मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे और मतदाता सूची के विशेष पुनरीक्षण (एसआईआर) को ढाल बनाकर संसद से सड़क तक अव्यवस्था फैलाने पर आमादा इंडी गठबंधन की हताशा अक्टूबर 2026 में पूरी तरह उजागर हो गई है। लगातार चुनावी शिकस्त झेल रहे राहुल गांधी, प्रियंका गांधी वाड्रा और उनके सहयोगी दलों के नेताओं ने जंतर-मंतर पर विरोध प्रदर्शन के नाम पर जमकर उपद्रव किया। प्रदर्शन के दौरान सुरक्षा व्यवस्था में मुस्तैद दिल्ली पुलिस के जवानों और महिला पुलिसकर्मियों के साथ की गई हिंसक धक्का-मुक्की, बैरिकेड तोड़ने के प्रयास और संवेदनशील परिसरों में जबरन घुसने की कोशिशों ने लोकतांत्रिक मर्यादाओं को तार-तार कर दिया है। स्वायत्त संवैधानिक संस्थाओं की साख पर निरंतर आघात करने के बाद अब कर्तव्य पथ पर तैनात वर्दीधारी सुरक्षाबलों को निशाना बनाना विपक्ष के दिशाहीन रवैये का स्पष्ट प्रमाण है। देश की जनता द्वारा बार-बार नकारे जाने के बाद संसद से सड़क तक केवल अराजकता पैदा करना ही अब विपक्ष का मुख्य एजेंडा बनकर रह गया है।
विपक्षी नेताओं और कार्यकर्ताओं ने ड्यूटी पर तैनात पुलिसकर्मियों से की बदसलूकी
जंतर-मंतर पर शांतिपूर्ण सत्याग्रह का दावा करने वाले विपक्षी नेताओं और कार्यकर्ताओं ने कानून-व्यवस्था संभाल रहे जवानों पर खुला आक्रोश निकाला। सुनियोजित रणनीति के तहत सुरक्षा घेरा तोड़ने, बैरिकेड्स गिराने और जवानों की वर्दी खींचने जैसी घटनाएं कैमरे में दर्ज हुईं। प्रतिबंधित क्षेत्रों और वीवीआईपी परिसरों की ओर जबरन बढ़ने का प्रयास करके विपक्षी नेताओं ने सीधे तौर पर विधि के शासन को खुली चुनौती दी। राजधानी की सड़कों पर दिन-रात सुरक्षा में तैनात जवानों के साथ इस तरह का आक्रामक बर्ताव यह दिखाता है कि राजनीतिक हताशा में डूबा विपक्ष अब कानून के रखवालों को ही निशाना बनाने पर उतर आया है। देश के सुरक्षाकर्मियों के सम्मान को ताक पर रखकर की गई यह हरकत पूरी तरह अक्षम्य और निंदनीय है।
जनता इन तस्वीरों को बहुत ध्यान से देख रही है कि कैसे राहुल गांधी और प्रियंका वाड्रा और कांग्रेस के पालतू समर्थक पुलिस को मार रहे है
जनता देख कर समझ रही है कि इन जाहिलों को सत्ता मिली तो हमारे साथ भी यही होगा।
जनता तय करेगी कि कांग्रेस आने वाले 20-25 साल तक सत्ता में नहीं आए
जनता नकली गांधी की इस हैवानियत का बदला लेकर रहेगी।
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https://t.co/gC5ST2JeF3
https://t.co/USpylesPTO https://t.co/DUEIMsKwbU— Dilip Jain (दिलीप जैन) 🇮🇳 (@dilipjain1979) October 7, 2026
प्रियंका वाड्रा ने महिला पुलिसकर्मी के पेट में कोहनी से वार किया
मंचों से ‘लड़की हूं, लड़ सकती हूं’ का नारा देने वाली प्रियंका गांधी वाड्रा और राहुल गांधी का असली चेहरा उस समय सामने आ गया जब उन्होंने ड्यूटी पर मुस्तैद सुरक्षाकर्मियों और महिला पुलिसकर्मियों के साथ सरेआम धक्का-मुक्की की। सामने आए वीडियो में साफ दिखा कि प्रियंका वाड्रा ने महिला पुलिसकर्मी के पेट में कोहनी से वार किया और सुरक्षाकर्मियों को पीछे धकेला। वर्दी का सम्मान पैरों तले कुचलने और सुरक्षा में लगी बेटियों पर हमला करने का यह कृत्य विपक्ष के खोखले नारी सम्मान और सामंती सोच को पूरी तरह उजागर करता है। देश की कानून-व्यवस्था संभालने वाली महिला जवानों के साथ इस तरह का हिंसक और अशोभनीय व्यवहार यह स्पष्ट करता है कि राजनीतिक हताशा में यह परिवार अब कानून और मर्यादा दोनों की सीमाएं लांघ चुका है।
दोनों भैय्या बहना में एक समानता हे दोनों फुल ड्रामेबाज हे और पुलिस कर्मीयो से अमानवीय व्यवहार इनके खून में हे।
ये किसी भी स्तर तक गिर सकते हे।🤬
प्रियंका वाड्रा ने महिला पुलिसकर्मी के पेट मे कोहनी मारी.. 😡🤬
अब ये दोनों बहन भाई सत्ता के लालच मे हिंसक हो गए हैँ https://t.co/UnjNtSd1sQ— राष्ट्रवादी 🚩सनातनी🚩 HiNdU (@HiNdU05019434) October 8, 2026
प्रियंका वाड्रा ने सुरक्षाकर्मी को धक्का देकर दिखाया वीआईपी अहंकार
सड़क पर कानून का पालन कराने में जुटे जवानों को खुलेआम धक्का देने का वीडियो सामने आने के बाद कांग्रेस की कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। ‘मोहब्बत की दुकान’ का नारा देने वालों का यह असली सामंती चेहरा है, जहां एक सुरक्षाकर्मी को केवल इसलिए धक्का दिया गया क्योंकि वह अपने संवैधानिक दायित्व का निर्वहन कर रहा था। जो नेता वर्दी का सम्मान नहीं कर सकते और खाकी को अपने पैरों तले कुचलना चाहते हैं, वे देश के शासन और कानून-व्यवस्था को संभालने का दावा करते हैं। यह वीडियो गवाही देता है कि गांधी परिवार के भीतर आज भी सत्ता का वीआईपी अहंकार किस कदर हावी है।
देखिए ‘मोहब्बत की दुकान’ वालों का असली ‘जहांगीरी’ चेहरा!
