेखों और मंचों के माध्यम से आदिवासियों या स्थानीय लोगों के विस्थापन और उत्पीड़न की बढ़ा-चढ़ाकर और झूठी कहानियां फैलाते हैं।
  • सरकार की ओर से बनने वाली सड़कों, रेलवे, बांधों या खनन परियोजनाओं को जनता के सामने इस तरह पेश किया जाता है मानो वे सिर्फ पर्यावरण या संस्कृति को नष्ट करने के लिए हैं।
  • जनहित याचिका (PIL) या अन्य कानूनी दांव-पेंच का इस्तेमाल करके विकास परियोजनाओं को अदालतों में उलझाए रखना, ताकि काम समय पर पूरा न हो सके और लागत बढ़ जाए।

आइए जानते हैं कैसे भारत के ‘दिमागी नक्सल’ को विदेशों में मंच प्रदान किया जाता है। उन्हें कैसे ट्रेनिंग और आर्थिक मदद दी जाती है। जिन दिमागी नक्सलियों के बारे में बात करने जा रहे हैं उनमें सुप्रिया शर्मा, सौरव दास शामिल हैं, जिन्होंने हाल ही में दिल्ली सहित पूरे देश में अराजकता पैदा करने की कोशिश की….

कौन है शरजील इमाम और उमर खालिद की समर्थक पत्रकार सुप्रिया शर्मा ?
सबसे पहले सुप्रिया शर्मा के बारे में बात करते हैं। सुप्रिया शर्मा स्वतंत्र डिजिटल समाचार पोर्टल Scroll.in की कार्यकारी संपादक हैं। इस पोर्टल पर अक्सर सरकार विरोधी और एकतरफा एजेंडा चलाने का आरोप लगाया जाता है। इस पर ऐसे लेख प्रकाशित होते हैं, जिनमें हिंदू संस्कृति के प्रति बेशर्म नफरत दिखाई देती है। यह पोर्टल हिंदू विरोधी वामपंथियों के बीच काफी लोकप्रिय है, क्योंकि यह माओवाद के एजेंडे पर काम करता है। इस पोर्टल पर नक्सल गतिविधियों और देश विरोधी ताकतों को बढ़ावा देने के आरोप लगते रहे हैं। 

इस पोर्टल के कार्यकारी संपादक सुप्रिया शर्मा भी छत्तीसगढ़ में नक्सलियों पर विस्तृत रिपोर्टिंग के लिए जानी जाती हैं। सुप्रिया शर्मा ने जून 2026 में ओस्लो फ्रीडम फोरम में हिस्सा लिया। 18वां ओस्लो फ्रीडम फोरम 1 से 3 जून 2026 तक ओस्लो, नॉर्वे में आयोजित किया गया था। इस वर्ष के सम्मेलन का मुख्य विषय “डिसमेंटलिंग डिक्टेटरशिप” (तानाशाही को खत्म करना) था, जिसमें दुनिया भर के कार्यकर्ताओं, कलाकारों और तकनीकविदों ने हिस्सा लिया। इस कार्यक्रम में सुप्रिया शर्मा ने प्रेस की स्वतंत्रता, भारत में स्वतंत्र मीडिया के लिए बढ़ते खतरों और सत्ता द्वारा असहमति की आवाज़ों को दबाए जाने पर अपने विचार रखे थे। उन्होंने अपने संबोधन में सुधा भारद्वाज, गौतम नवलखा, उमर खालिद, महेश राउत, फादर स्टैम स्वामी, गुलफिशा फातिमा और शरजील इमाम को सोशल एक्टिविस्ट्स बताया था।  उन्होंने उमर खालिद और शरजील इमाम को हीरो के रूप में पेश किया, जिन्होंने हिंदू-विरोधी दंगों की योजना बनाई थी।

