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धर्मनिरपेक्ष बुद्धिजीवियों का पाखंड देखिए, केंद्र में बहुसंख्यकवाद और हिन्दू पीएम से परेशानी, लेकिन सिख, ईसाई, मुस्लिम बहुल राज्यों में ‘बहुसंख्यकवाद’ पर चुप्पी

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देश में जिस तरह गांधी परिवार चुनाव आते ही अपना रूप बदलकर मंदिर, गुरुद्वारा, चर्च और मस्जिद का दौरा शुरू कर देता है, उसी तरह धर्मनिरपेक्ष बुद्धिजीवी भी अपने फायदे, स्थिति और स्थान के मुताबिक अपनी प्राथमिकताएं बदल लेते हैं। केंद्र स्तर पर ‘बहुसंख्यकवाद’ उन्हें शोषक के रूप में दिखाई देता है और इसका जमकर विरोध करते हैं। उन्हें बहुसंख्यकों का प्रतिनिधित्व करने वाले एक हिन्दू प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से परेशानी होती है, लेकिन मुस्लिम, सिख, ईसाई बहुल राज्यों में उनका ‘बहुसंख्यकवाद’ का फॉर्मूला लागू नहीं होता है। केंद्र से राज्य में आते ही उनकी धर्मनिरपेक्षता, बहुसंख्यकवाद और अल्पसंख्यकवाद की थ्योरी पूरी तरह से बदल जाती है।

कांग्रेस की वरिष्ठ नेता अंबिका सोनी को पंजाब के मुख्यमंत्री पद का ऑफर दिया गया तो उन्होंने इनकार करते हुए कहा कि केवल सिख ही मुख्यमंत्री होना चाहिए। कांग्रेस मंथन के दौरान कई हिन्दू दावेदारों के भी नाम सामने आए, लेकिन आखिरकार दलित सिख लीडर चरणजीत सिंह चन्नी को राज्य का नया मुख्यमंत्री नियुक्त किया गया। यहां पर किसी धर्मनिरपेक्ष बुद्धिजीवी ने सवाल नहीं उठाया कि पंजाब में सिर्फ सिख ही मुख्यमंत्री क्यों बनेगा ? क्या अल्पसंख्यक समुदाय के किसी व्यक्ति को इस पद पर नियुक्त नहीं किया जा सकता ? 

दरअसल सेक्युलर बुद्धिजीवी यह धारणा बनाने में सफल रहे है कि पंजाब एक सिख बहुल राज्य है, इसलिए यहां पर सीएम अनिवार्य तौर पर सिख होना चाहिए। हालांकि राज्य की 39 प्रतिशत आबादी (2011 की जनगणना के मुताबिक) हिंदू है। यही नहीं, अनुच्छेद 370 हटने से पहले जम्मू और कश्मीर का मुख्यमंत्री भी अनिवार्य तौर पर मुस्लिम होता था, क्योंकि स्थानीय आबादी में मुस्लिमों का दबदबा है। वहीं नागालैंड और मिजोरम का मुख्यमंत्री ईसाई होना चाहिए क्योंकि दोनों राज्यों में ईसाईयों की आबादी ज्यादा है।

सेक्युलर बुद्धिजीवियों ने कभी भी अपनी आवाज या कलम जम्मू और कश्मीर के अल्पसंख्यकों के लिए नहीं उठाई, जिनके लिए भेजा गया करोड़ों रुपया साल दर साल बहुसंख्यक मुस्लिम हड़पते रहे। अविभाजित पंजाब के दो राज्यों (पंजाब और हरियाणा) में बंटवारे के बाद राज्य में कोई भी मुख्यमंत्री हिंदू, ईसाई, जैन या बौद्ध नहीं रहा है। 1966 में रामकिशन अविभाजित पंजाब के आखिरी हिंदू मुख्यमंत्री थे। उसके बाद से हर मुख्यमंत्री जट्ट सिख रहा है।

इसी तरह लक्ष्यद्वीप और बिहार के किशनगंज जैसे मुस्लिम बहुल जिले में मुस्लिम उम्मीदवार ही जीतते रहे हैं। क्या इन मुस्लिम बहुल जिलों में धर्मनिरपेक्षता, बहुसंख्यकवाद और अल्पसंख्यकवाद की थ्योरी लागू नहीं होती ? क्या यहां पर किसी अल्पसंख्यक हिन्दू, सिख और ईसाई की जीत के लिए धर्म और जाति से ऊपर उठकर अपील नहीं की जा सकती है। लेकिन देश के तथाकथित सेक्युलर बुद्धिजीवियों ने ऐसा करने की कभी कोशिश नहीं की, क्योंकि उनकी धर्मनिरपेक्षता खतरे में पड़ जाएगी। इन सेक्युलरों को यहां के अल्पसंख्यक हिन्दू, सिख, ईसाई, जैन और बौद्ध दिखाई नहीं देते हैं। यहां पर इन्हें देश की एकता, अखण्डता और संप्रभुता को खतरा नजर नहीं आता है। 