कांग्रेस ‘शहज़ादी’ प्रियंका वाड्रा का सुरक्षाकर्मी को ‘धक्का’ देना इस घमंडी खानदान का असली VIP अहंकार है
जो वर्दी की इज्ज़त पैर तले कुचलते हैं, वो देश चलाने के ख़्वाब देख रहे हैं?
शर्मनाक! https://t.co/7jfNtE0YGO
— Radhika Khera (@Radhika_Khera) October 6, 2026
गेट पर चढ़कर प्रियंका वाड्रा ने किया हाई वोल्टेज ड्रामा
प्रदर्शन के बाद हिरासत में लिए जाने की सामान्य कानूनी प्रक्रिया को भी विपक्षी नेताओं ने एक नाटकीय तमाशे में बदल दिया। किंग्सवे कैंप स्थित जिस हॉल में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी को हिरासत में रखा गया था, सांसद प्रियंका गांधी वाड्रा उस मुख्य गेट पर खुद चढ़ गईं। सुरक्षा नियमों और एक सांसद की गरिमामयी मर्यादा को दरकिनार कर गेट पर लटकने की यह तस्वीर बताती है कि कांग्रेस केवल मीडिया की सुर्खियां बटोरने के लिए किस स्तर तक जा सकती है। कानून लागू करने वाली एजेंसियों के काम में बाधा डालकर इस तरह का हाई वोल्टेज ड्रामा रचना सिर्फ और सिर्फ राजनीतिक हताशा का प्रदर्शन है।
सांसद प्रियंका गांधी वाड्रा किंग्स-वे कैंप के उस हॉल के गेट पर चढ़ गईं जहां नेता विपक्ष राहुल गांधी को हिरासत में लिए जाने के बाद रखा गया था
@RahulGandhi
@priyankagandhi
@INCIndia
@INCUttarPradesh https://t.co/G7NKnB5N7c— Alok Tiwari (@alokjitiwari) October 6, 2026
राहुल गांधी ने पुलिस को अपने नेताओं को हिरासत में लेने से जबरन रोका
सामने आई तस्वीरों और वीडियो फुटेज में यह साफ देखा जा सकता है कि नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी किस तरह कानून के पालन में सीधे अड़ंगा डाल रहे हैं। जब दिल्ली पुलिस शांति व्यवस्था बनाए रखने के लिए विपक्षी नेताओं को हिरासत में ले रही थी, तब राहुल गांधी खुद आगे आकर पुलिसकर्मियों से उलझते और उन्हें रोकने की हास्यास्पद कोशिश करते नजर आए। एक संवैधानिक पद पर बैठा व्यक्ति जब पुलिस को उसकी आधिकारिक ड्यूटी करने से रोके और बलप्रयोग के बीच व्यवधान डाले, तो यह कानून के शासन का खुला मखौल उड़ाना है। सुरक्षाबलों के साथ इस तरह की खींचतान न केवल गैर-जिम्मेदाराना है बल्कि यह दिखाती है कि विपक्ष खुद को कानून से ऊपर समझता है।
इन तस्वीरों को देखकर समझिए प्रदर्शन में कैसे नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी दिल्ली पुलिस को अपने नेताओं को उठाने से रोक रहे हैं।मज़ेदार विडियो है। https://t.co/U5zaz2h6q0
— Aadesh Rawal (@AadeshRawal) October 7, 2026
खुद हमलावर होकर पुलिस पर आरोप लगाने का विक्टिम कार्ड खेला
वीडियो फुटेज में साफ तौर पर देखा जा सकता है कि सुरक्षा घेरा तोड़ने और महिला पुलिसकर्मियों पर शारीरिक प्रहार करने की शुरुआत स्वयं विपक्षी नेताओं और कार्यकर्ताओं ने की। इसके बावजूद घटना के तुरंत बाद कांग्रेस प्रवक्ताओं ने उलटा पुलिस पर खरोंचने और दुर्व्यवहार करने का मनगढंत आरोप लगाना शुरू कर दिया। पहले खुद कानून तोड़ना, सुरक्षाकर्मियों से हिंसक उलझना और पकड़े जाने पर खुद को ही पीड़ित साबित करना विपक्ष का पुराना हथकंडा रहा है। यह विक्टिम कार्ड खेलने की रणनीति केवल जनता और मीडिया में झूठी सहानुभूति बटोरने के लिए अपनाई गई। अपनी आक्रामक और गैर-कानूनी हरकतों को छिपाने के लिए खाकी वर्दी को बदनाम करने का यह दोहरा आचरण अब पूरी तरह बेनकाब हो चुका है।
Bad words hurt, but words with bad intentions hurt more…
#DPUpdates
#RespectHerDignity https://t.co/XbDmSXuHvQ— Delhi Police (@DelhiPolice) October 8, 2026
राहुल गांधी ने बहन को आगे कर सड़क पर रचा सियासी ड्रामा