नक्सली, आतंकी और देश विरोधी ताकतों का गठजोड़

  • भीमा कोरेगांव हिंसा के बाद सुधा भारद्वाज को गिरफ्तार किया गया था। तीन साल तक जेल में रहने के बाद 2021 में सुप्रीम कोर्ट ने शर्तों के साथ जमानत दी थी।
  • सुप्रीम कोर्ट ने मई 2024 में चार साल से जेल में बंद तथाकथित मानवाधिकार कार्यकर्ता गौतम नवलखा को जमानत दी। एल्गार परिषद सम्मेलन के कारण अगले दिन भीमा कोरेगांव युद्ध स्मारक के पास हिंसा हुई थी। बाद में उन पर माओवादियों से संबंध रखने का भी आरोप लगा।
  • फादर स्टैन स्वामी पर एल्गार परिषद कार्यक्रम में भड़काऊ भाषण देने और माओवादियों को हिंसा के लिए फंड व समर्थन मुहैया कराने का आरोप था। उन्हें 8 अक्टूबर 2020 को रांची से गिरफ्तार किया गया था। न्यायायिक हिरासत में 5 जुलाई 2021 को मुंबई के एक अस्पताल में उनका निधन हो गया
  • जेएनयू के छात्र रहे उमर खालिद 2020 के दिल्ली दंगों की बड़ी साजिश से जुड़े UAPA मामले में आरोपी होने के कारण जेल में हैं। दिल्ली हाईकोर्ट ने मामले की अगली सुनवाई 27 अगस्त को तय की है।
  • दिल्ली दंगों के आरोपी शरजील इमाम ने सिलीगुड़ी कॉरिडोर (जिसे ‘चिकन नेक’ कहा जाता है) के ज़रिए असम को भारत के बाकी हिस्सों से अलग करने की बात कही थी। अदालत ने उनके भाषण को ‘जहरीला’ और भीड़ को हिंसा के लिए उकसाने वाली बड़ी साजिश का मुख्य सूत्रधार माना है।

पत्रकार सुप्रिया शर्मा ने हिंदुओं की तुलना हिटलर और मुसोलिनी से की 
ठाकुर फाउंडेशन फंडेड ‘स्क्रॉल’ की कार्यकारी संपादक सुप्रिया शर्मा ने ओस्लो फ्रीडम फोरम में हिंदुओं को निशाना बनाया था। उन्होंने हिंदुओं की तुलना हिटलर और मुसोलिनी से करने के लिए एक खतरनाक, एकतरफा और झूठा नैरेटिव फैलाया। उन्होंने सेकुलर इंडिया में दूसरे धर्मों के साथ भेदभाव और हिन्दू बहुसंख्यकों का प्रभुत्व होने का प्रोपेगैंडा किया। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री मोदी ‘हिन्दू फर्स्ट’ विचारधारा के प्रमुख प्रोडक्ट हैं। सुप्रिया ने प्रधानमंत्री मोदी को तानाशाह साबित करने के लिए 2002 के गुजरात दंगों का जिक्र किया। लेकिन गोधरा में उन 58 कारसेवकों के बारे में नहीं बताया, जिन्हें मुसलमानों ने जिंदा जला दिया था।  उन्होंने नहीं बताया कि भारतीय अदालतों को कैसे इस बात के सबूत मिले हैं कि बाबरी मस्जिद एक मंदिर को तोड़कर बनाई गई थी। इस मामले में भी सुप्रिया ने झूठ फैलाया कि हिंदुओं ने मुसलमानों पर हमला किया। उन्होंने कुछ यादृच्छिक (रैंडम) मामलों के तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर पेश किया कि भारत में हिंदू मुसलमानों पर अत्याचार कर रहे हैं। एक तरफ ये दिमाग़ी नक्सल हमारे छात्रों से कहते हैं कि वे ‘हिंदू-मुस्लिम’ न करें, तो दूसरी तरफ वे अंतरराष्ट्रीय मंचों पर हिंदुओं को निशाना बनाने के लिए साजिश के सिद्धांत (कॉन्स्पिरसी थ्योरीज़) बेचते हैं।