इन सेक्युलर बुद्धिजीवियों ने अल्पसंख्यक हितों की रक्षा के नाम पर विभाजन को बढ़ावा दिया है। जब केंद्र में कांग्रेस की सरकार थी और इन सेक्युलर बुद्धिजीवियों को बोलबाला था, तो विभिन्न समुदायों में अल्पसंख्यक बनने की होड़ मच गई थी। जिन वर्गों और समुदायों ने हजारों साल से इसी धरती पर सदभाव के साथ सह अस्तित्व की मिसाल पेश की वे खुद को अल्पसंख्यक घोषित कराने पर आमादा हो गए। 2014 में कांग्रेस के नेतृत्व वाली सरकार ने जैन समाज को अल्पसंख्यक घोषित कर दिया। वे सभी जैन जो हिन्दू धर्म के अनुसार ही जीवन जीते रहे जिनके रोटी,बेटी के रिश्ते सनातनी लोगों से आज भी बरकरार है वे सभी अब अल्पसंख्यक हो गए। 

विवेकानंद ने पूरी दुनिया में सनातन धर्म का झंडा फहराया, उनके अनुयायी रामकृष्ण मठ भी खुद को ऐसा ही दर्जा मांगता रहता है, खालसा पंथ के लिए सनातन समाज जिसे हिन्दू भी कहते हैं, ने अपने लोगों को सहर्ष भेजा वह आज अलग धर्म बन गया। कर्नाटक का विधानसभा चुनाव जीतने के लिए कांग्रेस ने वहां की लिंगायत जाति को अल्पसंख्यक घोषित कर दिया। दरअसल अपने कुछ लोगों के लिए रियायतें और सुविधाएं हासिल करने की स्वार्थी सोच इस अल्पसंख्यक दर्जे की चाहत में छिपी है। धर्मनिरपेक्ष संविधान की आड़ लेकर ये बुद्धिजीवी बहुसंख्यक हिन्दुओं की सांस्कृतिक पहचान को ही खत्म करने की साजिश कर रहे हैं।

धर्मनिरपेक्ष बुद्धिजीवी अपनी सुविधा के मुताबिक ‘बहुसंख्यकवाद’ का विरोध करते हैं, ताकि हिन्दुओं को विभाजित कर अल्पसंख्यकवाद का इस्तेमाल कर सके। सच्चाई यह है कि ये धर्मनिरपेक्ष बुद्धिजीवि देश में अल्पसंख्यकों का शासन स्थापित पर अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षा पूरी करना चाहते हैं, क्योंकि ‘बहुसंख्यकवाद’ उनकी महत्वाकांक्षा पूरी करने में सबसे बड़ी बाधा है। ये हिन्दू समाज को विभाजित कर अपनी शक्ति बढ़ाना चाहते हैं। इसलिए ये कभी आदिवासियों को बरगलाकर हिन्दू नहीं होने की आवाज बुलंद कराते हैं, तो कभी जय भीम को बढ़ावा देकर दलित समुदाय को भड़काते हैं।

बीजेपी ने धर्मनिरपेक्ष बुद्धिजीवियों के इस पाखंड को जनता के सामने रखा। 2014 में हिंदुत्व और विकास के प्रतीक बन चुके नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाया। इससे बीजेपी को प्रचंड जीत मिली। लेकिन पांच साल तक इन तथाकथित सेक्युलर बुद्धिजीवियों ने मोदी सरकार को बदनाम करने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ी। कभी अल्पसंख्यक असुरक्षा, असहिष्णुता, मॉब लिंचिंग का मुद्दा उठाया, तो कभी अवार्ड वापसी कर माहौल खराब करने की कोशिश की। इसके बावजूद बीजेपी सरकार 2019 में भारी बहुमत से सत्ता में आई और नरेन्द्र मोदी दूसरी बार देश के प्रधानमंत्री बने। इन बुद्धिजीवियों को बहुत पीड़ा है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी स्पष्ट और निडर होकर बहुसंख्यक हिंदू हितों की रक्षा करते हैं। 

 

 

 

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