कभी पश्चिम बंगाल की राजनीति में अजेय दिखाई देने वाली ममता बनर्जी और उनकी पार्टी तृणमूल कांग्रेस के सामने आज चुनौतियों का अंबार खड़ा होता नजर आ रहा है। जिस राजनीतिक संगठन ने तीन दशक पुराने वाम शासन को समाप्त कर बंगाल की सत्ता पर कब्जा किया था, उसी संगठन के भीतर आज असंतोष, गुटबाजी, अंतर्कलह और ममता के नेतृत्व को लेकर सवाल उठने लगे हैं। विपक्ष तो लगातार टीएमसी पर हमलावर है, लेकिन पार्टी के अंदर से और तेज विरोध के स्वर सुनाई देने लगे हैं। यह भी सच है कि लगातार मिल रहे राजनीतिक झटके ममता बनर्जी के लिए चेतावनी की घंटी हैं। विधानसभा चुनाव में करारी हार, सत्ता से बेदखली, विधायकों और सांसदों की टूट के बाद अब नेता प्रतिपक्ष पद भी ममता से हाथ से छूट गया है। टीएमसी की अंतर्कलह के बीच हाई कोर्ट से झटका मिला है। कोर्ट ने विधानसभा स्पीकर रथिन बोस के उस फैसले पर अंतरिम रोक लगाने से इनकार कर दिया, जिसमें उन्होंने बागी टीएमसी विधायक ऋतब्रत बनर्जी को विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष के रूप में मान्यता दी थी।
ममता के अहंकार से सांसदों-विधायकों में नाराजगी, संगठन में कलह
ममता बनर्जी की रणनीति केवल बंगाल तक सीमित नहीं थी, बल्कि उनकी नजर राष्ट्रीय राजनीति के उस शून्य पर भी थी, जो कांग्रेस की कमजोरी के कारण पैदा हुआ था। वे इंडी गठबंधन में राहुल गांधी को हटाकर उनका स्थान लेने का ख्वाब संजोए हुए थीं, लेकिन बदले हुए राजनीतिक घटनाक्रम, पार्टी के भीतर बढ़ती चुनौतियां, नेताओं की नाराजगी और संगठनात्मक अस्थिरता ने उनकी इस राजनीतिक महत्वाकांक्षा के बजाए खुद को बनाए रखना का संकट खड़ा कर दिया है। राजनीति में किसी भी दल की असली ताकत उसकी चुनावी जीत के साथ-साथ संगठनात्मक एकजुटता होती है। लेकिन हाल के समय में टीएमसी को कई ऐसे झटके लगे हैं, जिन्होंने यह संदेश देने की कोशिश की है कि पार्टी के भीतर सब कुछ सामान्य नहीं है। चुनावी चुनौतियों से लेकर सांसदों-विधायकों की नाराजगी, संगठन के अंदर मतभेद, विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष के पद को लेकर विवाद और अब ममता बनर्जी की सुरक्षा व्यवस्था में बदलाव जैसे घटनाक्रमों ने बंगाल की राजनीति को और गरमा दिया है।
आइए, देखते हैं कि टीएमसी की उल्टी पड़ी सियासत में ममता बनर्जी का क्या-क्या झटके मिल रहे हैं…
झटका नंबर 1: करारी चुनावी पराजय ने बढ़ाई राजनीतिक चिंता
ममता बनर्जी की राजनीति का आधार हमेशा उनकी जनसभाओं में दिखाई देने वाला जनसमर्थन और चुनावी सफलता रही है। लेकिन हाल के राजनीतिक संघर्षों में टीएमसी को कई मोर्चों पर विपक्ष की कड़ी चुनौती का सामना करना पड़ा। विपक्ष लगातार यह दावा करता रहा है कि बंगाल में ममता सरकार के खिलाफ माहौल बन रहा है और आगामी चुनावों में टीएमसी की राह आसान नहीं होगी। विधानसभा चुनाव में विपक्ष की बात सौ फीसदी सच साबित हुई। बीजेपी ने टीएमसी को लगभग रौंदते हुए पश्चिम बंगाल में अपनी शानदार सरकार बनाई। करीब डेढ़ दशक के बाद ममता बनर्जी सत्ताविहीन हो गई हैं।
