संसद का 2026 मॉनसून सत्र एक बार फिर देश के सामने दो विपरीत तस्वीरें लेकर आया। एक तरफ जहाँ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में सरकार देश के विकास को गति देने वाले कानूनों को आगे बढ़ाने में जुटी रही, वहीं दूसरी तरफ दिशाहीन विपक्ष ने केवल राजनीतिक स्वार्थ के लिए संसद को बंधक बनाने का प्रयास किया। विपक्ष के अड़ियल रवैये के कारण निर्धारित 133 घंटों में से लोकसभा महज 17.5 घंटे (उत्पादकता केवल 15-16%) और राज्यसभा करीब 37 घंटे (उत्पादकता 33%) ही चल सकी। इस तरह कुल 7,023 मिनट बर्बाद हुए और देश के 175 करोड़ रुपये पानी में बह गए। लेकिन इस अभूतपूर्व रुकावट के बावजूद, मोदी सरकार ने अटूट इच्छाशक्ति दिखाते हुए 12 महत्वपूर्ण बिल पास कराकर यह साफ कर दिया कि देश की प्रगति को रोकना नामुमकिन है।
1. हंगामे के बीच भी जारी रहा ‘विकास पथ’: 12 जनहितैषी बिल पास
विपक्ष का मकसद केवल सदन की कार्यवाही को ठप करना था, लेकिन मोदी सरकार की प्राथमिकता देश का विकास रही। अभूतपूर्व शोर-शराबे और विपक्ष के गैर-जिम्मेदाराना रवैये के बावजूद सरकार ने लोकसभा और राज्यसभा मिलाकर 12 महत्वपूर्ण बिलों को पास कराया। यह मोदी सरकार की कार्यकुशलता को दर्शाता है कि संसद में रोड़े अटकाने की कोशिशों के बाद भी जनता के हित से जुड़े विधायी काम नहीं रुके।
Hon’ble Union Minister of Parliamentary Affairs & Minority Affairs Shri @KirenRijiju ji addresses a Press Conference in New Delhi. https://t.co/EuA7wPHwRY
— Office of Kiren Rijiju (@RijijuOffice) August 13, 2026
2. 175 करोड़ की बर्बादी: जनता के खून-पसीने की कमाई पर पानी
संसद के मॉनसून सत्र 2026 में दोनों सदनों के लिए लगभग 133-133 घंटे निर्धारित थे। लेकिन विपक्ष के हंगामे के कारण लोकसभा में केवल 17.5 घंटे ही कामकाज हो सका, जिससे लोकसभा की उत्पादकता गिरकर मात्र 15-16% रह गई। वहीं राज्यसभा में भी केवल 37 घंटे काम हो पाया और उत्पादकता महज 33% सिमट गई। 7,023 मिनट का कीमती समय नष्ट होने से जनता के गाढ़ी कमाई के 175 करोड़ रुपये बर्बाद हुए। जनता पूछ रही है कि उनके टैक्स के पैसे पर ऐसा गैर-जिम्मेदाराना रवैया क्यों?
3. बहस से भागने की पुरानी आदत: क्यों चर्चा से डरता है विपक्ष?