सुप्रिया शर्मा ने जुबैर जैसे एजेंडा पत्रकार का किया बचाव
सुप्रिया शर्मा ने अपने प्रेजेंटेशन में जुबैर को एक ऐसे पत्रकार के रूप में पेश किया, जिन पर मुकदमा चलाया गया था और उन्हें मुस्लिम होने के कारण हिंदुओं द्वारा निशाना बनाया गया था। लेकिन उन्होंने यह उजागर नहीं किया कि ‘ठाकुर फैमिली फाउंडेशन’ (Thakur Family Foundation) ने उन दोनों को वित्तपोषित (फंड) किया था, और वे दोनों अपनी प्रचार रिपोर्टों से हिंदुओं को निशाना बनाते हैं।
कुछ मीडिया रिपोर्ट्स और सोशल मीडिया दावों के अनुसार, ऑल्ट न्यूज़ से जुड़ी रहीं डॉक्टर सुमैय्या शेख और एक अन्य Contributor को इस अमेरिकी फाउंडेशन से लगभग 50 लाख रुपये का भारी वित्तीय अनुदान (फंडिंग) मिला था। 

ओस्लो फ्रीडम फोरम में सुप्रिया शर्मा और पत्रकार हेले लिंग की मुलाकात
सुप्रिया शर्मा ने जून 2026 में ओस्लो फ्रीडम फोरम में शामिल होने के दौरान नॉर्वे की पत्रकार हेले लिंग (Helle Lyng) से मिली थी। इसने मई 2026 में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की नॉर्वे यात्रा के दौरान एक प्रेस ब्रीफिंग में सवाल पूछने और उस पर हुए विवाद के कारण वह चर्चा में आई थीं। पत्रकार हेले लिंग से मुलाकात कोई संयोग नहीं, बल्कि पूरी तरह स्क्रिप्टेड टूलकिट का हिस्सा है। क्योंकि दावा किया जा रहा है कि यहीं पर आम आदमी पार्टी (AAP) का व्यंग्यात्मक (सैटायरिकल) रूप ‘CJP’ पैदा हुआ था। गौरतलब है कि नॉर्वे की पत्रकार हेले लिंग नॉर्वे के जाने-माने समाचार पत्र ‘डागा सविसिन’ (Dagsavisen) से जुड़ी हुई हैं और उसके लिए काम करती हैं।

रेजीम चेंज विशेषज्ञ पोपोविक से मिला ‘दिमागी नक्सल’ को प्रशिक्षण
शासन परिवर्तन (रेजीम चेंज) विशेषज्ञ सरदजा पोपोविक (Srdja Popovic) जून 2026 में ओस्लो फ्रीडम फोरम कार्यक्रम के मुख्य आयोजकों और प्रशिक्षकों में से एक हैं। उन्होंने जीन शार्प के सिद्धांत में महारत हासिल की है और मार्क्सवादियों को इसका प्रशिक्षण दिया है। दरअसल, सरदजा पोपोविक एक प्रसिद्ध सर्बियाई राजनीतिक कार्यकर्ता हैं। वर्ष 2003 में उन्होंने Center for Applied Nonviolent Action and Strategies (कैनवास) की शुरुआत की, जो दुनिया भर के कार्यकर्ताओं को अहिंसक संघर्ष के तरीके सिखाता है। उन्होंने अहिंसक आंदोलनों पर आधारित प्रसिद्ध पुस्तक ‘ब्लूप्रिंट फॉर रेवोल्यूशन’ (Blueprint for Revolution) लिखी है। देखिए कि वह शासन परिवर्तन के लिए संगीत और व्यंग्य के उपयोग का प्रशिक्षण कैसे दे रहे हैं।