झटका नंबर 2: विधायकों की नाराजगी और अंतर्कलह की खुली तस्वीर
किसी भी क्षेत्रीय दल की मजबूती उसके विधायकों और जमीनी नेतृत्व पर निर्भर करती है। बंगाल में टीएमसी के भीतर कई बार नेताओं के बीच मतभेद और गुटीय राजनीति की खबरें सामने आती रही हैं। जब पार्टी के भीतर ही नेतृत्व को लेकर मतभेद सार्वजनिक होने लगें तो यह किसी भी राजनीतिक संगठन के लिए चिंता का विषय बन जाता है। ममता बनर्जी की टीएमसी ने विधानसभा चुनाव 2026 में केवल 80 विधायक ही जीते थे। इसमें से भी 58 विधायक ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व वाले बागी गुट के साथ खड़े हुए और विधानसभा स्पीकर को पत्र देकर उन्हें अपना नेता घोषित करने की मांग की। यह टीएमसी विधायक दल का लगभग 72.5% हिस्सा था। बनर्जी अब नेता प्रतिपक्ष बन गए हैं।
झटका नंबर 3: सांसदों की टूट ने बढ़ाई ममता बनर्जी की बेचैनी
विधानसभा चुनावों में मिली हार के बाद तृणमूल कांग्रेस के भीतर का असंतोष ज्वालामुखी की तरह फट पड़ा। टीएमसी के 28 लोकसभा सांसदों में से 20 ने एक साथ पार्टी आलाकमान के खिलाफ बगावत कर दी। दलबदल विरोधी कानून की अयोग्यता से बचने के लिए इन बागी सांसदों ने एक कम प्रसिद्ध, पंजीकृत दल ‘नेशनलिस्ट सिटिजन्स पार्टी ऑफ इंडिया’ (NCPI) में अपने पूरे गुट का विलय कर दिया। लोकसभा अध्यक्ष को पत्र लिखकर केंद्र की सत्तारूढ़ एनडीए सरकार को समर्थन देने का यह फैसला केवल एक तकनीकी विलय नहीं है, बल्कि ममता बनर्जी के एकछत्र नेतृत्व को दी गई अब तक की सबसे बड़ी चुनौती है। एनडीए के पाले में 20 सांसदों के खड़े हो जाने से यह साफ हो गया है कि टीएमसी सियासत के दिन अब पूरी तरह लद गए हैं। इस टूट ने संसद में ममता बनर्जी की ताकत को बेहद सीमित कर दिया है।
झटका नंबर 4: नेता प्रतिपक्ष के रूप में ऋतब्रत बनर्जी को मान्यता
टीएमसी की आंतरिक राजनीति के बीच विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष के मुद्दे ने एक नया मोड़ ले लिया। विधानसभा अध्यक्ष रथिन बोस द्वारा बागी टीएमसी विधायक ऋतब्रत बनर्जी को नेता प्रतिपक्ष के रूप में मान्यता देने के फैसले को चुनौती दी गई, लेकिन हाई कोर्ट ने इस फैसले पर अंतरिम रोक लगाने से इनकार कर दिया। इस घटनाक्रम ने राजनीतिक बहस को और तेज कर दिया है। विरोधी दल इसे टीएमसी के अंदर बढ़ती असहमति का संकेत बता रहे हैं, जबकि पार्टी इसे राजनीतिक साजिश के रूप में प्रस्तुत कर रही है। लेकिन इतना तय है कि इस विवाद ने ममता बनर्जी के खिलाफ एक नया राजनीतिक मोर्चा खोल दिया है।
झटका नंबर 5: सुरक्षा अधिकारी की वापसी ने बढ़ाई चर्चाएं