संसद संवाद और स्वस्थ बहस के लिए बनी है। सरकार हमेशा हर मुद्दे पर सार्थक चर्चा के लिए तैयार रहती है, लेकिन विपक्ष के पास ठोस तर्कों और तथ्यों का अभाव होता है। अपनी वैचारिक कंगाली को छुपाने के लिए विपक्ष हर बार वेल में आकर हंगामा करने और वॉकआउट करने का आसान रास्ता चुनता है।
संसद चलने के हर एक मिनट में करदाताओं के ₹2.5 लाख रुपये खर्च हो रहे हैं।
पवन खेड़ा संसद के बाहर खिलौने का बंदर हाथ में लेकर चिल्ला रहे हैं—⁰🗣️ “56 इंच का छोटा बंदर, जल्दी आओ सदन के अंदर।”
पिछले 20 दिनों में करोड़ों रुपये बर्बाद हो चुके हैं क्योंकि सदन को सर्कस बना दिया गया है।… pic.twitter.com/ncCF7xosMB
— Manoj Singh (@PracticalSpy) August 13, 2026
4. रुकावट की राजनीति का पुराना इतिहास: यूपीए काल का ‘ब्लैक रिकॉर्ड’
संसद को ठप करने और देश की प्रगति को रोकने का यह विपक्ष का नया पैंतरा नहीं है। यदि इतिहास उठाकर देखें, तो जब भी देश के सामने महत्वपूर्ण नीतियां लाने का समय आया, विपक्ष ने केवल गतिरोध पैदा किया। देश के विकास में रोड़ा अटकाने की यह मानसिकता सालों से चली आ रही है।
5. 2010 का शीतकालीन सत्र: जब कांग्रेस सरकार में खुद ठप हुई थी संसद
इतिहास गवाह है कि 2010 के शीतकालीन सत्र में 2G घोटाले जैसे ऐतिहासिक भ्रष्टाचार के मामलों पर जब देश जवाब मांग रहा था, तब पूरा सत्र हंगामे की भेंट चढ़ गया था। जो दल अपने शासनकाल में बड़े-बड़े घोटालों के कारण संसद नहीं चला सके, वे आज लोकतंत्र और संसद की गरिमा की दुहाई देते हैं।
6. 2012 का गतिरोध: लोकपाल और राष्ट्रमंडल खेलों के घोटालों पर पर्दा डालने की कोशिश
2012 के मॉनसून सत्र में कॉमनवेल्थ गेम्स घोटाले और लोकपाल जैसे मुद्दों पर देश में आक्रोश था। उस दौरान निर्धारित 60 घंटों में से मात्र 23 घंटे ही काम हो सका था। जो लोग खुद अपने दौर में भ्रष्टाचार पर चर्चा से बचते रहे, आज वही संसद की उत्पादकता पर सवाल खड़े करने का दुस्साहस कर रहे हैं।
7. 2015 मॉनसून सत्र: मोदी सरकार के शुरुआती सुधारों को रोकने का षड्यंत्र
2014 में जब देश ने पूर्ण बहुमत की मोदी सरकार चुनी, तब से ही पराजित विपक्ष ने जनादेश को स्वीकार करने के बजाय संसद में रोड़े अटकाना शुरू कर दिया। 2015 का मॉनसून सत्र इसका प्रत्यक्ष प्रमाण था, जहाँ केवल 46 फीसदी काम होने दिया गया ताकि देश के आर्थिक सुधारों की गति धीमी हो सके।
8. 2016 का नोटबंदी पर हंगामा: काले धन पर प्रहार से तिलमिलाया विपक्ष
जब पीएम मोदी ने काले धन और समानांतर अर्थव्यवस्था पर ऐतिहासिक सर्जिकल स्ट्राइक (नोटबंदी) की, तो विपक्ष पूरी तरह बौखला गया। 2016 के शीतकालीन सत्र में 92 घंटे का बहुमूल्य समय केवल इसलिए बर्बाद किया गया क्योंकि विपक्ष को देश हित से ज्यादा अपने राजनीतिक हितों की चिंता थी।
9. 2018 का दोहरा हमला: राफेल पर फैलाया गया झूठ, लेकिन अंततः सच की हुई जीत
2018 के बजट और मॉनसून सत्र में विपक्ष ने देश की सुरक्षा से जुड़े राफेल मुद्दे पर झूठे और मनगढ़ंत आरोप लगाकर संसद का कामकाज बाधित किया। मॉनसून सत्र में मात्र 15 फीसदी काम होने दिया गया। हालांकि, बाद में सुप्रीम कोर्ट से लेकर जनता की अदालत तक विपक्ष का यह झूठ पूरी तरह बेनकाब हुआ।
