भारतीय राजनीति में भगवान श्रीराम केवल करोड़ों लोगों की धार्मिक आस्था और अध्यात्म और का विषय नहीं हैं, बल्कि दशकों से देश की सबसे बड़ी राजनीतिक बहसों के भी केंद्र रहे हैं। पांच सौ सालों के संघर्ष के बाद अयोध्या में राम लला का भव्य-दिव्य मंदिर बना है। अयोध्या आंदोलन से लेकर 9 नवंबर 2019 को आए सर्वोच्च न्यायालय के ऐतिहासिक फैसले, 22 जनवरी 2024 को पीएम मोदी द्वारा प्राण-प्रतिष्ठा और उसके बाद अब मंदिर प्रबंधन से जुड़े हालिया विवादों तक, प्रभु श्रीराम सदा सर्वोच्च रहे हैं और सबके रोम-रोम में समाए हैं। लेकिन इस पूरे दौर में कुछ नेताओं के सार्वजनिक बयानों और राजनीतिक रुख में तेजी से परिवर्तन ने उनके पाखंड को उजागर कर दिया है। इनमें समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव सबसे पहले नंबर पर हैं। उन्होंने अलग-अलग समय पर राम मंदिर, बाबरी विवाद, न्यायिक प्रक्रिया, प्राण-प्रतिष्ठा और अयोध्या को लेकर ऐसे बयान दिए, जिन्हें देखने पर स्पष्ट होता है कि राजनीतिक परिस्थितियों के साथ-साथ उनकी आस्था, बयान और रुख बदलता रहा है। प्रारंभिक वर्षों में जहां वे भाजपा पर राम मंदिर के राजनीतिक उपयोग का आरोप लगाते रहे, वहीं बाद के वर्षों में स्वयं को भगवान राम का भक्त बताया। प्राण प्रतिष्ठा का निमंत्रण ठुकरा दिया और बाद फिर अयोध्या जाने की घोषणा कर दी। अब राम लला मंदिर के चढ़ावे को लेकर सामने आए कथित विवाद पर मुखर प्रतिक्रिया दी। यह परिवर्तन केवल व्यक्तिगत आस्था का प्रश्न है या बदलते राजनीतिक समीकरणों का परिणाम है। प्रभु राम को लेकर उनकी आस्था और राजनीति समय-समय पर बदलती रही है।
आइए, जानते हैं कि सपा सुप्रीमो और पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव राम मंदिर आंदोलन, प्रभु श्रीराम के मंदिर निर्माण से लेकर आस्था की आड़ में क्या-क्या पाखंड कर चुके हैं….
पाखंड नंबर -1: आस्था पर नहीं, कोर्ट के फैसले पर जोर (2017–2019)
अखिलेश यादव के पिता और पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव रामसेवकों पर गोलियां चलवाकर उन्हें लहूलुहान करने के लिए पहचाने जाते हैं। उन्हीं की लकीर पर चलते हुए अखिलेश का भी राम जन्मभूमि विवाद पर स्पष्ट सार्वजनिक रुख यही था कि इसका समाधान केवल न्यायपालिका के माध्यम से होना चाहिए। भाजपा को इसमें किसी प्रकार की राजनीति नहीं करनी चाहिए। उन्होंने अनेक अवसरों पर कहा कि सभी पक्षों को सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय को स्वीकार करना चाहिए। उस समय समाजवादी पार्टी स्वयं को धर्मनिरपेक्ष राजनीति के केंद्र में स्थापित करने का प्रयास कर रही थी और भाजपा पर धार्मिक ध्रुवीकरण का आरोप लगा रही थी।
पाखंड नंबर -2 : सुप्रीम कोर्ट के फैसले का स्वागत (2019)
सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने से पहले तक अखिलेश यादव ने कभी सार्वजनिक रूप से नहीं माना कि प्रभु श्री राम लला का जन्म उसी विवादित स्थल पर हुआ था। 9 नवंबर 2019 को सर्वोच्च न्यायालय का फैसला राम लला के पक्ष में आने के बाद अखिलेश यादव को सोशल मीडिया पर लिखना पड़ा- “जो फैसले फासलों को घटाते हैं, वही इंसान को बेहतर इंसान बनाते हैं।” यह उनके राजनीतिक पाखंड में पहला महत्वपूर्ण परिवर्तन माना गया। उन्होंने फैसले का विरोध नहीं किया, बल्कि सामाजिक सद्भाव पर बल दिया। इससे यह संकेत मिला कि पार्टी अब न्यायालय के निर्णय के बाद नए धार्मिक और राजनीतिक यथार्थ को स्वीकारने के लिए मजबूर हो रही है।