जंतर-मंतर और सड़कों पर हुआ यह पूरा हंगामा एक सुनियोजित राजनीतिक पटकथा के तहत रचा गया था। पहले प्रियंका वाड्रा को सड़क पर लिटाकर सहानुभूति बटोरने की साजिश रची गई और फिर ‘मेरी बहन है’ का भावुक राग अलापते हुए राहुल गांधी खुद पुलिसकर्मियों से उलझते नजर आए। सत्ता को अपना जन्मसिद्ध अधिकार समझने वाले ये दोनों नेता आज तक इस लोकतांत्रिक सच्चाई को स्वीकार नहीं कर पाए हैं कि देश की जनता ने एक गरीब मां के बेटे को पूर्ण विश्वास के साथ प्रधानमंत्री चुना है। जनहित के मुद्दों से कोसों दूर, केवल कैमरों के सामने टकराव की नौटंकी खड़ी कर देश का माहौल बिगाड़ना ही इस परिवार की पहचान बन चुका है।
राहुल गाँधी पहले अपनी बहन प्रियंका वाड्रा को सड़क पर एक षड्यंत्र के तहत लेटने को कहते हैं।
जब अक्ल काम किया तो बाद में कहते हैं कि मेरी बहन है वो… उसे हौसला देने के लिये वो आगे बढ़ते हैं और पुलिस वालों से उलझ जाते हैं…
अब पप्पू को कौन बताये कि जब नेतागिरी कराओगे और प्रोटेस्ट कराओगे तो ये सब करना पड़ेगा। इसे सहना पड़ेगा…
— khulasa India (@KhulasaIndia) October 8, 2026
मुख्य चुनाव आयुक्त पर दबाव बनाकर संस्था को ब्लैकमेल करने की कोशिश की
संवैधानिक प्रावधानों और निष्पक्ष लोकतांत्रिक व्यवस्था को ताक पर रखकर विपक्ष ने सीधे तौर पर मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की मांग उठाई, जो विशुद्ध संस्थागत दबाव बनाने की साजिश है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत कार्यरत निर्वाचन आयोग एक स्वायत्त संस्था है, जिसे किसी राजनीतिक दल के सड़क छाप दबाव से संचालित नहीं किया जा सकता। चुनाव में अनुकूल परिणाम न मिलने पर संवैधानिक संस्था के प्रमुख को सार्वजनिक रूप से धमकाना और इस्तीफा मांगना सीधे तौर पर ब्लैकमेलिंग की राजनीति है। संस्थाओं को डराकर अपने पक्ष में झुकाने का यह अलोकतांत्रिक प्रयास साबित करता है कि विपक्ष निष्पक्ष संस्थाओं की स्वतंत्रता को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं है।
घर-घर पसीना बहाने वाले बीएलओ कर्मियों और शिक्षकों के परिश्रम का किया अपमान
मतदाता सूची का विशेष पुनरीक्षण (एसआईआर) किसी बंद कमरे में तैयार नहीं होता, बल्कि इसमें राज्यों के लाखों प्राथमिक शिक्षक, आंगनवाड़ी कार्यकर्ता और स्थानीय बूथ लेवल अधिकारी (बीएलओ) कड़ी धूप में घर-घर जाकर सत्यापन करते हैं। विपक्ष ने मतदाता सूची पर निराधार आरोप लगाकर और इसे फर्जी बताकर वास्तव में उन लाखों निष्पक्ष, मेहनती शिक्षकों और सरकारी कर्मचारियों की सत्यनिष्ठा का अपमान किया है। स्थानीय स्तर पर दिन-रात मेहनत कर मतदाता सूची को शुद्ध बनाने वाले जमीनी कर्मियों के काम को कठघरे में खड़ा करना विपक्ष की संकीर्ण मानसिकता को दर्शाता है। अपने राजनीतिक स्वार्थ के लिए ईमानदार कर्मचारियों के मनोबल को चोट पहुंचाना किसी भी तरह उचित नहीं ठहराया जा सकता।
स्थानीय व्यापारियों और रेहड़ी-पटरी वालों की आजीविका पर पहुंचाया आघात
विपक्ष के इस हिंसक हंगामे और सघन बैरिकेडिंग का सबसे दर्दनाक असर मध्य दिल्ली के स्थानीय छोटे व्यापारियों, पटरी दुकानदारों और ऑटो चालकों पर पड़ा। कनॉट प्लेस, जनपथ, बाबा खड़क सिंह मार्ग और बंगाली मार्केट के आसपास रास्ते बंद होने से पूरा व्यापारिक केंद्र ठप हो गया और ग्राहकों की आवाजाही थम गई। जो विपक्षी नेता मंचों से गरीबों, कामगारों और छोटे व्यापारियों के हितैषी बनने का ढोंग करते हैं, उन्हीं के प्रायोजित उपद्रव ने दैनिक कमाने-खाने वाले निर्दोष लोगों की पूरे दिन की आजीविका छीन ली। अपनी राजनीतिक दुकान चमकाने के लिए गरीबों की रोटी पर संकट खड़ा करने वाली इस स्वार्थी राजनीति को राजधानी की आम जनता कभी माफ नहीं करेगी।
मोदी सरकार के विकास और आत्मनिर्भर भारत से हताश हुआ विपक्ष