क्या है ठाकुर फेमली फाउंडेशन ? स्वास्थ्य के नाम पर भारत विरोधी एजेंडा चलाने का आरोप 
ठाकुर फेमली फाउंडेशन (Thakur Family Foundation) अमेरिका स्थित एक संगठन है। इसकी स्थापना रैनबैक्सी के पूर्व कार्यकारी दिनेश ठाकुर ने की थी, जो भारत में नागरिक स्वतंत्रता, स्वास्थ्य सेवा और स्वतंत्र मीडिया से जुड़े प्रोजेक्ट्स को ग्रांट (अनुदान) देता है। इस फाउंडेशन पर डिजिटल मीडिया पोर्टल ‘स्क्रॉल’ (Scroll.in) फंडिंग का आरोप है। आलोचकों का आरोप है कि इस प्रकार की विदेशी या बाह्य फंडिंग से चलने वाले मीडिया संस्थान एक खास वैचारिक एजेंडे के तहत खबरें दिखाते हैं, जबकि समर्थकों और संस्थाओं का कहना है कि यह अनुदान मुख्य रूप से जनस्वास्थ्य (Public Health) और स्वतंत्र पत्रकारिता जैसे विशिष्ट कार्यों के लिए होता है। ठाकुर फाउंडेशन ने भी सार्वजनिक स्वास्थ्य और महामारी से जुड़ी कवरेज के लिए स्क्रॉल मीडिया को अनुदान देने की बात स्वीकार की है। लेकिन स्क्रॉल मीडिया पर स्वास्थ्य से ज्यादा एक एजेंडे के तहत विवादित मुद्दों की कवरेज ज्यादा होती है। स्वास्थ्य की जगह शरजील इमाम और उमर खालिद की रिहाई को लेकर आवाजें उठाई जाती हैं।

2025 में CJP प्रवक्ता सौरव दास वर्ल्ड एक्सप्रेशन फोरम में हुए थे शामिल
ठाकुर फाउंडेशन द्वारा वित्तपोषित एक और आप (AAP)/सीजेपी (CJP) प्रवक्ता, सौरव दास, 2025 में नॉर्वे के लिलेहम्मर में आयोजित वर्ल्ड एक्सप्रेशन फोरम (WEXFO) में शामिल हुए थे। भारत के तथाकथित स्वतंत्र खोजी पत्रकार और पारदर्शिता कार्यकर्ता सौरव दास यंग एक्सपर्ट के रूप में शामिल हुए थे।  उसी समय ऑस्लो फ्रीडम फोरम भी आयोजित किया गया था। दोनों कार्यक्रमों में शामिल होने वाले लोग एक ही इकोसिस्टम का हिस्सा थे। 2025 में, ये दोनों कार्यक्रम एक के बाद एक (लगातार) आयोजित किए गए थे, जिससे अंतरराष्ट्रीय प्रतिभागियों के लिए दोनों में आसानी से भाग लेना संभव हो गया:

ऑस्लो फ्रीडम फोरम (OFF): 26 – 28 मई, 2025

वर्ल्ड एक्सप्रेशन फोरम (WEXFO): 2 – 3 जून, 2025 (4 जून को एक अतिरिक्त “WEXFO टेक एक्शन” दिवस के साथ)

दोनों कार्यक्रमों को रणनीतिक रूप से निर्धारित किया गया था, जिससे यह “नॉर्वे सर्किट” के लिए सुविधाजनक हो गया, जहाँ कार्यकर्ता और नेता ऑस्लो में OFF में भाग लेते हैं और फिर अगले सप्ताह WEXFO के लिए लिलहैमर की यात्रा करते हैं।