10. 2023 का मॉनसून सत्र: संवेदनशील मुद्दों पर भी गंभीर नहीं दिखा विपक्ष
2023 के मॉनसून सत्र में जब देश को संवेदनशील मुद्दों पर एकजुटता और परिपक्वता की आवश्यकता थी, तब भी विपक्ष ने राजनीतिक रोटियां सेकने को प्राथमिकता दी। समाधान तलाशने के बजाय चर्चा से भागना और हंगामा करना ही उनकी एकमात्र रणनीति रही।
11. जन-आकांक्षाओं पर भारी ‘नकारात्मक राजनीति’
संसद का हर सत्र देश के करोड़ों युवाओं, किसानों, महिलाओं और व्यापारियों के लिए नई उम्मीदें लेकर आता है। लेकिन विपक्ष की नकारात्मक राजनीति के कारण जनता की समस्याओं और उनके समाधान से जुड़े सवालों को हाशिए पर धकेल दिया जाता है।

12. राष्ट्र-प्रथम बनाम परिवार-प्रथम: दो विचारधाराओं का अंतर
2026 के मॉनसून सत्र ने स्पष्ट कर दिया है कि एक तरफ जहाँ भाजपा और उसके सहयोगी दल ‘राष्ट्र-प्रथम’ की नीति पर चलते हुए हर परिस्थिति में विधायी कार्यों को पूरा कर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ विपक्ष ‘परिवार-प्रथम’ और पार्टी हित को देश हित से ऊपर रख रहा है।
13. डिजिटल इंडिया से लेकर इंफ्रास्ट्रक्चर तक: कानून बनाना बेहद जरूरी
संसद में पास होने वाले 12 बिल केवल कागजी दस्तावेज नहीं हैं, बल्कि ये भारत को 2047 तक विकसित राष्ट्र बनाने की नींव हैं। नए कानून, आर्थिक सुधार और सुरक्षा तंत्र को मजबूत करने के लिए इन बिलों का पास होना अनिवार्य था, जिसे सरकार ने हर हाल में पूरा किया।
14. संसदीय गरिमा को तार-तार करने का प्रयास
संसद के वेल में आकर तख्तियां दिखाना, कागजात फाड़ना और सभापति के पीठ का अनादर करना अब विपक्ष का मानक आचरण बन चुका है। यह न केवल लोकतंत्र का अपमान है, बल्कि देश के उन करोड़ों मतदाताओं का भी अपमान है जिन्होंने अपने प्रतिनिधियों को नीति-निर्माण के लिए चुना है।
आइए देखते हैं कि हंगामे के बावजूद कौन-कौन से महत्वपूर्ण बिल पास हुए…
1. पब्लिक एग्जामिनेशंस (प्रिवेंशन ऑफ अनफेयर मीन्स) अमेंडमेंट बिल, 2026
प्रतियोगी परीक्षाओं में धांधली और पेपर लीक पर पूर्ण विराम लगाने के लिए सरकार यह कड़ा कानून लाई है। इस संशोधन के तहत अनुचित साधनों का प्रयोग करने वाले माफियाओं और सर्विस प्रोवाइडर पर 5 करोड़ रुपये तक के जुर्माने और कड़े कारावास का प्रावधान है। मामलों की त्वरित जाँच के लिए विशेष फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट और स्पेशल टास्क फ़ोर्स गठित की जाएगी। इससे देश के करोड़ों युवा अभ्यर्थियों के भविष्य और उनकी मेहनत को पुख्ता सुरक्षा मिलेगी।
2. टैक्सेशन एंड अदर लॉज़ (अमेंडमेंट) बिल, 2026
यह विधेयक देश में औद्योगिक निवेश को बढ़ावा देने और मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर को मजबूत करने के उद्देश्य से पारित किया गया है। इससे प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष कर प्रणाली को अधिक पारदर्शी, सुव्यवस्थित और डिजिटल-फ्रेंडली बनाने में मदद मिलेगी। वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताओं के बीच यह कानून भारतीय व्यवसायों को वित्तीय स्थिरता प्रदान करेगा। मोदी सरकार का यह कदम देश में ‘ईज ऑफ डूइंग बिजनेस’ को नई ऊंचाइयों पर ले जाएगा।