विपक्ष की असली छटपटाहट यह है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत आज विश्व की पांचवीं बड़ी अर्थव्यवस्था बन चुका है और सबसे तेज गति से आगे बढ़ रहा है। जो देश कभी रक्षा खरीद में दलालों और घोटालों के लिए जाना जाता था, वह आज रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनकर विश्व के अनेक देशों को सैन्य साजो-सामान का निर्यात कर रहा है। लुटियंस की गलियों में दलाली का तंत्र बंद होने, जीएसटी जैसे पारदर्शी आर्थिक सुधारों और विश्वस्तरीय एक्सप्रेसवे, टनल और आधुनिक रेल नेटवर्क के निर्माण से हताश ताकतें अब बौखला गई हैं। अयोध्या में भव्य श्रीराम मंदिर और काशी विश्वनाथ धाम जैसे सांस्कृतिक पुनर्जागरण के दौर में भारत-विरोधी शक्तियां किसी भी बहाने से देश में अस्थिरता फैलाने का षड्यंत्र रच रहे हैं, जिसे सजग जनता कभी सफल नहीं होने देगी।
लड़की हूं लड़ सकती हूं का नारा देनी वाली प्रियंका वाड्रा और उनके भाई राहुल गांधी अब महिला पुलिसकर्मियों और अधिकारियों को कोहनी से मारते हुए एवं धक्का मुक्की करते हुए दिख रहे हैं
अब अगर इन पुलिस कर्मियों और अधिकारियों ने क्रिया की प्रतिक्रिया दे दी तो दोनों भाई बहन फर्जी RR शुरू कर देंगे
इन दोनों को लगता है कि भारत पर राज करना इनका जन्मसिद्ध अधिकार है
ये दोनों भाई बहन और इनको मां आज तक इस बात को नहीं पचा पाए हैं कि देश का प्रधानमंत्री एक गरीब माँ का बेटा कैसे बन गया
इनको इस बात से भी बहुत समस्या है कि देश जनप्रिय लोकप्रिय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदीजी के नेतृत्व में लगातार प्रगति के पथ पर अग्रसर है
कांग्रेस की सरकार में विश्व की लड़खड़ाती हुए 11वीं अर्थव्यवस्था से आज भारत विश्व में प्रथम 5 अर्थव्यवस्थाओं में पहुंच गई है।
आज भारत विश्व की सबसे तेज गति से बढ़ने वाली अर्थव्यवस्था है
यही कारण है कि ये विदेशी मां से उत्पन्न भाई बहन और उनकी विदेशी मां को आज भारत सुदृढ़ होता अच्छा नहीं लग रहा है
क्या इसके पीछे कोई विदेशी भारत विरोधी शक्तियों का भी हाथ है? भारत सरकार को इसकी कठोरता से जांच करानी चाहिए
भारत आज रक्षा क्षेत्र में धीरे धीरे आत्मनिर्भर बन रहा है, आज भारत अपने सैन्य साजो सामान विश्व के अनेक देशों को निर्यात भी कर रहा है।
हम सभी ने वो दौर भी देखा है जब दिल्ली की लुटियंस की गलियों में Defence Agent नाम से अनेक देश विदेश के दलाल सक्रिय रहते थे, हमे यह भी नहीं भूलना चाहिए कि Augusta Westland Helicopter घोटाले में इटली की कोर्ट ने इस कंपनी के लोगों को सजा सुनाई थी कि उन्होंने इस डील के लिए भारत में अनेक नेताओं और पत्रकारों को घूस दी थी।
भारत में एक ईमानदार नेता के प्रधानमंत्री बनने के बाद से इन सभी दलालों और इनके आकाओं की दलाली की कमाई बंद हो गई है
आग भारत विश्व में धार्मिक आध्यात्मिक चेतना का केंद्र बन रहा है, आज काशी विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग में भव्य मंदिर, अयोध्या में प्रभु श्री राम का भव्य मंदिर , सोमनाथ मंदिर का भव्य कॉरिडोर सहित अनेक मंदिरों का जीर्णोद्धार भारत की सनातन संस्कृति के जागृत होने का स्पष्ट संकेत है।
आज भारत GST जैसे कर सुधारों को लागू करके, विश्व स्तरीय एक्सप्रेसवे, टनल, हाइड्रोजन ट्रेन, बुलेट ट्रेन इत्यादि अनेक विश्व स्तरीय इंफ्रास्ट्रक्चर निर्माणों को कर रहा है जो भविष्य के विकसित भारत की आधारशिला है।
यही सब कारण है कि किसी ना किसी बहाने से विदेशी ताकतें भारत में अराजकता फैलाने का कुचक्र रच रहे हैं
भारत का जनमानस इन देश विरोधी शक्तियों को पहचानता है और इनके कुचक्रों को ध्वस्त करके भारत की विजय पताका फहरा रहा है
वंदे मातरम् 🇮🇳
जय हिंद जय भारत 🇮🇳— अर्पित मिश्र (@arpitmishraBJP) October 8, 2026
लगातार चुनावी हार के बाद चुनाव आयोग पर साधा निशाना