पाखंड नंबर-3: मैं भगवान मानता हूं, लेकिन पूजा नहीं करता
पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की वास्तव में प्रभु श्रीराम की पूजा-अर्चना कोई में आस्था नहीं है। हालांकि इस मामले में अखिलेश यादव इतने यू-टर्न ले चुके हैं कि उन्हें खुद ही नहीं पता कि वह चाहते क्या हैं। एक बार इंटरव्यू में उन्होंने खुद कहा कि मैं भगवान मानता हूं, लेकिन पूजा नहीं करता। जब इसके मीम्स बने तो वे कहने लगे कि हम पूजा करते हैं दिखावा करते हैं। यानि जो लाखों-करोड़ों लोग प्रतिदिन देवालयों में पूजा-अर्चना करते हैं, अखिलेख के मुताबिक वह दिखावा है। फिर अखिलेश को परम ज्ञान की प्राप्ति हुई और कहा- पेज पूजा से बड़ी कोई पूजा नहीं होती। सपा सुप्रीमो यहीं नहीं रूके और एक बार फिर यू-टर्न मारा-कुछ लोग ऐसे हैं, हमें पूजा नहीं करने देते हैं। इंटरव्यू में कह तो दिया और फिर याद आया तो बोले-अरे मैं तो भगवान श्रीराम, श्रीकृष्ण, भगवान शिव और जितनी देवी हैं उनको प्रणाम करके ही निकलता हूं। रोज पूजा करके निकलता हूं। अब यह आप ही तय कीजिए कि अखिलेश के किस पाखंड पर विश्वास किया जाए।
पाखंड नंबर -4: भगवान राम समाजवादियों के हैं (2020)
एक ओर पिता मुलायम सिंह यादव ने कहा था कि अयोध्या में परिंदा भी पर नहीं मार पाएगा। दो दूसरी ओर सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने के बाद दिसंबर 2020 में अखिलेश यादव का यह बयान व्यापक चर्चा में रहा- “भगवान राम समाजवादियों के भी हैं।” उनको भगवान राम के अस्तित्व को मानना पड़ा और उन्होंने यह बोलने का भी पाखंड किया कि समाजवादी पार्टी कभी भगवान राम के विरोध में नहीं रही। जबकि वह समाजवादी पार्टी और उसकी सरकार ही थी, जिसने सैंकड़ों रामभक्तों को बल प्रयोग कर मरवा दिया था। राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक अखिलेश का यह बयान इसकी स्वीकारोक्ति थी कि भाजपा ने प्रभु राम की वास्तविक आस्था से एक बड़ी लकीर खींच दी है। इसलिए अखिलेश को पिछले पांवों पर आना पड़ा है।

पाखंड नंबर -5: भगवान कृष्ण रोज सपने में सरकार बनाते हैं (2022)
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2022 के दौरान, सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने दावा किया था कि भगवान श्रीकृष्ण हर रात उनके सपने में आते हैं और भविष्यवाणी करते हैं कि राज्य में समाजवादी पार्टी की सरकार बनने जा रही है। उन्होंने तंज कसते हुए यह भी कहा था कि असल में समाजवाद का रास्ता ही रामराज्य का मार्ग है। इसके बाद भी, राज्य की आगामी चुनावी तैयारियों के बीच अखिलेश यादव द्वारा एक बार फिर इसी तरह के दावे का जिक्र करते हुए बयान दिए गए।
पाखंड नंबर -6 : प्राण-प्रतिष्ठा के निमंत्रण पर अनर्गल विवाद (2024)