3. माइंस एंड मिनरल्स (डेवलपमेंट एंड रेगुलेशन) अमेंडमेंट बिल, 2026
खनन क्षेत्र में पारदर्शिता लाने और आधुनिक सुधारों को लागू करने के लिए यह एक बड़ा कदम है। इस कानून के जरिए देश में दुर्लभ और रणनीतिक खनिजों की खोज व नीलामी प्रक्रिया में तेजी आएगी। इससे कैप्टिव खदानों को अपनी अतिरिक्त उपज खुले बाजार में बेचने की आजादी मिलेगी। मोदी सरकार के इस फैसले से खनिज संसाधन के क्षेत्र में भारत आत्मनिर्भरता की ओर तेजी से बढ़ेगा।
4. ट्रिब्यूनल्स रिफॉर्म्स बिल, 2026
अदालतों में मुकदमों के बोझ को कम करने और आम जनता को त्वरित न्याय सुनिश्चित करने के लिए यह सुधार पारित हुआ है। इसके तहत न्यायाधिकरणों के पुनर्गठन और उनके कामकाज को डिजिटल व सुव्यवस्थित रूप दिया जाएगा। इससे प्रशासनिक, आयकर और वाणिज्यिक मामलों का निपटारा समयबद्ध सीमा के भीतर हो सकेगा। न्याय प्रणाली को सुलभ और पारदर्शी बनाना इस कानून का मुख्य ध्येय है।
5. केरला (अल्टरेशन ऑफ नेम) बिल, 2026
केरल राज्य का नाम बदलकर उसकी सांस्कृतिक और ऐतिहासिक पहचान के अनुरूप ‘केरलम’ करने का यह विधेयक संसद से पारित हुआ। यह कानून स्थानीय भाषा, परंपरा और सांस्कृतिक अस्मिता का सम्मान करने की मोदी सरकार की प्रतिबद्धता को दर्शाता है। राज्य विधानसभा द्वारा भेजे गए प्रस्ताव पर केंद्र ने त्वरित कार्रवाई करते हुए इसे कानूनी रूप दिया। यह देश की भाषाई विविधता को सशक्त करने की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम है।

6. नेशनल कोऑपरेटिव डेवलपमेंट कॉर्पोरेशन (अमेंडमेंट) बिल, 2026
‘सहकारिता से समृद्धि’ के संकल्प को साकार करने के उद्देश्य से NCDC अधिनियम में यह बड़ा संशोधन किया गया है। इसके माध्यम से प्राथमिक सहकारी समितियों और ग्रामीण स्तर के संगठनों को सीधे वित्तीय सहायता पहुँचाई जा सकेगी। इससे देश के ग्रामीण इलाकों, पशुपालकों और किसानों की आय में सीधी बढ़ोतरी होगी। सहकारिता आंदोलन को नई मजबूती देने में यह कानून बेहद कारगर साबित होगा।
7. रजिस्ट्रेशन ऑफ बर्थ्स एंड डेथ्स (अमेंडमेंट) बिल, 2026
नागरिक रिकॉर्ड प्रणाली को पूरी तरह डिजिटल और आधुनिक बनाने के उद्देश्य से यह संशोधन पास कराया गया। इससे जन्म और मृत्यु प्रमाण पत्र से जुड़ी सेवाओं का लाभ नागरिकों को बिना किसी प्रशासनिक बाधा और भ्रष्टाचार के सीधे ऑनलाइन मिल सकेगा। प्रामाणिक डेटा के आधार पर सरकारी कल्याणकारी योजनाओं का लाभ पात्र लाभार्थियों तक पहुँचना आसान होगा। यह ‘डिजिटल इंडिया’ की दिशा में एक और बड़ा प्रशासनिक सुधार है।
8. बैंकर्स बुक्स एविडेंस बिल, 2026
डिजिटल बैंकिंग और आधुनिक वित्तीय प्रणाली के इस दौर को ध्यान में रखकर यह महत्वपूर्ण विधेयक पास किया गया। इसके लागू होने से बैंकों के इलेक्ट्रॉनिक डेटा, डिजिटल ट्रांजैक्शन और ऑनलाइन रिकॉर्ड्स को अदालतों में वैध कानूनी साक्ष्य माना जाएगा। यह कानून अनावश्यक कागजी कार्रवाई को समाप्त कर बैंकिंग वित्तीय धोखाधड़ी पर लगाम लगाने में असरदार होगा। आम नागरिकों के डिजिटल वित्तीय लेनदेन की सुरक्षा को इससे बड़ी ताकत मिलेगी।