इंडी गठबंधन का यह आक्रामक रुख सीधे तौर पर भारत निर्वाचन आयोग जैसी स्वायत्त और निष्पक्ष संस्था की साख पर आघात करने का सुनियोजित एजेंडा है। जब भी जनता मतदान के जरिए विपक्ष के नकारात्मक एजेंडे को नकारती है, यह गठबंधन कभी अदालतों, कभी ईवीएम और अब मतदाता सूची पुनरीक्षण प्रक्रिया पर निराधार आरोप लगाने लगता है। आयोग के अनुसार विशेष पुनरीक्षण (एसआईआर) पूरी तरह पारदर्शी, तकनीक आधारित और सर्वदलीय बूथ लेवल एजेंटों की सक्रिय सहभागिता से चलने वाली विधिक प्रक्रिया है। इसके बावजूद संवैधानिक संस्था के प्रमुख के इस्तीफे की असंवैधानिक मांग करना केवल अपनी खिसकती जमीन से ध्यान भटकाने का बहाना है। लगातार पराजय के बाद संस्थाओं को कटघरे में खड़ा करने की यह पुरानी आदत अब लोकतंत्र के लिए गंभीर खतरा बन चुकी है।
पारदर्शी मतदाता सूची और डिजिटल सुधारों का किया विरोध
भारत का चुनाव आयोग जब डिजिटल सत्यापन और सटीक मैपिंग के जरिए फर्जी प्रविष्टियों को हटाकर मतदाता सूची को पूरी तरह पारदर्शी बना रहा है, तब विपक्ष आधुनिक सुधारों की राह में रोड़े अटका रहा है। तकनीकी पारदर्शिता का विरोध कर पुरानी खामियों और विवादों की वकालत करना यह दर्शाता है कि विपक्ष डिजिटल भारत की प्रगति को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं है। दशकों तक फर्जी मतदान और गफलत की राजनीति के सहारे चुनावी नैया पार लगाने वाले दल आज आधुनिक और पारदर्शी व्यवस्था से घबरा रहे हैं। चुनाव सुधारों पर सहयोग देने के बजाय सड़कों पर भ्रम फैलाना यह साबित करता है कि विपक्ष को निष्पक्ष चुनाव नहीं, बल्कि अव्यवस्था पसंद है। तकनीकी प्रगति से पारदर्शी होते लोकतंत्र पर यह विरोध पूरी तरह आधारहीन है।
फर्जी वोटबैंक बिखरने के डर से उपद्रव पर उतरा इंडी गठबंधन
मतदाता सूची के विशेष पुनरीक्षण से विपक्षी दलों में मची वास्तविक बेचैनी इस बात से है कि आधुनिक तकनीक और सत्यापन से उनका पारंपरिक फर्जी वोटबैंक ध्वस्त हो रहा है। फर्जी प्रविष्टियों, एक ही मतदाता के कई स्थानों पर नाम और अवैध प्रवासियों के अवैध पंजीकरणों को हटाने की पारदर्शी प्रक्रिया विपक्ष के चुनावी गणित को बिगाड़ रही है। दशकों तक तुष्टिकरण और बोगस वोटिंग के सहारे चुनावी लाभ लेने वाली ताकतें अब पारदर्शी सूची को अपने अस्तित्व के लिए खतरा मान रही हैं। यही कारण है कि चुनावी सुधारों का स्वागत करने के बजाय विपक्ष सड़कों पर उतरकर पूरी प्रक्रिया को विवादित बनाने की साजिश रच रहा है। यह छटपटाहट लोकतंत्र को बचाने की नहीं, बल्कि अपने सिकुड़ते वोटबैंक को बचाने की है।
बाबा साहेब आंबेडकर की नसीहत भूलकर सड़क पर फैलाई अराजकता
संविधान की प्रति हाथ में लेकर घूमने वाले विपक्षी नेता बाबा साहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर के मूल विचारों की सरेआम धज्जियां उड़ा रहे हैं। संविधान सभा के अपने ऐतिहासिक अंतिम भाषण में डॉ. आंबेडकर ने स्पष्ट चेतावनी दी थी कि जब संवैधानिक और कानूनी रास्ते उपलब्ध हों, तब सड़क पर असहयोग और सविनय अवज्ञा का रास्ता चुनना केवल ‘अराजकता का व्याकरण’ कहलाता है। आज जब संसद और स्वतंत्र न्यायपालिका के दरवाजे पूरी तरह खुले हैं, तब सड़कों पर पुलिस पर हमला करना और उपद्रव मचाना संविधान विरोधी आचरण है। खुद को संविधान का स्वयंभू रक्षक बताने वाला इंडी गठबंधन उसी संविधान निर्माता के सिद्धांतों को कुचलकर देश में राजनीतिक अस्थिरता फैलाने की जिद पर अड़ा है।
संसद में सकारात्मक बहस से बचकर सड़क पर किया प्रदर्शन
मतदाता सूची और चुनावी प्रक्रियाओं से जुड़े किसी भी विषय पर संसद के पटल पर तर्कसंगत बहस करने और सरकार से सवाल पूछने के पर्याप्त संवैधानिक अवसर उपलब्ध हैं। इसके बावजूद विधायी मंचों से दूरी बनाकर सड़कों पर अवरोध खड़ा करना साबित करता है कि विपक्ष के पास तर्कों और ठोस आंकड़ों का भारी अभाव है। संसद में रचनात्मक भागीदारी निभाने के बजाय सदन का बहिष्कार करना और सड़क पर उपद्रव मचाना विधायी गरिमा का खुला अपमान है। जब भी देश के नीतिगत मुद्दों पर चर्चा की बात आती है, विपक्षी दल भाग खड़े होते हैं और केवल हंगामे के बल पर मीडिया स्पेस हथियाना चाहते हैं। इस प्रकार की संसदीय अनुशासनहीनता लोकतंत्र को मजबूत करने के बजाय कमजोर करती है।