वर्ल्ड एक्सप्रेशन फोरम 2025 में कैसे पहुंचा सौरव दास ?
सौरव दास अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत विरोधी ताकतों से मिलता है। 2025 में नर्वे के वर्ल्ड एक्सप्रेशन फोरम पहुंचता है। वर्ल्ड एक्सप्रेशन फोरम (WEXFO) 2025 के प्रमुख आयोजक और नेतृत्वकर्ता मैड्स नूगार्ड (बोर्ड के अध्यक्ष) और क्रिस्टेन आइनारसन (संस्थापक व प्रबंध निदेशक) थे। यह वार्षिक सम्मेलन नॉर्वे के लिलेहमर शहर में आयोजित किया गया था। मैडस नायगार्ड नॉर्वे के जाने-माने प्रकाशक हैं। मैडस नायगार्ड ने नॉर्वे के प्रसिद्ध समाचार पत्र ‘डागा सविसिन’ के प्रशासनिक निदेशक (Managing Director/CEO) के रूप में कार्य किया है। वर्तमान में वह नॉर्वे के जाने-माने प्रकाशन गृह ‘अशेशौग’ (Aschehoug) के प्रमुख और मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO) के रूप में कार्यरत हैं। प्रधानमंत्री मोदी से सवाल पूछने वाली नॉर्वे की पत्रकार हेले लिंग (Helle Lyng) नॉर्वे के समाचार पत्र ‘डागा सविसिन’ (Dagsavisen) से जुड़ी हुई हैं। स्टेज पर सौरव और माइक पर हेल कोई संयोग नहीं है। यह पूरी तरह से स्क्रिप्टेड टूलकिट है। अब सवाल उठता है कि सौरव दास को वर्ल्ड एक्सप्रेशन फोरम (WEXFO) 2025 के मंच पर पहुंचाने वाला कौन है?

कैसे अराजकता पैदा कर सत्ता परिवर्तन की होती है फंडिंग और ट्रेनिंग ?
शासन परिवर्तन विशेषज्ञ सरदजा पोपोविक ने दुनिया भर में पेशेवर प्रदर्शनकारियों को प्रशिक्षित करने के लिए ‘कैनवास’ (CANVAS) नामक एक संगठन बनाया है, और USAID इस संगठन को वित्तपोषित (फंड) करता है। देखिए कि वे एक लेख में अपने प्रोजेक्ट को किस तरह उजागर कर रहे हैं। द सेंटर फॉर एप्लाइड नॉनवायलेंस एक्शन एंड स्ट्रैटेजीज (Center for Applied Nonviolent Action and Strategies) को जॉर्जिया में उसके ‘नागरिक समाज सहभागिता कार्यक्रम’ (Civil Society Engagement Program) के माध्यम से यू.एस. एजेंसी फॉर इंटरनेशनल डेवलपमेंट (USAID) द्वारा वित्तपोषित किया जाता है, जो 1 नवंबर 2021 से शुरू हुआ एक 5-वर्षीय कार्यक्रम है। यह कार्यक्रम 1.7 करोड़ डॉलर ($17 million) का है और इसे ईस्ट-वेस्ट मैनेजमेंट इंस्टीट्यूट द्वारा CANVAS, जिंक नेटवर्क, इंटरनेशनल सेंटर फॉर नॉट-फॉर-प्रॉफिट लॉ, यूरोपियन कम्युनिटी फाउंडेशन इनिशिएटिव, जॉन्स हॉपकिन्स यूनिवर्सिटी के सेंटर फॉर सिविल सोसाइटी स्टडीज, सेंटर फॉर ट्रेनिंग एंड कंसल्टेंसी, ग्लोबल कॉम्पैक्ट नेटवर्क जॉर्जिया, और नेटवर्क ऑफ सेंटर्स फॉर सिविक एंगेजमेंट की साझेदारी में लागू किया गया है। यह कार्यक्रम 31 अक्टूबर 2026 को पूरा होने वाला है।