9. एप्रोप्रिएशन (No. 3) बिल, 2026
देश के बुनियादी ढांचे के विकास और जन-कल्याणकारी योजनाओं को बिना किसी रुकावट के जारी रखने के लिए यह धन विधेयक पारित कराया गया। इसके माध्यम से सरकार को बजटीय आवश्यकताओं के अनुरूप विभिन्न विभागों के लिए आवश्यक फंड जारी करने की मंजूरी मिली। इंफ्रास्ट्रक्चर, स्वास्थ्य, रक्षा और शिक्षा जैसे प्राथमिकता वाले क्षेत्रों में विकास कार्यों की निरंतरता बनी रहेगी। विपक्ष के हंगामे के बाद भी देश के विकास से जुड़े काम नहीं रुकने दिए गए।
10. माइक्रो, स्मॉल एंड मीडियम एंटरप्राइजेज डेवलपमेंट (अमेंडमेंट) बिल, 2026
छोटे और मध्यम उद्योगों (MSME) को उनके बकाये भुगतान की समस्या से मुक्ति दिलाने और उन्हें वित्तीय सुरक्षा देने के लिए यह बिल लाया गया। इससे छोटे कारोबारियों का वर्किंग कैपिटल फ्लो बेहतर होगा और उनकी व्यावसायिक क्षमता बढ़ेगी। स्थानीय स्तर पर स्वरोजगार और नए रोजगार के अवसर पैदा करने में यह विधेयक बड़ा उत्प्रेरक बनेगा। देश के छोटे उद्यमियों को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाने की यह मोदी सरकार की बड़ी पहल है।
11. सुप्रीम कोर्ट (नंबर ऑफ जजेज) अमेंडमेंट बिल, 2026
उच्चतम न्यायालय में लंबित पड़े मामलों के त्वरित निस्तारण के लिए जजों की स्वीकृत संख्या में वृद्धि से जुड़ा यह विधेयक पारित किया गया। अध्यादेश के स्थान पर लाए गए इस कानून से शीर्ष अदालत की कार्यक्षमता और न्याय प्रक्रिया में गति आएगी। आम नागरिकों को समय पर न्याय मिलने की संभावनाएँ बढ़ेंगी और न्यायपालिका पर मुकदमों का बोझ कम होगा। देश की न्यायिक व्यवस्था को सुदृढ़ करने में यह संशोधन मील का पत्थर है।
12. इनकम-टैक्स (अमेंडमेंट) बिल, 2026
आयकर व्यवस्था का सरलीकरण करने और करदाताओं को अनावश्यक नोटिसों व जटिल प्रक्रियाओं से राहत देने के लिए यह संशोधन विधेयक पास कराया गया। यह कानून ईमानदार करदाताओं को प्रोत्साहित करता है और अनुपालन प्रक्रिया को पूरी तरह पारदर्शी बनाता है। इससे देश में निवेशकों का भरोसा बढ़ेगा और कर प्रशासन अधिक मित्रवत बनेगा। कर प्रणाली को सुगम बनाकर अर्थव्यवस्था को गति देने की दिशा में यह सरकार का एक ठोस प्रयास है।
काम करने वालों और काम रोकने वालों का फर्क जनता के सामने साफ!
2026 का मॉनसून सत्र भारतीय संसदीय इतिहास में एक ऐसे अध्याय के रूप में दर्ज हो गया है, जहाँ एक तरफ विपक्ष की गैर-जिम्मेदाराना राजनीति ने देश का समय और पैसा दोनों बर्बाद किया, तो दूसरी तरफ मोदी सरकार ने अडिग रहते हुए 12 विधेयक पारित कराकर देश हित को सर्वोपरि रखा। विपक्ष भले ही नारों और हंगामे के जरिए देश के विकास की रफ्तार धीमी करने की कोशिश करे, लेकिन जन-कल्याण के प्रति समर्पित यह सरकार हर बाधा को पार कर देश को ‘विकसित भारत’ बनाने के संकल्प पर आगे बढ़ती रहेगी। आगामी चुनावों में देश की जागरूक जनता इस बर्बादी और काम रोकने की राजनीति का जवाब अपने वोट से जरूर देगी।