सड़कें जाम कर राजधानी के आम नागरिकों को किया परेशान
विपक्ष के इस गैर-जिम्मेदाराना और उग्र प्रदर्शन का सीधा खामियाजा राजधानी के निर्दोष नागरिकों को भुगतना पड़ा। जंतर-मंतर, संसद मार्ग, आईटीओ और कनॉट प्लेस के आसपास व्यापक रूट डायवर्जन और सड़क जाम के कारण दफ्तर जाने वाले कर्मचारियों, स्कूली छात्रों और आपातकालीन एंबुलेंस सेवाओं को घंटों फंसे रहना पड़ा। राजनीतिक लाभ और व्यक्तिगत स्वार्थ के लिए आम करदाताओं और रोजमर्रा के यात्रियों की दिनचर्या को बंधक बनाना विपक्ष की असंवेदनशील कार्यशैली को दर्शाता है। दिल्ली की जीवनरेखा को रोककर अपनी राजनीति चमकाने का यह प्रयास आम नागरिकों के बुनियादी अधिकारों पर सीधा प्रहार है। जनता को परेशान करके हासिल की जाने वाली सियासत को देश कभी स्वीकार नहीं कर सकता।
Rahul Gandhi Cafe से निकल कर राजघाट की तरफ जाने के लिए सभी सांसद के साथ बस मे बैठने की कोशिश कर रहे हैं और दूसरी तरफ कनॉट प्लेस का आउटर सर्किल पूरा ट्राफिक जाम हो चुका है..8 October https://t.co/u0lpyBjxgL
— Vkr (Rewari,HR.) (@vkr76767) October 8, 2026
राजनीतिक नौटंकी के नाम पर जनता की गाढ़ी कमाई लुटाई
एक दिन के राजनीतिक ड्रामे के लिए राजधानी में सुरक्षा और यातायात नियंत्रण के नाम पर सरकारी मशीनरी को झोंकना पड़ा, जिससे जनता के पैसे की भारी बर्बादी हुई। हजारों पुलिसकर्मियों, त्वरित कार्यबल (आरएएफ) की तैनाती, मल्टी-लेयर बैरिकेडिंग और ड्रोन निगरानी पर होने वाला खर्च सीधे तौर पर देश के ईमानदार करदाताओं की जेब से जाता है। जिस प्रशासनिक क्षमता का उपयोग अपराध नियंत्रण और नागरिक सुविधाओं के लिए होना चाहिए, उसे विपक्ष के उपद्रव को शांत करने में लगाना पड़ा। अपनी निजी और दलगत महत्त्वाकांक्षाओं की पूर्ति के लिए सार्वजनिक संसाधनों का इस तरह दुरुपयोग करना घोर आर्थिक और प्रशासनिक अपराध है।
अदालतों का दरवाजा छोड़कर सड़क पर फैसला थोपने की कोशिश की
यदि विपक्ष को मतदाता सूची पुनरीक्षण प्रक्रिया या निर्वाचन तंत्र पर कोई वास्तविक तकनीकी आपत्ति थी, तो देश में पारदर्शी न्यायिक व्यवस्था और सक्षम अदालतें हमेशा खुली हैं। विधिक मंचों पर साक्ष्य आधारित याचिका दायर करने के बजाय सड़कों पर आकर कानून हाथ में लेना यह स्पष्ट करता है कि विपक्ष को देश की न्याय प्रणाली पर भी भरोसा नहीं रहा। लोकतांत्रिक व्यवस्था में विवादों का हल संविधान और कानून के दायरे में होता है, न कि सड़क पर बलप्रयोग और नारेबाजी के जरिए। अदालत जाने की जगह उपद्रव का रास्ता चुनना यह सिद्ध करता है कि उनके पास कोई वैधानिक आधार नहीं है और वे केवल राजनीतिक सनसनी फैलाना चाहते हैं।
वर्दीधारियों पर हमला कर सुरक्षाबलों के मनोबल पर किया प्रहार
दिल्ली पुलिस केवल राष्ट्रीय राजधानी की कानून-व्यवस्था की रक्षक नहीं है, बल्कि देश के अति-संवेदनशील प्रतिष्ठानों और संप्रभुता की सुरक्षा पंक्ति का प्रमुख हिस्सा है। राजनेताओं द्वारा अपने कार्यकर्ताओं को भड़काकर कर्तव्य पर तैनात सुरक्षाकर्मियों पर हिंसक हमले कराना आंतरिक सुरक्षा ढांचे को सीधी चोट पहुंचाना है। जब वर्दीधारी जवानों के साथ सरेआम धक्का-मुक्की की जाती है और उनकी गरिमा को तार-तार किया जाता है, तो यह देश की सुरक्षा में लगे लाखों जवानों के मनोबल पर सीधा आघात करता है। अपनी राजनीतिक रोटियां सेकने के लिए वर्दी का अपमान करना राष्ट्रीय सुरक्षा हितों के साथ खिलवाड़ है जिसे कोई भी जिम्मेदार समाज सहन नहीं कर सकता।
शाबास दिल्ली पुलिस!