ममता बनर्जी की सुरक्षा में लगभग दो दशक से तैनात रहे उनके निजी सुरक्षा अधिकारी को हटाकर मूल विभाग में वापस भेजे जाने की घटना ने भी राजनीतिक गलियारों में चर्चाओं को जन्म दिया है। हालांकि प्रशासनिक स्तर पर अधिकारियों के तबादले और तैनाती में बदलाव सामान्य प्रक्रिया का हिस्सा माने जाते हैं, लेकिन जब किसी नेता के साथ लंबे समय तक जुड़े अधिकारी को हटाया जाता है तो राजनीतिक हलकों में इसके विभिन्न अर्थ निकाले जाने लगते हैं। विपक्ष इस घटनाक्रम को भी ममता के बदलते राजनीतिक माहौल से जोड़कर देख रहा है।
झटका नंबर 6: महागठबंधन की राजनीति में कमजोर पड़ती दावेदारी
राष्ट्रीय राजनीति में ममता बनर्जी लंबे समय से स्वयं को विपक्ष की सबसे प्रभावशाली नेताओं में स्थापित करने की कोशिश करती रही हैं। कांग्रेस की लगातार चुनावी पराजयों और राहुल गांधी के नेतृत्व को लेकर उठते सवालों के बीच यह माना जा रहा था कि यदि ममता बनर्जी एक बार फिर पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में प्रचंड जीत दर्ज करती हैं, तो वे विपक्षी महागठबंधन में अधिक निर्णायक भूमिका की दावेदारी कर सकती हैं। लेकिन बगावत से टीएमसी को विधानसभा और लोकसभा दोनों स्तरों पर राजनीतिक नुकसान हुआ है। इसलिए विपक्षी गठबंधन में ममता बनर्जी की दावेदारी भी स्वाभाविक रूप से कमजोर पड़ गई है। राष्ट्रीय राजनीति में नेतृत्व केवल व्यक्तिगत लोकप्रियता से नहीं, बल्कि चुनावी सफलता, संगठन की मजबूती और सांसदों की संख्या से तय होता है। इसी कारण पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी के लिए राजनीतिक लड़ाई अब केवल राज्य तक ही सीमित रह गई है।
झटका नंबर 7: भ्रष्टाचार के आरोपों और जांच एजेंसियों के शिकंजे ने बढ़ाई मुश्किलें
विधानसभा चुनाव में मिली राजनीतिक चुनौती के बाद टीएमसी की परेशानियां केवल संगठनात्मक टूट तक सीमित नहीं रहीं, बल्कि भ्रष्टाचार और अन्य मामलों में उसके कई वरिष्ठ नेताओं पर कार्रवाई ने भी पार्टी की मुश्किलें बढ़ा दीं। पूर्व खाद्य मंत्री ज्योतिप्रिय मलिक पहले से ही कथित राशन वितरण घोटाले में जांच एजेंसियों के शिकंजे का सामना कर रहे हैं, वहीं पूर्व मंत्री सुजीत बोस को नगर निकाय भर्ती से जुड़े कथित घोटाले की जांच में कार्रवाई का सामना करना पड़ा। टीएमसी के वरिष्ठ नेता और पूर्व मंत्री मदन मित्र के आवास पर भी नगर निकाय भर्ती मामले में जांच एजेंसियों की छापेमारी हुई। इसके अलावा भांगर विस्फोट मामले में टीएमसी के प्रभावशाली नेता एवं पूर्व विधायक सौकत मोल्ला की गिरफ्तारी तथा स्थानीय निकायों से जुड़े कई नेताओं पर हुई कार्रवाई ने पार्टी की छवि को और झटका दिया। एक समय विपक्ष पर आक्रामक रहने वाली तृणमूल कांग्रेस अब राजनीतिक चुनौतियों के साथ-साथ भ्रष्टाचार के आरोपों और कानूनी लड़ाइयों के दबाव से भी जूझती दिखाई दे रही है।