दिमागी नक्सलियों के लिए बाइबिल है जीन शार्प की किताब 
जिस तरह भारत में जुलाई 2026 में दिल्ली के जंतर-मंतर और सड़कों पर कॉकरोच जनता पार्टी के प्रदर्शन के दौरान देखने को मिला, वहीं साल 2000 में सर्बिया के शासक स्लोबोदान मिलोसेविच के खिलाफ देखने को मिला। मिलोसेविच को हटाने के लिए वहां के छात्रों ने ‘ओटपोर’ (प्रतिरोध) आंदोलन शुरू किया था। उन्होंने जीन शार्प की किताब को अपनी मार्गदर्शिका बनाया। बोस्टन (अमेरिका) स्थित अल्बर्ट आइंस्टीन संस्थान के संस्थापक डॉ. जीन शार्प की प्रसिद्ध पुस्तक ‘From Dictatorship to Democracy’ (तानाशाही से लोकतंत्र तक) को दुनिया भर के अहिंसक आंदोलनों की ‘बाइबिल’ (यानी मार्गदर्शिका) कहा जाता है।

जीन शार्प ने अपनी किताब में अहिंसक संघर्ष के 198 तरीके (198 Methods of Nonviolent Action) बताए हैं। उन्होंने इन तरीकों को मुख्य रूप से तीन बड़े हिस्सों में बांटा है।
1. विरोध और अनुनय (Protest and Persuasion)
2. असहयोग (Noncooperation)
3. अहिंसक हस्तक्षेप (Nonviolent Intervention)

मजाकिया विरोध (Humor as a Weapon): वे शासक का मजाक उड़ाते हुए नुक्कड़ नाटक करते थे, जिससे पुलिस असमंजस में पड़ जाती थी कि उन्हें गिरफ्तार करे या नहीं।

सुरक्षा बलों का दिल जीतना: आंदोलनकारियों ने पुलिस और सेना पर हमला करने के बजाय उन्हें फूल दिए। नतीजा यह हुआ कि जब अंतिम विद्रोह हुआ, तो सेना ने जनता पर गोली चलाने से मना कर दिया।

एकजुट प्रतीक चिन्ह: उन्होंने एक ‘मुट्ठी’ (Clenched Fist) को अपना सिंबल बनाया, जो पूरे देश में दीवारों पर पेंट कर दिया गया। इससे शासक के मन में डर बैठ गया कि आंदोलन हर जगह फैल चुका है।

डॉ. जीन शार्प की  इस पुस्तक की अहिंसक संघर्ष के 198 तरीके से सर्बिया, जॉर्जिया, यूक्रेन और मिस्र सहित कई देशों में सत्ता परिवर्तन हुए हैं।

सर्बिया (2000): यहाँ के ‘ओटपोर!’ (Otpor!) युवा संगठन ने मिलोसेविच की तानाशाही को हटाने के लिए शार्प की रणनीतियों का इस्तेमाल किया, जिसे ‘बुलडोजर क्रांति’ कहा गया।

‘रोज़ रिवोल्यूशन’ (गुलाब क्रांति) के दौरान इसी पुस्तक के तरीकों से तत्कालीन राष्ट्रपति शेवार्डनाद्जे को सत्ता छोड़ने पर मजबूर किया गया।

यूक्रेन (2004): ‘ऑरेंज क्रांति’ (Orange Revolution) के दौरान वहाँ के ‘पोरा’ (PORA) आंदोलन के नेताओं ने शार्प की इस किताब को अपनी बाइबिल माना और सत्ता परिवर्तन किया।

मिस्र (2011): अरब स्प्रिंग के दौरान काहिरा के तहरीर स्क्वायर पर होस्नी मुबाफिर के शासन को पलटने वाले युवाओं (जैसे अप्रैल 6 यूथ मूवमेंट) ने भी इसी वैचारिक आधार का उपयोग किया था।

इस किताब की शुरुआत मूल रूप से 1993 में म्यांमार के असंतुष्टों के लिए ही लिखी गई थी और बाद में यह दुनिया के कई तानाशाही विरोधी संघर्षों तक पहुँची।

कृपया इस वीडियो को देखें। इसमें पेशेवर शासन परिवर्तन (रेजीम चेंज) करने वालों का विस्तृत पर्दाफाश किया गया है। 

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