और मारो इन जाहिलों को…
धूर्त मक्कारी,गद्दारी सीख ली और चले आए प्रोटेस्ट करने.महिला पुलिस को चाहिए ऐसी पागल,बिगड़ैल औलादों से निपटने के लिए बाल छोटे रखें और
छोटे बेंत का प्रयोग अवश्य करें 🙏Every FIR
राहुल गांधी जंतर मंतर
प्रियंका गांधी सड़क https://t.co/KBxx6jFtyB— अनिल भारद्वाज (@Anil000789) October 7, 2026
अंदरूनी फूट और सीट विवाद से ध्यान भटकाने के लिए रचा स्वांग
जंतर-मंतर पर दिखाई गई यह बनावटी एकजुटता वास्तव में इंडी गठबंधन के घटक दलों के बीच जारी भीषण आंतरिक कलह और अविश्वास को छिपाने का आवरण मात्र है। आगामी चुनावों में सीट बंटवारे को लेकर विपक्षी दलों में मची खींचतान, आपसी विरोधाभास और राज्यों में एक-दूसरे के खिलाफ जारी बयानबाजी से मीडिया का ध्यान भटकाने के लिए यह साझा मंच तैयार किया गया। अपने कार्यकर्ताओं के गिरते मनोबल को संभालने और बिखरते गठबंधन को एक सूत्र में दिखाने के लिए यह प्रदर्शन केवल एक छलावा था। जनता भली-भांति जानती है कि जिन दलों के विचार और नीतियां एक नहीं हैं, उनका यह सड़क-गठबंधन केवल अपनी राजनीतिक जमीन बचाने का हताश प्रयास है।
आपातकाल लगाने वालों ने दिया लोकतांत्रिक संस्थाओं पर उपदेश
आपातकाल थोपकर संविधान की आत्मा को कुचलने, न्यायपालिका की स्वायत्तता को सीमित करने और जांच एजेंसियों को अपने राजनीतिक स्वार्थ के लिए इस्तेमाल करने का लंबा इतिहास रखने वाले दल आज संस्थागत मर्यादाओं का उपदेश दे रहे हैं। दशकों तक सत्ता में रहकर चुनावी प्रणाली को अपनी सुविधानुसार चलाने वाले परिवारवादी दलों का यह नैतिक रुख पूरी तरह हास्यास्पद है। जब भी सत्ता इनके हाथों से निकलकर जनता के जनादेश से सुशासन की ओर बढ़ती है, ये संस्थाओं को कठघरे में खड़ा करने लगते हैं। इतिहास गवाह है कि लोकतंत्र को सबसे बड़ा नुकसान उन्हीं ताकतों ने पहुंचाया है जो आज सड़क पर खड़े होकर संविधान बचाने का ढोंग रच रही हैं।
आपातकाल थोपने वाले भूल गए कि 2026 में खाकी संयम की मिसाल है
साल 1975 में जब तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने देश पर आपातकाल थोपा था, तब व्यवस्था बनाए रखने के नाम पर पुलिस और सत्ता के दुरुपयोग की दलीलें दी गई थीं। लेकिन यह वर्ष 2026 का लोकतांत्रिक भारत है, जहां मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे और तथाकथित ‘वोट चोरी’ का बहाना बनाकर राहुल गांधी और कांग्रेस पार्टी लगातार सड़कों पर उपद्रव मचा रही है। आज दिल्ली पुलिस, आईटीबीपी और आरएएफ के जवानों को विपक्ष के बड़े-छोटे नेताओं की लातें, कोहनियां और गालियां तक सहनी पड़ रही हैं, फिर भी सुरक्षाबल असाधारण संयम का परिचय दे रहे हैं। शांतिपूर्ण प्रदर्शन की आड़ में वर्दीधारियों को पीटना और सड़क पर गिराना विपक्ष के विरोध की नई और हिंसक भाषा बन चुकी है। खाकी को अपना निशाना बनाकर और प्रतिबंधों की दुहाई देकर विक्टिम कार्ड खेलने वाली कांग्रेस को समझना होगा कि लोकतंत्र में वर्दी पर हाथ उठाने का अधिकार किसी भी राजनीतिक दल को नहीं है।
पुलिस सरकार की होती है। खाकी किसी के भी विचार, व्यवहार, विपत्ति, आपत्ति या उत्पत्ति से प्रभावित नहीं होती है। पुलिस सत्ता चलाती है। इसको दोनों ही अर्थ में समझा जा सकता है। एक तो ये कि पुलिस सरकार के आदेशों का ही अनुसरण करती है, लेकिन दूसरा ये भी कि अगर पुलिस ऐसा न करे तो सरकार रहेगी भी नहीं। प्रदर्शन की आग व्यवस्था को खाक कर देती है और देश में व्यवस्था बनाए रखना ही सरकार का सबसे ज़रूरी कर्तव्य है। पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने जब साल 1975 में EMERGENCY लगाई थी तो कुछ यही दलील दी गई थी।
लेकिन ये 2026 है। Vote Chori और CEC Gyanesh Kumar के इस्तीफे की मांग के साथ दिल्ली में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी, पूरी कांग्रेस पार्टी साथ ही कुछ अन्य विपक्षी दल लगातार प्रदर्शन कर रहे हैं। इस प्रदर्शन से निबटने में पुलिस को बहुत दिक्कत हो रही है। बड़े नेता से नेता से लेकर छोटे नेताओं तक की कुहनी और लात पुलिस की वर्दी पर पड़ रही है। वर्दी संभाले पुलिस वाले सड़क पर गिर जा रहे हैं। गरियाये जा रहे हैं, पीट दिए जा रहे हैं।
दिल्ली के प्रदर्शनों की भाषा अब शायद यही रहने वाली है। अब तो दिल्ली पुलिस, ITBP और RAF के लोगों को भी समझ आ गया है कि वर्दी में चांटा भी सह जाना होगा। क्योंकि यहां कोई EMERGENCY नहीं है, यही लोकतंत्र के प्रदर्शन की अब नई भाषा है और इस भाषा को गढ़ा भी शायद दिल्ली पुलिस ने ही है, 20 जुलाई के रोज़।
ये भाषा गलत है, ये हर ज़ुबान कहेगी लेकिन ये सवाल भी पूछा जाना चाहिए कि कांग्रेस के लिए जंतर मंतर का रास्ता बंद क्यों है?