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अयोध्या में प्रभु राम लला की भव्य-दिव्य प्राण प्रतिष्ठा कराई। प्राण-प्रतिष्ठा समारोह के समय पहले अखिलेश यादव यह कहते रहे कि उन्हें तो निमंत्रण ही नहीं मिला है। हालांकि उन्हें बकायदा आयोजकों की ओर से प्राण-प्रतिष्ठा समारोह का निमंत्रण दिया गया था। निमंत्रण मिलने पर उन्होंने ट्रस्ट का धन्यवाद तो किया, लेकिन 22 जनवरी के राम लला के समारोह में शामिल नहीं हुए। यानि जब तक निमंत्रण पत्र नहीं मिला था, तब तक को उनमें राम की चाहत थी, लेकिन निमंत्रण पत्र मिलते ही आस्था गायब हो गई। उनके बयानों का प्रपंच और पाखंड जनता के सामने आ गया।

पाखंड नंबर -7: प्राण-प्रतिष्ठा के बाद मूर्ति भगवान का स्वरूप बन गई
सपा सुप्रीमो में जब देखा की प्राण-प्रतिष्ठा का भव्य-दिव्य समारोह हुआ है और प्रभु श्रीराम की दुनियाभर में जय-जयकार हो रही है, तो अखिलेश यादव का नया पाखंड जाग गया। आखिरकार प्राण-प्रतिष्ठा के बाद अखिलेश यादव ने सार्वजनिक रूप से माना कि कि अब राम लला का विग्रह दिव्य स्वरूप प्राप्त कर चुका है। यह बयान इसलिए चर्चा में आ गया क्योंकि इससे पहले विपक्ष के कई नेता समारोह को लेकर अलग-अलग आपत्तियां उठा रहे थे।
पाखंड नंबर -8: रामलला के दर्शन-पूजन की घोषणा
एक ओर अखिलेश यादव कह चुके थे कि मैं भगवान को मानता हूं, पूजा नहीं करता। दूसरी ओर जब उन्होंने देखा का प्राण-प्रतिष्ठा के बाद जनसैलाब अयोध्या में उमड़ रहा है, तो उन्होंने कहा कि वे अपने परिवार के साथ अयोध्या जाकर रामलला के दर्शन-पूजन करेंगे। यह बयान उनके पहले के अपेक्षाकृत दूरी बनाए रखने वाले रुख से अलग माना गया। इस पाखंड से अखिलेश ने यह संदेश देने का प्रयास किया कि समाजवादी पार्टी धार्मिक आस्था भी मानती है।
पाखंड नंबर -9: अयोध्या के विकास पर राजनीतिक प्रतिस्पर्धा
पिता मुलायम सिंह को तुष्टिकरण की राजनीति के चलते अयोध्या को प्रभु श्रीराम की नगरी बनने देने के ही खिलाफ रहे। लेकिन जब अखिलेश की राजनीति में दाल न गली तो 2025–26 के दौरान अखिलेश यादव ने कहा कि यदि समाजवादी पार्टी सत्ता में आई तो अयोध्या को “सियाराम धाम” के रूप में और बेहतर विकसित किया जाएगा। यह भाजपा के विकास मॉडल के समानांतर अखिलेश यादव का नया पाखंड था।
पाखंड नंबर -10: भाजपा पर राम के राजनीतिक उपयोग का आरोप
रामलला के प्रति खुद श्रद्धा का दिखावा करने के साथ-साथ अखिलेश लगातार यह भी कहते रहे कि भाजपा भगवान राम के नाम का राजनीतिक लाभ उठाती है। इस प्रकार उनका सार्वजनिक संदेश दो स्तरों पर चलता रहा। एक ओर राम के प्रति सम्मान, दूसरी ओर भाजपा की रणनीति की आलोचना।
पाखंड नंबर -11: चढ़ावा विवाद पर नौ सौ चूहे खाकर हज पर जाने की कहावत
इतने पाखंड करने के बाद अब सपा सुप्रीमो अखिलेश यादव राम मंदिर के चढ़ावे को लेकर कथित अनियमितताओं के आरोप सामने आने के बाद भाजपा सरकार पर श्रद्धालुओं की आस्था के साथ खिलवाड़ करने का आरोप लगा रहे हैं। यह एक तरह से नौ सौ चूहे खाकर हज पर जाने की कहावत चरितार्थ हो रही है। हाल के भाषणों में अखिलेश यादव लगातार यह बोल रहे हैं कि भगवान राम किसी दल विशेष के नहीं हैं। उनका कहना रहा कि भाजपा और भगवान राम को एक ही राजनीतिक प्रतीक के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। यही उनकी वर्तमान राजनीतिक लाइन का केंद्रीय आधार बन चुका है।