#electioncommission #gyaneshkumar #delhipolice #votechori #congress #RahulGandhi
— Bharat Suraj भारत सूरज (@bharatsuraj01) October 7, 2026
युवाओं को विकास की राह से भटकाकर नकारात्मक राजनीति में धकेला
वर्ष 2026 का जागरूक भारत जब स्टार्टअप्स, उच्च तकनीक, आर्थिक सशक्तिकरण और विकसित भारत के विजन के साथ आगे बढ़ रहा है, तब विपक्ष युवाओं को अराजकता की ओर धकेलने पर तुला है। सड़कों पर झूठे नैरेटिव खड़े करके, काल्पनिक भय दिखाकर और संस्थाओं के प्रति अविश्वास पैदा कर युवाओं की ऊर्जा को नकारात्मकता में झोंकने का यह प्रयास देश के भविष्य के साथ खिलवाड़ है। प्रगतिशील और विकासोन्मुख एजेंडे पर चर्चा करने के बजाय युवाओं को उपद्रव का माध्यम बनाना विपक्ष की दिशाहीन सोच को रेखांकित करता है। देश की युवा पीढ़ी अब इस नकारात्मक और प्रतिगामी राजनीति को पूरी तरह खारिज कर चुकी है।
वैश्विक मंचों पर भारत की छवि बिगाड़ने का षड्यंत्र रचा
ऐसे समय में जब भारत वैश्विक स्तर पर एक सशक्त लोकतांत्रिक और आर्थिक शक्ति के रूप में अपनी मजबूत पहचान सुदृढ़ कर रहा है, देश की सबसे प्रतिष्ठित चुनावी संस्था पर बार-बार बेबुनियाद सवाल उठाना बेहद गंभीर मामला है। विदेशी मंचों और अंतरराष्ट्रीय मीडिया में भारत-विरोधी नैरेटिव खड़ा करने के लिए विपक्ष जानबूझकर अपनी ही संवैधानिक संस्थाओं को लांछित करने का प्रयास कर रहा है। दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की साख पर प्रश्नचिह्न खड़ा करने की यह प्रवृत्ति पूरी तरह राष्ट्रीय हितों के प्रतिकूल है। अपनी संकीर्ण राजनीतिक महत्त्वाकांक्षाओं के लिए देश की वैश्विक प्रतिष्ठा को दांव पर लगाना किसी भी जिम्मेदार राजनीतिक दल को शोभा नहीं देता। विदेशी ताकतों को देश के आंतरिक मामलों में बोलने का अवसर देना विपक्ष का अक्षम्य अपराध है।
जनहित के मुद्दों को छोड़कर मीडिया कैमरों के लिए ड्रामेबाजी
जंतर-मंतर पर आयोजित यह पूरा जमावड़ा जनहित के बुनियादी मुद्दों से कोसों दूर केवल कैमरों के सामने सुर्खियां बटोरने का एक सुनियोजित तमाशा था। पहले से तय पटकथा के अनुसार बैरिकेड्स पर धक्का-मुक्की करना, मीडिया को बाइट देना और फिर मुस्कुराते हुए हिरासत में जाने का ड्रामा रचना राहुल गांधी और उनके सहयोगियों की पुरानी कार्यशैली बन चुकी है। जनता के वास्तविक सरोकारों, विकास और सुरक्षा से इनका कोई लेना-देना नहीं है। भ्रष्टाचार के मामलों और परिवारवादी राजनीति के अस्तित्व संकट से घिरे नेता केवल अपनी प्रासंगिकता बचाए रखने के लिए यह प्रपंच रच रहे हैं। जनता अब इस ड्रामेबाजी और जमीन से कटे नेताओं के दोहरे रवैये को पूरी तरह पहचान चुकी है।
हिंसक प्रदर्शन पर भाजपा का तीखा हमला, कहा जनता देगी कड़ा जवाब
भारतीय जनता पार्टी ने इस हिंसक प्रदर्शन की कड़े शब्दों में निंदा करते हुए इसे हताशा से उपजी सड़क-छाप अराजकता बताया है। भाजपा प्रवक्ताओं ने कहा कि जो दल दशकों तक संस्थाओं को अपनी निजी जागीर समझते रहे, वे आज स्वतंत्र और पारदर्शी संवैधानिक व्यवस्था को पचा नहीं पा रहे हैं। ड्यूटी पर तैनात जवानों और महिला पुलिसकर्मियों के साथ की गई बर्बरता अक्षम्य है और कानून तोड़ने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जानी चाहिए। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में देश सुशासन, विकास और संस्थागत मजबूती की ओर तेजी से बढ़ रहा है, जबकि विपक्ष नकारात्मक राजनीति के कारण जनता की नजरों में पूरी तरह बेनकाब हो चुका है। देश की जागरूक जनता आगामी चुनावों में विपक्ष को इस अराजकता का कड़ा सबक सिखाएगी।
हिंसा ही कांग्रेस का असली चेहरा है। प्रदर्शन की आड़ में देश की राजधानी की सड़कों पर नौटंकी की जा रही है, अराजकता फैलाई जा रही है।
सत्ता का लालच इतना खूंखार है, कि ये जनता को ही पीटने पर उतर आए हैं!
— BJP (@BJP4India) October 8, 2026
उपद्रव और टकराव से नहीं, बल्कि जनविश्वास से चलती है राजनीति
जंतर-मंतर पर हिंसक प्रदर्शन की घटना ने एक बार फिर साफ कर दिया है कि जनसमर्थन पूरी तरह खो चुका विपक्ष अब सड़क पर टकराव पैदा कर अपनी उपस्थिति दर्ज कराने की फिराक में है। लोकतांत्रिक अधिकार कभी भी सुरक्षाकर्मियों पर हमले, बैरिकेड्स तोड़ने और संवैधानिक संस्थाओं को धमकाने की खुली छूट नहीं देते। वर्ष 2026 का जागरूक और आत्मनिर्भर भारत विकास, सुशासन और राष्ट्रीय एकता की राजनीति का पक्षधर है, न कि सड़कों पर होने वाले ड्रामे का। वर्दीधारी जवानों और लोकतांत्रिक संस्थाओं को निशाना बनाने वाला यह नकारात्मक रवैया विपक्ष को जनता से और अधिक दूर कर देगा। राजनीति सड़कों पर उपद्रव करने से नहीं, बल्कि जनता के दिलों में विश्वास और सेवा भाव जगाने से चलती है।









